गुरुवार, 18 जून 2015

योग, योगा ,आर्यभट्ट और हॉट ब्रांड


योग का मतलब होता है जोड़,जिसे अंग्रेजी में उसी तरह एडिशन कहते है जैसे पहाड़े को टेबिल ।  योग अनेकार्थी शब्द है । योग जब योगा बनता है तब इसमें से दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित होता है। योगा जब किसी अनिंद्य सुंदरी के दैहिक सौष्ठव के सान्निध्य में प्रकट होता है तब इसकी छटा नयनाभिराम हो जाती है । देशज पाठशालाओं में नन्हें -नन्हें बच्चों के कान उमेठ कर उन्हें संख्याओं का जोड़ना इस उम्मीद के साथ सिखाया जाता रहा है कि इनमें से कोई  एक दिन आर्यभट्ट बनेगा । अलबत्ता पब्लिक स्कूल वाले बच्चों के कान नहीं उमेठते ,वे सिर्फ अविभावकों की जेब का दोहन करते हैं। वे किसी को आर्यभट्ट नहीं बनाते ,वे उन्हें मल्टीनेशनल्स के लिए किसी घोड़े की तरह सधाते हैं। बच्चों द्वारा गणितीय योग सीखते हुए सदियाँ बीती लेकिन उनमें से एक भी आर्यभट्ट तो न बना ,वे अधिकतम बड़े धन्नासेठों की दुकानों के पुरजे या प्यादे जरूर बन गए।  पर कसरती योग  बाज़ार का  हॉट ब्रांड अवश्य  बन गया ।  उससे  बाज़ार को नई ऊर्जा और सूत्र मिला –करो -करो ,करने से होता है ।
योग के बारे में हालाँकि कहा यह जाता है कि इसके साथ जब तक ध्यान न जुड़ा हो तब तक यह अकारथ रहता है।  जब इसके साथ ध्यान का योग होता  है तब यह मारक जुगलबंदी(डैडली कम्बिनेशन) बन जाता है । वैसे विद्वान  यह भी कहते रहे हैं कि करने से ध्यान नहीं हुआ करता । जब तक कुछ करने की ललक बाकी  है , तब तक ध्यान नहीं बस दुकानदारी होती है। यदि वाकई ध्यान करना है तो इसे करने के चक्कर से मुक्ति पाओ ।  
योग सूर्य नमस्कार करने की बात करता है और यहीं से सारी दिक्कत शुरू होती है।  ध्यान कहता है कि प्रणाम ,नमस्कार ,सलाम आदि की औपचारिकता त्याग कर अपनी आती -जाती सांसों में थिर हो जाओ । राजनीति कहती है कि कुछ भी करो या न करो ,पर  हर जरूरी -गैर जरूरी मुद्दे को लेकर मुखर बनो  ।  बात-बेबात  पर ताल ठोक कर या तो लड़ने पर आमादा हो जाओ या कीर्तनकार बन जाओ । एक दूसरे पर खूब कीचड़ उछालो या फिर मजीरे बजाओ।  गाओ खुशी के गीत गाओ। गाते बजाते योगाभ्यास भी करते जाओ।  अपनी आवाज़ इतनी बुलंद करो कि समस्त तार्किकता धूल का बगूला बन जाये ।
यह बात शतप्रतिशत सही है कि योग या कोई अन्य प्रकार काम करने से होता है । उंगली पर जोड़ों या मन के केलकुलेटर पर ,जोड़ तभी सही लगता है ,जब उसे एकाग्रचित्त हो स्थापित प्राविधि से किया जाता है । गणित मनचाहे बदलाव की इजाजत  नहीं देता । सदियों से योग विधिवत होता आया है । ध्यान की कोई तकनीक नहीं । यह एकदम तरल होता है । जो इसके साथ बह लिया वह योग ,वियोग और भोग की सीमा से परे निकल  गया ।
योग करना है तो इसे करो क्योंकि यह केवल होता तो करने से ही  है । बाज़ार को ध्यान जैसी कर्महीनता नहीं चाहिए । ध्यान रहे ,बाज़ार को आर्यभट्ट के पुनर्जन्म की आस नहीं ,चूरन ,चटनी, जैम, जैली ,शरबत ,उबटन ,अंजन ,मंजन और ब्यूटी पार्लर वाला ब्रांडेड योग और योगा चाहिये ।

गुरुवार, 11 जून 2015

अबकी बार हंसोड़ सरकार


बिहार में चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है । विवाह के अवसर पर होने वाले सामूहिक भोज का सा माहौल बनने लगा है । हलवाईयों ने अपनी भट्टियां लीपनी शुरू कर दी है । आटा दाल चीनी आलू नमक आदि की पहली खेप समारोह स्थल पर पहुंचने लगी है । मंगल गीत गाने के लिए गवैये अपना गला खंखार रहे हैं । ढोलकों की धमक को ठोक पीट कर दुरुस्त किया जा रहा है । समय रहते तमाम इंतजामों को परखने की कवायद चल रही है । दूल्हा  कौन होगा ,इसका ऐलान भी हो गया  है । मन मसोस कर सब गोलबंद हो गए हैं।  प्रदेश का वोटर दम साधे सारा कौतुक देख रहा है । आसन्न चुनावों को भांप कर दुधारू पशु समय असमय रंभाने लगे हैं। वे भी वक्त आने पर सत्ता में अपने लिए उचित भागीदारी की मांग कर सकते  हैं ।
सुशासन बाबू लगातार मुस्कुरा रहे हैं । कोई बता रहा है कि वह मुस्कुरा नहीं रहे वास्तव में इतरा रहे हैं ।पहले वह आधे अधूरे धार्मिक टाइप के थे या कहें टू –इन –वन । जैसा मौका हुआ वैसे हो लिए। लेकिन  जब से वह शतप्रतिशत ‘सेकुलर’ हुए हैं तब से वह बेहद खुशमिजाज हो चले हैं । उनकी होठों पर मुस्कुराहट स्थाई रूप से चिपक गई है। उन्होंने हँसते हँसते ऐलान कर दिया है कि वह प्रदेश के विकास की खातिर  कुछ भी कर सकते हैं। विकास से उनका आशय अपने सत्तारूढ़ होने से है । सर्वांगीण तरक्की के लिए वह भूतपूर्व जी को नाना  प्रकार की सुविधाएँ और तमाम प्रजाति के फल और कटहल न्योछावर करने को तैयार हैं बशर्ते वह सत्ता में भागीदारी की  मांग न करें ।
पर भूतपूर्व जी हैं कि वह मान कर भी मानते ही नहीं । बार- बार किसी न किसी बात पर बिदक और रूठ जाते हैं । जब वह नाराज़ होते हैं तो कह देते हैं कि उन्होंने तमाम विकल्प खुले रखे हैं । इसी खुलेपन की खातिर वह विभिन्न दलों के नेताओं से क्लोज डोर मीटिंग कर आते हैं । उन्हें पता है कि राजनीति के बाज़ार में दरवाजे सदा खुले रखने चाहिए । सिर्फ दरवाजे ही नहीं खिड़कियाँ और रौशनदान भी चौपट खुले रहें तो उम्मीद की गगरी कभी नहीं रीतती ।  ब्याह बारातों की दावतों में लड्डू उसी की पत्तलों में प्रकट होते हैं जो उसमें उन्हें परसे जाने की गुंजाइश रखते हैं । जिन पत्तलों में रायता सब्जी चटनी चारों ओर फैली होती है ,उसमें लड्डू परसने  वाले हाथ ठिठक  जाते हैं ।
सुशासन बाबू अपने को राजनीति की रमी का तुरुप का इक्का मान रहे हैं। उनके विरोधी अलबत्ता उन्हें कुछ और ही समझ रहे हैं। ताश के खेल में तुरप और जोकर की एक जैसा महत्व और उपयोगिता होती है।
पंगत अभी ठीक से बिछी नहीं है लेकिन शादी ब्याह जैसे मांगलिक अवसरों पर नाराज़ और कुपित होने वाले लोग कमर कस का तैयार हो गए हैं। सुशासन जी को यकीन है कि गठबंधन द्वय  की चुहलबाजी और उलटबांसी के जरिये अन्तोतगत्वा वह जनता को रिझा लेने में कामयाब हो जायेंगे । उन्होंने अपने गठबन्धन के लिए पंच लाइन तय की है – भाई बिरादर सब हैं साथ  , कुशासन को दे दो मात । अबकी बार हंसोड़ सरकार। 




रविवार, 7 जून 2015

आम ,लीची ,कटहल और स्वाद विमर्श


आम को लेकर तरह तरह की लालसाएं सामने आ रही हैं।  मतदाता प्रजाति के आम पहले से चर्चा में थे । अभी चुनाव दूर हैं तो आम टाइप के वोटर अपनी -अपनी कोटर में हैं । लेकिन  पेड़ पर लगने और समय -असमय  टपक पड़ने वाले आम  यकायक बड़े खास हो चले  हैं । और हों भी क्यों न ,आखिर वो लगे जो हैं सरकारी डाल पर । उनकी रखवाल के लिए बाकायदा सशस्त्र पुलिस बल तैनात किया  गया  है । एक -एक आम की सुरक्षा पूरी मुस्तैदी से की जा रही है।  चप्पे चप्पे पर गुप्तचर आँख गडायें हैं ताकि  कोई ऐरागैरा उन्हें  चखने न  पाए । यह यकीनन  आम की सोहबत का प्रताप है कि  आम तो आम उनके सान्निध्य में लगी लीचियां तक खास बन गई है । अब तक माली बगीचों में लगने वाले रसीले आमों  का लालची परिंदों से बचाव बाग में टिन के कनस्तर बजा कर , मुख से हुर्र हुर्र की आवाज़ पैदा करके और गुलेल से कुछ ढेले इधर उधर दाग कर किया करते थे ।यह उस समय की बात है जब आम सिर्फ आम होते थे ।मीठे गूदे से भरे रसीले आम ,जिसका रसास्वादन समाज के सभी तबके के लोग खांटी समतावादी अवधारणा के अनुरूप करते थे । यह अलग बात है कि तब भी आम के मामले में हर कोई अपनी  खास समझ और परख रखता था ।
आम एकबार फिर चर्चा के केन्द्र में है लेकिन इस बार मामला विशुद्ध  राजनीतिक  होने की वजह से जरा पेचीदा बन गया है ।दो दिग्गजों के लिए यह जिह्वा की प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है ।उन्होंने अपनी जबान को मेरठ की तेजतर्रार कतरनी बना लिया है।  शायद ऐसा पहली बार हो रहा है कि  व्यक्तिगत और जातिगत सम्मान से जुड़े किसी मामले में से नाक पूर्णत: नदारद है । अलबत्ता स्वाद को लेकर देशभर में  विमर्श हो रहा है और इस पर  चटखारे भी लिए जा रहे हैं । वैसे भी अलग अलग प्रसंग में  नाकें इतनी बार कट चुकी हैं कि अब वे  किसी मसले में अड़ने लायक रही भी नहीं । नाक की साख जड़मूल से समाप्त हो चुकी है ,लेकिन जीभ है कि उसका  तिलिस्म अभी बदस्तूर कायम है।  
पता चला है कि आम लीची के साथ ही साथ कटहल को भी वीआईपी सुरक्षा घेरे में ले लिया  गया है। इससे कटहल के सोशल स्टेट्स में  चार चाँद टंक  गए हैं और जनता के बीच यह ‘लाउड और क्लीयर’  मैसेज चला गया है कि सत्ताधारी चाहे जो हो , उनकी संवेदनशीलता ,कार्यप्रणाली और हनक लगभग एक जैसी और अमूमन बड़े कमाल की होती है । वह फल और सब्जी में गुणवत्ता को लेकर कोई ज्यादा भेद नहीं करते। पर वह किसी को कुछ भी आसानी से  मिलने भी नहीं देते। किसी को जब कुछ प्रदान करते हैं तो राजनीतिक नफा –नुकसान  की तराजू पर तोल जरूर लेते हैं। दाता होने की दैवीय आभा से ओतप्रोत होकर देते हैं। बेवजह तो यह लोग उबासी भी नहीं लेते ।      
सरकारी  पेड़ पौधों  पर पनपने वाले फल हों या सब्जी  ,उनकी तो हर बात निराली होती है ।इनका स्वाद चखने  के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं ।’आम के आम गुठलियों के दाम’ के गूढ़ निहितार्थ को ठीक से समझना पड़ता है । इन्हें कोई यूँही अनाधिकृत तरीके से खा पचा नहीं सकता। सरकारी सुविधायें  चाहे जिस श्रेणी की हो ,वह कभी अनायास नहीं मिलती। इसे पाने के लिए सहज रास्ते कभी उपलब्ध नहीं रहते।इन्हें पाने के लिए बड़ी जोड़ जुगाड़ करनी ही होती है ।      
लीची हो ,कटहल हो  या फिर आम जब राजकीय सरपरस्ती  पा जाते हैं तब एकदम खास बन जाते हैं । खास बोले तो एकदम झक्कास ।   




गुरुवार, 4 जून 2015

मैकमोहन ,लाइन और चीन


एक समय की बात है ।  मैकमोहन नाम का एक दढ़ियल आदमी हुआ करता था । वह पहले जन्मा या उसकी दाढ़ी ,इस पर उसी तरह का अनसुलझा विवाद है जैसे  अंडा पहले आया या मुर्गी या फिर चीन पहले अस्तित्व में आया या सीमा रेखा को लेकर तनातनी । लोग उसे  सांभा के नाम से जानते थे । उसका सरदार उसे अरेओसांभा के नाम से पुकारता था । वह हमेशा एक पहाड़ी पर गुमसुम बैठा  रहता था ।  कहा जाता है कि वह हरदम एक ही गाना गुनगुनाता रहता था ,’दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ ,बाज़ार से निकला हूँ खरीददार नहीं हूँ’ । बाद में पता चला कि वह वहां बैठ कर चीन की सीमावर्ती किसी कस्बे के बाज़ार को निहारता और किसी सुदर्शना पर  ‘लाइन’ मारता था । कालांतर में उसी लाइनको मैकमोहन लाइन कहा जाने लगा ।
मैकमोहन द्वारा खींची गई लाइन भावनात्मक टाइप की थी सो उसकी नापजोख कभी ठीक से नहीं हो पाई । उसकी लाइनगरीब की जोरू बन गई जिससे हर कोई हंसी ठट्ठा करने लगता । चीन ने कह दिया है कि इस तरह की कोई लाइन-वाइन नहीं है । यदि कभी ऐसी कोई लाइन रही होगी तो उसे मैकमोहन भगा कर अपने घर ले गया होगा ।
चीन को न मैकमोहन दिख रहा है न उसकी लाइनउसे केवल अपने माल को खपाने लायक विशाल बाज़ार दिख रहा  है  । उसने अपने साम्यवाद को इतना लचीला बना लिया है कि वह चायनीज सामान की तरह ड्यूरेबल हो या न हो पर किफायती इतना है कि हर जेब के अनुकूल बन गया  है। उसका  वामपंथ फोल्डिंग छाते की तरह  है कि बटन दबते ही उपयोग के लिए तन कर तैयार हो जाता है ।
चीन ने खुद को बाज़ार की मांग के हिसाब से ढाल लिया है लेकिन मैकमोहन यह काम समय रहते नहीं कर पाया । वह केवल गब्बर के सवालों के जवाब देने में लगा रहा । गब्बर पूछता कि सरकार हम पर कितना ईनाम धरे है तो वह तुरंत बता देता ,पूरे पचास हज़ार । उसने यह  कभी नहीं बताया कि वह पचास हज़ार रुपये की नहीं येन की बात कर रहा है  । यदि उसने यह किया  होता तो  उसकी चीनी लाइन की शिनाख्त प्रगाढ़ हो गई होती  और गब्बर का आतंक चीन तक फैले होने की पुष्टि हो जाती ।
चीन को सिर्फ बाज़ार की सूझती है, उसे मैकमोहन और उसकी लाइन से जुड़ी  गाथा से क्या लेना देना ? वैसे भी धोखे में रख कर पड़ोसी के साथ  छल करना चीन की पुरानी आदत है । अपनी बात से मौका देख कर पलट जाना उसका नैसर्गिक स्वभाव है । उसके भीतर विस्तारवाद की दावानल है । वह मैकमोहन को देख कर भी नहीं देखना चाहता । वह उसकी लाइन के प्रति भी  उपेक्षा का रवैया अपनाये है ।
चीन को नहीं पता कि मैकमोहन को यदि गुस्सा आ गया तो वह अपनी लाइन के साथ मिल कर उसके यहाँ के उत्पादित सामान के बहिष्कार का बिगुल बजा देगा । वह उसके सामान के विरोध में  देशव्यापी बाज़ार में लाइन खींच देगा ।
अभी समय है । मैकमोहन लाइन की महत्ता का स्वीकार करने में ही चीन की भलाई है । वरना गब्बर को कहना पड़ेगा कि ‘अरेओसांभा’ जरा अपनी बंदूक उठा कर  निशाना लगा तो इसकी खोपडिया पर ।  


मंगलवार, 2 जून 2015

गलियां बड़ी रंगदार होती हैं

मौसम गर्मी के मामले में रोज नए से नए रिकार्ड बना रहा है। इससे पहले उसने जाड़े में भी ऐसा ही किया था  शायद वह बरसात में जम के बरस कर या बिना बरसे ही नया माइल स्टोन अपने नाम कर लेरिकार्ड बना कर रिकार्ड तोड़ना मौसम का प्रिय शगल है  कोई बता रहा था कि रिकार्ड तो बनते हो टूटने के लिए हैं  हम अब तक यह भ्रम पाले थे कि रिकार्ड संजो के रखने के लिए होते हैं  उनसे ही अंतोतगत्वा  इतिहास और प्रभामंडल रचे  जाते  हैं 
ऊपीके एक मंत्री ने सुपरफास्ट गति से चुनिंदा गालियाँ  दी  वे सब रिकार्ड हुईं  मंत्री जी ने तीन मिनट में  एक सौ बावन गालियाँ दीं यानी एक मिनट में पचास गालियाँ मानी जाएँ तो भी दो गालियाँ वक्त जरूरत के लिए बची रहें।उससे भी  बड़ी बात यह कि एक अखबार ने उन गालियों को अक्षरश: छाप डाला और अखबार ने उस दिन बिक्री का नया कीर्तिमान रच दिया।  इससे पता  लगता है  कि  जो गालियाँ द्रुत गति   और  उपयुक्त विशेषणों  के साथ  परोसी जाती  हैं ,वे खूब चटखारे लेकर पढ़ी भी जाती  हैं उनके  सामने  सम्प्रेषणीयता का कोई  संकट कभी नहीं  रहता  
साहित्य में पॉपुलर शापुलर के विमर्श  के बीच एक बात एकदम साफ़ हुई कि गालियाँ सबसे अधिक बिकती हैं।  धंधे का उसूल है कि जो बिक पाए वही बाय डिफॉल्ट सर्वोत्तम मान लिया जाता है  अब तक धारणा यह थी कि गम्भीर साहित्य  केवल रचनाकार द्वारा  धारित पदनाम ,ओहदे की धमक , जेब की खनक  , दैहिक प्रसंगों के चाशनी भरे  आख्यान और रचियेता के जीवन से जुड़े अवांतर प्रसंगों के हिसाब से  बिकता है    मंच पर धर्मनिरपेक्षता के बरअक्स सेक्युलरिज्म का खोमचा खूब  जमता हैचुटकुलों की भी श्रोताओं की ओर से वन्स मोरकी डिमांड रहती हैखचाखच  भरा पंडाल देशभक्ति से भरपूर विमर्श और चुटकुलों को समभाव से सुनता ,गुनता और वाह वाह करता  हैवैसे भी  अपने कलेवर में देशभक्ति की अतिरंजित अभिव्यक्ति चुटकुलों का सा लोकरंजन करती हैं
गालियाँ हमारे महान मुल्क की महान सांस्कृतिक धरोहर हैंयह वाचिक परम्परा की थाती हैं  तमाम तकनीकी उन्नयन और अभिव्यक्ति में आये शिल्पगत बदलावों के बावजूद गालियाँ का तिलिस्म कुछ ऐसा है जो  जुबान चढ़ कर बोलता है इसका काला जादू सफ़ेद पन्नों को स्याही से रंगने वाले निष्णात कीमियागरों के सिर पर टंग कर तोते की तरह टांय टांय करता  है
गालियाँ देना एक कालजयी कला है  इसे देने वाले बखूबी जानते हैं कि कब ,कहाँ ,कैसे ,किसको और कैसी गाली दी जाये  गाली हमेशा सामने वाले का शारीरिक सौष्ठव ,उसकी भुजाओं के मर्तबान में फड़कती मछलियों और उसके रिएक्ट करने की तीव्रता को परख कर दी जाती हैं  गाली देने की आर्ट ईश्वर प्रदत्त होती है  यह किसी मदरसे या कोचिंग सेंटर में नहीं सिखाई जाती  यह हमारे अंतस से ठीक वैसे उपजती है जैसे किसी परिंदे के शिशु के डैनों में  उड़ान का सपना पनपता है  गालियाँ  स्वत:स्फूर्त होती हैं   इससे हमारी संवाद प्रवीणता में चार चाँद लगते हैं बिन गाली के  कोई बात चाहे जितनी गहरी कही जाये बड़ी उथली -उथली लगती है
यदि ये गाली न हों तो जिंदगी किस कदर बदरंग हो जाये