मंगलवार, 23 अगस्त 2016

मुंह फुलाने की वजह


लालकिले से भाषण हो गया।हर बरस ऐसा ही होता है।इस बार अनेक समानांतर भाषण भी  हुए।एक से बढ़ कर एक।तब यह देशज कहावत बड़ी याद आई-शेर का भाई बघेरा,एक कूदे तीन दूजा कूदे तेरा।एक भाषण तो फिर भी डेढ़ दो घंटे चलने के बाद थम गया था लेकिन तमाम किस्म के अन्य भाषण उपसंहार तक पहुंचे बिना अभी तक जारी हैं।यह सोशल मीडिया का ईजाद किया सोप ऑपेरा है। इस बीच साक्षी और सिन्धु ने ओलम्पिक में देश का नाम रोशम कर दिया। 'बहरहालके उपसर्ग के बाद रुके हुए भाषण फिर शुरू हो लिए जैसे टीवी पर कमर्शियल ब्रेक के बाद धारावाहिक पुन: चल पड़ें  ,अपनी गति से।अपनी धुन में रोते कलपते और रह रह कर चीत्कार करते ।
लालकिले वाले भाषण के साथ साथ जो वनलाइनर ट्रौल’ कर रहे थे,वे कुछ इस तरीके के थे जैसे फर्स्ट डे फर्स्ट शो में फिल्म देखने आया हुआ कोई फिल्म समीक्षक टाइप का  अतिउत्साही दर्शक आगे से आगे फिल्म के कथानक का अंदाज़ा लगाता और आवाज़-ए-बुलंद उसका ऐलान करता  चले।हर मामले में अटकल लगाना हमारा नेशनल पासटाइम है जिसमें  हम पूरी मारक भावना के साथ खिलवाड़ करते हैं.वस्तुतः यह वह  खेल है जिसमें बंद लिफाफे में रखे अलिखित खत का  मज़मून भांपा जाता है। सिर्फ भांपा ही नहीं जाता ,उसकी व्याख्या भी की जाती है. यह खेल यदि ओलम्पिक में रहा होता तो हम कभी का रियो से गोल्ड मैडल लेकर स्वदेश आ गये होते।इसमें हमारे समक्ष टिकने वाला कोई न होता.
इतना  लंबा चौड़ा भाषण सुनने के बाद भी कुछ पारखी कह रहे हैं कि लो जी,अपने भाषण में मान्यवर ने सोलर कुकर,गोबर गैस प्लांट और चाइनीज़ मांझे के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं।कोई कह रहा है कि उन्हें कम से कम आलू टिक्की बर्गर के बढ़ते दामों और ब्रांडेड पिज्जा में घटते कुरकुरेपन पर तो कुछ न कुछ कहना ही चाहिए था।उन्होंने गिलगिट तक का जिक्र कर दिया तो क्या उन्हें रंग बदलने वाले गिरगिटों की बढ़ती जनसंख्या पर अपनी चिंता जगजाहिर नहीं करनी चाहिए थी?बलूचिस्तान की बात के साथ उन्हें अलूचे की खेती और उसके समर्थन मूल्य पर भी अपनी राय जनता के सामने रखनी चाहिए थी.सबके पास कोई न कोई चिंता है और मुंह को गुब्बारे की तरह फुलाने के लिए तमाम पुख्ता वजह।
भाषण के कंटेंट को लेकर कुछ तो इस तरह उदास और उत्तेजित हैं जैसे उनके टिफिन को कोई दुष्ट कौआ चुपके से ले उड़ा हो।जैसे किसी ने बिना पेंच लड़ाये ही उनकी आसमान चूमती  पतंग की डोर की हत्थे से काट दिया हो।ऐसे भी लोग हैं जो इस कदर कुपित है कि यदि  उनका बस चले तो मान्यवर को सफाई का मौका दिए बिना खड़े-खड़े ही बर्खास्त  कर दें।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

मेरी आतुरता और देशभक्ति के सस्ते विकल्प

स्वतंत्रता दिवस बेखटके चला आ रहा है। जगह-जगह झंडे और डंडे बिक रहे हैं। लोग मोल-तोलकर खरीद रहे हैं। 69 साल के आजाद तजुर्बे से हमने सीखा है कि ठेली पर जाकर सब्जी खरीदो या इलाज के लिए अस्पताल जाओ; गुमटी से पान लगवाओ या बच्चे का बीटेक में एडमिशन करवाओ, मोल-भाव जरूर करो, वरना ठग लिए जाओगे।
हालांकि इसके बावजूद हम अक्सर ठग लिए जाते हैं। वैसे भी, दूध पीते हुए मुंह उन्हीं का जलता है, जो फूंक-फूंककर घूंट भरते हैं। स्वतंत्रता दिवस के बारे में सोच-सोचकर मेरा मन भी न जाने कैसा-कैसा हो रहा है। मुझे पहले तो लगा कि मेरा मन एसिडिटी के प्रकोप से अनमना हो रहा है। कुछ कैप्सूल भी निगले, लेकिन हुआ कुछ नहीं। दिल के भीतर देशभक्ति के भाव वैसे ही उमड़ रहे हैं, जैसे कोल्ड ड्रिंक में नमक मिलाने पर झाग। मैं भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कुछ कर गुजरने के लिए आतुर हूं। मेरे पास सीमित विकल्प हैं।
मेरे पास सबसे सस्ता या लगभग मुफ्त का विकल्प तो यह है कि वाट्सएप के जरिये दोस्तों को देशप्रेम से ओत-प्रोत वीडियो या ऑडियो मैसेज भेज दूं। अपने फेसबुक प्रोफाइल पर तिरंगा लहरा दूं। टीवी के सामने बैठकर लाल किले के प्राचीर से आते भाषण को सुनकर आंखों के कोर को पोंछते हुए हथेली पीटूं। इससे फायदा यह होगा कि देशभक्ति के घरेलू प्रदर्शन के साथ-साथ स्वास्थ्य लाभ भी मिल जाएगा। हर्र लगे न फिटकरी, रंग हो जाए तिरंगा।
मैं देशप्रेमी हूं, इसमें तो कोई शक नहीं, मगर वह प्यार भी क्या, जो छलकता हुआ दिखाई न दे? जमाना ही ऐसा है, जिसमें जंगल में नाचने वाले मोर को भी नृत्य कला का प्रमाण देना पड़ता है। मैं असमंजस में हूं। इस मौके पर देशभक्ति के नारों का उद्घोष करने को जी चाहा, तो मैं क्या करूं? क्या जय हिंद, जय भारत या वंदे मातरम जैसे नारे लगा सकता हूं? मैंने जनता से सोशल मीडिया के जरिये पूछा है कि वे बताएं कि इस तरह के नारों को लगाने से मेरी सेक्युलर छवि पर कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा? देखते हैं कि देश की प्रबुद्ध जनता इस बारे में क्या कहती है।

ओलंपिक का समापन और चोर की दाढ़ी में तिनका


रियो ओलंपिक का समापन हुआ। खेल खत्म, पैसा हजम। बच्चा लोग ताली बजाओ। अफसोस से झुकी गर्दनों को फिर अकड़ने दो। अब अगले चार साल तक कोई जोखिम नहीं। आओ अब आरोप-आरोप खेलें। बीच-बीच में जब ऐसा करते हुए मन उकताए, तो पदक जीतने वाली बेटियों की शान में कसीदे काढ़ लेंगे।
मुल्क की जनता को बताते रहेंगे कि हमें सिर्फ गमगीन होना ही नहीं वरन विजय का जश्न मनाना भी आता है। हमें अपने मुकद्दर पर पछताना ही नहीं, गौरवान्वित महसूस करना भी आता है। एक अरब 25 करोड़ लोगों के लिए ये दो पदक ऐसे हैं, जैसे डूबते को तिनके का सहारा। मगर यह ध्यान रहे, अपने यहां चोर की दाढ़ी में भी तिनके का मिथकीय घोंसला पाया जाता है।
जब तक ओलंपिक हुए, तब तक हर रात हम किसी अप्रत्याशित स्वदेशी जीत का सपना लेकर सोए और हर सुबह फेल्प्स या बोल्ट की अप्रतिम जीत की खबर सुनकर जागते रहे। वैश्विक परिदृश्य में खुद को रखकर मानवीय कामयाबी का यशगान करते रहे। लोगों को यह बता-बताकर आश्वस्त होते रहे कि पराजय की आद्र्रता भरे अंधकार में ही उजाले के अंकुर उपजते हैं। हर हार में जीत के अदृश्य गुलदान सजे होते हैं। ‘बेटर लक नेक्स्ट टाइम’ कहने से किसी की देशभक्ति पर सवालिया निशान थोड़े लग जाने वाला है।
खेल खत्म हुए, तो अब लग रहा है कि हमारे भीतर अजीब खालीपन पसर गया है। जैसे बारात चली गई हो और झूठे बरतन,कागज की प्लेट व टिशु पेपर जनवासे में यहां-वहां पड़े रह गए हों। हवा के तेज प्रवाह में खनकते और बिखरते हुए। बात-बात पर मुंह बिसराने वाले बारात बहादुर अनायास निठल्ले हो गए हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि वे अब करें, तो क्या करें? कारवां गुजर गया है, तो चिंतकों ने आंख पर काले चश्मे चढ़ा लिए हैं, ताकि गुबार से सम्यक बचाव हो।
रियो के बाद लोगों की नजर देश की सीमाओं की ओर है। अब उनकी नजर इस फ्रंट के जरिये होने वाले मनोरंजन पर है। खेल न हो, तो यह खींचतान ही सही, कुछ न कुछ तो होना ही है जिंदगी जीने के लिए।

बुधवार, 27 जुलाई 2016

इतिहास का तंदूर


काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है।
शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है।
धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पुरजोर अपील लिए लोग उस खजांची को तलाश रहे हैं,जिनके पास वे अपनी संवेदनशीलता को अपने नाम के इन्द्राज  के साथ उसी तरह जमा कर सकें जिस तरह मांगलिक समारोहों में शगुन  की धनराशि को सदियों से जमा कराये जाने की परिपाटी रही है।
हालात बिगडैल हाथी की तरह बिगड़ते जा रहे है।बिगड़े ही जा रहे हैं।तदबीरों के विविध व्यंजनों से भरी हुई प्लेट घाटी की ओर इस तरह रवाना की जा रही हैं जैसे किसी  समारोह में फूफा या बुआ के रूठ जाने पर उनके पास कुल्फी फलूदा,रबड़ी मलाई या खस का चिल्ड शर्बत भेज दिया जाता है।तजुर्बा बताता है कि जब कोई तरकीब काम नहीं करती तब इसी तरह के घरेलू  नुस्खे या सिर्फ दुआएं ही काम कर जाती हैं।
एक न एक दिन अमन चैन तो बहाल होना ही है।आइये, यदि फिलवक्त करने लायक और कोई काम न हो तो यत्र तत्र सर्वत्र हो रही प्रार्थनाओं में अपनी भागीदारी ही दर्ज करा लें।




इतिहास का तंदूर


काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है।
शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है।
धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पुरजोर अपील लिए लोग उस खजांची को तलाश रहे हैं,जिनके पास वे अपनी संवेदनशीलता को अपने नाम के इन्द्राज  के साथ उसी तरह जमा कर सकें जिस तरह मांगलिक समारोहों में शगुन  की धनराशि को सदियों से जमा कराये जाने की परिपाटी रही है।
हालात बिगडैल हाथी की तरह बिगड़ते जा रहे है।बिगड़े ही जा रहे हैं।तदबीरों के विविध व्यंजनों से भरी हुई प्लेट घाटी की ओर इस तरह रवाना की जा रही हैं जैसे किसी  समारोह में फूफा या बुआ के रूठ जाने पर उनके पास कुल्फी फलूदा,रबड़ी मलाई या खस का चिल्ड शर्बत भेज दिया जाता है।तजुर्बा बताता है कि जब कोई तरकीब काम नहीं करती तब इसी तरह के घरेलू  नुस्खे या सिर्फ दुआएं ही काम कर जाती हैं।
एक न एक दिन अमन चैन तो बहाल होना ही है।आइये, यदि फिलवक्त करने लायक और कोई काम न हो तो यत्र तत्र सर्वत्र हो रही प्रार्थनाओं में अपनी भागीदारी ही दर्ज करा लें।




सोशल मीडिया और अंगूठा छाप लाइक्स का वैभव


यह सोशल मीडिया का  जमाना हैlबधाई से लेकर गालियाँ तक बड़ी आसानी से यहाँ से वहां चली आती हैं,इतनी मात्रा में आती हैं कि लगता है कि इस दुनिया में बधाई  और अपशब्द के सिवा कुछ बचा ही नहीं हैसोशल मीडिया पर किसी के निधन की सूचना आती है तो देखते ही देखते हजारों अंगूठा छाप लाइक्सआ जाते हैंl झुमरीतलैया से खबर मिलती है कि वहां  कोई मैना सरेआम गलियां बकती  है तो पूरा मुल्क  उसकी इस हरकत पर दो खेमों  में बंट कर गहन विमर्श में तल्लीन हो जाता है मैना के इस साहस , दुस्साहस और नादानी पर लोग अपने -अपने तरीके से गम ,गुस्से और तारीफ का इज़हार करते हैं,लेकिन उनमें भी बधाई और गाली किसी न किसी रूप में रहती जरूर हैंlअभिव्यक्ति की इस आनलाइन आज़ादी ने सबको निहायत वाचाल  बना दिया हैlइस डिजिटल स्वछंदता ने तो  बाहुबलियों तक के  नाक में दम कर रखा हैसिर्फ इतना ही नहीं,सोशल मीडिया पर नेशनल लेवल के दबंगों तक की मोहल्ला स्तर  के फूंकची पहलवान तक बड़े मजे से टिल्ली -लिल्ली कर लेते हैंl

आभासी आज़ादी  ने अपने शैशव काल  में गुल खिलाने शुरू कर दिए हैं अधिकांश चिंतक इसके गले में बिल्ली के गले वाली मिथकीय घंटी लटकाने की फ़िराक में हैं हमारे विचारकों को तय मिकदार से अधिक आजादी हज़म ही कहाँ  होती है!
अब यदि इस ऑनलाइन हिमाकत से निबटना है तो खुद को ऑनलाइन करने का हुनर सीखना होगाइस मामले में  डंडे और हथकंडे जैसे किसी दिखावटी खौफ काम नही चलने वाला ऑनलाइन रणबांकुरों का सामना करने  के लिए उनसे ऑनलाइन ही भिड़ना होगा lयदि किसी से मिलना ,बतियाना,प्रणय निवेदन करना या झगड़ना है  तो कृपया व्हाह्ट्स एप ,फेसबुक,मैसेंजर  या ट्विटर पर तशरीफ़ लायें किसी से पुरानी अदावत का हिसाब किताब चुकता  करना हो तो पहले फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज कर दोस्त बनें  और फिर कमेन्ट में तेजाबी बयान लिख कर ‘अनफ्रेंड’ होंअमित्र बनने के लिए पहले मित्रता की पेशकश करनी  ही होगीसोशल मीडिया पर लड़ने -झगड़ने का  अलग विधान  होता है l
अलबत्ता सोशल मीडिया के  ग्लोब में मुहं छुपाने लायक स्पेस नहीं ढूंढें नहीं मिलती,यहाँ सब कुछ सेल्फी वाली आत्ममुग्धता के साथ प्रकट  होता है l

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

ऑनलाइन गंगाजल और डिजिटल आस्था


छन छन कर खबरें आ रही थीं कि अब गंगाजल ऑनलाइन बिकेगा।अब खबर कन्फर्म हुई कि हाँ जी ,बाकायदा ऑनलाइन बुक भी होगा और कैश ऑन डिलीवरी पर मिलेगा भी।अभी यह नहीं पता कि नापसंद होने पर वापस भी होगा या नहीं।लोगों का अनुमान है कि गंगाजल में हमारी युगीन आस्था जुड़ी है इसलिए इसकी कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं होगी।आस्थाएं लहंगे ,चुनरी और नाईट वियर की तरह उसी प्रकार वापस नहीं की जा सकेगी  जैसे खा लेने के बाद रबड़ी और पी लेने के बाद छाछ।रबड़ी खा लेने के बाद मिठास दीघ्रजीवी होती है और छाछ पीने के बाद पेट की ठंडक कालजयी।इसी तरह गंगाजल की पवित्रता सदा बरक़रार रहती है।
अब गंगाजल घर घर आएगा ठीक उसी तरह आएगा जैसे आरती भजन पूजा सामग्री आदि कूरियर से मंगाई जाती हैं।अभी यह नहीं पता कि जल किस ब्राण्ड का होगा।भागीरथ ब्राण्ड का या किसी राजनेता के खानदानी नाम का।तमाम तरह के खनिजों,विटामिनों और आशीर्वाद से भरापूरा।या वह वाला गंगाजल बिकेगा,जिसके बारे में राम तेरी गंगा मैली फिल्म ने भ्रामक अफवाहें फैला रखी है।सम्भव है कि समस्त प्रकार के पापों को धो देने की गारंटी वाले डिटर्जेंटयुक्त जल की आपूर्ति की जाए।हो सकता है कि ऐसा चुल्लू भर डिब्बाबंद पानी  भेजा जाए, जिसमें डूब मरने की मुहावरे वाली सुविधा सहज ही उपलब्ध हो।कौन जाने?
गंगाजल सरलता से  उपलब्ध होगा तो जिन्दगी कितनी निष्कलुष हो जायेगी।चाहे- अनचाहे ,समय-असमय कभी भी अनाचार टाइप कुछ किया और फट से गंगाजल अपने  ऊपर छिडक लिया।किसी पतित (या पतिता) का सान्निध्य हुआ तो  एंटी सेप्टिक गंगाजल से  रगड़ रगड़ कर हाथ पाँव धो लिए और हो गये निष्पाप। एंटी सेप्टिक लिक्विड से केवल शरीर धुलता है और इससे तन के साथ मन का अपराध बोध भी धुल जायेगा।।जाहिर है कि वो लोग जो तपाक से हाथ मिलाने के लिए एहतियातन जेब में सेनेटाईज़र स्प्रे लिए फिरते ते हैं वे तब गंगाजल से अपना काम चला सकेंगे।
यह तो तय है कि गंगाजल जब बिकेगा तो खूब बिकेगा।जाहिर है कि जब बिकेगा तो एक न एक दिन इसकी किल्लत भी होगी।इसलिए अभी से  ही यह पता करना पड़ेगा कि गंगाजल किस –किस मुल्क से इम्पोर्ट किया जा सकता है।इसके कारखाने स्थापित करने के लिए किन किन मुल्कों से एफडीआई  मिल सकती है।जब अरहर की दाल मोजाम्बीक में मिल सकती है तो यकीनन गंगाजल भी तंजानिया या ऐसे ही किसी दीगर मुल्क में सस्ते दामों पर मिल ही जाएगा।जब तक आयात की नौबत आये तब तक निर्यात तो इसका हो ही सकता है।वह दिन दूर नहीं चीन में बना गंगाजल सब जगह बिकने ही लगेगा।
वैसे गंगाजल यदि  डिजिटल फॉर्मेट भी ऑनलाइन मिलने लगे तो क्या कहने।विकल्प तो आस्थाओं के भी होते ही होंगे।दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि कोई भी विचार या वस्तु तभी ग्लोबल होती है जब उसका डिजिटल स्वरुप उपलब्ध हो जाता है।


सोमवार, 18 जुलाई 2016

ठुल्ले और अलौकिक निर्वात में उनका वजूद


अदालत ठुल्ले का मतलब पूछ रही है।समानांतर कोष वाले अरविंद कुमार  जी शब्द को चिमटी से पकड़ कर बड़ी ईमानदारी से उसकी रिहाइश के लिए डिक्शनरी  में उपयुक्त जगह ढूंढ रहे हैं।फ़िलहाल शब्दकोशों में यह शब्द ढूंढें नहीं मिल रहा।इस सबके बावजूद ठुल्ले हर जगह हैं और हरदम हैं।बड़े काम के हैं।निष्काम हैं।उन दुर्लभ स्थानों पर भी है जहाँ न ईश्वर रहता है और न शैतान।इस तरह के अलौकिक निर्वात में भी ठुल्लों का वजूद रहता  है।इसलिए रहता है क्योंकि ठुल्लापन हर हालात में रह लेता है।अपनी निरर्थकता के मध्य बड़े मजे से बना रहता है।वैसे ठुल्ले ही हैं जिनकी वजह से समाज में थोड़ा-बहुत खौफ और ला एंड ऑडर है।हर आपदा के समय इन्हें ही सर्वत्र उपलब्ध ईश्वर की बजाय याद किया जाता है।वे थोड़ा विलम्ब से ही डायल -100 पर बतियाने के लिए मिल भी जाते हैं।आसमानी ताकतों का तो न ही  कोई सर्वज्ञात हेल्पलाइन नम्बर है और न ही उसकी कोई ईमेल आईडी।वेब पोर्टल भी नहीं है।इसका जो पता धर्मग्रन्थों में मिलता  है उस एड्रेस पर तो उसकी जगह तमाम तरह के  बहुरूपिये रहते हैं।
ठुल्ले  है।बाकायदा है।उनका अस्तित्व वास्तविक है।वे  कोई आभासी रूपक नहीं हैं। किसी प्रकार  काव्यात्मक बिम्ब भी नहीं है।उनका कोई अर्थ हो या न हो लेकिन उनका होना निर्विवाद है।उचक्का किसी का सामान छीन कर भागता है तो उस समय दो बाते होती हैं। भागता हुआ उचक्का सोचता है कि कहीं कोई ठुल्ला उसकी दौड़ में टांग न अड़ा दे और लुटा हुआ आदमी सपना देखता है कि अपवाद स्वरुप ही सही उचक्का ठुल्ले की पकड़ में आ जाए।मजे की बात यह है कि कभी-कभी इसी ठुल्ले के कारण लुटेरे का दुस्वप्न और लुटने वाले का  सुंदर सपना  साकार हो जाता हैं। किसी का कच्ची नींद में सपना टूटता है तभी  तो कोई  चाहत पूरी होने का जश्न मनाता है।हमारे अधिकांश उत्सव इसी तरह के चोर-सिपाही के शाश्वत खेल के बाय प्रोडक्ट हैं।
ठुल्ले दरअसल ठुल्ले कहा ही इसलिए जाते हैं क्योंकि वे  हर जगह अकसर ठहलते हुए मिल जाते हैं।पनवाड़ी से मुफ्त में सौंफ लेकर उसे चुभलाते हुए।45 डिग्री सेल्सियस के तापक्रम में गर्म भाप वाली चाय का लुत्फ़ लेते हुए।मूसलाधार बारिश में अपनी टोपी को पौलीथीन की पन्नी से ढंके हुए।सर्द रातों में जमीन पर डंडा फटकार कर झुझलाहट दूर करते हुए।मन ही मन दूरस्थ गाँव में रह रहे बीवी बच्चों और बुजुर्ग माता पिता के कुशलक्षेम के लिए अस्फुट प्रार्थनायें बुदबुदाते हुए।घटाटोप अँधेरे में मोहल्ले के चौकीदार की चारपाई के पैताने बैठ उससे खैनी और चूना मांगते हुए।पार्किंग में खड़ी हुई आपकी चमचमाती हुई गाड़ी को अपने  मैले हाथों से छू कर उसे दागदार सुरक्षा देते हुए।खुलेआम हुई वारदात के बाद प्रत्यक्षदर्शियों की अनभिज्ञता पर चौंकते हुए।इलाके के बाहुबली से रहमदिली की उम्मीद करते हुए।वीआइपी और वीवीआइपी की सुरक्षा के लिए भीड़ को परे धकेलते हुए।अधिकारियों और नेताओं की डांट तथा जनता की दुत्कार को साक्षीभाव से श्रवण करते  हुए।

यह ठुल्ले ही हैं जिनकी वजह से राजनेताओं का खोटा रुआब खरे सिक्के सा खनकता है।यह सच है कि वाकई ठुल्ले का कोई मतलब नहीं है लेकिन इन्हें इस बात की परवाह ही कब है।  

रविवार, 10 जुलाई 2016

खुली चिट्ठी का लिखना और बोतल बंद का रोमांच

आजकल चिट्ठी कौन लिखता है?
हालांकि चिट्ठियां अभी भी लिखी और भेजी तो जाती ही हैं।जब तक यह कायनात है,तब तक लिखा-पढ़ी  तो जारी रहनी ही है।यह अलग बात है कि अब इन चिट्ठियों को ‘मेल’ और लिखी  इबारत को ‘टेक्स्ट’ कहा जाता हैं।ये बिना पर के उड़ लेती हैं और पलक झपकते ही  लैंड भी कर जाती हैं।पर इस तरह की मेल को हाथ में थाम कर कोई नहीं गाता –चिट्ठी आई है,आई है,बड़े दिनों के बाद।
फिर भी कुछ लोग हैं जो चिट्ठी लिखने की जिद पर आमादा हैं।वे बात-बात पर और कभी-कभी बेबात चिट्ठी लिख मारते हैं।और चिट्ठी भी ऐसी वैसी नहीं खुली चिट्ठी।एक जमाना था जब चिट्ठियों की बात ही कुछ और थी।तब खुली चिट्ठियों वाले पोस्टकार्ड से सुखद और दुखद सूचनाओं ,बधाइओं और श्रृद्धांजलियों का आदानप्रदान समभाव से हो जाया करता था।लेकिन असल रोमांच तो बंद लिफाफों  में ही विरजता था।उन दिनों किसी चिट्ठी में यदि यह लिखा आ जाए कि इसे तार समझो और तुरंत आओ तो लोग पहली उपलब्ध बस या रेल से गाँव घर की ओर कूच कर जाते थे।कोई मूढ़मति भी उस तार को तार समझ उस पर गीले कपड़े सुखाने की हिमाकत नहीं करता था।
अब खुली चिट्ठियां हवा में लहरा कर अपने सरोकारों  पर इतराने का वक्त है।पहले वह समय भी गुजरा जब खुली चिट्ठी बंद बोतल में रख कर सागर की धार के साथ यह सोच कर तैरा  दी जाती थी कि वे देर- सवेर जिनके लिए हैं,उन्हें मिल ही जाएँगी।वैसे अमूमन चिट्ठियां बंद लिफाफे में ही अपनी यात्रा तय करती थीं।लेकिन अब जिस मात्रा में खुली चिट्ठी लिखी जा रही हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हम लिफाफा विरोधी युग में प्रवेश कर चुके हैं। अब बाज़ार में शगुन देने वाले सिक्का लगे लिफाफे ही चलन में अधिक है।कुछ दिनों बाद जब निमन्त्रण पत्र पर  बैंक एकाउंट नम्बर और आईएफएससी कोड छापा जाने लगेगा तब इनका भी  निष्प्रयोज्य हो जाना लगभग तय है।
ओपन लैटर और प्यार का खुल्लमखुल्ला इज़हार एक ही सिक्के दो सपाट पहलू हैं।ये चिट्ठियां दरअसल वे  कनकौए हैं, जो तेज हवा में  ऊंचे आसमान  में  खुलकर उड़ते कम और फरफराते अधिक है।


मंगलवार, 5 जुलाई 2016

पे कमीशन का सातवाँ घोड़ा और तलहटी में खड़ा ऊंट


अंतत: पे कमीशन के अस्तबल का सातवाँ घोड़ा छूट निकला।कल तक जो लोग इसे लेकर बड़ी –बड़ी खुशफहमी पाले बैठे थे,वे गमज़दा हैं।उन्हें अब पता लगा  कि खुशफहमी ही दरअसल गलतफहमी होती है। जैसे किसी से प्यार का अहसास-ए-गुल तभी तक मन को भरमाता है जब तक वह मिसेज गुलबदन बनकर बाकायदा रोज लौकी की सब्जी में हींग जीरे का छौंक  नहीं लगाने लगती।दूरस्थ पहाड़ तभी तक नयनाभिराम लगते हैं जब तक उसके नजदीक पहुँच कर आदमी ऊंट में रूपांतरित नहीं हो जाता।तब उसे पता लगता है कि अरे वह तो ऊंचे  पहाड़ की तलहटी में जा पहुंचा एक अदद उदास मसखरा है।
पे कमीशन की रिपार्ट क्या आई ,गंदे नाले के मुहाने पर बने दड़बानुमा मकानों को स्वीमिंगपूल या पार्क फेसिंग विला कहकर बेचने वाले प्रोपर्टी डीलर से लेकर मौत के बाद जीवन को स्वार्गिक आनंद से भर देने का दावा करने वाला बीमा कम्पनी के  एजेंट तक सभी उसी तरह  सक्रिय हो गये हैं जैसे मानसून की पहली बौछार के बाद धरती के भीतर के तमाम जीवजन्तु धरती की सतह पर सक्रिय हो उठते हैं।यकीनन यह पाताललोकवासियों  के लिए मुरादों भरा आभासी मौसम है।बाज़ार के पास करेंसी नोटों से  भरी हुई ‘ओवरसाइज’ जेबों को बेचने के लिए कुछ न कुछ हमेशा मौजूद रहता है।
पे कमीशन  की रिपोर्ट ने बीते ज़माने में  टाइमपास के लिए सुलझाई जाने वाली वर्ग पहेली फिर उपलब्ध करा दी है।सुडुकू के जरिये दिमाग का ताजादम रखने वाले नवपेंशनधारियों के लिए यह रिपोर्ट  महज एक रिपोर्ट ही नहीं वरन सम्पूर्ण मानसिक व्यायामशाला भी है,जिसके जरिये वे अपने-अपने केलकुलेटर पर दिमागी घोड़ों को सरपट दौड़ा और जम्प करा रहे  हैं।बार–बार अलग-अलग फार्मूलों के तहत पेंशन को घटा- बढ़ा कर कभी उदास तो कभी मुदित हो लेते  हैं।
बाकी सब तो ठीक ,लेकिन इस अफवाह ने बड़ी सनसनी फैला दी है कि सरकार यह मार्मिक अपील करके कर्मचारियों को धर्म संकट में डालने वाली है कि वे रेल किराये में सीनियर सिटीजन को मिलने वाली रियायत और गैस सब्सीडी की तरह वेतन वृद्धि लेने से स्वेच्छा से इंकार करके देश के विकास में अपना महती योगदान दे।
कुछ सच भी बिलकुल अफवाहों जैसे लगते जरूर हैं,लेकिन वे निरी अफवाह नहीं होते


गुरुवार, 23 जून 2016

इसरो के सेटेलाईट और एबोनाईट के पुराने रिकार्ड


इसरो ने फिर रिकार्ड तोड़ दिया।एबोनाईट के रिकार्ड वाला पुराना समय होता तो यह सुनते ही इसरार की अम्मी ने पहले तो अपने शैतान बच्चे को कूटना था।इसके बाद इसरार के अब्बा को कोसना था कि इत्ते बड़े हो लिए लेकिन इनका  गानों -शानों को सुनने का शौक न गया।घर भर को इन मुए रिकार्डों का कबाड़खाना बनाये हैं।यह वह वक्त था जब रिकार्ड  बजते कम ठिठकते अधिक थे।घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के, हाय धडके क्यों धडके....टाइप का जब गाना चलता था तो सुनने वालों को पता होता था कि इसे कहीं न कहीं अटकना जरूर है।
समय बदल गया है।अब कोई इसरार बेवजह मार नहीं खाता।रिकार्ड बेआवाज़ टूट जाते हैं।दरअसल टूटते भी नहीं, नये बन जाते हैं।इसरो की तो आदत -सी हो चुकी है पुराने रिकार्ड तोड़ने और नये बनाने की।इसरो के विज्ञानी मेहनत करते हैं।सरकार झटपट अपनी पीठ ठोंक लेती है।विज्ञान अपना काम करता है और  भक्त  लोग इस मौके पर खुश होकर पीपल के पेड़ के नीचे कडुवे तेल के दिये जला आते हैं।यह अलग बात है कि आसमान में काले बादल उमड़ने घुमड़ने के बाद भी नहीं बरसते तो विपक्षी कयास लगा लेते हैं कि हो न हो, ऐसा इसरो के किसी सेटेलाईट की नीयत में खोट की वजह से हुआ है।वरना बादलों की क्या जुर्रत कि जनता कातर हो पुकारे-काले  मेघा पानी दे,पानी दे गुड़धानी दे और वे न बरसें।
इसरो विज्ञान सम्मत तरीके से अपना काम कर रहा है।शाब्दिक तार्किकता में सराबोर कुतर्क भी अपना काम धडल्ले से  कर रहे हैं।इसरो द्वारा प्रक्षेपित सेटेलाईट अपने अपने ऑरबिट में पहुँच कर उसी तरह संधान कर रहे हैं जैसे खचाखच भरी बस में अचानक बैठने के लिए विंडो वाली सीट मिल जाने पर मुसाफिर चैन की सांस और  खर्राटें लेता है।
इसरो के विज्ञानी दनादन रिकार्ड पर रिकार्ड बना रहे है।मौसम विभाग के सुपर कम्प्यूटर फटाफट मौसम के आंकड़े दे रहे हैं।भयानक सूखे  और दरिद्रता से जूझता किसान आसमान की ओर टकटकी लगाये रहता है।उसे वहां न  कोई  सेटेलाईट दिखता है और न कोई दीगर  उम्मीद।हालांकि तमाम मायूसियों के बीच उम्मीद अभी भी जिंदा लफ्ज़ है।


रविवार, 19 जून 2016

उड़ता हुआ पंजाब और हंसती कुर्सी


उड़ता पंजाब आख़िरकार रिलीज हो गयी।एक फिल्म समीक्षक को कहते सुना गया कि यह फिल्म लंबी दौड़ का घोड़ा है।इससे पहले तो यही लग रहा था कि यह फिल्म फिल्म न होकर कोई परिंदा है,जिसके पंख कतरने और न कतरे जाने को लेकर विवाद है।खबर तो यह भी आई थी कि फिल्म रुपहले पर्दे पर आने से पहले ही लीक हो गयी।तब सवाल उठा  था कि यह फिल्म है या किसी स्कूली बच्चे का लंच बॉक्स कि उसमें से परोंठे के साथ रखे अचार में से तेल रिस जाए।
एक समय था जब किस्सा कुर्सी का खूब उड़ा था।जब यह किस्सा चारों ओर मंडरा रहा था तब भी कुछ  लोग सोच रहे थे कि फर्नीचर की दुकान पर जहाँ-तहां बिकने वाली कुर्सी को लेकर इतनी शाब्दिक तलवारें  क्यों भांजी जा रही है।एक ब्रांड की कुर्सी यदि नहीं जंच रही  तो न सही,दूसरी ले आओ।इसी तरह की बात जब किसी ने नाई की दुकान पर सार्वजनिक रूप से कही  तो ग्राहक के बाल कतरता बारबर मास्टर फिस्स से हंसा।उससे भी अधिक जोर से कुर्सी हंसी।देर तक हिचकोले लेती रही।उसका हिलना तब रुका जब बाल कटवाने वाले ने कहा-हे कुर्सी ,यह बात तुम्हारे बारे में नहीं, आज के राजनीतिक हालात पर टिप्पणी है।
उड़ता पंजाब बिना उड़े ही काफी उड़ान भर चुकी है।किसी हसीना के मलमल के दुपट्टे की तरह सोशल मीडिया की  खुली हवा में खूब लहरा ली है।अब वह सिनेमा हॉल के स्क्रीन पर आयी है।गुपचुप देखने का रोमांच खत्म हुआ।कौतुहल तभी तक बरक़रार रहता है जब तक कुछ दबा ढंका या गोपन रहता है।
पंजाब उड़े या अमरीकी ड्रोन या फिर कोई अन्य उपकरण,हर चीज के उड़ने की एक तय सीमा और मियाद होती है। समय समय पर चर्चाओं के नभ पर अलग अलग चीज उड़ती रहती हैं।कल तक पंजाब उड़ रहा था।आज महंगा टमाटर उड़ने में लगा है।हो सकता है कल देशभक्ति पंख तौलने लगे या विश्वप्रेम हिरन की तरह विमर्श के जंगल में कुलांचे भरता दिख जाए।।बदलते वक्त के साथ किरदार बदल जाते हैं।भूमिकाओं में उलटफेर हो जाती है। कहानियों के फॉर्मेट और पात्र बदल जाते हैं,किस्से जस के तस रहते हैं।

शनिवार, 18 जून 2016

मानसून का देरी से आना और उपलब्ध विकल्पों का खुलापन


मौसम विभाग ने बता दिया है कि इस बार केरल में मानसून एक हफ्ता विलम्ब से आएगा।यह बात बताने का उसका अंदाज़ ऐसा रहा जैसे कि मानसून आया तो आया और न आया तो उसके भरोसे मत रहियो।अपने लिए बादल, बरखा, भीगी धरती की सौंधी गंध, रेन डांस, पकौड़ी की चाहत और तरल गरल रूमानी यादों आदि का इंतेज़ाम खुद ही कर लेना।विभाग ने समय रहते चेता दिया ताकि कोई गफलत न रहे।विभाग का काम है जनता को सावधान करना।ठीक उसी तरह से अवगत कराना जैसे दुकान या दफ्तर के बाहर यह बोर्ड लगा देना कि सावधान आप कैमरे की निगरानी में हैं।लेकिन अपने समान की हिफाजत खुद करें।
मौसम विभाग और सरकार की वैधानिक चेतावनी को शायद ही कोई गम्भीरता से लेता हो।जिस तरह हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता आदमी शायद ही सिगरेट की डिब्बी पर छपी ‘स्टेच्युरी वार्निंग’ को देखता या पढ़ता है ,उसी तरह बारिश के मौसम का लुत्फ़ उठाने की इच्छा रखने वाले उमड़ती घुमड़ती बदली के सहारे हाथ पर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहते।वे बारिश से जुड़े प्रत्येक साजोसामान की परफेक्ट व्यवस्था रखते हैं ,जैसे मांगलिक आयोजन पर जी भर उधम मचाने  वाले 'डीजे' के इंतजाम के साथ अपने बत्तीस जीबी की पेनड्राइव में मनभावन संगीत का जखीरा और जेनरेटर के लिए भरपूर  डीजल की व्यवस्था रखते हैं।लब्बेलुबाब यह कि अब लोग हर मौके पर तमाम उपलब्ध विकल्प खुले और उपलब्ध रखते हैं।
बारिश के दिनों वाली  मस्ती के तलबगार जानते हैं कि सावन आये या न आये ,जिया जब झूमे सावन है।वे जिया को झुमाने वाले रसायनों की कीमियागरी में माहिर हैं।सबको पता है कि घोड़े बेचकर मिलने वाली नींद को उनकी फिजिकल खरीद फरोख्त किये बिना चंद मिलीग्राम प्रशांतक की गोली  के जरिये पाया जा सकता है।बारिश के अहसास को पाना भी अब अधिक मुश्किल नहीं।बात सिर्फ मन मस्तिष्क में उठने वाली झुरझुरी की तो है,उसके लिए आवश्यक तामझाम बाज़ार के बंद या खुले दरवाज़ों के पीछे  मिल ही जाते हैं।
अब सचमुच की बारिश का इंतजार सिर्फ कागज की नाव तैराने वाले बचकाने नाविक करते हैं।

मंगलवार, 14 जून 2016

क्रॉस वोटिंग और भोजन-भट्ट की तोंद की परिधि


वे क्रॉस वोटिंग करके बाहर आये तो उनके चेहरे पर गजब का नूर था।आमतौर पर ऐसी चमक क्रीम पॉलिश के बाद  जूतों में परिलक्षित होती है या ब्यूटी पार्लर से बाहर निकलती ‘आंटियों’ के मुखड़े पर दिखती है।मॉर्निंग वॉक पर  आदमी को  टहलाने गये टॉमी की टेल लेंग्वेज(दुम की भाषा) में छलकती है या मुफ्त के मालपुए उदरस्थ करने के बाद भोजन-भट्ट की तोंद की परिधि में दमकती है।लोकतंत्र इसी प्रकार के  प्रसंगों की वजह से खुद  को महिमामंडित करता है।बीच –बीच में राज्यसभा, विधान परिषद आदि के चुनाव न हों तो राजनीति किस कदर एकरस,बोरिंग और बिना घी वाली मूंग की दाल की खिचड़ी हो कर रह जाए।
ऐसे मौकों पर वोट तो सभी डालते हैं लेकिन जो मेधावी होते हैं वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर मताधिकार का इस्तेमाल करते है।पार्टी अनुशासन बड़ी चीज है लेकिन अंतरात्मा उससे भी उपयोगी  वस्तु है।इस वस्तु के इस्तेमाल का अलग विधान और वास्तु शिल्प होता है।आत्मा और जेब का जब परस्पर समन्वय होता है तब ठोस राजनीतिक मतवाद एकदम तरल हो जाते हैं।कोई माने या न माने, यह तरल सहजता ही है ,जिससे जिंस और जिंदगी का कारोबार चलता है।
कहने वाले तो यहाँ तक कहने लगे हैं कि राजनीति में क्रॉस वोटिंग और राजनय में क्रॉस बॉडर टेररिज्म एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं।ऐसा सिक्का जो जब हवा में उछलता है तो मनोवांछित नतीजा ही सामने लेकर आता है।इससे सदा बड़ी-बड़ी बहसों की शुरुआत होती है और अंततः सदाशयता व शुभकामनाओं के साथ उनका उपसंहार हो जाता है।क्रॉस वोटिंग करने वाले ही भली प्रकार जानते हैं कि लीक से हट कर चलने में कितना रूहानी रोमांच और भौतिक रोमांस  निहित होता है।
वैसे क्रॉस वोट करना इतना आसान भी नहीं होता,यह एक कला है।बड़ी मुश्किल से सध पाती है।यह उतना ही अधिक जोखिम से भरा काम होता है जैसे मधुमक्खी  के पैर में डोरा बाँध कर हवा में उड़ाने के लिए उसका डंक निकालना।
कहने को तो क्रॉसिंग का यह  खेल सिर्फ खेल जैसा ही है लेकिन इसमें हरेक नहीं जीतता।बिहार के टापरों की तरह लोग इसमें हीरो बनते-बनते जीरो भी हो जाते हैं।


रविवार, 12 जून 2016

दुर्लभ कलाकृतियां और तसल्ली


अमरीका ने हमारी दुर्लभ कलाकृतियां हमें लौटा दी।दो हजार साल पुराने इस सामान ने हमें अनायास बहुत भावुक कर दिया है।वर्तमान चाहे जैसा हो पर अतीत के गौरव के लेकर हमारी संवेदनशीलता बेमिसाल है। इससे उम्मीद बंधी है कि वह एक न एक दिन हमें ‘वे गुमशुदा दिन’ भी वापस दिलवा देगा, जब परों वाले तोते मैना या गौरेया नहीं,सोने की चिड़िया मुल्क की डाल डाल पर बसेरा करती थीं।जब शेर और मेमने एक ही प्याऊ पर ओक से पानी पीते थे।जब एक ही चूल्हे और हांडी में वेज और नॉनवेज व्यंजन पकते थे।जब पान की दुकानों पर यह नहीं लिखा होता था कि उधार प्यार की कैंची है।जब कैंची सिर्फ गबरू जवानों की मूंछे और लोगों के जेबें तराशने के काम आती थी।जब महिलाओं के गले से उचक्के सोने की चेन नहीं, दिल का चैन लूटने जैसी रोमांटिक वारदात को अंजाम देते थे।जब लोग  तपाक से गले मिलने से पहले एक दूसरे की आस्तीनों की तलाशी नहीं लेते थे।जब मसखरे हंसने हंसाने के लिए अपने मुंह बिचकाने के आलावा भी बहुत –सी अन्य तरह की तरकीब जानते थे। जब दुल्हन, बारात की चढ़त के समय नागिन डांस न होने की स्थिति में, दूल्हे के गले में वरमाला डालने से साफ़ इंकार करने का वैधानिक अधिकार रखती थी।
अमरीका सर्वगुणसंपन्न मुल्क है।उसका बाहुबल असीम है।वह मुल्क के तमाम मवालियों ,दादाओं और भाईलोगों के कुल जमा सामूहिक बल से भी अधिक बलशाली है।उसके हाथ वाकई बहुत लम्बे है।उसके कंधे पर अदृश्य पंख  हैं।ड्रोन की शक्ल में वह किसी भी जगह उड़ता हुआ दिख जाता हैं।कभी कभी नहीं भी दिखता पर अचूक निशाना फिर भी लगा लेता है।सुना है कि अब उसके पास वाचिक परम्परा का एक अग्निवर्षक लीडर भी है, जो अपने भाषणों और उद्घोषणाओं से इतनी आंच पैदा करता है कि वैश्विक परिदृश्य पर चल रहे तमाम शालीन और शीतल विमर्श भाप बन कर उड़ जाने वाले हैं।कहने वाले तो यहाँ तक कह रहे हैं कि वह आने वाले समय में इतनी आग्नेय ऊर्जा पैदा करेगा कि दस बीस विकासशील मुल्कों के पॉवर रिएक्टर उसी से चल जाया करेंगे।वह अपनी उलटबांसियों से आतंकवाद का समूल नाश कर देगा।   
अमरीका ने हमारी कलाकृतियाँ वापस दी हैं तो यकीनन कुछ सोच समझ कर ही दी होंगी।इतने बड़े मुल्क बेवजह कुछ नहीं करते। हो सकता है कि इस ‘फॉरेन-पलट’ चीजों  के जरिये वह हमारे एफडीआई में इजाफ़ा करवाने वाला हो  या ग्रोथ रेट को बढ़वा कर कोई जादुई आंकड़ा पैदा करवाना चाहता हो या सेंसेक्स में अभूतपूर्व बढ़त दर्ज कराके सबको हार्षित करना चाहता हो।कौन जाने? बड़े लोगों की बड़ी बातें!
वैसे अमरीका को यदि आशीर्वाद या उपहार स्वरुप कुछ देना ही है तो वह हमें हमारी विरासत के प्रतीक चिन्हों के बजाए नयनाभिराम टाइप की कुछ डिब्बाबंद तसल्लियाँ, हाईटेक सेल्फी स्टिक और तारीफ़ के चंद रसपगे कथोपकथन ही दे दे।हम तो इनक जरिये भी अपना आज और कल दर्शनीय बना लेंगे।

गुरुवार, 2 जून 2016

खीसे निपोरते टॉपर और अंकपत्रों से टपकते नम्बर


परीक्षाओं के परिणाम आ रहे हैं।निरंतर आये ही जा रहे हैं।एक ओर यत्र तत्र खीसे निपोरते कतिपय टॉपर अपनी मौलिक प्रतिभा से सबको  हतप्रभ करते दिख रहे हैं तो दूसरी ओर सर्वशिक्षा अभियान वाले गली -गली और मोहल्ला -मोहल्ला जाकर ‘चलो स्कूल’ की हांक लगा रहे हैं।बच्चा आनाकानी करता है तो उसे फुसलाते हैं,बहलाते हैं और फिर भी जिद पर अडिग रहे तो जबरन उठाकर वायुमार्ग से स्कूल ले जाते हैं।शैक्षिक कार्यकर्ताओं के दो जोड़ी हाथों के बीच हवा में तैरते ये बच्चे मुल्क के मुस्तकबिल के खेवनहार  हैं।
बच्चा एक बार जब स्कूल जाना शुरू करता है तो कुछ दिनों में  ही वहां रम जाता है।मिड-डे मील आदि  के लिए छीना- झपटी करता हुआ वह अपना हिस्सा हथियाने का हुनर सीख जाता है।बाद में ककहरा सीखने के साथ तमाम तिकड़म भी सीख लेता है।शिक्षकों की खिदमद और चिरोरी करके परीक्षा में मनोवांछित अंक प्राप्त करने का तरीका जान लेता है।बिना ठीक से पढ़े लिखे उत्तर पुस्तिका  में समग्र ज्ञान रोप देने की कला का निष्णात काश्तकार हो जाता है।यही बच्चा  बडा होकर सबसे  अपने बौद्धिक चातुर्य का लोहा मनवाता है।अपने प्रदेश का नाम रोशन करता हैं।अपनी कीर्ति का डंका बजवाता हैं।
आज के दौर में स्कूल कालेज के परीक्षकों से अधिक उदार कोई नहीं है।अब परीक्षक परीक्षा कापियां जांचते हुए अंक उसी तरह लुटाते हैं जैसे कभी गाँव कस्बे के मनचले सिनेमा घर के पर्दे पर नाचती हुए नायिका को देख सिक्के बरसाते थे।वे अंकपत्रों को इतने अधिक नम्बरों से लाद देते हैं कि बोदे कागज पर यदि मार्कशीट का प्रिंट लिया जाए तो हो सकता है कि  दस बीस नम्बर झड़बेरी के बेर की तरह उसमें से नीचे टपक जाएँ।
सच तो यह है कि परीक्षा की मार्कशीट में टंके नम्बर महज नम्बर नहीं वरन शीर्ष पहुँचने के लिए बांस की सीढ़ी में बंधे मजबूत समानांतर  डंडे होते हैं।अब कोई किसी से यह निरर्थक सवाल न पूछे कि यह सीढ़ी उसे मिली तो मिली कैसे ? बिहार के मेधावियों को लेकर उठ रहे सवालों में से यकीनन ईर्ष्या की बू आ रही है।ध्यान रहे, सुशासन की हामी जनता को इस तरह की मीनमेख कतई बर्दाश्त नहीं।
  





गरमी का है व्याकरण और तपती हुई दलील


सूरज आसमान से दनादन आग उगल रहा है।कमरों में लगे एसी शुष्क ठंडी हवा बिखेर रहे हैं।कूलर अपने तरीके से लू के खिलाफ ‘वाटरलू’ में डटे हैं।जहाँ बिजली  की किल्लत है, वे हाथ का पंखा झलते हुए इंद्र देवता और सरकार की अक्षमता पर  सवाल उठा रहे हैं।आरटीआई वाले नेताओं की शैक्षिक योग्यता सम्बंधी सवाल पूछ पूछ कर वातावरण को ठंडाने नहीं दे रहे।खुलासों और विवादों के अगस्ता वेस्टलैंड  हेलिकॉप्टर अपनी लैंडिंग के लिए उपयुक्त स्थान और सही समय तलाश रहे हैं।सवाल बहादुर पानी के लिए मच मच मचाये लोगों से अपने सूचना के अधिकार का अतिक्रमण करते हुए पूछना चाह रहे हैं कि गन्ने के रस को  कोल्ड ड्रिंक से बेहतर को क्यों न माना जाए।
यह यकीनन सूचना प्रधान समय है।नेताओं की स्कूली मार्कशीट से लेकर उनके पालतू कुत्तों को खिलाये जाने वाले बिस्कुटों  की एमआरपी पर तमाम सवाल उठाये जा रहे हैं।लगता यही है कि इसी तरह के मूलभूत प्रश्नों के जरिये जनक्रांति का बिरवा बिना उचित खाद, प्रकाश और पानी के  पनपेगा।आइपीएल-9 में लगने वाले चौके छक्कों के जरिये जनता की दुश्वारियों का समाधान देर –सवेर निकलेगा।अक्षर पटेल की हैट्रिक से पटेल आरक्षण की हार्दिकता फलीभूत होगी।उम्मीद है कि इसी फटाफट क्रिकेट से जाट आरक्षण का कोई सर्वमान्य हल मिल जाएगा।
भयानक सूखे से ग्रस्त और जल संकट से घिरे स्थानों की ओर पनिहारिन रेलगाड़ियाँ जा रही हैं।जो काम मेघों का था वे काम ट्रेन कर रही हैं।लेकिन रेलगाड़ियों के बलबूते यह काम मुकम्मल नहीं होने वाला।इस काम में हवाई जहाजों को भी लगाना चाहिए। तभी तो जनता को पता लगेगा कि रेलगाड़ी वाले पानी और वायुमार्ग से आये वाटर में कितना फर्क होता है।पानी सिर्फ दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग आक्सीजन से मिल कर नहीं बनता है।जल का पृथक  मुक्त बाज़ार और उन्मुक्त राजनय भी  होता है।
गर्मी केवल वही नहीं होती जिसका तापक्रम स्मार्टफोन के बैरोमीटर में दिखाई देता है।गर्मी की तपिश की अपनी राजनीति होती है।इसे जानने ,परखने और अनुभव करने के नाना प्रकार के उपकरण और मानदण्ड होते हैं।
गर्मी के मौसम में सदा गर्मी ही होती रही है,यह सपाट बयानी अब किसी को स्वीकार्य नहीं।
निर्मल गुप्त,208,छीपी टैंक ,मेरठ-250001 मोब.08171522922

 

दो साल का हाल


दो साल बीत गये।सरकार इतने बड़े –बड़े विज्ञापन न छपवाती तो शायद यह बात पता भी  नहीं चलती।आमतौर से सरकारें उसी तरह  दबे पाँव ही चलती हैं जैसे चतुर बिल्ली जो  रसोई में रखी सारी दूध मलाई चट  कर जाए और किसी को भनक तक न लगे।धडाधड़ विकास पर विकास होता चला जाए और उसका अंदाजा  तक किसी को न होने पाए।जैसे बरसात में घास की फसल ऐसी उपजे कि सब तरफ हरा ही हरा दिखने लगे।खर पतवार की ऐसी बढ़वार हो कि पौधों पर लगे फूलों  के समस्त रंग उसकी हरीतिमा में गुम हो जाए।
तो वाकई दो साल पूरे हुए।इतना समय यूँही गुजर गया।सच तो यह है कि वक्त हमेशा इसी तरह गुजरता है।जन्मजात प्रेमी प्रेयसी के आगमन के इंतजार में छज्जे की रेलिंग पर टंगे के टंगे रह जाते हैं और सपनों की अदृश्य पालकी पलक झपकते आँखों  के आगे से बिना कोई सुराग छोड़े गुजर जाती है।लेकिन सरकार नहीं चाहती कि वह चुपचाप समय को बीत जाने दे।उसके पास हर पल को सेलिब्रेट करने का मौका है और दस्तूर भी।अपनी कारगुजारियों के आदमकद विज्ञापनों के परचम लहराने की अपूर्व सुविधा है।सबको पता है कि सरकारी कृत्यों का वैभव उसके सम्यक प्रदर्शन से ही प्रकट होता है।
दो साल बीतने का अहसास हो या न हो लेकिन विपक्षियों को इसका अच्छे से पता था।वैसे भी राजनीति में सत्ता से पृथक हो कर टाईम बड़ी मुश्किल से उसी तरह कटता है जैसे लोडशेडिंग की रात में पसीने में तरबतर आदमी के लिए कंटीली रात  बीतती है।ऐसे विकट समय में सरकार को जन सरोकारों की आड़ में गरियाने से बेहतर वक्तकटी कुछ हो ही नहीं सकती।आप मानें या न मानें, गाली गलौच हमारे मुल्क का सबसे अधिक लोकप्रिय इनडोर और आउटडोर गेम है।आजकल विपक्षी खेमा सरकार को पूरी शिद्दत से लानत भेजने में लगा है।इस समय सरकार को वे लोग पूरे मनोयोग से गाली दे रहे हैं ,जिनको यकीन है कि एक न एक दिन जनता द्वारा चुनी गयी सरकार उनकी चुनिंदा गालियों से  आज़िज़ आकर खुद इस्तीफ़ा दे देगी।
यह वक्त ही कुछ ऐसा है ,जब छाज तो बोले ही बोले वे छलनियाँ भी वाचाल बन जाएँ , जिनमें बहत्तर  छेद।गालियों के साथ बदलाव का राग वे गा रहे हैं, जिनसे कभी अपने घर की दीवार पर लगा फ्यूज़ बल्ब तक नहीं बदला गया। देश दुनिया के मुद्दे उठाने की बात वे कर  रहे हैं,जिनके पाँव दुछत्ती पर रखी कूटनी  को नीचे उतारने की कल्पना मात्र से थरथराने लगते हैं।ऐसे साहसी  रणबांकुरों को अब यकीन हो चला है कि सरकार का तख्ता पलटने में और सांप सीढ़ी के खेल में कोई खास फर्क नहीं होता।जिसे लूडो खेलना आता है वह सांप सीढ़ी भी खेल सकता है और जिसे इस खेल में निन्यानवे के अंक से नीचे लुढ़क कर शून्य पर आने का सदमा सहना आ जाता है ,वह अंतत: राजनीति का निष्णात खिलाड़ी बन जाता है।
तो बात हो रही है,सरकार के लिए लगभग 731 दिन बीत जाने की। इनमें से आधे दिन तो बीत गये सोते -सुलाते,कुछ दिन व्यतीत हुए इधर उधर की ताकझांक में ,काफी समय बरबाद हुआ यत्रतत्र होने वाले शोरगुल से पैदा क्राइसिस के मेनेजमेंट में।मुल्क में जब जब संकट आया तो उसके समाधान  के लिए होने वाली हाईपावर मीटिंग का एजेंडा तय करने में और पडौसियों की हिंसक धूर्तता का शब्दवाणों के जरिये  मुंह तोड़ जवाब देने में।
इस बीच  कुछ थोडा बहुत जो भी काम हुआ,उसे ही पर्याप्त मानने की यदि सरकार जिद कर ही रही है तो उसे  मान लेने में आखिर हर्ज़ ही  क्या है?
 निर्मल गुप्त,208,छीपी टैंक ,मेरठ-250001 मोब। 08171522922



शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

मोबाइल का पैनिक बटन और पैनिकता की फ़िक्र


अब मोबाइल में पैनिक बटन होगा।इस खबर ने बहुत से लोगों के भीतर अदृश्य भय के साथ  नवउत्साह का संचार कर दिया है।पैनिक का हिंदी समानार्थी  त्रास  अमूमन हर बौद्धिक के भीतर कमोबेश संत्रास की शक्ल में मौजूद रहता ही है।यदि इसका मतलब आतंक माना जाए तो पैनिक  यकीनन बड़ी  डिप्लोमेटिक व्यंजना है।कुटिलता से भरीपूरी।पैनिक  की थाह पाने के लिए यदि इसके भावार्थ में गहरे उतरें तो एक अजब हलचल शब्दकोश में यहाँ वहां टहलती दिख जायेगी।लेकिन पैनिक  होने के लिए कोई एक  लफ्ज़  पर्याप्त नहीं है।
पैनिक  बोले तो वो पैनिक  जिसके लिए बटन की जरूरत महसूस हो।बटन भी ऐसा जिसे वक्त-जरूरत झट से दबा कर उसे आलोकित किया  जा सके।बटन दबते ही अपना काम करे।ईवीएम वाला नोटा जैसा बटन न हो,जिसके दबाने या न  दबाने से कोई फर्क ही न पड़ता हो। रेलगाड़ी और बस में रखी उस कम्प्लेंट बुक जैसा भी नहीं जिसकी जब आवश्यकता पड़े तो पता लगे कि वह तो कभी अस्तित्व में आई ही नहीं थी।छाते में लगे उस जंग लगे बटन जैसा न हो ,जिसे बारिश होने पर  दबाते रह जाएँ और वह तब खुले जब काले मेघ पानी बरसा  अगले मोहल्ले की ओर बढ़ लें।
वैसे पैनिक  भी कई आकार,प्रकार और प्रजाति का होता है।कामवाली के सुबह तय समय पर न प्रकट होने पर होने वाला  उद्दात पैनिक ।इस आपदा से निबटने के लिए कोई बटन आजतक इजाद नहीं हुआ।अलबत्ता ऐसी अपरिहार्य स्थिति में भद्रपुरुष टाइप पतियों के कान में पैनिक की घंटी खुद-ब-खुद बज उठती है।एक अन्य तरह का पैनिक  तब भी फैलता है जब संतान युनिवर्सटी में एडमिशन के लिए बाट जोह रही हो और फर्स्ट कटऑफ के सौ प्रतिशत पर अटक जाने की खबर आ जाए।तब संतान इसके निदान के लिए चार छ: लाख रुपये वार्षिक फीस वाले निजी संस्थान का प्रोस्पेक्ट्स मंगाने की फरमाइश कर दे।इस पैनिक  में कोई बटन नहीं सिर्फ सहमति में हिलती हुई गर्दन और प्रोविडेंट फंड की खाता संख्या काम करती है।

अनुमान तो यही है कि मोबाइल के पैनिक  बटन से दिलासा भरा यह संदेश निकलना है कि हम आपकी ‘पैनिकता’ की फ़िक्र  करते हैं।आप समाधान की कतार में हैं।कृपया धैर्यपूर्वक पैनिक होते रहें।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

गुड़गाँव, गुरुग्राम और गुलगुले


गुड़गांव का नाम गुरुग्राम हो गया।गुड़ गुरु बन गया।तमाम शक्करखोर इस बात पर पूर्ण स्वाद भाव के साथ नाराज़ हैं।घंटाल इसे लेकर बेहद उत्तेजित हैं।वैसे टेक्निकली देखा जाए तो गुड़ के गुरु हो जाने में कुछ भी दुरूह नहीं।इसे बोलने में न जुबान अटकती है,न किसी की आस्था का कोई बिंदु फ़िसलता है और न ही महाभारत का युद्ध पुन: छिड़ जाने का कोई आसन्न खतरा उत्पन्न होता है।द्रोणाचार्य ने जब कभी एकलव्य से अंगूठा माँगा होगा तो मांग लिया होगा।अब कोई गुरु ऐसी आलतू -फालतू चीज न तो मांगता है और न ही शिष्य देता है।अलबत्ता जिसे मौका मिलता है वह अंगूठा दिखा देता है।और तो और सबसे बड़ी बात यह कि जब गुड़ न होगा तो लोग क्या  खाकर स्वादिष्ट गुलगुलों से परहेज जैसे फालतू काम करने में अपने समय और ऊर्जा का अपव्यय करते हैं।नाम में ग्राम की फीलिंग होगी तब घरघुसरे टाइप के लोग वृथा ही गॉंव घर को लेकर भावुक भी नहीं होगे।वैसे भी ग्राम हर हाल में गाँव से बेहतर होता है जैसे मक्का के दाने  ‘फुल्ले’ से पॉपकार्न बनकर महिमामंडित होते हैं ठीक उसी तरह।जैसे फटी पुरानी घिसी हुई पतलून फेडिड जीन्स फैशन के रूप में अपनी  पहचान बना लेती हैं। पहचान पुराना लफ्ज़ है ,इसे फैशन स्टेटमेंट कहें तो बेहतर।
गुड़गांव का नाम बदलने पर भाईलोग व्यर्थ ही चिंतित हैं।जलेबी का नाम कचौरी रख लो पर रहेगी तो वह चाशनी में आकंठ डूबी मिठास का संजाल ही।चपरासी अपना नाम यदि अफसर अली रख ले तो क्या वह किसी कम्पनी का सीइओ बन जाएगा।मजदूर अपना नाम ठेकेदार रख ले तो क्या उसके सिर पर रखी ईंटों का वजन घट जाएगा? मक्खी अपना नाम बदल कर गिरगिट रख ले तब भी क्या खतरा होने पर अपना रंग बदल पाएगी? सेठजी का नाम ऐसा हो या वैसा लेकिन उनके नाम प्रताप तब तक जस का तस ही रहना है जब तक उनके नामधारी बैंक के खाते और तिजोरी धन से लबालब भरे है।ध्यान रहे नाम सिर्फ नाम ही होते है।न इससे अधिक न इससे कम।हालांकि शेक्सपियर ने अरसा हुआ कहा था कि नाम में क्या धरा है।लेकिन बाज़ार कहता है कि सब नाम का ही तो किया धरा होता है।जब नाम का डंका बजता है तो सब चलता है।बाज़ार के आगे किसी की नहीं चलती।उसके आगे सबको घुटने टेकने होते हैं।
गुरुग्राम बेहद पवित्र -सा नाम लगता है।हमारी अर्वाचीन संस्कृति और माटी में रचा बसा।यह नाम ही ऐसा है कि धार्मिकता में ओतप्रोत आदमी इसका नाम भर ले तो हाथ खुद-ब-खुद उठकर आदरभाव से कान को छू लें, जैसे संगीतकार अपने उस्ताद मरहूम का जिक्र करते हुए  अक्सर करते हैं।आजकल इसी तरह के नामों की डिमांड भी है।मिनी स्कर्ट बिकनी आदि बेचने वाले भी अपनी दुकान का नाम लिबास रखते हैं ताकि आधुनिकता के साथ परम्परा का मजबूत गठजोड़ यथावत बना रहे। टू पीस स्विम सूट बेचने वाले बुटीक ‘हया’ के नाम से बड़े मजे से खूब जाने और पहचाने जाते हैं।हया शब्द बतौर ब्रांड नेम फबता  भी बहुत है।वह हया जो  कारोबारी  होती है , उसकी ही ऊँची हवा रहती है।हया हो या बेहया या फिर हवा फरफर कर चलती हुई अच्छी लगती है।
कुछ भी कह लें,वाकई नाम हो तो गुरुग्राम जैसा।जैसे कभी नत्थूलाल की मिथकीय मूंछ हुआ करती थी,जिनके विषय में  यह क्रांतिकारी लोकोक्ति पचलित है कि मूंछे हो तो नत्थूलाल जैसी वरना क्लीनशेव्ड ही भले।इसे इतिहास में हज्जाम के उस्तरे के पक्ष में दिया गया पहला अधिकारिक लेकिन तनिक विरोधाभासी बयान भी माना जाता है।
अब दो नामों के विकल्प हमारे पास है।जब मन कहे कि चलो कुछ मीठा हो जाए तो गुरुग्राम को बड़े लाड़ से गुड़गांव कह लिया वरना गुरुग्राम में गुरूजी वाले आध्यात्मिक सान्निध्य और लॉजिक के जरूरी  तत्व तो मौजूद हैं ही।



बुधवार, 6 अप्रैल 2016

खेल जैसा खेल न हुआ


खेल खेल ही होता है।इसमें एक जीतता तो दूसरा हार जाता है।चुपचाप बैठ कर निरपेक्ष भाव से खेल को सिर्फ निहारने अधिक स्वास्थ्यवर्धक कुछ हो ही नहीं सकता।न दिल जोर -जोर से धडकता है और न मुट्ठियाँ बाँधने या दांत भींचने की जरूरत पड़ती है। कमजोर दिल वालों के लिए हार्ट अटेक का खतरा भी उत्पन्न नहीं होता।देह की शिराओं में रक्त प्रवाह नॉर्मल बना रहता है। और तो और जयकारे लगाने में ऊर्जा का अपव्यय भी नहीं होता।दर्शक जब तक तटस्थ दृष्टा बने रहते हैं तब तक वाकई वे एकदम भद्र पुरुष लगते हैं और खेल एकदम जेंटिलमैन टाइप का स्पोर्ट।कोई जीते,कोई पराजित हो –इससे हमें क्या टाइप का चिंतन उपजता है।
दो टीम के खिलाडियों के खेल कौशल के मध्य जब मुल्क ,जज्बात,राजनीति और बाज़ार आ जाते हैं तब खेल खेल न रह कर छायायुद्ध बन जाता है।यह अलग बात है कि कुछ लोग इसे  देशप्रेम की डिफॉल्ट अभिव्यक्ति कहते और मान कर चलते हैं।यह सबको पता है कि जंग ,मोहब्बत और क्रीड़ापूर्ण हुडदंग में हर बात और वारदात  जायज़ होती है।चीखना चिल्लाना, गाली गलौच, उछलना -कूदना ,हथेली पीटना ,पटाखे फोड़ना आदि भी इसका अपरिहार्य हिस्सा होता है।वैसे कहा और माना तो  यही जाता है कि ऐसे नाज़ुक वक्त पर ही पता लगता है कि किसके भीतर भक्तिभाव के ज्वालामुखी में खौलता हुआ लावा किस मिकदार में है।देशभक्ति और देशद्रोही के सर्टिफिकेट वितरित करने के लिए यह लिटमस टैस्ट का दुर्लभ मौका भी  होता  है और कमोबेश दस्तूर भी।
हमेशा की तरह इस बार भी एक देश की टीम हार गयी।दूसरी जीत गयी।इनाम, इकराम, ट्राफी और ख़िताब जिन्हें मिलने थे मिल  गये।न किसी ने गम से बोझिल अढ़ाई मन के सिर को हथेलियों में थामा,न पुराने टीवी सेट को मीडिया के कैमरों के सामने फोड़ा, न किसी ने लड्डुओं का भोग लगवाया,न घंटे घड़ियाल बजे  और  न कोई क्रिकेट का कुल देवता अवतरित हुआ।न किसी खलनायक बने खिलाड़ी के घर को उन्मादियों ने घेरा।  सिर्फ इतना ही नहीं,कोई ‘शांतिदूत’ पड़ोसी के चकनाचूर हुए टीवी के लिए सद्भावना का ‘क्विक -फिक्स’ देने की पेशकश करता भी दृष्टिगोचर नहीं  हुआ।मानना होगा कि इस बार खेल तो हुआ लेकिन खेल जैसा बाकायदा खेल न हुआ।इकहरा खेल हुआ। खेल के भीतर कई खेल न हुए। यदि हुए  भी हों  तो उनका स्टिंग टाइप का भंडाफोड़ नहीं हुआ। मैदान में हुए खेल तभी सनसनी पैदा करते हैं  जब अदृश्य ताकतें अपना काम ज़रा ढंग से करती हैं।जब दो दलों की हार और जीत में तेईसवें खिलाड़ी के सक्रिय रूप से  उपस्थित होने का पुष्ट या अपुष्ट सुराग मिल जाता है।
इस बार चौके छक्के तो खूब जड़े गये ।हारते –हारते टीमें जीती और लगभग मैच जीत चुकी टीम अंततः पराजित भी हुई।आखिरी ओवर की चार गेंदों पर चार गगनचुम्बी छक्के भी लगे।पर सच यही है कि  वैसा मज़ा नहीं आया जैसे मजे की लोग आस लगाये थे।पैसा वसूल नहीं हुआ।विजेताओं ने मैदान में खूब धमाल किया लेकिन उनके कमाल में मन रमा नहीं।
शायद वक्त बदल गया है।अब अब्दुल्ला इतने मासूम नहीं रहे कि बेगानी शादी में प्रेमदीवानी मीरा की तरह मगन होकर नाचने लगें।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

पनामा पेपर्स का लीक हो जाना


पनामा पेपर्स के लीक हो जाने की बड़ी खबर आई है।एक वक्त था जब लोगों के जेब में टंगे पैन स्याही छोड़ देते थे।तब जेब के दायें –बाएं अमूर्त कलाकृति बन जाती थी।कहा जाता है कि दुनिया की अनेक कलाकृतियाँ इसी तरह के लीकेज के दुर्लभ संयोग से अस्तित्व में आयीं।लेकिन अब मामला कलम के नहीं पेपर  के लीक होने का है इसलिए मसला जरा जटिल है।यह तो सुना था कि पेपर पर दर्ज इबारतें चुगलखोर होती थीं पर पेपर तो अपने आप बेहद निरीह  माने जाते रहे हैं।पेपर फडफडाते तो सुने गये थे लेकिन उनकी वाचालता की कोई बात कभी नहीं उठी।
पनामा में जो पेपर लीक हुए हैं ,वे साधारण पेपर नहीं हैं।उन पर दर्ज नाम कद्दावर हैं।महानायक,अप्रतिम सुंदरी से लेकर अपने तमाम ताकतवर थैलीशाहों और  तानाशाहों से लेकर तमाम  गॉडफादर टाइप तक के नाम इसमें  हैं।इन उज्ज्वल नामों के आगे  स्वर्णिम राशियां लिखी है,जगमग करती। सवा अरब के देश में से सिर्फ पांच सौ नाम इसमें हैं।इस बात पर चाहे तो मुल्क की जनता कम से कम एक दशक तक रह-रह कर शर्मिंदा टाइप की  हो सकती हैं।
आम आदमी पनामा के बारे में ज्यादा से ज्यादा यह जानता है कि इस नाम का एक हैट हुआ करता है।वह हैट जिसे हाथ की सफाई दिखाने वाले जादूगर  परिंदे निकाल कर उड़ाते हैं।पुराने ज़माने जिसे  पहनकर खलनायक बड़े अंदाज़ में खिसियानी हंसी हँसता था।जिसे कुछ लोग अपरिहार्य स्थिति में टोकरी बना लेते थेऔर झोला न होने की स्थिति में इसमें  बाज़ार से खरीदे गये आम अमरुद धर लिया करते थे।तब इस हैट के लीक हो जाने का कोई खतरा नहीं रहा होगा।
बुद्धिमान लोगों को पता है कि पनामा नाम की एक नहर हुआ करती है।जिसमें जलपोत चलते हैं।यह वनस्पति ,मछलियों और तितलियों के बाहुल्य वाली जगह है।लेकिन यह किसी को पता नहीं था कि यह टैक्स लुटेरों का  अभ्यारण्य भी है।इससे भी बड़ी बात, यहाँ काले धन को धो पोंछ कर धवल बनाने का बाकायदा ड्राईक्लीनिंग का  धंधा चलता है।यहाँ से कुछ पेपर लीक क्या हुए पनामा तो रातोंरात लगभग कुख्यात ही गया।बदनाम भले हुआ पर स्वनामधन्य हो गया।अब तो कहने को जी चाहता है कि पनामा में धन टिकाने वालों की बात ही कुछ और है।अनेक लोगों के लिए पनामा में रकम खपा पाना किसी खूबसूरत स्वप्न के साकार हो जाने जैसा हो गया है।
पनामा में हिफाजत से रखे पेपर अचानक फ़रार क्या हुए तमाम उजले चेहरों की कलई ही खुल गयी।सात तालों में हिफाजत से रखी इन मान्यवरों की साख राख हो गयी।सब जान गये कि काले धन के मामले में सारे मतवाद बजारवाद के साथ बड़ी आसानी से हिलमिल  जाते हैं।वाम वाला  दक्षिण पंथी के बगलगीर होकर मुस्कराता है तो खांटी सेक्युलर कन्फर्म कम्युनल से तपाक से हाथ मिलाता दिखता है।मानना होगा कि बाज़ारवादी पूँजी का अपना धर्म,संस्कृति और एक अदद पनामा भी होता है।
पनामा पेपर्स के जरिये जिनके नाम आये तो आये लेकिन जिनके नहीं आ पाए उनकी तो सामाजिक प्रतिष्ठा ही पूरी तरह मिट्टी में मिल गयी। पूरी मट्टी पलीद हो गयी उनकी।बनी बनाई इज्जत पर बड़ा-सा सवालिया निशान लग गया है।
अब तो यही लग रहा है कि इन पनामा वालों को शायद कोई काम ठीक से करना आता ही नहीं।जब पेपर लीक किये ही थे तो उसमें ऐसी कोताही तो न बरतते।अंतर्राष्ट्रीय बहुजनहिताय की तर्ज पर समस्त नामों को उजागर करते।पेपर लीक करने का भी अपना सौंदर्यशास्त्र और सलीका होता है।