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June, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

योग, योगा ,आर्यभट्ट और हॉट ब्रांड

योग का मतलब होता है जोड़,जिसे अंग्रेजी में उसी तरह एडिशन कहते है जैसे पहाड़े को टेबिल ।  योग अनेकार्थी शब्द है । योग जब योगा बनता है तब इसमें से दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित होता है। योगा जब किसी अनिंद्य सुंदरी के दैहिक सौष्ठव के सान्निध्य में प्रकट होता है तब इसकी छटा नयनाभिराम हो जाती है । देशज पाठशालाओं में नन्हें -नन्हें बच्चों के कान उमेठ कर उन्हें संख्याओं का जोड़ना इस उम्मीद के साथ सिखाया जाता रहा है कि इनमें से कोई  एक दिन आर्यभट्ट बनेगा । अलबत्ता पब्लिक स्कूल वाले बच्चों के कान नहीं उमेठते ,वे सिर्फ अविभावकों की जेब का दोहन करते हैं। वे किसी को आर्यभट्ट नहीं बनाते ,वे उन्हें मल्टीनेशनल्स के लिए किसी घोड़े की तरह सधाते हैं। बच्चों द्वारा गणितीय योग सीखते हुए सदियाँ बीती लेकिन उनमें से एक भी आर्यभट्ट तो न बना ,वे अधिकतम बड़े धन्नासेठों की दुकानों के पुरजे या प्यादे जरूर बन गए।  पर कसरती योग  बाज़ार का  हॉट ब्रांड अवश्य  बन गया ।  उससे  बाज़ार को नई ऊर्जा और सूत्र मिला –करो -करो ,करने से होता है । योग के बारे में हालाँकि कहा यह जाता है कि इसके साथ जब तक ध्यान न जुड़ा हो तब तक यह अकारथ रहता है…

अबकी बार हंसोड़ सरकार

बिहार में चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है । विवाह के अवसर पर होने वाले सामूहिक भोज का सा माहौल बनने लगा है । हलवाईयों ने अपनी भट्टियां लीपनी शुरू कर दी है । आटा दाल चीनी आलू नमक आदि की पहली खेप समारोह स्थल पर पहुंचने लगी है । मंगल गीत गाने के लिए गवैये अपना गला खंखार रहे हैं । ढोलकों की धमक को ठोक पीट कर दुरुस्त किया जा रहा है । समय रहते तमाम इंतजामों को परखने की कवायद चल रही है । दूल्हा  कौन होगा ,इसका ऐलान भी हो गया  है । मन मसोस कर सब गोलबंद हो गए हैं।  प्रदेश का वोटर दम साधे सारा कौतुक देख रहा है । आसन्न चुनावों को भांप कर दुधारू पशु समय असमय रंभाने लगे हैं। वे भी वक्त आने पर सत्ता में अपने लिए उचित भागीदारी की मांग कर सकते  हैं । सुशासन बाबू लगातार मुस्कुरा रहे हैं । कोई बता रहा है कि वह मुस्कुरा नहीं रहे वास्तव में इतरा रहे हैं ।पहले वह आधे अधूरे धार्मिक टाइप के थे या कहें टू –इन –वन । जैसा मौका हुआ वैसे हो लिए। लेकिन  जब से वह शतप्रतिशत ‘सेकुलर’ हुए हैं तब से वह बेहद खुशमिजाज हो चले हैं । उनकी होठों पर मुस्कुराहट स्थाई रूप से चिपक गई है। उन्होंने हँसते हँसते ऐलान कर दिया है कि…

आम ,लीची ,कटहल और स्वाद विमर्श

आम को लेकर तरह तरह की लालसाएं सामने आ रही हैं।  मतदाता प्रजाति के आम पहले से चर्चा में थे । अभी चुनाव दूर हैं तो आम टाइप के वोटर अपनी -अपनी कोटर में हैं । लेकिन  पेड़ पर लगने और समय -असमय  टपक पड़ने वाले आम  यकायक बड़े खास हो चले  हैं । और हों भी क्यों न ,आखिर वो लगे जो हैं सरकारी डाल पर । उनकी रखवाल के लिए बाकायदा सशस्त्र पुलिस बल तैनात किया  गया  है । एक -एक आम की सुरक्षा पूरी मुस्तैदी से की जा रही है।  चप्पे चप्पे पर गुप्तचर आँख गडायें हैं ताकि  कोई ऐरागैरा उन्हें  चखने न  पाए । यह यकीनन  आम की सोहबत का प्रताप है कि  आम तो आम उनके सान्निध्य में लगी लीचियां तक खास बन गई है । अब तक माली बगीचों में लगने वाले रसीले आमों  का लालची परिंदों से बचाव बाग में टिन के कनस्तर बजा कर , मुख से हुर्र हुर्र की आवाज़ पैदा करके और गुलेल से कुछ ढेले इधर उधर दाग कर किया करते थे ।यह उस समय की बात है जब आम सिर्फ आम होते थे ।मीठे गूदे से भरे रसीले आम ,जिसका रसास्वादन समाज के सभी तबके के लोग खांटी समतावादी अवधारणा के अनुरूप करते थे । यह अलग बात है कि तब भी आम के मामले में हर कोई अपनी  खास समझ और परख रखता था । …

मैकमोहन ,लाइन और चीन

एक समय की बात है ।  मैकमोहन नाम का एक दढ़ियल आदमी हुआ करता था । वह पहले जन्मा या उसकी दाढ़ी ,इस पर उसी तरह का अनसुलझा विवाद है जैसे  अंडा पहले आया या मुर्गी या फिर चीन पहले अस्तित्व में आया या सीमा रेखा को लेकर तनातनी । लोग उसे  सांभा के नाम से जानते थे । उसका सरदार उसे ‘अरेओसांभा’ के नाम से पुकारता था । वह हमेशा एक पहाड़ी पर गुमसुम बैठा  रहता था ।  कहा जाता है कि वह हरदम एक ही गाना गुनगुनाता रहता था ,’दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ ,बाज़ार से निकला हूँ खरीददार नहीं हूँ’ । बाद में पता चला कि वह वहां बैठ कर चीन की सीमावर्ती किसी कस्बे के बाज़ार को निहारता और किसी सुदर्शना पर  ‘लाइन’ मारता था । कालांतर में उसी “लाइन” को मैकमोहन लाइन कहा जाने लगा । मैकमोहन द्वारा खींची गई “लाइन” भावनात्मक टाइप की थी सो उसकी नापजोख कभी ठीक से नहीं हो पाई । उसकी “लाइन”गरीब की जोरू बन गई जिससे हर कोई हंसी ठट्ठा करने लगता । चीन ने कह दिया है कि इस तरह की कोई लाइन-वाइन नहीं है । यदि कभी ऐसी कोई “लाइन” रही होगी तो उसे मैकमोहन भगा कर अपने घर ले गया होगा । चीन को न मैकमोहन दिख रहा है न उसकी “लाइन”उसे केवल अ…

गलियां बड़ी रंगदार होती हैं

मौसम गर्मी के मामले में रोज नए से नए रिकार्ड बना रहा है।इससे पहले उसने जाड़े में भी ऐसा ही किया था।शायद वह बरसात में जम के बरस कर या बिना बरसे ही नया माइल स्टोन अपने नाम कर ले।रिकार्ड बना कर रिकार्ड तोड़ना मौसम का प्रिय शगल है।कोई बता रहा था कि रिकार्ड तो बनते हो टूटने के लिए हैं।हम अब तक यह भ्रम पाले थे कि रिकार्ड संजो के रखने के लिए होते हैं।उनसे हीअंतोतगत्वा  इतिहास और प्रभामंडल रचेजातेहैं। ‘ऊपी’ के एक मंत्री ने सुपरफास्ट गति से चुनिंदा गालियाँ  दी।वे सब रिकार्ड हुईं।मंत्री जी ने तीन मिनट मेंएक सौ बावन गालियाँ दीं यानी एक मिनट में पचास गालियाँ मानी जाएँ तो भी दो गालियाँ वक्त जरूरत के लिए बची रहें।उससे भीबड़ी बात यह कि एक अखबार ने उन गालियों को अक्षरश: छाप डाला और अखबार ने उस दिन बिक्री का नया कीर्तिमान रच दिया।इससे पतालगता हैकिजो गालियाँद्रुत गति  औरउपयुक्तविशेषणोंके साथपरोसी जातीहैं,वेखूब चटखारेलेकरपढ़ी भी जातीहैं।उनकेसामनेसम्प्रेषणीयता का कोईसंकटकभी नहींरहता। साहित्य में पॉपुलर शापुलर के विमर्शके बीच एक बात एकदम साफ़ हुई कि गालियाँ सबसे अधिक बिकती हैं।धंधे का उसूल है कि जो बिक पाए वही …