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मुंह फुलाने की वजह

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लालकिले से भाषण हो गया।हर बरस ऐसा ही होता है।इस बार अनेक समानांतर भाषण भीहुए।एक से बढ़ कर एक।तब यह देशज कहावत बड़ी याद आई-शेर का भाई बघेरा,एक कूदे तीन दूजा कूदे तेरा।एक भाषण तो फिर भी डेढ़ दो घंटे चलने के बाद थम गया था लेकिन तमाम किस्म के अन्य भाषण उपसंहार तक पहुंचे बिना अभी तक जारी हैं।यह सोशल मीडिया का ईजाद किया सोप ऑपेरा है। इस बीच साक्षी और सिन्धु ने ओलम्पिक में देश का नाम रोशम कर दिया। 'बहरहाल' के उपसर्ग के बाद रुके हुए भाषण फिर शुरू हो लिए जैसे टीवी पर कमर्शियल ब्रेक के बाद धारावाहिक पुन: चल पड़ें  ,अपनी गति से।अपनी धुन में रोते कलपते और रह रह कर चीत्कार करते । लालकिले वाले भाषण के साथ –साथ जो वनलाइनर ‘ट्रौल’ कर रहे थे,वे कुछ इस तरीके के थे जैसे फर्स्ट डे फर्स्ट शो में फिल्म देखने आया हुआ कोई फिल्म समीक्षक टाइप काअतिउत्साही दर्शक आगे से आगे फिल्म के कथानक का अंदाज़ा लगाता और आवाज़-ए-बुलंद उसका ऐलान करता  चले।हर मामले में अटकल लगाना हमारा नेशनल पासटाइम है जिसमें  हम पूरी मारक भावना के साथ खिलवाड़ करते हैं.वस्तुतः यह वह  खेल है जिसमें बंद लिफाफे में रखे अलिखित खत का  मज़मून भांपा ज…

मेरी आतुरता और देशभक्ति के सस्ते विकल्प

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स्वतंत्रता दिवस बेखटके चला आ रहा है। जगह-जगह झंडे और डंडे बिक रहे हैं। लोग मोल-तोलकर खरीद रहे हैं। 69 साल के आजाद तजुर्बे से हमने सीखा है कि ठेली पर जाकर सब्जी खरीदो या इलाज के लिए अस्पताल जाओ; गुमटी से पान लगवाओ या बच्चे का बीटेक में एडमिशन करवाओ, मोल-भाव जरूर करो, वरना ठग लिए जाओगे। हालांकि इसके बावजूद हम अक्सर ठग लिए जाते हैं। वैसे भी, दूध पीते हुए मुंह उन्हीं का जलता है, जो फूंक-फूंककर घूंट भरते हैं। स्वतंत्रता दिवस के बारे में सोच-सोचकर मेरा मन भी न जाने कैसा-कैसा हो रहा है। मुझे पहले तो लगा कि मेरा मन एसिडिटी के प्रकोप से अनमना हो रहा है। कुछ कैप्सूल भी निगले, लेकिन हुआ कुछ नहीं। दिल के भीतर देशभक्ति के भाव वैसे ही उमड़ रहे हैं, जैसे कोल्ड ड्रिंक में नमक मिलाने पर झाग। मैं भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कुछ कर गुजरने के लिए आतुर हूं। मेरे पास सीमित विकल्प हैं। मेरे पास सबसे सस्ता या लगभग मुफ्त का विकल्प तो यह है कि वाट्सएप के जरिये दोस्तों को देशप्रेम से ओत-प्रोत वीडियो या ऑडियो मैसेज भेज दूं। अपने फेसबुक प्रोफाइल पर तिरंगा लहरा दूं। टीवी के सामने बैठकर लाल किले के प्राचीर से आते…

ओलंपिक का समापन और चोर की दाढ़ी में तिनका

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रियो ओलंपिक का समापन हुआ। खेल खत्म, पैसा हजम। बच्चा लोग ताली बजाओ। अफसोस से झुकी गर्दनों को फिर अकड़ने दो। अब अगले चार साल तक कोई जोखिम नहीं। आओ अब आरोप-आरोप खेलें। बीच-बीच में जब ऐसा करते हुए मन उकताए, तो पदक जीतने वाली बेटियों की शान में कसीदे काढ़ लेंगे। मुल्क की जनता को बताते रहेंगे कि हमें सिर्फ गमगीन होना ही नहीं वरन विजय का जश्न मनाना भी आता है। हमें अपने मुकद्दर पर पछताना ही नहीं, गौरवान्वित महसूस करना भी आता है। एक अरब 25 करोड़ लोगों के लिए ये दो पदक ऐसे हैं, जैसे डूबते को तिनके का सहारा। मगर यह ध्यान रहे, अपने यहां चोर की दाढ़ी में भी तिनके का मिथकीय घोंसला पाया जाता है। जब तक ओलंपिक हुए, तब तक हर रात हम किसी अप्रत्याशित स्वदेशी जीत का सपना लेकर सोए और हर सुबह फेल्प्स या बोल्ट की अप्रतिम जीत की खबर सुनकर जागते रहे। वैश्विक परिदृश्य में खुद को रखकर मानवीय कामयाबी का यशगान करते रहे। लोगों को यह बता-बताकर आश्वस्त होते रहे कि पराजय की आद्र्रता भरे अंधकार में ही उजाले के अंकुर उपजते हैं। हर हार में जीत के अदृश्य गुलदान सजे होते हैं। ‘बेटर लक नेक्स्ट टाइम’ कहने से किसी की देशभक्ति पर…

इतिहास का तंदूर

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काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है। शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है। धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पु…

इतिहास का तंदूर

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काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है। शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है। धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पु…

सोशल मीडिया और अंगूठा छाप लाइक्स का वैभव

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यह सोशल मीडिया का  जमाना हैlबधाई से लेकर गालियाँ तक बड़ी आसानी से यहाँ से वहां चली आती हैं,इतनी मात्रा में आती हैं कि लगता है कि इस दुनिया में बधाई  और अपशब्द के सिवा कुछ बचा ही नहीं हैl सोशल मीडिया पर किसी के निधन की सूचना आती है तो देखते ही देखते हजारों ‘अंगूठा छाप लाइक्स’ आ जाते हैंlझुमरीतलैयासे खबर मिलती है कि वहां कोई मैना सरेआम गलियां बकती  है तो पूरा मुल्क  उसकी इस हरकत पर दो खेमोंमें बंट कर गहन विमर्श में तल्लीन हो जाता हैl मैना के इस साहस , दुस्साहस और नादानी पर लोग अपने -अपने तरीके से गम ,गुस्से और तारीफ का इज़हार करते हैं,लेकिन उनमें भी बधाई और गाली किसी न किसी रूप में रहती जरूर हैंlअभिव्यक्ति की इस आनलाइन आज़ादी ने सबको निहायत वाचाल  बना दिया हैlइस डिजिटल स्वछंदता ने तो  बाहुबलियों तक के  नाक में दम कर रखा हैl सिर्फ इतना ही नहीं,सोशल मीडिया पर नेशनल लेवल के दबंगों तक की मोहल्ला स्तर  के फूंकची पहलवान तक बड़े मजे से टिल्ली -लिल्ली कर लेते हैंl
आभासी आज़ादी  ने अपने शैशव काल  में गुल खिलाने शुरू कर दिए हैंl अधिकांश चिंतक इसके गले में बिल्ली के गले वाली मिथकीय घंटी लटकाने की फ़िराक …

ऑनलाइन गंगाजल और डिजिटल आस्था

छन छन कर खबरें आ रही थीं कि अब गंगाजल ऑनलाइन बिकेगा।अब खबर कन्फर्म हुई कि हाँ जी ,बाकायदा ऑनलाइन बुक भी होगा और कैश ऑन डिलीवरी पर मिलेगा भी।अभी यह नहीं पता कि नापसंद होने पर वापस भी होगा या नहीं।लोगों का अनुमान है कि गंगाजल में हमारी युगीन आस्था जुड़ी है इसलिए इसकी कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं होगी।आस्थाएं लहंगे ,चुनरी और नाईट वियर की तरह उसी प्रकार वापस नहीं की जा सकेगी  जैसे खा लेने के बाद रबड़ी और पी लेने के बाद छाछ।रबड़ी खा लेने के बाद मिठास दीघ्रजीवी होती है और छाछ पीने के बाद पेट की ठंडक कालजयी।इसी तरह गंगाजल की पवित्रता सदा बरक़रार रहती है।
अब गंगाजल घर घर आएगा ठीक उसी तरह आएगा जैसे आरती भजन पूजा सामग्री आदि कूरियर से मंगाई जाती हैं।अभी यह नहीं पता कि जल किस ब्राण्ड का होगा।भागीरथ ब्राण्ड का या किसी राजनेता के खानदानी नाम का।तमाम तरह के खनिजों,विटामिनों और आशीर्वाद से भरापूरा।या वह वाला गंगाजल बिकेगा,जिसके बारे में राम तेरी गंगा मैली फिल्म ने भ्रामक अफवाहें फैला रखी है।सम्भव है कि समस्त प्रकार के पापों को धो देने की गारंटी वाले डिटर्जेंटयुक्त जल की आपूर्ति की जाए।हो सकता है कि ऐसा चुल्ल…

ठुल्ले और अलौकिक निर्वात में उनका वजूद

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अदालत ठुल्ले का मतलब पूछ रही है।समानांतर कोष वाले अरविंद कुमार  जी शब्द को चिमटी से पकड़ कर बड़ी ईमानदारी से उसकी रिहाइश के लिए डिक्शनरी  में उपयुक्त जगह ढूंढ रहे हैं।फ़िलहाल शब्दकोशों में यह शब्द ढूंढें नहीं मिल रहा।इस सबके बावजूद ठुल्ले हर जगह हैं और हरदम हैं।बड़े काम के हैं।निष्काम हैं।उन दुर्लभ स्थानों पर भी है जहाँ न ईश्वर रहता है और न शैतान।इस तरह के अलौकिक निर्वात में भी ठुल्लों का वजूद रहता  है।इसलिए रहता है क्योंकि ठुल्लापन हर हालात में रह लेता है।अपनी निरर्थकता के मध्य बड़े मजे से बना रहता है।वैसे ठुल्ले ही हैं जिनकी वजह से समाज में थोड़ा-बहुत खौफ और ला एंड ऑडर है।हर आपदा के समय इन्हें ही सर्वत्र उपलब्ध ईश्वर की बजाय याद किया जाता है।वे थोड़ा विलम्ब से ही डायल -100 पर बतियाने के लिए मिल भी जाते हैं।आसमानी ताकतों का तो न ही  कोई सर्वज्ञात हेल्पलाइन नम्बर है और न ही उसकी कोई ईमेल आईडी।वेब पोर्टल भी नहीं है।इसका जो पता धर्मग्रन्थों में मिलता  है उस एड्रेस पर तो उसकी जगह तमाम तरह के  बहुरूपिये रहते हैं। ठुल्ले  है।बाकायदा है।उनका अस्तित्व वास्तविक है।वे  कोई आभासी रूपक नहीं हैं। किसी प्…

खुली चिट्ठी का लिखना और बोतल बंद का रोमांच

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आजकल चिट्ठी कौन लिखता है? हालांकि चिट्ठियां अभी भी लिखी और भेजी तो जाती ही हैं।जब तक यह कायनात है,तब तक लिखा-पढ़ी तो जारी रहनी ही है।यह अलग बात है कि अब इन चिट्ठियों को ‘मेल’ और लिखी इबारत को ‘टेक्स्ट’ कहा जाता हैं।ये बिना पर के उड़ लेती हैं और पलक झपकते ही लैंड भी कर जाती हैं।पर इस तरह की मेल को हाथ में थाम कर कोई नहीं गाता –चिट्ठी आई है,आई है,बड़े दिनों के बाद।
फिर भी कुछ लोग हैं जो चिट्ठी लिखने की जिद पर आमादा हैं।वे बात-बात पर और कभी-कभी बेबात चिट्ठी लिख मारते हैं।और चिट्ठी भी ऐसी वैसी नहीं खुली चिट्ठी।एक जमाना था जब चिट्ठियों की बात ही कुछ और थी।तब खुली चिट्ठियों वाले पोस्टकार्ड से सुखद और दुखद सूचनाओं ,बधाइओं और श्रृद्धांजलियों का आदानप्रदान समभाव से हो जाया करता था।लेकिन असल रोमांच तो बंद लिफाफों  में ही विरजता था।उन दिनों किसी चिट्ठी में यदि यह लिखा आ जाए कि इसे तार समझो और तुरंत आओ तो लोग पहली उपलब्ध बस या रेल से गाँव घर की ओर कूच कर जाते थे।कोई मूढ़मति भी उस तार को तार समझ उस पर गीले कपड़े सुखाने की हिमाकत नहीं करता था। अब खुली चिट्ठियां हवा में लहरा कर अपने सरोकारों  पर इतराने का …

पे कमीशन का सातवाँ घोड़ा और तलहटी में खड़ा ऊंट

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अंतत: पे कमीशन के अस्तबल का सातवाँ घोड़ा छूट निकला।कल तक जो लोग इसे लेकर बड़ी –बड़ी खुशफहमी पाले बैठे थे,वे गमज़दा हैं।उन्हें अब पता लगा  कि खुशफहमी ही दरअसल गलतफहमी होती है। जैसे किसी से प्यार का अहसास-ए-गुल तभी तक मन को भरमाता है जब तक वह मिसेज गुलबदन बनकर बाकायदा रोज लौकी की सब्जी में हींग जीरे का छौंक  नहीं लगाने लगती।दूरस्थ पहाड़ तभी तक नयनाभिराम लगते हैं जब तक उसके नजदीक पहुँच कर आदमी ऊंट में रूपांतरित नहीं हो जाता।तब उसे पता लगता है कि अरे वह तो ऊंचे  पहाड़ की तलहटी में जा पहुंचा एक अदद उदास मसखरा है। पे कमीशन की रिपार्ट क्या आई ,गंदे नाले के मुहाने पर बने दड़बानुमा मकानों को स्वीमिंगपूल या पार्क फेसिंग विला कहकर बेचने वाले प्रोपर्टी डीलर से लेकर मौत के बाद जीवन को स्वार्गिक आनंद से भर देने का दावा करने वाला बीमा कम्पनी के  एजेंट तक सभी उसी तरह  सक्रिय हो गये हैं जैसे मानसून की पहली बौछार के बाद धरती के भीतर के तमाम जीवजन्तु धरती की सतह पर सक्रिय हो उठते हैं।यकीनन यह पाताललोकवासियों  के लिए मुरादों भरा आभासी मौसम है।बाज़ार के पास करेंसी नोटों से  भरी हुई ‘ओवरसाइज’ जेबों को बेचने के लिए …

इसरो के सेटेलाईट और एबोनाईट के पुराने रिकार्ड

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इसरो ने फिर रिकार्ड तोड़ दिया।एबोनाईट के रिकार्ड वाला पुराना समय होता तो यह सुनते ही इसरार की अम्मी ने पहले तो अपने शैतान बच्चे को कूटना था।इसके बाद इसरार के अब्बा को कोसना था कि इत्ते बड़े हो लिए लेकिन इनका  गानों -शानों को सुनने का शौक न गया।घर भर को इन मुए रिकार्डों का कबाड़खाना बनाये हैं।यह वह वक्त था जब रिकार्ड  बजते कम ठिठकते अधिक थे।घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के, हाय धडके क्यों धडके....टाइप का जब गाना चलता था तो सुनने वालों को पता होता था कि इसे कहीं न कहीं अटकना जरूर है। समय बदल गया है।अब कोई इसरार बेवजह मार नहीं खाता।रिकार्ड बेआवाज़ टूट जाते हैं।दरअसल टूटते भी नहीं, नये बन जाते हैं।इसरो की तो आदत -सी हो चुकी है पुराने रिकार्ड तोड़ने और नये बनाने की।इसरो के विज्ञानी मेहनत करते हैं।सरकार झटपट अपनी पीठ ठोंक लेती है।विज्ञान अपना काम करता है और  भक्त  लोग इस मौके पर खुश होकर पीपल के पेड़ के नीचे कडुवे तेल के दिये जला आते हैं।यह अलग बात है कि आसमान में काले बादल उमड़ने घुमड़ने के बाद भी नहीं बरसते तो विपक्षी कयास लगा लेते हैं कि हो न हो, ऐसा इसरो के किसी सेटेलाईट की नीयत में खोट की वजह से हुआ है।वर…

उड़ता हुआ पंजाब और हंसती कुर्सी

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उड़ता पंजाब आख़िरकार रिलीज हो गयी।एक फिल्म समीक्षक को कहते सुना गया कि यह फिल्म लंबी दौड़ का घोड़ा है।इससे पहले तो यही लग रहा था कि यह फिल्म फिल्म न होकर कोई परिंदा है,जिसके पंख कतरने और न कतरे जाने को लेकर विवाद है।खबर तो यह भी आई थी कि फिल्म रुपहले पर्दे पर आने से पहले ही लीक हो गयी।तब सवाल उठा  था कि यह फिल्म है या किसी स्कूली बच्चे का लंच बॉक्स कि उसमें से परोंठे के साथ रखे अचार में से तेल रिस जाए।
एक समय था जब किस्सा कुर्सी का खूब उड़ा था।जब यह किस्सा चारों ओर मंडरा रहा था तब भी कुछ  लोग सोच रहे थे कि फर्नीचर की दुकान पर जहाँ-तहां बिकने वाली कुर्सी को लेकर इतनी शाब्दिक तलवारें  क्यों भांजी जा रही है।एक ब्रांड की कुर्सी यदि नहीं जंच रही  तो न सही,दूसरी ले आओ।इसी तरह की बात जब किसी ने नाई की दुकान पर सार्वजनिक रूप से कही  तो ग्राहक के बाल कतरता बारबर मास्टर फिस्स से हंसा।उससे भी अधिक जोर से कुर्सी हंसी।देर तक हिचकोले लेती रही।उसका हिलना तब रुका जब बाल कटवाने वाले ने कहा-हे कुर्सी ,यह बात तुम्हारे बारे में नहीं, आज के राजनीतिक हालात पर टिप्पणी है।
उड़ता पंजाब बिना उड़े ही काफी उड़ान भर चुक…

मानसून का देरी से आना और उपलब्ध विकल्पों का खुलापन

मौसम विभाग ने बता दिया है कि इस बार केरल में मानसून एक हफ्ता विलम्ब से आएगा।यह बात बताने का उसका अंदाज़ ऐसा रहा जैसे कि मानसून आया तो आया और न आया तो उसके भरोसे मत रहियो।अपने लिए बादल, बरखा, भीगी धरती की सौंधी गंध, रेन डांस, पकौड़ी की चाहत और तरल गरल रूमानी यादों आदि का इंतेज़ाम खुद ही कर लेना।विभाग ने समय रहते चेता दिया ताकि कोई गफलत न रहे।विभाग का काम है जनता को सावधान करना।ठीक उसी तरह से अवगत कराना जैसे दुकान या दफ्तर के बाहर यह बोर्ड लगा देना कि सावधान आप कैमरे की निगरानी में हैं।लेकिन अपने समान की हिफाजत खुद करें। मौसम विभाग और सरकार की वैधानिक चेतावनी को शायद ही कोई गम्भीरता से लेता हो।जिस तरह हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता आदमी शायद ही सिगरेट की डिब्बी पर छपी ‘स्टेच्युरी वार्निंग’ को देखता या पढ़ता है ,उसी तरह बारिश के मौसम का लुत्फ़ उठाने की इच्छा रखने वाले उमड़ती घुमड़ती बदली के सहारे हाथ पर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहते।वे बारिश से जुड़े प्रत्येक साजोसामान की परफेक्ट व्यवस्था रखते हैं ,जैसे मांगलिक आयोजन पर जी भर उधम मचाने  वाले 'डीजे' के इंतजाम के साथ अपने बत्तीस जीबी की पेनड्…

क्रॉस वोटिंग और भोजन-भट्ट की तोंद की परिधि

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वे क्रॉस वोटिंग करके बाहर आये तो उनके चेहरे पर गजब का नूर था।आमतौर पर ऐसी चमक क्रीम पॉलिश के बाद  जूतों में परिलक्षित होती है या ब्यूटी पार्लर से बाहर निकलती ‘आंटियों’ के मुखड़े पर दिखती है।मॉर्निंग वॉक पर  आदमी को  टहलाने गये टॉमी की टेल लेंग्वेज(दुमकी भाषा) में छलकती है या मुफ्त के मालपुए उदरस्थ करने के बाद भोजन-भट्ट की तोंद की परिधि में दमकती है।लोकतंत्र इसी प्रकार के  प्रसंगों की वजह से खुद  को महिमामंडित करता है।बीच –बीच में राज्यसभा, विधान परिषद आदि के चुनाव न हों तो राजनीति किस कदर एकरस,बोरिंग और बिना घी वाली मूंग की दाल की खिचड़ी हो कर रह जाए। ऐसे मौकों पर वोट तो सभी डालते हैं लेकिन जो मेधावी होते हैं वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर मताधिकार का इस्तेमाल करते है।पार्टी अनुशासन बड़ी चीज है लेकिन अंतरात्मा उससे भी उपयोगी  वस्तु है।इस वस्तु के इस्तेमाल का अलग विधान और वास्तु शिल्प होता है।आत्मा और जेब का जब परस्पर समन्वय होता है तब ठोस राजनीतिक मतवाद एकदम तरल हो जाते हैं।कोई माने या न माने, यह तरल सहजता ही है ,जिससे जिंस और जिंदगी का कारोबार चलता है। कहने वाले तो यहाँ तक कहने लगे हैं कि …

दुर्लभ कलाकृतियां और तसल्ली

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अमरीका ने हमारी दुर्लभ कलाकृतियां हमें लौटा दी।दो हजार साल पुराने इस सामान ने हमें अनायास बहुत भावुक कर दिया है।वर्तमान चाहे जैसा हो पर अतीत के गौरव के लेकर हमारी संवेदनशीलता बेमिसाल है। इससे उम्मीद बंधी है कि वह एक न एक दिन हमें ‘वे गुमशुदा दिन’ भी वापस दिलवा देगा, जब परों वाले तोते मैना या गौरेया नहीं,सोने की चिड़िया मुल्क की डाल डाल पर बसेरा करती थीं।जब शेर और मेमने एक ही प्याऊ पर ओक से पानी पीते थे।जब एक ही चूल्हे और हांडी में वेज और नॉनवेज व्यंजन पकते थे।जब पान की दुकानों पर यह नहीं लिखा होता था कि उधार प्यार की कैंची है।जब कैंची सिर्फ गबरू जवानों की मूंछे और लोगों के जेबें तराशने के काम आती थी।जब महिलाओं के गले से उचक्के सोने की चेन नहीं, दिल का चैन लूटने जैसी रोमांटिक वारदात को अंजाम देते थे।जब लोग  तपाक से गले मिलने से पहले एक दूसरे की आस्तीनों की तलाशी नहीं लेते थे।जब मसखरे हंसने हंसाने के लिए अपने मुंह बिचकाने के आलावा भी बहुत –सी अन्य तरह की तरकीब जानते थे। जब दुल्हन, बारात की चढ़त के समय नागिन डांस न होने की स्थिति में, दूल्हे के गले में वरमाला डालने से साफ़ इंकार करने का वैध…

खीसे निपोरते टॉपर और अंकपत्रों से टपकते नम्बर

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परीक्षाओं के परिणाम आ रहे हैं।निरंतर आये ही जा रहे हैं।एक ओर यत्र तत्र खीसे निपोरते कतिपय टॉपर अपनी मौलिक प्रतिभा से सबको  हतप्रभ करते दिख रहे हैं तो दूसरी ओर सर्वशिक्षा अभियान वाले गली -गली और मोहल्ला -मोहल्ला जाकर ‘चलो स्कूल’ की हांक लगा रहे हैं।बच्चा आनाकानी करता है तो उसे फुसलाते हैं,बहलाते हैं और फिर भी जिद पर अडिग रहे तो जबरन उठाकर वायुमार्ग से स्कूल ले जाते हैं।शैक्षिक कार्यकर्ताओं के दो जोड़ी हाथों के बीच हवा में तैरते ये बच्चे मुल्क के मुस्तकबिल के खेवनहार  हैं। बच्चा एक बार जब स्कूल जाना शुरू करता है तो कुछ दिनों में  ही वहां रम जाता है।मिड-डे मील आदि  के लिए छीना- झपटी करता हुआ वह अपना हिस्सा हथियाने का हुनर सीख जाता है।बाद में ककहरा सीखने के साथ तमाम तिकड़म भी सीख लेता है।शिक्षकों की खिदमद और चिरोरी करके परीक्षा में मनोवांछित अंक प्राप्त करने का तरीका जान लेता है।बिना ठीक से पढ़े लिखे उत्तर पुस्तिका  में समग्र ज्ञान रोप देने की कला का निष्णात काश्तकार हो जाता है।यही बच्चा  बडा होकर सबसे  अपने बौद्धिक चातुर्य का लोहा मनवाता है।अपने प्रदेश का नाम रोशन करता हैं।अपनी कीर्ति का डंक…

गरमी का है व्याकरण और तपती हुई दलील

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सूरज आसमान से दनादन आग उगल रहा है।कमरों में लगे एसी शुष्क ठंडी हवा बिखेर रहे हैं।कूलर अपने तरीके से लू के खिलाफ ‘वाटरलू’ में डटे हैं।जहाँ बिजली  की किल्लत है, वे हाथ का पंखा झलते हुए इंद्र देवता और सरकार की अक्षमता पर  सवाल उठा रहे हैं।आरटीआई वाले नेताओं की शैक्षिक योग्यता सम्बंधी सवाल पूछ पूछ कर वातावरण को ठंडाने नहीं दे रहे।खुलासों और विवादों के अगस्ता वेस्टलैंड  हेलिकॉप्टर अपनी लैंडिंग के लिए उपयुक्त स्थान और सही समय तलाश रहे हैं।सवाल बहादुर पानी के लिए मच मच मचाये लोगों से अपने सूचना के अधिकार का अतिक्रमण करते हुए पूछना चाह रहे हैं कि गन्ने के रस को  कोल्ड ड्रिंक से बेहतर को क्यों न माना जाए। यह यकीनन सूचना प्रधान समय है।नेताओं की स्कूली मार्कशीट से लेकर उनके पालतू कुत्तों को खिलाये जाने वाले बिस्कुटों  की एमआरपी पर तमाम सवाल उठाये जा रहे हैं।लगता यही है कि इसी तरह के मूलभूत प्रश्नों के जरिये जनक्रांति का बिरवा बिना उचित खाद, प्रकाश और पानी के  पनपेगा।आइपीएल-9 में लगने वाले चौके छक्कों के जरिये जनता की दुश्वारियों का समाधान देर –सवेर निकलेगा।अक्षर पटेल की हैट्रिक से पटेल आरक्षण की …

दो साल का हाल

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दो साल बीत गये।सरकार इतने बड़े –बड़े विज्ञापन न छपवाती तो शायद यह बात पता भी  नहीं चलती।आमतौर से सरकारें उसी तरह  दबे पाँव ही चलती हैं जैसे चतुर बिल्ली जो  रसोई में रखी सारी दूध मलाई चट  कर जाए और किसी को भनक तक न लगे।धडाधड़ विकास पर विकास होता चला जाए और उसका अंदाजा  तक किसी को न होने पाए।जैसे बरसात में घास की फसल ऐसी उपजे कि सब तरफ हरा ही हरा दिखने लगे।खर पतवार की ऐसी बढ़वार हो कि पौधों पर लगे फूलों  के समस्त रंग उसकी हरीतिमा में गुम हो जाए। तो वाकई दो साल पूरे हुए।इतना समय यूँही गुजर गया।सच तो यह है कि वक्त हमेशा इसी तरह गुजरता है।जन्मजात प्रेमी प्रेयसी के आगमन के इंतजार में छज्जे की रेलिंग पर टंगे के टंगे रह जाते हैं और सपनों की अदृश्य पालकी पलक झपकते आँखों  के आगे से बिना कोई सुराग छोड़े गुजर जाती है।लेकिन सरकार नहीं चाहती कि वह चुपचाप समय को बीत जाने दे।उसके पास हर पल को सेलिब्रेट करने का मौका है और दस्तूर भी।अपनी कारगुजारियों के आदमकद विज्ञापनों के परचम लहराने की अपूर्व सुविधा है।सबको पता है कि सरकारी कृत्यों का वैभव उसके सम्यक प्रदर्शन से ही प्रकट होता है। दो साल बीतने का अहसास हो या…

मोबाइल का पैनिक बटन और पैनिकता की फ़िक्र

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अब मोबाइल में पैनिक बटन होगा।इस खबर ने बहुत से लोगों के भीतर अदृश्य भय के साथ  नवउत्साह का संचार कर दिया है।पैनिक का हिंदी समानार्थी  त्रास  अमूमन हर बौद्धिक के भीतर कमोबेश संत्रास की शक्ल में मौजूद रहता ही है।यदि इसका मतलब आतंक माना जाए तो पैनिक  यकीनन बड़ी  डिप्लोमेटिक व्यंजना है।कुटिलता से भरीपूरी।पैनिक  की थाह पाने के लिए यदि इसके भावार्थ में गहरे उतरें तो एक अजब हलचल शब्दकोश में यहाँ वहां टहलती दिख जायेगी।लेकिन पैनिक  होने के लिए कोई एक  लफ्ज़  पर्याप्त नहीं है। पैनिक  बोले तो वो पैनिक  जिसके लिए बटन की जरूरत महसूस हो।बटन भी ऐसा जिसे वक्त-जरूरत झट से दबा कर उसे आलोकित किया  जा सके।बटन दबते ही अपना काम करे।ईवीएम वाला नोटा जैसा बटन न हो,जिसके दबाने या न  दबाने से कोई फर्क ही न पड़ता हो। रेलगाड़ी और बस में रखी उस कम्प्लेंट बुक जैसा भी नहीं जिसकी जब आवश्यकता पड़े तो पता लगे कि वह तो कभी अस्तित्व में आई ही नहीं थी।छाते में लगे उस जंग लगे बटन जैसा न हो ,जिसे बारिश होने पर  दबाते रह जाएँ और वह तब खुले जब काले मेघ पानी बरसा  अगले मोहल्ले की ओर बढ़ लें। वैसे पैनिक  भी कई आकार,प्रकार और प्रजाति …

गुड़गाँव, गुरुग्राम और गुलगुले

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गुड़गांव का नाम गुरुग्राम हो गया।गुड़ गुरु बन गया।तमाम शक्करखोर इस बात पर पूर्ण स्वाद भाव के साथ नाराज़ हैं।घंटाल इसे लेकर बेहद उत्तेजित हैं।वैसे टेक्निकली देखा जाए तो गुड़ के गुरु हो जाने में कुछ भी दुरूह नहीं।इसे बोलने में न जुबान अटकती है,न किसी की आस्था का कोई बिंदु फ़िसलता है और न ही महाभारत का युद्ध पुन: छिड़ जाने का कोई आसन्न खतरा उत्पन्न होता है।द्रोणाचार्य ने जब कभी एकलव्य से अंगूठा माँगा होगा तो मांग लिया होगा।अब कोई गुरु ऐसी आलतू -फालतू चीज न तो मांगता है और न ही शिष्य देता है।अलबत्ता जिसे मौका मिलता है वह अंगूठा दिखा देता है।और तो और सबसे बड़ी बात यह कि जब गुड़ न होगा तो लोग क्या  खाकर स्वादिष्ट गुलगुलों से परहेज जैसे फालतू काम करने में अपने समय और ऊर्जा का अपव्यय करते हैं।नाम में ग्राम की फीलिंग होगी तब घरघुसरे टाइप के लोग वृथा ही गॉंव घर को लेकर भावुक भी नहीं होगे।वैसे भी ग्राम हर हाल में गाँव से बेहतर होता है जैसे मक्का के दाने  ‘फुल्ले’ से पॉपकार्न बनकर महिमामंडित होते हैं ठीक उसी तरह।जैसे फटी पुरानी घिसी हुई पतलून फेडिड जीन्स फैशन के रूप में अपनी  पहचान बना लेती हैं। पहचान पु…

खेल जैसा खेल न हुआ

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खेल खेल ही होता है।इसमें एक जीतता तो दूसरा हार जाता है।चुपचाप बैठ कर निरपेक्ष भाव से खेल को सिर्फ निहारने अधिक स्वास्थ्यवर्धक कुछ हो ही नहीं सकता।न दिल जोर -जोर से धडकता है और न मुट्ठियाँ बाँधने या दांत भींचने की जरूरत पड़ती है। कमजोर दिल वालों के लिए हार्ट अटेक का खतरा भी उत्पन्न नहीं होता।देह की शिराओं में रक्त प्रवाह नॉर्मल बना रहता है। और तो और जयकारे लगाने में ऊर्जा का अपव्यय भी नहीं होता।दर्शक जब तक तटस्थ दृष्टा बने रहते हैं तब तक वाकई वे एकदम भद्र पुरुष लगते हैं और खेल एकदम जेंटिलमैन टाइप का स्पोर्ट।कोई जीते,कोई पराजित हो –इससे हमें क्या टाइप का चिंतन उपजता है। दो टीम के खिलाडियों के खेल कौशल के मध्य जब मुल्क ,जज्बात,राजनीति और बाज़ार आ जाते हैं तब खेल खेल न रह कर छायायुद्ध बन जाता है।यह अलग बात है कि कुछ लोग इसे  देशप्रेम की डिफॉल्ट अभिव्यक्ति कहते और मान कर चलते हैं।यह सबको पता है कि जंग ,मोहब्बत और क्रीड़ापूर्ण हुडदंग में हर बात और वारदात  जायज़ होती है।चीखना चिल्लाना, गाली गलौच, उछलना -कूदना ,हथेली पीटना ,पटाखे फोड़ना आदि भी इसका अपरिहार्य हिस्सा होता है।वैसे कहा और माना तो  यही…

पनामा पेपर्स का लीक हो जाना

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पनामा पेपर्स के लीक हो जाने की बड़ी खबर आई है।एक वक्त था जब लोगों के जेब में टंगे पैन स्याही छोड़ देते थे।तब जेब के दायें –बाएं अमूर्त कलाकृति बन जाती थी।कहा जाता है कि दुनिया की अनेक कलाकृतियाँ इसी तरह के लीकेज के दुर्लभ संयोग से अस्तित्व में आयीं।लेकिन अब मामला कलम के नहीं पेपर  के लीक होने का है इसलिए मसला जरा जटिल है।यह तो सुना था कि पेपर पर दर्ज इबारतें चुगलखोर होती थीं पर पेपर तो अपने आप बेहद निरीह  माने जाते रहे हैं।पेपर फडफडाते तो सुने गये थे लेकिन उनकी वाचालता की कोई बात कभी नहीं उठी। पनामा में जो पेपर लीक हुए हैं ,वे साधारण पेपर नहीं हैं।उन पर दर्ज नाम कद्दावर हैं।महानायक,अप्रतिम सुंदरी से लेकर अपने तमाम ताकतवर थैलीशाहों और  तानाशाहों से लेकर तमाम  गॉडफादर टाइप तक के नाम इसमें  हैं।इन उज्ज्वल नामों के आगे  स्वर्णिम राशियां लिखी है,जगमग करती। सवा अरब के देश में से सिर्फ पांच सौ नाम इसमें हैं।इस बात पर चाहे तो मुल्क की जनता कम से कम एक दशक तक रह-रह कर शर्मिंदा टाइप की  हो सकती हैं। आम आदमी पनामा के बारे में ज्यादा से ज्यादा यह जानता है कि इस नाम का एक हैट हुआ करता है।वह हैट जिसे …