रविवार, 29 मार्च 2015

यह भक्ति है, सब जानते हैं


Everyone knows, this is Devotion
देश एक है, मगर भक्त अनेक हैं। देश के होने की वजह विशुद्ध राजनीतिक है। भक्तों के होने का कारण भावनात्मक कम, धार्मिक अधिक है। कुछ भक्त सत्ता पाने के लिए देशभक्त टाइप के बने रहते हैं। ये लोग वक्त के हिसाब से अपने मुखौटे चुनते हैं। उनका देशप्रेम बेलौस होता है। बदलते समय के साथ उनकी चाल, चरित्र और चेहरा बदलता रहता है। वे जब खुद को मुसीबतों में घिरा पाते हैं, तो भक्तिभाव से सुर, ताल और लय की परवाह किए बिना मजीरे बजाते हैं। वे अपनी देशभक्ति के आगे किसी अन्य की भावना को टिकने नहीं देते।

देश भौगोलिक रूप से भले ही स्थिर हो, लेकिन भक्तों की उसके प्रति निष्ठा पोर्टेबिल रहती है। वह उस मोबाइल नंबर की तरह होती है, जो खुद तो स्थिर रहता है, लेकिन कंपनी बदल जाती है। राजनीति में सिद्धांतों की पोर्टेबिलिटी का अजब सुख होता है। इसकी महिमा से स्वर्णिम मध्यमार्ग सहज उपलब्ध हो जाता है, और टकराव से बचाव हो जाता है।

देश कमोबेश वहां रहने वालों के दिल में बसता है। बसता है या नहीं बसता, यह बात तो कंफर्म नहीं है, लेकिन भावुक होने पर कहा यही जाता है। हालांकि यदि देश वाकई दिल में बसा होता, तो वह हमेशा संकट में रहता। इसलिए यह दिल में नहीं, हमारे स्वार्थी मुंह में स्वर्णिम नकली दांत की तरह आरोपित है। खीसे निपोरते हुए इसे दिखाया जाता है। इसी के जरिये राष्ट्रभक्ति के प्रमाणपत्र पर सत्यता की मुहर लगती है।

भक्ति रंग में सराबोर इस देश में तीन प्रकार के लोग रहते हैं। एक वे हैं, जो वाकई देशभक्त हैं, लेकिन लगते नहीं, क्योंकि उनके पास इसका कोई सुबूत नहीं। दूसरे वे भक्त हैं, जो जरा कारोबारी किस्म के हैं; 'जहां देखा तवा परांत, वहां बिता दी सारी रात' टाइप के। तीसरे प्रकार के भक्त सिर्फ गाल बजाते हैं, और इस तरह बजाते हैं कि उनका दिलफरेब झूठ भी बिल्कुल सच जैसा लगता है।

इस भक्तिमय समय में देशभक्ति दिल की किसी धमनी में कटी पतंग की तरह फिजूल का शब्द बनकर अटक गई है।

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

ऑनलाइन आज़ादी के चौपट खुले दरवाजे ,,,

यह ऑनलाइन जमाना है।शुभकामनाओं से लेकर गालियाँ तक बड़ी आसानी से यहाँ से वहां चली आतीहैं इतनी मात्रा में आती हैं कि लगता है कि इस दुनिया में शुभता और अपशब्दों के सिवा कुछ बचा ही नहीं है  सोशल मीडिया पर किसी के निधन की सूचना आती है तो देखते ही देखते हजारों लाइक्सआ जाते हैं  झुमरीतलैया  में कोई मैना पिंजरे से गायब  हो जाती है तो पूरा आभासी संसार उसकी इस हरकत पर दो खेमों  में बंट कर गहन विमर्श में तल्लीन हो जाता है।मैना के इस साहस , दुस्साहस और नादानी पर लोग अपने -अपने तरीके से गम ,गुस्से और तारीफ का इज़हार करते हैं  अभिव्यक्ति की इस आनलाइन आज़ादी ने पूरे मुल्क को निहायत वाकपटु बना दिया है। इस ऑनलाइन स्वछंदता ने नैतिकतावादियों की नाक फुला दी है   सोशल मीडिया पर दबंग नेता तक की गली मोहल्ले का सींकियाछाप पहलवान यहाँ टिल्ली-लिल्ली करके रख देता है 
इस ऑनलाईन आज़ादी  ने अपने शैशव में ही गुल खिलाने शुरू कर दिए हैं।पूत के पाँव पालने में अपना कौतुक दिखा रहे हैं  अधिकांश चिंतक इसके गले में बिल्ली के गले वाली मिथकीय घंटी बाँधने की फ़िराक में हैं  वैसे भी हमारे विचारकों को तय मिकदार से अधिक आजादी हज़म नहीं होती। इसीलिए सरकार सोशलमीडिया की  डाल पर बैठ कर समय-असमय चिचियाने वाले उन्मुक्त परिदों के पर कतरने के लिए कानून लायी थी ,जिसे  देश की सबसे आला अदालत ने  नकार  दिया है। ऑनलाइन अभिव्यक्ति के सारे दरवाजे दुबारा चौपट खुल गए हैं।
अब यदि ऑनलाइन हिमाकत से निबटना है तो खुद को ऑनलाइन करने का हुनर सीखना  होगा।इस मामले में  पुलिसिया डंडे का खौफ काम नहीं करने वाला  ऑनलाइन रणबांकुरों का सामना करने  के लिए ऑनलाइन भिड़ना  होगा  वह समय आ गया है यदि किसी से मिलना ,बतियाना या झगड़ना है  तो कृपया व्हाह्ट्स एप ,फेसबुक या ट्विटर पर आयें   किसी पुरानी अदावत का हिसाब किताब चुकता  करना हो तो पहले फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजें और फिर कमेन्ट कॉलम में तेजाबी बयान लिख कर  अनफ्रेंड (अमित्र ) बनें।अमित्र बनने के लिए पहले मित्रता को अंगीकार करना ही होगा  सोशल मीडिया पर झगड़ने का भी एक विधान  होता है।
सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में मुहं छुपाने की जगह नहीं होती ,यहाँ सब कुछ बड़े धूमधाम से  होता है।

मंगलवार, 24 मार्च 2015

खिड़कियां व नकल


सारे मुल्क ने देखा l कई कई बार देखा l इसलिए देखा क्योंकि देखने में कोई हर्ज़ नहीं था कि दीवारों में खिड़कियाँ होती हैं l सिर्फ होती ही नहीं वरन उसमें रहती हैं l दीवार के उस पार मूढ़मति नकलची रहते हैं l दीवार के इस पार अक्लमंद नकल प्रोवाइडर रहते हैं l इसके आरपार हमारी शिक्षा प्रणाली और पूरा सिस्टम रहता है l सिस्टेमेटिक तरीके से रहता है l इसमें सबकी अपनी -अपनी भूमिका होती है l समस्त अभिनेता अपने रोल को पूरी लगन और शिद्दत से निबाहते हैंl 
खिड़कियों से केवल ताज़ी हवा और रौशनी ही नहीं आती ,इसमें से शानदार नम्बरों से लदीफदी मार्क्सशीट और सर्टिफिकेट पाने का शार्टकट निकलता है l खिड़कियों की मुंडेरों पर कबूतरों की तरह टिक कर नकल करवाने और गुटुरगूं गुटरगूँ करने का हुनर आता है l जांबाजी दिखाने का मौका मिलता है l यह भी पता लगता है कि खिड़कियों की सत्ता केवल कम्प्यूटर की विंडोज तक ही सीमित नहीं है l नैटजनित आभासी संसार से इतर भी खांटी खिड़कियों की उपयोगिता बरक़रार है l खिड़कियाँ कालजयी होती हैं l
एक वक्त था जब इन्हीं खिड़कियों की वजह से नैनों की विविध भावभंगिमा की रोशनाई से लिखे अदृश्य प्रेमगीतों का आदानप्रदान हो जाया करता था l अनेक लोग इन्हीं खिड़कियों के चलते सफल या असफल प्रेमी बने l कालांतर में उनमें से कुछ सफल प्रेमी बन कर बच्चों के पापा हो गए और खिड़कियाँ उनसे दूर होती गयीं l असफल टाइप के प्रेमी खिड़कियों से ताउम्र चिपके रह गए और अपने प्रेम की भूली बिसरी दास्तान का पुनर्पाठ करते रहे l
कम्प्यूटर पर डेरा जमाए विंडोज ने सूचना के आदानप्रदान को नितांत आसान बना दिया है l विद्यालयों की खिड़कियों ने नकल की अहमन्यता कम नहीं होने दी है l सोशल मीडिया पर नकल की वायरल हुई फोटो ने नकल के कारोबार की ख्याति को ग्लोबल कर दिया है l सबको पता लग गया है कि सर्वांगीण विकास नकल और अक्ल के मिक्सचर से होता है l विंडोज के जरिये खिड़कियों को नया आयाम और व्यापक पहचान मिली है l सर्वशिक्षा अभियान को गति मिली है l सूबे का नाम रोशन हुआ है l शिक्षा के क्षेत्र में अन्य पिछड़े हुए राज्यों के मन में तरक्की की आस जगी है l रुखे सूखे अध्ययन मनन की सनातन परिपाटी में हींग , जीरे और लहसुन का स्वादिष्ट तड़का लगा है l
दीवार में खिड़की अरसे से रहती आई है l यह बात आधुनिक हिंदी साहित्य के अधिकांश पाठकों को पहले से पता है l जिन्होंने यह बात किसी वजह से नहीं सुनी , उन्हें भी पता लग गया है कि दीवारों में बनी खिड़कियों की महती कृपा से बिना पढे लिखे ही लोग पढ़े लिखे जैसे बन जाते हैं l इन्हीं खिड़कियों के जरिये परीक्षा पर्चे में दिए सवालों के जवाब प्रकट होते हैं और उत्तर पुस्तिका पर जाकर खुद –ब –खुद चिपक जाते हैं जैसे फूलों पर तितलियाँ जा विराजती हैं l
कोई दीवार बनावट में चाहे जैसी भी हो लेकिन उसमें नकल करने और करवाने वालों के लिए सदैव एक अदद सीढ़ी और जिंदा उम्मीद रहती है l शिक्षा नकल की अक्ल में ही बसती और पनपती है l

गुरुवार, 19 मार्च 2015

गुप्तचर तन्त्र और पीपिंग टॉम

वह आम आदमी नहीं हैं l आजकल वह छुट्टी पर हैं l मुल्क भर के सारे गोपीचंद  गाजर कुतरते हुए उन्हें यहाँ - वहां तलाश रहे हैं l उनकी थाह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है l हाथों में मैग्नीफाइंग ग्लास थामे राज्य गुप्तचर यह पता लगाने में लगे हैं कि वह पार्टी पराभव का इतिहास रचने के बाद अंतर्ध्यान होकर गए कहाँ हैं l वह इतिहास लेखन का काम अधूरा छोड़ गए हैं l उन्हें अभी उसके कुछ और अध्याय और अनुच्छेद लिखने हैं l उनकी पार्टी उन्हें बहुत ‘मिस’ कर रही है और मीडिया उनकी बाईट पाने के लिए  मिस कॉल पर मिस कॉल मार रही है l
वह ब्रह्मांड के किसी कोने में ठीक उसी तरह सुस्ता रहे हैं जैसे कभी सृजनहार अपना काम निबटाने के बाद चैन के कुछ पल बिताने  अवकाश पर गए थे l प्रभु की तरह उनकी लीला निराली है l वह हर जगह होते हैं लेकिन वह कहीं नहीं होते l वह कभी गुम नहीं होते इसलिए किसी को मिलते नहीं l वह कभी आँख से ओझल नहीं होते इसलिए दिखते नहीं l  वह सृजक हैं ,कर्ता नहीं l उनकी महिमा अपरम्पार है l  
जासूस उनको पूरी शिद्दत से दूंढ रहे हैं l वे उन्हें हर उस जगह तलाश चुके हैं ,जहाँ वे अकसर पाए जाते रहे हैं l वे उन्हें कैंडी क्रेश से लेकर पोगो तक और पॉपकॉर्न के खाली रैपर से लेकर आइसकैंडी स्टिक तक पर ढूंढ चुके हैं l  कुछ प्रोएक्टिव जासूस तो उन्हें उनके मनपसंद वीडियोगेम की सीडी और पेनड्राइव तक में खंगाल चुके हैं l उनके होने की भनक तो मिल  रही है लेकिन वह सशरीर नहीं मिल पा रहे l वह कर्तव्यनिष्ठ पार्टी कार्यकर्ताओं की स्मृति में मौजूद हैं l वह हींग की महक की तरह उसकी खाली डिब्बी में विद्यमान हैं l वह गायब भी हैं और हाज़िर भी ,वह  मंज़र भी हैं नाजिर भी l
उनकी अनुपस्थिति पार्टी को बड़ी खल रही है l वे इतनी  बेचैन है कि लगभग रोज ही किसी न किसी मुद्दे को लेकर मार्चपास्ट करती है l पार्टी हांफती हुई अपना खोया हुआ जनाधार नहीं ,अपने गुमशुदा नेता को तलाश रही है l वह वापस आयेंगे तो सब कुछ ठीक हो जायेगा l देशहित में पार्टी भले ही खो जाये लेकिन गुमशुदा जी का मिलना बड़ा जरूरी है l
जासूस लोग पूरी कोशिश के बाद भी उनका पता नहीं लगा पा रहे हैं l  इस टेंशन में वे इतनी गाजर कुतर चुके हैं कि आने वाले समय में सब्जी मंडी में उसकी किल्लत हो जाये तो ताज्जुब नहीं l एहतियाती तौर पर जनता से कह दिया गया है कि जब तक जासूस अपने काम पर लगे हैं वे राष्ट्रहित में गाजरों का सेवन स्थगित रखें l जासूसों से कह दिया गया है कि वे निश्चिंत हो कर उनकी तलाश की मुहिम  जारी रखें l
 और किसी को हो या न हो लेकिन इस मुल्क के गुप्तचर तंत्र ,पीपिंग टॉम (मीडिया ) और  स्वामीभक्तों को उनका अतापता जानने को लेकर बड़ी उत्सुकता  है l




जासूस नहीं रिसर्च स्कॉलर


उनके घर के आसपास जो टहलते मंडराते मिले थे ,उनके बारे में पक्की खबर यह है कि वे कोई जासूस -वासूस नहीं खांटी  एकेडेमिक रिसर्च स्कॉलर थे l वे यह पता करने आये थे कि राजनेता का निठल्लापन आम आदमी की  अकर्मण्यता से कैसे भिन्न होता  है l वे यह भी जानने  में लगे थे कि राजसी तफरीह के लिए कौन से नम्बर का जूता और कैसी पतलून या हॉफ पैंट मुफ़ीद रहती  है l उनकी उत्सुकता इस बात को लेकर  भी थी कि वे उस नीरो के मानस पुत्र बनने में किस हद तक  कामयाब रहे  हैं ,जो जलते हुए रोम को देख कर चैन ब्रांड की बांसुरी बजाया करता था l वे यह रिसर्च भी करने में लगे थे कि रोम वाले नीरो के मुकाबले इनका बांसुरीवादन कितना अधिक कर्णप्रिय साबित हो रहा है l
जासूस और रिसर्च स्कॉलर में बड़ा फर्क होता है l  सीक्रेट एजेंट  उन बातों को जानने में जान खपाते हैं जो ओपन  टाइप के सीक्रेट  होते हैं  l  अंडरकवर  जासूस  रहस्य पर पड़ा ‘कवर’  उठाते कम  हैं उसे जमींदोज करने  की कोशिश  अधिक करते   हैं  l  शोधक  पहले से सर्विदित  बातों को कुछ इस तरह से क्रमवार परोसते हैं , जिससे उनकी निजी विद्वता में चार चाँद लग जाते हैं  l वह पकाने से अधिक पके पकाए को सजाने में अपनी मेधा का अधिक उपयोग करते हैं l  दोनों में एक मौलिक समानता यह रहती  है कि वे काम कम करते हैं लेकिन उसे  करते हुए प्रतीत  अधिक होते  हैं l उनकी इस प्रतीति पर ही  राष्ट्रव्यापी विमर्श की शुरुआत  होती है l लम्बी बहसें होती हैं l  दोनों ही तरह के लोग अवांतर प्रसंगों की वजह से खुद को प्रासंगिक बनाते हैं l जासूस अपने कारनामों  की वजह से कुख्यात बनते हैं और शोधक लगभग उन्हीं कारणों के चलते  शैक्षिक प्रणाली के सुनामधन्य कर्णधार बन बैठते हैं l
अब तो यह भी रिसर्च के लिए उपयुक्त टॉपिक बन गया  है कि वे जहाँ शोध करते बरामद हुए थे ,वहां केवल शून्य पसरा था तो वे  आखिर उसमें क्या तलाशने की कोशिश कर रहे थे l  जानकार लोगों का तो यही कहना रहा है कि शून्य में तो केवल कविता बसती है l वे कवियों के एकाधिकार वाले क्षेत्र में अतिक्रमण करने गए ही क्यों थे ? उन्होंने यह दुस्साहस किया है तो बतौर  सजा सार्वजनिक निंदा ,छीछालेदर और प्रताड़ना के तो  भुगतनी ही होगी l  काव्यात्मक उलहाने और संत्रास का फल चखना ही होगा l क्या उन्हें यह  नहीं पता कि शोध प्रबंध लिखने के लिए इससे -उससे पूछताछ , इधर -उधर ताकाझांकी और  यहाँ -वहां टहलना नहीं मात्र गूगल सर्च , कट पेस्ट और रिसर्च गाइड की सेवा -टहल में  माहिर होना ही पर्याप्त होता है l केवल चापलूसी के जरिये भी अक्सर महान रिसर्च सम्पन्न हो जाती हैं l
कुछ नादान  शोधकों ने शर्लाक होम्स का  दत्तक पुत्र बन कर नाम और दाम कमाने के चक्कर में ‘बेचारी’ सरकार की जान नाहक ही झंझट में फंसा दी है  l इनकी नादानी पर एक अदद शोध का किया जाना तो बनता ही है l




कोई पूछे तो मुद्दा क्या है !


मुद्दे बहुत हैं l आम आदमी की जिंदगी में कोई न कोई मुद्दा  रहता ही है l उसकी जेब भली रीती रहे लेकिन मुद्दों से भरपूर  रहती  है l उसकी ख्वाइश रहती  है कि कोई उससे जुड़े मुद्दों को  उठाये l लेकिन वे हमेशा धरे के धरे रह जाते हैं l जब मुल्क का समूचा विपक्ष भूमि अधिग्रहण कानून का मुद्दा कांधे पर उठाये राजमार्ग पर मार्च करता है तब आम आदमी किराये की खोली के लिए अपने सपनों में कदमताल करता है उसकी चिंता पैर के नीचे की जमीन खिसक जाने की नहीं ,अपने लिए सिर्फ पैर टिकाने लायक स्थान पाने की है l उसकी जद्दोजेहद बाद मरने के दो गज़ जमीन पाने की नहीं जिन्दा बने रहते हुए कमर टिकाने का ठिकाना पाने के लिए हैl  
राजनेताओं को सदा मुद्दों की तलाश रहती है l वे सदन के पटल पर मुद्दे किसी गुलदस्ते की तरह सजाते हैं l मौका मिलने पर उन्हें हवा में लहराते हैं l बड़े बड़े बयान देते हैं l  मेज पर रखे मुद्दों को अलटते -पलटते हैं l वे इन्हें किसी कुशल खानसामे की भांति रोटी की तरह सेंकते हैं l  मुद्दा हाथ आ जाये तो उसे सीने से लगा कर रखते हैं l उनका पुनर्पाठ करते हैं l सरकारें  मुद्दों को  हमेशा विज्ञापनी पंच लाइन बना देती हैं  l इस तरह मुद्दे मुद्दे न रह कर ‘अपने मुहँ मियां मिटठू’ टाइप स्तुतिगान बन जाते हैं l
मुद्दा कोई भी हो लम्बे समय तक मुद्दा नहीं रह पाता l उसका स्वरुप बदल जाता है l मुद्दे द्रव सरीखे होते हैं जिस आकार के पात्र में रखे जाते हैं वैसे ही बन जाते हैं l रोटी ,कपड़ा और मकान से जुड़े शाश्वत प्रश्न चुटकुले या मारक वनलाइनर बन जाते हैं l सोशल मीडिया पर इन विषयों पर अनवरत विमर्श चलता है और लाइक्स से शुरू होकर  कमेंट्स के क्लाइमैक्स पर  निबट  जाता है l  मुद्दे फिर भी कभी खत्म नहीं होते l वे बने रहते हैं l
सदन में लोग मुद्दे उठाते और उठवाते रहते हैं l विपक्ष हर मुद्दे को भुनाता है l सरकार हर मुद्दे पर भुनभुनाती है l अपनी फ़ाइल में से नए -नकोर मुद्दे उठा लाती है l जोरदार बहस करवाती है l हाल ही में पता चला कि सदन के भीतर शाम के समय सक्रिय हो जाने वाले मच्छर भी एक मुद्दा हैं l वे राजनेताओं के कान पर बैठकर घुन्न -घुन्न करते हैं l मच्छर चाहते हैं कि वे भी राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनें l  सदन वाले मच्छर  किसी भी रासयन से डर कर भागते नहीं l हर हाल में मौजूद रहते हैं l इन्हें आप चाह कर भी नजरंदाज़ नहीं कर सकते l कहा तो यह जाता है कि मुद्दे हैं तो सदन है l सदन है तो लोकतंत्र है l लोकतंत्र है तो मच्छरों का वजूद है l मच्छर हैं तो उनके दंश की आशंकाएं हैं l
गरीबों  के लिए असल मुद्दा उनकी भूख है लेकिन उनके इस मुद्दे को उठाने वालों के लिए यह वक्तकटी और  वोट बैंक की चाभी है  l यही वह चाभी है ,जिससे गरीब का पेट तो नहीं भरता पर नेताओं के मुकद्दर पर लगे  ताले खुल जाते हैं l
फिर भी आजतक किसी को  समझ में नहीं आया कि असल मुद्दा क्या है l





सोमवार, 16 मार्च 2015

भगत जी ,जगत जी और मस्तराम की पकौड़ी


एक जगतजी हैं ,उनकी अरसे से समोसे की दुकान है lवह पूरे मनोयोग से परंपरागत समोसे तलते हैं lउनके लगे बंधे ग्राहक हैं lउनका काम ठीकठाक चल रहा है lउनके बनाये समोसे न कभी हॉटहिट साबित  हुए और न ही कभी सुपर फ्लॉप l
जगतजी जरा रूखी सूखी खाये कर ठंडा पानी पीव टाइप के हैं lवह पहले से  ऐसे ही हैं lउनके पिता भी लगभग ऐसे ही थे lलोगों का अनुमान है कि उनके पिता भी अमूमन इसी प्रकार के रहे होंगे lलब्बेलुआब यह कि वह जेनेटिकली ऐसे  हैं l
एक भगत जी हैं lउन्होंने उनकी दुकान के बगल मे दुकान खोल रखी है lवह भी समोसे बनाते हैं lउनके समोसे आकार में तो समोसे जैसे होते हैं लेकिन खाने में लगभग केक जैसे लगते हैं l वह कढ़ाई के खौलते घी में समोसे तलते नहीं बंद भट्टी में पकाते हैं lउनमें से केक जैसी गंध आती है lइसलिए वह  हॉट केक्स की तरह बिकते हैं lहालाँकि यह कहने वाले भी हैं कि यह समोसे नहीं उसके नाम कलंक है l इसलिए वो धड़ाधड़ बिकते हैं lइससे जगतजी को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उनकी संतति  को मार्केट में अपने पड़ोसी से यूं पिछड़ना मंजूर नहीं lवह रूखी सूखी खाने वाली  नहीं है l
वे  अपने पिता  से पूछ रही है  आप केक जैसे समोसे क्यों नहीं बनाते ?
-क्यों बनाऊ वह  कहते हैं  l
-क्योंकि उसका  माल  बिकता  है  l संतति का तर्क है  l
-उसके समोसे नहीं केक बिकते  है lसमोसे तो केवल मैं ही बनाता और  बेचता हूँ l उनका कहना है  l
संतति  जिद पर अडिग रही  उसने भगत जी वाले सोकाल्ड’ समोसे की रेसिपी कॉपी कर उस जैसे समोसे बनवाने की कोशिश की  l लेकिन हुआ यह कि लगे बंधे ग्राहकों ने भी उनकी दुकान से किनारा गए  l
तभी एक तीसरी दुकान उनके बगल में खुली – मस्तराम के मदमस्त समोसे l उसके समोसे सिर्फ अपने बाह्य रूप में समोसे हैं लेकिन  वह स्वाद में एकदम भांग की पकौड़ी जैसे  l ग्राहक उन्हें खाते ,चटखारे लेते  और मगन हो जाते हैं  l जगतजी भगत जी कह रहे हैं  यह समोसे नहीं उसके नाम पर निपट धोखा है l पर इससे क्या मस्तराम की समोसेनुमा पकौड़ी की मार्केट में खूब डिमांड  है  l
अब बाज़ार में सिर्फ मस्ती बिकती   है l  उसकी ‘शेप’ को कौन पूछता है ?


निर्मल गुप्त ,२०८ छीपी टैंक ,मेरठ -२५०००१ मोबाइल : ०८१७१५२२९२२



जुबान की फिसलन का मैकेनिज्म और क्षमा याचना का अनुष्ठान


मुहँ में जब आइडियोलोजी  के मलाईदार लड्डू भरे हों और अपने मन की  बात कह कर लाइमलाइट में आने की जल्दबाजी  हो तब अमूमन आदमी वो सब कह जाता है जिसे जुबान का फिसलना कहा जाता है lसड़क पर पड़े केले के छिलके पर पैर फिसल जाये तो उसके सिवा जो धराशाही हुआ होता है सब हँसते हैं lयह हंसी हालाँकि लापरवाही पर सटीक व्यंग्य होती है लेकिन इसका शुमार विशुद्ध व्यंग्य में होता हैl यही वह संधिस्थल है जब केले का छिलका ,मलाईदार लड्डू ,हास्य और व्यंग्य सब एकजुट होते दिख जाते हैं l
राजनीति में किसी न किसी की जुबान के बेकाबू होने का सिलसिला चलता ही रहता है lइसी फिसलन के जरिये टीआरपी पर निगाह गड़ाये रखने वाले मीडिया को मनोवांछित बाईट मिलती है l  वह इसे  प्रोफेशनल आलोचकों के साथ  मिल बाँट कर चटखारे लेकर कुतरता है  lइससे ही जीवन में विकासोन्मुखी  परोपदेशी  नारों  से उपजने  वाली एकरसता टूटती है l लोगों को लगता है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि कामधाम भले ही ठीक से न कर पा रहे हों लेकिन अपने गालों के  ढपोरशंख को  बजा बखूबी रहे हैं l
जुबान के फिसलने का अपना आनंद होता है lइससे बिना पचे लड्डूओं की मिठास सतह पर आ जाती हैlउदर में सिर्फ उतना ही मीठापन अवस्थित हो पाता है जितना उर्जावान बने रहने के लिए जरूरी होता है lशेष बाहर आ गिरता है lराजनीतिक पटल पर खुद को केन्द्र में रखने का यह वो मैकेनिज्म है जिससे शुगर के अधिक्य से शरीर का बचाव  होता है और स्वास्थ्य के लिए कोई गम्भीर खतरा पैदा नहीं होता lतिस पर वक्त -जरूरत क्षमायाचना टाइप अनुष्ठान  भी कर लिया  जाये तो उससे उदारमना होने की खबर  सार्वजनिक हो जाती है lयानि सांप भी मर जाता है और  मारने वाले की सहिष्णु और अहिंसक छवि भी बरक़रार रहती  है l
वैसे रोजमर्रा की जिंदगी में भी यह फिसलन बड़े काम की होती है l जब जी चाहा थोड़ा इधर- उधर बहुत भटक लिए और फिर तफरीह करके लौट आये अपने  पूर्व स्थान पर l 
जुबान को फिसलाने का यह  काम थोड़ा जोखिम भरा तो जरूर है लेकिन है बड़े काम का l 
निर्मल गुप्त 

रविवार, 15 मार्च 2015

उनके खुश हो जाने का मतलब


उन्होंने कहा कि वह पार्टी द्वारा दिए जा रहे समर्थन से खुश होने से भी अधिक खुश हैं वह खुश हुए तो मानो कायनात खिलखिला उठी उससे भी अधिक बात यह कि वह बोल उठे तो मानो काली शिलाओं ने अपने सनातन मौन से बाहर आकर वाचाल होना तय किया  अब काजल की कोठरी से बेदाग निकल आने का काला जादू देखने दिखाने की रुत आई है बड़े दिनों के बाद नेताओं को कदमताल करने का मौका मिला है बयानवीरों को अपना मुहँ खोलने और पंख तौलने का अवसर प्राप्त हुआ है छाज जब मौन तोड़ता है तो छलनियों को बोलने और फटकन बटोरने का  मौका मिल जाता हैl
वह खुश हैं कि पूरी पार्टी उनके पीछे खड़ी  है आलाकमान उनके पीछे नहीं पड़ा ,उनके साथ अड़ा है सभी अपने अपने हाथ खड़े करके पूरे मुल्क को हाथों की सफाई दिखा रहे हैं वे कह रहे हैं ,देखो देखो हमारे हाथों में कालिख को कोई निशान नहीं है समस्त कालिमा को हमने चुनावी पराजयों के बाद मंथन चिंतन जैसे डिटरजेंट से धो डाला है पार्टी के एक बड़े नेता तो उच्च स्तरीय साबुन की तलाश में विदेश यात्रा पर निकले हुए हैं l
पार्टी को बिन मांगे मौका मिल गया है क्रिकेट वर्ड कप की तर्ज पर मौका ...मौका .....मौका की  धुन बजती हुई सुनाई दे रही है मैच में हार जीत कोई रहा है और उसके जरिये मौका किसी अन्य को मिल रहा है पार्टी की  करिश्माई  हींग बिक चुकी है लेकिन रीती डिब्बी महक रही है यह अवसर की नज़ाकत को भांप कर उसे सूंघने और सुंघाने का समय है l
यह सही है कि मौन रहना बड़ी बात होती है वही नेता अन्तोत्ग्त्वा अव्वल दर्जे के नेता बनते हैं जो हर महत्वपूर्ण मसले पर चुप्पी साध लेते हैं वही मालिक और मालिकन सबका दिल जीतते  हैं  जो कारिंदों  की प्रत्येक नादानी पर मुहँ फेर कर अनजान बने  रहते  है वही  कद्दावर नेता माने  जाते  हैं जो बौनी नस्ल के राजसी पौधों को बटवृक्ष मान लेते हैं lवही चुप्पियाँ बेशकीमती होती हैं , जिनके टूटने से तहलका मचने की संभावना  मौजूद रहती है सब जानते हैं कि मौन पटाखे के भीगा हुआ पलीता होता है ,जिसमें  कभी भी धमाका कर देने की आशंका मौजूद रहती है l
वह कह रहे है कि वह खुश होने से भी अधिक खुश हैं यह कोई सीधा सादा बयान नहीं है इसके मतलब का अनुमान लगाने के लिए खुशी  के गूढ़ अर्थ के अथाह  समन्दर में गहरे तक उतरना होगा खुशी कभी एकांगी नहीं होती यह कभी बेवजह नहीं होती इसकी अपनी कूटनीति होती है इसका अलग अर्थशास्त्र और स्वायत्त सत्ता होती है खुशी के इजहार भर से बड़े बड़े काम हो जाते हैं इसके अलावा खुश होने और दिखने में फर्क होता है उससे भी अधिक ,खुश होने का खुलासा करने के अलग मतलब होता है अनेक लोग खुश हो भी जाते हैं ,उनके मन में खुशी के मोतीचूर के लड्डू फूटते रहते हैं लेकिन वे इसकी  भनक किसी को नहीं मिलने देते कभी कभी ऐसा  भी देखने में आया है कि मातमी चेहरे वालों के पास खुशी का विपुल भंडार पाया जाता है l
वह बहुत खुश हैं तो यकीनन वह खुश ही होंगे उनकी खुशी मोगोम्बो वाली खुशी है या किसी अन्य प्रकार की खुशी ,कौन जाने  सपाट चेहरे वाले मौन साधकों के मंतव्य जरा देर से समझ में आते हैं l

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

बापू ,सुभाष और मसखरे का इकतारा


नई –नई बातें सामने आ रही हैं बड़े मुहँ से बड़ी -बड़ी  बातें प्रकट हो रही है इतिहास पुरुषों को मोहल्ला स्तर का शोहदा साबित करने की होड़ मची है चाँद की ओर मुहँ करके कुल्ले किये जा रहे हैं बयानों की उलटबांसी के जरिये मीडिया को टीआरपी बढ़ाने वाला सामान परोसा जा रहा है अभिव्यक्ति की आज़ादी का नया मुहावरा गढा जा रहा है बड़े ओहदे पर रह चुके लोग अपने अतीत की ऊँची दुकान पर फीके पकवान मौलिकता के रैपर में बेच रहे हैं यह मसखरों के लिए इकतारा  बजाने के लिए मनोवांछित समय है  l
दस प्रतिशत स्वयंभू अक्लमंद नब्बे प्रतिशत मूर्खों  को बता रहे हैं कि बापू ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सेल्स एजेंट थे और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस  जापानी माल के थोक विक्रेता बापू मोटी पगार के लिए सदा अंग्रेजी सरकार की चाकरी करते रहे और नेताजी जापानी आकाओं से टू इन-वन टाईप के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मुफ्त में पाने के लिए अपने मुल्क से गद्दारी उन्होंने बताया है कि मार्डन हिस्ट्री में इन लोगों के बारे में दर्ज अधिकांश इबारतें झूठ का पुलिंदा है वह सच्चे इतिहासबोध के  सोल प्रोप्राइटर है वह हमारे समय के मेधावी  गालबहादुर हैं वह कुछ भी कह सकते हैं वह राखी सांवत से लेकर कैटरीना कैफ और मीका से लेकर योयो हनीसिंह तक किसी को भी मुल्क का राष्ट्रपति नामित कर सकते हैं वह किसी को भी डाट पिला कर देशनिकाला दे सकते हैं l
फ़िलहाल उनका सारा ध्यान सुनामधन्य आइकनों को धूल चटा उनकी जगह  कार्टून कैरेक्टरों के स्टिकर चिपकाने  पर केंद्रित है इस गुरुतर कारगुजारी के लिए उन्होंने अपना तम्बू अपने ब्लॉग की राजधानी में गाड़ दिया है वह वहां बैठ कर  मुल्क के अजात शत्रुओं को चुन चुन कर नेस्तनाबूद करने में लगे हैं बापू और नेताजी के बाद संभवतः उनके निशाने पर भगत सिंह ,आजाद ,बिस्मिल ,अशफाक जैसे आतंकवादीहोंगे ,जिन्होंने मुल्क की आज़ादी के लिए नहीं सिर्फ अपनी पापुलरिटी के लिए पूरी दुनिया में शांतिप्रिय देश की छवि को कलंकित किया वह यह भी पता करने में लगे हैं  कि स्वतंत्रता संग्राम के ये रणबांकुरे किस फायर आर्म्स निर्माता कम्पनी के ब्रांड एम्बेसडर  थे l

नामवर  मुखारबिंद से निकले  ऐसे  ही बयान शोभायमान  होते  हैं l