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September, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

डिजिटल पड़ोसियों का आना

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यह आकाशवाणी नहीं है।यह खबर ऊपर से आई है इसलिए सच ही होगी।वैसे हमें ये जमीनी सच नहीं पता कि सोलहवीं मंजिल पर एकाकी रहने वाली बूढ़ी महिला के घुटनों का दर्द आजकल कैसा है। बगल के फ़्लैट में रहने वाली आंटी अपने इकलौते बेटे के सीरिया में मार डाले जाने के बाद किस हाल में हैं।उन्होंने अब अपने जिन्दा बने रहने की कौन सी तरकीब इज़ाद की है। सोलहवीं मंजिल वाली बिल्डिंग की  लिफ्ट ख़राब हो जाने पर ग्राउंड फ्लोर पर फिजियो के पास सिकाई के लिए कैसे आती जाती होंगी।हम अपने पड़ोसियों की जिंदगी में  उसूलन नहीं झाँका करते। अच्छे भले पड़ोसी इसी प्रकार के होते हैं। समय तेजी से बदल रहा  है।अच्छे दिनों की आहट महसूस की जा रही है। अफवाह और हकीकत का फ़र्क मिट गया है। इस अंतर पर लोग चिंतित भी नहीं हैं। देशभक्ति अमरीका आदि मुल्कों में रह रहे प्रवासी भारतियों के बीच ओवरफ्लो कर रही है।  कन्फर्म सूचना यह है कि फेसबुक, टि्वटर, गूगल, इंस्टाग्राम नाम के हमारे नए पड़ोसी  आये हैं। ये ब्रह्मांड के किस माले पर  रहते हैं ,यह तो नहीं पता पर हमारी कामनाओं के कबाडखाने में इनका आवास  है। इनके घर की ओर जाने वाले रास्ते हरदम चौपट खुले रहते …

डिसलाइक और व्हिसिल की मारक जुगलबंदी

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फेसबुक पर जल्द डिसलाइक को बटन आने वाला है। बोले तो खानदानी टाइप के नकचढ़ो के लिए मुरादों भरे दिन आने वाले हैं। वे इस लाइक -लाइक की मोनोपोली से तंग आ चुके हैं।हर ऐरागैरा नत्थूखैरा लाइक का बटन दबाने में लगा है।किसी के घर गमले में फूल खिला -लाइक। किसी ने माथे पर पर्पल बिंदी लगी सेल्फी चिपकाई -लाइक। किसी ने घर फूंक तमाशा देखने की रेसिपी सुझाई –लाइक। कोई मरा तो लाइक ,कोई बाल बाल बचा तो भी लाइक। इस लाइक ने आभासी दुनिया को असल दुनिया की तरह कितना एकरस बना दिया है। जब डिसलाइक आएगा तो कितना मजा आएगा। हर बात पर लाइक बटोरने वाले आत्ममुग्ध लोगों  को पता लगेगा कि ऊँचे पहाड़ों के नीचे आना सिर्फ ऊंटों के मुकद्दर में नहीं बदा होता। आभासी दुनिया में बिना वाचाल हुए भी असहमत हुआ जा सकता है। सर्वांग सुंदर सेल्फियों की शान में गुस्ताखी करने वाले वीरोद्त्त नायक नायिकाएँ अभी भी होते हैं। पसंदगी का विलोम नापसंदगी ही होता है। इसके –उसके पक्ष में जबरिया वोट देने की बाध्यता से इतर नोटा जैसा विकल्प है। डिसलाइक के आने की सुगबुगाहट विचारों के लोकतंत्र में हैड-टेल वाले सिक्के का हवा में उछलने जैसी है ,जिसकी हनक अरसे त…

अब तेरा क्या होगा बम !

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मियां जी का कहना है कि हमारा परमाणु बम किसी के लिए नहीं है।बड़े दिनों बाद उन्होंने अपने मन की बात कही। अच्छा लगा। मन को जुबान पर लाने के लिए अदम्य साहस की जरूरत होती है।बहुत से प्रेमी टाइप के लोग तो अपनी बात को कहने के लिए भीतरी ताकत जुटाते जुटाते प्रेयसी के बच्चों के मामाजी तक बन जाते रहे हैं।वह  बड़ा रिस्क उठा कर यह बात कह पाए है।हमारे घरों में अमूमन बहुत –सी चीजें किसी काम की नहीं होती फिर भी वह रहती हैं। मसलन दही मथने वाली मथनी।मिक्सी के रहते उसका क्या काम।फिर भी मथनी किचिन के किसी कोने में टिकी रहती है। फ्यूज बल्ब इसलिए कि क्या पता कभी रोशन हो उठें। पुराने टायर कि कभी कोई अजायबघर वाला उसे  मुहँमांगी कीमत दे उठा ले जाये। हमारी शौर्य गाथाएं जो निरर्थक होने के बावजूद स्मृति की शैल्फ में धरी रहती  हैं। इतिहास के संग्रहालय में रखा वीरोद्त्त नायक  का  एक क्विंटल वजन वाला कवच ,जिसे धारण करने से योद्धा के उसके भार से कुचल जाने का आसन्न खतरा मौजूद रहता है। प्रौढ़ दिल के भीतर संजो कर रखी हनीमून की वो यादें और तस्वीरें ,जो आदमी को रिझाती कम चिढ़ाती अधिक हैं। और भी न जाने क्या क्या चीजे हैं  ,जि…

हिंदी दिवस और सत्ता के चमचमाते जूते

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हिंदी दिवस पर उस वक्त मेरा मन एकदम ‘हिंदी हिंदी’ हो गया जब एक वयोवृद्ध लेखक पुरस्कार प्राप्त करते समय झुकते-झुकते इनाम प्रदाता के सामने लगभग लम्बवत हो गये।यदि कोई और दिन रहा होता तो इस परिदृश्य को निहार कर मेरा अंतस ‘गार्डन गार्डन’ हो गया होता। वर्ष के शेष तीन सौ चौंसठ दिन मेरा दिल अभिव्यक्ति के नाम पर भाषाई भेद को नहीं मानता। हिंदी ,अंग्रेजी, उर्दू ,संस्कृत या पंजाबी में जैसे चाहे अपनी खुशी प्रकट कर लेता है। वह प्रसन्नता भी क्या प्रसन्नता जिसे सामने लाने के लिए गणित के जटिल सूत्र को हल करने जैसी माथापच्ची करनी पड़े। इन शेष दिनों में मेरा लेखक बेहद उदारमना रहता है। हिंदी को भी अंग्रेजी की तरह शब्दों को घुमा घुमा कर बोलता है। मुझे पता है कि हिंदी अंग्रेजी लिबास में अधिक जंचती है।
सत्ता का सान्निध्य पा हिंदी की रचनाधर्मिता अकसर भावुक हो उठती है। हमारे गहरे तक जड़ें जमाए संस्कार ठीक उसी तरह खिल उठते हैं जैसे ओस का स्पर्श पाते ही शंखपुष्पी। हम हाथ मिलाते मिलाते सत्ता के चमचमाते जूते के स्पर्श के लिए आतुर हो झुक जाते हैं।झुकी हुई भाषा तनी हुई भाषा के मुकाबले अधिक संभावनाओं से भरी और गरिमामय ल…

हिंदी का ग्लोबलाइज़ेशन और फर्जी तसल्लियों की तितलियाँ

हिंदी वैश्विक भाषा बनने की ओर अग्रसर है।अग्रसर क्या है ,इसे अब लगभग बनी ही समझो। इतनी तामझाम के बाद यह तो होना ही है। जब जब विश्व हिंदी सम्मेलन होता है तब तब ऐसी ही अनुभूति होती है।भोपाल में लोग जीभर के हिंदी बोल आये। अब अगले एक साल तक कोई  हिंदी में खुल कर बोलेगा तो वह उसके गले में अटक कर रह जायेगी।यह अलग बात है कि दिन भर अंग्रेजी में बतियाने के बावजूद वे सपने वर्नाकुलर लेंग्वेज में ही देखंगे। सिर्फ इतना ही नहीं यदि हिंदी में बोले तो इस अदा से बोलेंगे कि वह लगभग अंग्रेजी –सी लगे। हम हिंदी से उसी तरह प्यार करते हैं जैसे अपनी निपट देहाती माँ से करते  हैं।कहने का जब मौका मिलता है तो कहते हैं कि माँ है तो जहान है।उसकी गोद में जन्नत होती है।लेकिन वह तभी तक अच्छी लगती है जब तक गाँव देहात में रहती है।यदि कभी वह महानगर में बेटे के पास रहने आ जाये तो लगता है कि इसने तो बनी बनाई इज्जत का फालूदा बना दिया। यही हाल हिंदी का है।  इसे भी हर जगह कैसे उच्चारा जा सकता है? इसे बोलने से आदमी की जेन्टिलमैन वाली छवि पर विपरीत असर पड़ता है।हिंदी घरघुसरी टाइप की भाषा है।वहीं जंचती है। ठीक उसी तरह जैसे माँ गा…

हिंदी विंदी का चक्कर

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विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा है। हिंदी दिवस आने को है । मन हिंदी -हिंदी हो रहा है। बच्चे उनसठ का मतलब नहीं समझ पा रहे हैं। हम उन्हें यह बता कर कि उनसठ फिफ्टी नाइन को कहते हैं ,रीझे जा रहे हैं। बच्चे का हिंदी ज्ञान जितना न्यूनतम होगा उसका भविष्य उतना ही अधिक उज्ज्वल होगा। हिंदी तरक्की के रास्ते का अडंगा है। अधिक हिंदी विंदी के चक्कर में आदमी किसी सरकारी दफ्तर के बाबू पद से ऊपर नहीं जा पाता। इससे ऊपर के ओहदे पाने के लिए सिर्फ इंग्लिश ही काम आती है। हिंदी को इंग्लिश की तरह जब बोला जाता है तब अभिव्यक्ति की आज़ादी मुखरित होती है। लोगों को पता लगता है कि बंदा पढ़ा लिखा है। विश्व हिंदी सम्मेलन में तमाम जगहों से लोग बुलाए गए हैं। वे सब नियत तिथि पर नियत स्थान पर एकजुट होकर हिंदी के बारे में चिंतित होंगे। वे हिंदी का मान बढ़ाने के लिए कुछ भी कर गुजरने का अहद लेंगे। चिंता कर चुकने के बाद अहद लेना वैसा ही है जैसा भरपेट भोजन कर लेने के बाद चूरन फांक लेना। अधिक देर हिंदी में बतियाने से विद्वानों को अपच होने लगती है।वे जब आपस में किसी मुद्दे पर उलझते हैं तो कुछ देर हिंदी बोलने के बाद संस्कृत पर आते हैं औ…

हिंदी सम्मेलन में न बुलाये जाने की वजह

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विश्व हिंदी सम्मेलन मुल्क में कहीं होने को है ।यह खबर मुझे उड़ती -उड़ती मिली थी। मुझे तभी लगा था कि यह बात सोलह आने सच होगी। जो खबर अफवाह के प्रारूप में उड़ान भरती हुई आती है वह अमूमन सच निकलती हैं। मुझे इसकी पुष्टि के लिए कोई प्रयास भी नहीं करना पड़ा। नुक्कड़ पर छोले भटूरे बनाने वाले रामखिलावन ने गदगद स्वर में सूचना दी कि वह  सम्मेलन में भाग लेने के लिए बाकायदा बुलाया गया है।-अहोभाग्य ,मैंने कहा। अकेले जा रहे हो ? मैंने पूछा। -नहीं जी।परचा साथ ले कर जाऊँगा। उसने बताया। मुझे लगा कि कढ़ाही का समानार्थी देशज शब्द परचा भी होता होगा। या फिर अमरीकन इंग्लिश में कढ़ाही के लिए प्रयुक्त होने वाला ‘स्लेंग’ जैसा कुछ होगा । मैंने पूछ लिया ,करछी आदि के बिना वहां काम चल जायेगा। मेरी बात सुनकर रामखिलावन ‘हो हो’ कर हंसा। उसके  हंस पड़ने  के कारण मेरे चेहरे पर प्रश्नचिन्ह लटक गया तो उसने खुलासा किया कि वह वहां हिंदी का मान बढ़ाने जा रहा है।उसे वहां हिंदी साहित्य में सौंदर्यशास्त्र की अवधारणा पर परचा पढ़ने के लिए बुलाया गया है। -सिर्फ परचा ही पढ़ोगे या सम्मेलन में आने वालों को अपनी कारीगरी का सुबूत भी दोगे ? मैंने …