शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

मोबाइल का पैनिक बटन और पैनिकता की फ़िक्र


अब मोबाइल में पैनिक बटन होगा।इस खबर ने बहुत से लोगों के भीतर अदृश्य भय के साथ  नवउत्साह का संचार कर दिया है।पैनिक का हिंदी समानार्थी  त्रास  अमूमन हर बौद्धिक के भीतर कमोबेश संत्रास की शक्ल में मौजूद रहता ही है।यदि इसका मतलब आतंक माना जाए तो पैनिक  यकीनन बड़ी  डिप्लोमेटिक व्यंजना है।कुटिलता से भरीपूरी।पैनिक  की थाह पाने के लिए यदि इसके भावार्थ में गहरे उतरें तो एक अजब हलचल शब्दकोश में यहाँ वहां टहलती दिख जायेगी।लेकिन पैनिक  होने के लिए कोई एक  लफ्ज़  पर्याप्त नहीं है।
पैनिक  बोले तो वो पैनिक  जिसके लिए बटन की जरूरत महसूस हो।बटन भी ऐसा जिसे वक्त-जरूरत झट से दबा कर उसे आलोकित किया  जा सके।बटन दबते ही अपना काम करे।ईवीएम वाला नोटा जैसा बटन न हो,जिसके दबाने या न  दबाने से कोई फर्क ही न पड़ता हो। रेलगाड़ी और बस में रखी उस कम्प्लेंट बुक जैसा भी नहीं जिसकी जब आवश्यकता पड़े तो पता लगे कि वह तो कभी अस्तित्व में आई ही नहीं थी।छाते में लगे उस जंग लगे बटन जैसा न हो ,जिसे बारिश होने पर  दबाते रह जाएँ और वह तब खुले जब काले मेघ पानी बरसा  अगले मोहल्ले की ओर बढ़ लें।
वैसे पैनिक  भी कई आकार,प्रकार और प्रजाति का होता है।कामवाली के सुबह तय समय पर न प्रकट होने पर होने वाला  उद्दात पैनिक ।इस आपदा से निबटने के लिए कोई बटन आजतक इजाद नहीं हुआ।अलबत्ता ऐसी अपरिहार्य स्थिति में भद्रपुरुष टाइप पतियों के कान में पैनिक की घंटी खुद-ब-खुद बज उठती है।एक अन्य तरह का पैनिक  तब भी फैलता है जब संतान युनिवर्सटी में एडमिशन के लिए बाट जोह रही हो और फर्स्ट कटऑफ के सौ प्रतिशत पर अटक जाने की खबर आ जाए।तब संतान इसके निदान के लिए चार छ: लाख रुपये वार्षिक फीस वाले निजी संस्थान का प्रोस्पेक्ट्स मंगाने की फरमाइश कर दे।इस पैनिक  में कोई बटन नहीं सिर्फ सहमति में हिलती हुई गर्दन और प्रोविडेंट फंड की खाता संख्या काम करती है।

अनुमान तो यही है कि मोबाइल के पैनिक  बटन से दिलासा भरा यह संदेश निकलना है कि हम आपकी ‘पैनिकता’ की फ़िक्र  करते हैं।आप समाधान की कतार में हैं।कृपया धैर्यपूर्वक पैनिक होते रहें।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

गुड़गाँव, गुरुग्राम और गुलगुले


गुड़गांव का नाम गुरुग्राम हो गया।गुड़ गुरु बन गया।तमाम शक्करखोर इस बात पर पूर्ण स्वाद भाव के साथ नाराज़ हैं।घंटाल इसे लेकर बेहद उत्तेजित हैं।वैसे टेक्निकली देखा जाए तो गुड़ के गुरु हो जाने में कुछ भी दुरूह नहीं।इसे बोलने में न जुबान अटकती है,न किसी की आस्था का कोई बिंदु फ़िसलता है और न ही महाभारत का युद्ध पुन: छिड़ जाने का कोई आसन्न खतरा उत्पन्न होता है।द्रोणाचार्य ने जब कभी एकलव्य से अंगूठा माँगा होगा तो मांग लिया होगा।अब कोई गुरु ऐसी आलतू -फालतू चीज न तो मांगता है और न ही शिष्य देता है।अलबत्ता जिसे मौका मिलता है वह अंगूठा दिखा देता है।और तो और सबसे बड़ी बात यह कि जब गुड़ न होगा तो लोग क्या  खाकर स्वादिष्ट गुलगुलों से परहेज जैसे फालतू काम करने में अपने समय और ऊर्जा का अपव्यय करते हैं।नाम में ग्राम की फीलिंग होगी तब घरघुसरे टाइप के लोग वृथा ही गॉंव घर को लेकर भावुक भी नहीं होगे।वैसे भी ग्राम हर हाल में गाँव से बेहतर होता है जैसे मक्का के दाने  ‘फुल्ले’ से पॉपकार्न बनकर महिमामंडित होते हैं ठीक उसी तरह।जैसे फटी पुरानी घिसी हुई पतलून फेडिड जीन्स फैशन के रूप में अपनी  पहचान बना लेती हैं। पहचान पुराना लफ्ज़ है ,इसे फैशन स्टेटमेंट कहें तो बेहतर।
गुड़गांव का नाम बदलने पर भाईलोग व्यर्थ ही चिंतित हैं।जलेबी का नाम कचौरी रख लो पर रहेगी तो वह चाशनी में आकंठ डूबी मिठास का संजाल ही।चपरासी अपना नाम यदि अफसर अली रख ले तो क्या वह किसी कम्पनी का सीइओ बन जाएगा।मजदूर अपना नाम ठेकेदार रख ले तो क्या उसके सिर पर रखी ईंटों का वजन घट जाएगा? मक्खी अपना नाम बदल कर गिरगिट रख ले तब भी क्या खतरा होने पर अपना रंग बदल पाएगी? सेठजी का नाम ऐसा हो या वैसा लेकिन उनके नाम प्रताप तब तक जस का तस ही रहना है जब तक उनके नामधारी बैंक के खाते और तिजोरी धन से लबालब भरे है।ध्यान रहे नाम सिर्फ नाम ही होते है।न इससे अधिक न इससे कम।हालांकि शेक्सपियर ने अरसा हुआ कहा था कि नाम में क्या धरा है।लेकिन बाज़ार कहता है कि सब नाम का ही तो किया धरा होता है।जब नाम का डंका बजता है तो सब चलता है।बाज़ार के आगे किसी की नहीं चलती।उसके आगे सबको घुटने टेकने होते हैं।
गुरुग्राम बेहद पवित्र -सा नाम लगता है।हमारी अर्वाचीन संस्कृति और माटी में रचा बसा।यह नाम ही ऐसा है कि धार्मिकता में ओतप्रोत आदमी इसका नाम भर ले तो हाथ खुद-ब-खुद उठकर आदरभाव से कान को छू लें, जैसे संगीतकार अपने उस्ताद मरहूम का जिक्र करते हुए  अक्सर करते हैं।आजकल इसी तरह के नामों की डिमांड भी है।मिनी स्कर्ट बिकनी आदि बेचने वाले भी अपनी दुकान का नाम लिबास रखते हैं ताकि आधुनिकता के साथ परम्परा का मजबूत गठजोड़ यथावत बना रहे। टू पीस स्विम सूट बेचने वाले बुटीक ‘हया’ के नाम से बड़े मजे से खूब जाने और पहचाने जाते हैं।हया शब्द बतौर ब्रांड नेम फबता  भी बहुत है।वह हया जो  कारोबारी  होती है , उसकी ही ऊँची हवा रहती है।हया हो या बेहया या फिर हवा फरफर कर चलती हुई अच्छी लगती है।
कुछ भी कह लें,वाकई नाम हो तो गुरुग्राम जैसा।जैसे कभी नत्थूलाल की मिथकीय मूंछ हुआ करती थी,जिनके विषय में  यह क्रांतिकारी लोकोक्ति पचलित है कि मूंछे हो तो नत्थूलाल जैसी वरना क्लीनशेव्ड ही भले।इसे इतिहास में हज्जाम के उस्तरे के पक्ष में दिया गया पहला अधिकारिक लेकिन तनिक विरोधाभासी बयान भी माना जाता है।
अब दो नामों के विकल्प हमारे पास है।जब मन कहे कि चलो कुछ मीठा हो जाए तो गुरुग्राम को बड़े लाड़ से गुड़गांव कह लिया वरना गुरुग्राम में गुरूजी वाले आध्यात्मिक सान्निध्य और लॉजिक के जरूरी  तत्व तो मौजूद हैं ही।



बुधवार, 6 अप्रैल 2016

खेल जैसा खेल न हुआ


खेल खेल ही होता है।इसमें एक जीतता तो दूसरा हार जाता है।चुपचाप बैठ कर निरपेक्ष भाव से खेल को सिर्फ निहारने अधिक स्वास्थ्यवर्धक कुछ हो ही नहीं सकता।न दिल जोर -जोर से धडकता है और न मुट्ठियाँ बाँधने या दांत भींचने की जरूरत पड़ती है। कमजोर दिल वालों के लिए हार्ट अटेक का खतरा भी उत्पन्न नहीं होता।देह की शिराओं में रक्त प्रवाह नॉर्मल बना रहता है। और तो और जयकारे लगाने में ऊर्जा का अपव्यय भी नहीं होता।दर्शक जब तक तटस्थ दृष्टा बने रहते हैं तब तक वाकई वे एकदम भद्र पुरुष लगते हैं और खेल एकदम जेंटिलमैन टाइप का स्पोर्ट।कोई जीते,कोई पराजित हो –इससे हमें क्या टाइप का चिंतन उपजता है।
दो टीम के खिलाडियों के खेल कौशल के मध्य जब मुल्क ,जज्बात,राजनीति और बाज़ार आ जाते हैं तब खेल खेल न रह कर छायायुद्ध बन जाता है।यह अलग बात है कि कुछ लोग इसे  देशप्रेम की डिफॉल्ट अभिव्यक्ति कहते और मान कर चलते हैं।यह सबको पता है कि जंग ,मोहब्बत और क्रीड़ापूर्ण हुडदंग में हर बात और वारदात  जायज़ होती है।चीखना चिल्लाना, गाली गलौच, उछलना -कूदना ,हथेली पीटना ,पटाखे फोड़ना आदि भी इसका अपरिहार्य हिस्सा होता है।वैसे कहा और माना तो  यही जाता है कि ऐसे नाज़ुक वक्त पर ही पता लगता है कि किसके भीतर भक्तिभाव के ज्वालामुखी में खौलता हुआ लावा किस मिकदार में है।देशभक्ति और देशद्रोही के सर्टिफिकेट वितरित करने के लिए यह लिटमस टैस्ट का दुर्लभ मौका भी  होता  है और कमोबेश दस्तूर भी।
हमेशा की तरह इस बार भी एक देश की टीम हार गयी।दूसरी जीत गयी।इनाम, इकराम, ट्राफी और ख़िताब जिन्हें मिलने थे मिल  गये।न किसी ने गम से बोझिल अढ़ाई मन के सिर को हथेलियों में थामा,न पुराने टीवी सेट को मीडिया के कैमरों के सामने फोड़ा, न किसी ने लड्डुओं का भोग लगवाया,न घंटे घड़ियाल बजे  और  न कोई क्रिकेट का कुल देवता अवतरित हुआ।न किसी खलनायक बने खिलाड़ी के घर को उन्मादियों ने घेरा।  सिर्फ इतना ही नहीं,कोई ‘शांतिदूत’ पड़ोसी के चकनाचूर हुए टीवी के लिए सद्भावना का ‘क्विक -फिक्स’ देने की पेशकश करता भी दृष्टिगोचर नहीं  हुआ।मानना होगा कि इस बार खेल तो हुआ लेकिन खेल जैसा बाकायदा खेल न हुआ।इकहरा खेल हुआ। खेल के भीतर कई खेल न हुए। यदि हुए  भी हों  तो उनका स्टिंग टाइप का भंडाफोड़ नहीं हुआ। मैदान में हुए खेल तभी सनसनी पैदा करते हैं  जब अदृश्य ताकतें अपना काम ज़रा ढंग से करती हैं।जब दो दलों की हार और जीत में तेईसवें खिलाड़ी के सक्रिय रूप से  उपस्थित होने का पुष्ट या अपुष्ट सुराग मिल जाता है।
इस बार चौके छक्के तो खूब जड़े गये ।हारते –हारते टीमें जीती और लगभग मैच जीत चुकी टीम अंततः पराजित भी हुई।आखिरी ओवर की चार गेंदों पर चार गगनचुम्बी छक्के भी लगे।पर सच यही है कि  वैसा मज़ा नहीं आया जैसे मजे की लोग आस लगाये थे।पैसा वसूल नहीं हुआ।विजेताओं ने मैदान में खूब धमाल किया लेकिन उनके कमाल में मन रमा नहीं।
शायद वक्त बदल गया है।अब अब्दुल्ला इतने मासूम नहीं रहे कि बेगानी शादी में प्रेमदीवानी मीरा की तरह मगन होकर नाचने लगें।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

पनामा पेपर्स का लीक हो जाना


पनामा पेपर्स के लीक हो जाने की बड़ी खबर आई है।एक वक्त था जब लोगों के जेब में टंगे पैन स्याही छोड़ देते थे।तब जेब के दायें –बाएं अमूर्त कलाकृति बन जाती थी।कहा जाता है कि दुनिया की अनेक कलाकृतियाँ इसी तरह के लीकेज के दुर्लभ संयोग से अस्तित्व में आयीं।लेकिन अब मामला कलम के नहीं पेपर  के लीक होने का है इसलिए मसला जरा जटिल है।यह तो सुना था कि पेपर पर दर्ज इबारतें चुगलखोर होती थीं पर पेपर तो अपने आप बेहद निरीह  माने जाते रहे हैं।पेपर फडफडाते तो सुने गये थे लेकिन उनकी वाचालता की कोई बात कभी नहीं उठी।
पनामा में जो पेपर लीक हुए हैं ,वे साधारण पेपर नहीं हैं।उन पर दर्ज नाम कद्दावर हैं।महानायक,अप्रतिम सुंदरी से लेकर अपने तमाम ताकतवर थैलीशाहों और  तानाशाहों से लेकर तमाम  गॉडफादर टाइप तक के नाम इसमें  हैं।इन उज्ज्वल नामों के आगे  स्वर्णिम राशियां लिखी है,जगमग करती। सवा अरब के देश में से सिर्फ पांच सौ नाम इसमें हैं।इस बात पर चाहे तो मुल्क की जनता कम से कम एक दशक तक रह-रह कर शर्मिंदा टाइप की  हो सकती हैं।
आम आदमी पनामा के बारे में ज्यादा से ज्यादा यह जानता है कि इस नाम का एक हैट हुआ करता है।वह हैट जिसे हाथ की सफाई दिखाने वाले जादूगर  परिंदे निकाल कर उड़ाते हैं।पुराने ज़माने जिसे  पहनकर खलनायक बड़े अंदाज़ में खिसियानी हंसी हँसता था।जिसे कुछ लोग अपरिहार्य स्थिति में टोकरी बना लेते थेऔर झोला न होने की स्थिति में इसमें  बाज़ार से खरीदे गये आम अमरुद धर लिया करते थे।तब इस हैट के लीक हो जाने का कोई खतरा नहीं रहा होगा।
बुद्धिमान लोगों को पता है कि पनामा नाम की एक नहर हुआ करती है।जिसमें जलपोत चलते हैं।यह वनस्पति ,मछलियों और तितलियों के बाहुल्य वाली जगह है।लेकिन यह किसी को पता नहीं था कि यह टैक्स लुटेरों का  अभ्यारण्य भी है।इससे भी बड़ी बात, यहाँ काले धन को धो पोंछ कर धवल बनाने का बाकायदा ड्राईक्लीनिंग का  धंधा चलता है।यहाँ से कुछ पेपर लीक क्या हुए पनामा तो रातोंरात लगभग कुख्यात ही गया।बदनाम भले हुआ पर स्वनामधन्य हो गया।अब तो कहने को जी चाहता है कि पनामा में धन टिकाने वालों की बात ही कुछ और है।अनेक लोगों के लिए पनामा में रकम खपा पाना किसी खूबसूरत स्वप्न के साकार हो जाने जैसा हो गया है।
पनामा में हिफाजत से रखे पेपर अचानक फ़रार क्या हुए तमाम उजले चेहरों की कलई ही खुल गयी।सात तालों में हिफाजत से रखी इन मान्यवरों की साख राख हो गयी।सब जान गये कि काले धन के मामले में सारे मतवाद बजारवाद के साथ बड़ी आसानी से हिलमिल  जाते हैं।वाम वाला  दक्षिण पंथी के बगलगीर होकर मुस्कराता है तो खांटी सेक्युलर कन्फर्म कम्युनल से तपाक से हाथ मिलाता दिखता है।मानना होगा कि बाज़ारवादी पूँजी का अपना धर्म,संस्कृति और एक अदद पनामा भी होता है।
पनामा पेपर्स के जरिये जिनके नाम आये तो आये लेकिन जिनके नहीं आ पाए उनकी तो सामाजिक प्रतिष्ठा ही पूरी तरह मिट्टी में मिल गयी। पूरी मट्टी पलीद हो गयी उनकी।बनी बनाई इज्जत पर बड़ा-सा सवालिया निशान लग गया है।
अब तो यही लग रहा है कि इन पनामा वालों को शायद कोई काम ठीक से करना आता ही नहीं।जब पेपर लीक किये ही थे तो उसमें ऐसी कोताही तो न बरतते।अंतर्राष्ट्रीय बहुजनहिताय की तर्ज पर समस्त नामों को उजागर करते।पेपर लीक करने का भी अपना सौंदर्यशास्त्र और सलीका होता है।