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March, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यह भक्ति है, सब जानते हैं

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संबंधित ख़बरेंमहंगाई का रोनाबुखार का मौसम देश एक है, मगर भक्त अनेक हैं। देश के होने की वजह विशुद्ध राजनीतिक है। भक्तों के होने का कारण भावनात्मक कम, धार्मिक अधिक है। कुछ भक्त सत्ता पाने के लिए देशभक्त टाइप के बने रहते हैं। ये लोग वक्त के हिसाब से अपने मुखौटे चुनते हैं। उनका देशप्रेम बेलौस होता है। बदलते समय के साथ उनकी चाल, चरित्र और चेहरा बदलता रहता है। वे जब खुद को मुसीबतों में घिरा पाते हैं, तो भक्तिभाव से सुर, ताल और लय की परवाह किए बिना मजीरे बजाते हैं। वे अपनी देशभक्ति के आगे किसी अन्य की भावना को टिकने नहीं देते।

देश भौगोलिक रूप से भले ही स्थिर हो, लेकिन भक्तों की उसके प्रति निष्ठा पोर्टेबिल रहती है। वह उस मोबाइल नंबर की तरह होती है, जो खुद तो स्थिर रहता है, लेकिन कंपनी बदल जाती है। राजनीति में सिद्धांतों की पोर्टेबिलिटी का अजब सुख होता है। इसकी महिमा से स्वर्णिम मध्यमार्ग सहज उपलब्ध हो जाता है, और टकराव से बचाव हो जाता है।

देश कमोबेश वहां रहने वालों के दिल में बसता है। बसता है या नहीं बसता, यह बात तो कंफर्म नहीं है, लेकिन भावुक होने पर कहा यही जाता है। हालांकि यदि देश वाकई दिल …

ऑनलाइन आज़ादी के चौपट खुले दरवाजे ,,,

यह ऑनलाइन जमाना है।शुभकामनाओं से लेकर गालियाँ तक बड़ी आसानी से यहाँ से वहां चली आती।हैंइतनी मात्रा में आती हैं कि लगता है कि इस दुनिया में शुभता और अपशब्दों के सिवा कुछ बचा ही नहीं है।सोशल मीडिया पर किसी के निधन की सूचना आती है तो देखते ही देखते हजारों ‘लाइक्स’ आ जाते हैं।झुमरीतलैयामें कोई मैना पिंजरे से गायब  हो जाती है तो पूरा आभासी संसार उसकी इस हरकत पर दो खेमोंमें बंट कर गहन विमर्श में तल्लीन हो जाता है।मैना के इस साहस,दुस्साहस और नादानी पर लोग अपने -अपने तरीके से गम,गुस्से और तारीफ का इज़हार करते हैं।अभिव्यक्ति की इस आनलाइन आज़ादी ने पूरे मुल्क को निहायत वाकपटु बना दिया है।इसऑनलाइन स्वछंदता ने नैतिकतावादियों की नाक फुला दी है।सोशल मीडिया पर दबंग नेता तक की गली मोहल्ले का सींकियाछाप पहलवान यहाँ टिल्ली-लिल्ली करके रख देता है। इस ऑनलाईन आज़ादी  ने अपने शैशव में ही गुल खिलाने शुरू कर दिए हैं।पूत के पाँव पालने में अपना कौतुक दिखा रहे हैं।अधिकांश चिंतक इसके गले में बिल्ली के गले वाली मिथकीय घंटी बाँधने की फ़िराक में हैं।वैसे भी हमारे विचारकों को तय मिकदार से अधिक आजादी हज़म नहीं होती।इसीलिए स…

खिड़कियां व नकल

सारे मुल्क ने देखा l कई कई बार देखा l इसलिए देखा क्योंकि देखने में कोई हर्ज़ नहीं था कि दीवारों में खिड़कियाँ होती हैं l सिर्फ होती ही नहीं वरन उसमें रहती हैं l दीवार के उस पार मूढ़मति नकलची रहते हैं l दीवार के इस पार अक्लमंद नकल प्रोवाइडर रहते हैं l इसके आरपार हमारी शिक्षा प्रणाली और पूरा सिस्टम रहता है l सिस्टेमेटिक तरीके से रहता है l इसमें सबकी अपनी -अपनी भूमिका होती है l समस्त अभिनेता अपने रोल को पूरी लगन और शिद्दत से निबाहते हैंl 
खिड़कियों से केवल ताज़ी हवा और रौशनी ही नहीं आती ,इसमें से शानदार नम्बरों से लदीफदी मार्क्सशीट और सर्टिफिकेट पाने का शार्टकट निकलता है l खिड़कियों की मुंडेरों पर कबूतरों की तरह टिक कर नकल करवाने और गुटुरगूं गुटरगूँ करने का हुनर आता है l जांबाजी दिखाने का मौका मिलता है l यह भी पता लगता है कि खिड़कियों की सत्ता केवल कम्प्यूटर की विंडोज तक ही सीमित नहीं है l नैटजनित आभासी संसार से इतर भी खांटी खिड़कियों की उपयोगिता बरक़रार है l खिड़कियाँ कालजयी होती हैं l
एक वक्त था जब इन्हीं खिड़कियों की वजह से नैनों की विविध भावभंगिमा की रोशनाई से लिखे अदृश्य प्रेमगीतों का आदानप्रदान…

गुप्तचर तन्त्र और पीपिंग टॉम

वह आम आदमी नहीं हैं l आजकल वह छुट्टी पर हैं l मुल्क भर के सारे गोपीचंद  गाजर कुतरते हुए उन्हें यहाँ - वहां तलाश रहे हैं l उनकी थाह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है l हाथों में मैग्नीफाइंग ग्लास थामे राज्य गुप्तचर यह पता लगाने में लगे हैं कि वह पार्टी पराभव का इतिहास रचने के बाद अंतर्ध्यान होकर गए कहाँ हैं l वह इतिहास लेखन का काम अधूरा छोड़ गए हैं l उन्हें अभी उसके कुछ और अध्याय और अनुच्छेद लिखने हैं l उनकी पार्टी उन्हें बहुत ‘मिस’ कर रही है और मीडिया उनकी बाईट पाने के लिए  मिस कॉल पर मिस कॉल मार रही है l वह ब्रह्मांड के किसी कोने में ठीक उसी तरह सुस्ता रहे हैं जैसे कभी सृजनहार अपना काम निबटाने के बाद चैन के कुछ पल बिताने  अवकाश पर गए थे l प्रभु की तरह उनकी लीला निराली है l वह हर जगह होते हैं लेकिन वह कहीं नहीं होते l वह कभी गुम नहीं होते इसलिए किसी को मिलते नहीं l वह कभी आँख से ओझल नहीं होते इसलिए दिखते नहीं l  वह सृजक हैं ,कर्ता नहीं l उनकी महिमा अपरम्पार है l जासूस उनको पूरी शिद्दत से दूंढ रहे हैं l वे उन्हें हर उस जगह तलाश चुके हैं ,जहाँ वे अकसर पाए जाते रहे हैं l वे उन्हें कैंडी क्…

जासूस नहीं रिसर्च स्कॉलर

उनके घर के आसपास जो टहलते मंडराते मिले थे ,उनके बारे में पक्की खबर यह है कि वे कोई जासूस -वासूस नहीं खांटी  एकेडेमिक रिसर्च स्कॉलर थे l वे यह पता करने आये थे कि राजनेता का निठल्लापन आम आदमी की  अकर्मण्यता से कैसे भिन्न होता  है l वे यह भी जानने  में लगे थे कि राजसी तफरीह के लिए कौन से नम्बर का जूता और कैसी पतलून या हॉफ पैंट मुफ़ीद रहती  है l उनकी उत्सुकता इस बात को लेकर  भी थी कि वे उस नीरो के मानस पुत्र बनने में किस हद तक  कामयाब रहे  हैं ,जो जलते हुए रोम को देख कर चैन ब्रांड की बांसुरी बजाया करता था l वे यह रिसर्च भी करने में लगे थे कि रोम वाले नीरो के मुकाबले इनका बांसुरीवादन कितना अधिक कर्णप्रिय साबित हो रहा है l जासूस और रिसर्च स्कॉलर में बड़ा फर्क होता है l  सीक्रेट एजेंट  उन बातों को जानने में जान खपाते हैं जो ओपन  टाइप के सीक्रेट  होते हैं  l  अंडरकवर  जासूस  रहस्य पर पड़ा ‘कवर’  उठाते कम  हैं उसे जमींदोज करने  की कोशिश  अधिक करते   हैं  l  शोधक  पहले से सर्विदित  बातों को कुछ इस तरह से क्रमवार परोसते हैं , जिससे उनकी निजी विद्वता में चार चाँद लग जाते हैं  l वह पकाने से अधिक पके …

कोई पूछे तो मुद्दा क्या है !

मुद्दे बहुत हैं l आम आदमी की जिंदगी में कोई न कोई मुद्दा  रहता ही है l उसकी जेब भली रीती रहे लेकिन मुद्दों से भरपूर  रहती  है l उसकी ख्वाइश रहती  है कि कोई उससे जुड़े मुद्दों को  उठाये l लेकिन वे हमेशा धरे के धरे रह जाते हैं l जब मुल्क का समूचा विपक्ष भूमि अधिग्रहण कानून का मुद्दा कांधे पर उठाये राजमार्ग पर मार्च करता है तब आम आदमी किराये की खोली के लिए अपने सपनों में कदमताल करता है l  उसकी चिंता पैर के नीचे की जमीन खिसक जाने की नहीं ,अपने लिए सिर्फ पैर टिकाने लायक स्थान पाने की है l उसकी जद्दोजेहद बाद मरने के दो गज़ जमीन पाने की नहीं जिन्दा बने रहते हुए कमर टिकाने का ठिकाना पाने के लिए हैl राजनेताओं को सदा मुद्दों की तलाश रहती है l वे सदन के पटल पर मुद्दे किसी गुलदस्ते की तरह सजाते हैं l मौका मिलने पर उन्हें हवा में लहराते हैं l बड़े बड़े बयान देते हैं l  मेज पर रखे मुद्दों को अलटते -पलटते हैं l वे इन्हें किसी कुशल खानसामे की भांति रोटी की तरह सेंकते हैं l  मुद्दा हाथ आ जाये तो उसे सीने से लगा कर रखते हैं l उनका पुनर्पाठ करते हैं l सरकारें  मुद्दों को  हमेशा विज्ञापनी पंच लाइन बना देती ह…

भगत जी ,जगत जी और मस्तराम की पकौड़ी

एक जगतजी हैं ,उनकी अरसे से समोसे की दुकान हैlवह पूरे मनोयोग से परंपरागत समोसे तलते हैंlउनके लगे बंधे ग्राहक हैंlउनका काम ठीकठाक चल रहा हैlउनके बनाये समोसे न कभी हॉटहिट साबितहुए और न ही कभी सुपर फ्लॉपl जगतजी जरा ‘रूखी सूखी खाये कर ठंडा पानी पीव ' टाइप के हैंlवह पहले सेऐसे ही हैंlउनके पिता भी लगभग ऐसे ही थेlलोगों का अनुमान है कि उनके पिता भी अमूमन इसी प्रकार के रहे होंगेlलब्बेलुआब यह कि वह जेनेटिकली ऐसे  हैंl एक भगत जी हैंlउन्होंने उनकी दुकान के बगल मे दुकान खोल रखी हैlवह भी समोसे बनाते हैंlउनके समोसे आकार में तो समोसे जैसे होते हैं लेकिन खाने में लगभग केक जैसे लगते हैंlवह कढ़ाई के खौलते घी में समोसे तलते नहीं बंद भट्टी में पकाते हैंlउनमें से केक जैसी गंध आती हैlइसलिए वह  हॉट केक्स की तरह बिकते हैंlहालाँकि यह कहने वाले भी हैं कि यह समोसे नहीं उसके नाम कलंक हैlइसलिए वो धड़ाधड़ बिकते हैंlइससे जगतजी को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उनकी संतति  को मार्केट में अपने पड़ोसी से यूं पिछड़ना मंजूर नहींlवह रूखी सूखी खाने वाली  नहीं हैl वे  अपने पिता  से पूछ रही है  –आप केक जैसे समोसे क्यों नहीं बनाते ? -…

जुबान की फिसलन का मैकेनिज्म और क्षमा याचना का अनुष्ठान

मुहँ में जब आइडियोलोजी  के मलाईदार लड्डू भरे हों और अपने मन की  बात कह कर लाइमलाइट में आने की जल्दबाजी  हो तब अमूमन आदमी वो सब कह जाता है जिसे जुबान का फिसलना कहा जाता है lसड़क पर पड़े केले के छिलके पर पैर फिसल जाये तो उसके सिवा जो धराशाही हुआ होता है सब हँसते हैं lयह हंसी हालाँकि लापरवाही पर सटीक व्यंग्य होती है लेकिन इसका शुमार विशुद्ध व्यंग्य में होता हैl यही वह संधिस्थल है जब केले का छिलका ,मलाईदार लड्डू ,हास्य और व्यंग्य सब एकजुट होते दिख जाते हैं l राजनीति में किसी न किसी की जुबान के बेकाबू होने का सिलसिला चलता ही रहता है lइसी फिसलन के जरिये टीआरपी पर निगाह गड़ाये रखने वाले मीडिया को मनोवांछित बाईट मिलती है l  वह इसे  प्रोफेशनल आलोचकों के साथ  मिल बाँट कर चटखारे लेकर कुतरता है  lइससे ही जीवन में विकासोन्मुखी  परोपदेशी  नारों  से उपजने  वाली एकरसता टूटती है l लोगों को लगता है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि कामधाम भले ही ठीक से न कर पा रहे हों लेकिन अपने गालों के  ढपोरशंख को  बजा बखूबी रहे हैं l जुबान के फिसलने का अपना आनंद होता है lइससे बिना पचे लड्डूओं की मिठास सतह पर आ जाती हैlउदर में स…

उनके खुश हो जाने का मतलब

उन्होंने कहा कि वह पार्टी द्वारा दिए जा रहे समर्थन से खुश होने से भी अधिक खुश हैं l वह खुश हुए तो मानो कायनात खिलखिला उठी l उससे भी अधिक बात यह कि वह बोल उठे तो मानो काली शिलाओं ने अपने सनातन मौन से बाहर आकर वाचाल होना तय किया l  अब काजल की कोठरी से बेदाग निकल आने का काला जादू देखने दिखाने की रुत आई है l बड़े दिनों के बाद नेताओं को कदमताल करने का मौका मिला है l बयानवीरों को अपना मुहँ खोलने और पंख तौलने का अवसर प्राप्त हुआ है l छाज जब मौन तोड़ता है तो छलनियों को बोलने और फटकन बटोरने का  मौका मिल जाता हैl वह खुश हैं कि पूरी पार्टी उनके पीछे खड़ी  है l आलाकमान उनके पीछे नहीं पड़ा ,उनके साथ अड़ा है l सभी अपने अपने हाथ खड़े करके पूरे मुल्क को हाथों की सफाई दिखा रहे हैं l वे कह रहे हैं ,देखो देखो हमारे हाथों में कालिख को कोई निशान नहीं है l समस्त कालिमा को हमने चुनावी पराजयों के बाद मंथन चिंतन जैसे डिटरजेंट से धो डाला है l पार्टी के एक बड़े नेता तो उच्च स्तरीय साबुन की तलाश में विदेश यात्रा पर निकले हुए हैं l पार्टी को बिन मांगे मौका मिल गया है l क्रिकेट वर्ड कप की तर्ज पर मौका ...मौका .....मौका की …

बापू ,सुभाष और मसखरे का इकतारा

नई –नई बातें सामने आ रही हैं l  बड़े मुहँ से बड़ी -बड़ी  बातें प्रकट हो रही हैl  इतिहास पुरुषों को मोहल्ला स्तर का शोहदा साबित करने की होड़ मची हैl चाँद की ओर मुहँ करके कुल्ले किये जा रहे हैंl बयानों की उलटबांसी के जरिये मीडिया को टीआरपी बढ़ाने वाला सामान परोसा जा रहा हैl अभिव्यक्ति की आज़ादी का नया मुहावरा गढा जा रहा हैl बड़े ओहदे पर रह चुके लोग अपने अतीत की ऊँची दुकान पर फीके पकवान मौलिकता के रैपर में बेच रहे हैंl यह मसखरों के लिए इकतारा  बजाने के लिए मनोवांछित समय है  l दस प्रतिशत स्वयंभू अक्लमंद नब्बे प्रतिशत मूर्खों  को बता रहे हैं कि बापू ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सेल्स एजेंट थे और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस  जापानी माल के थोक विक्रेताl बापू मोटी पगार के लिए सदा अंग्रेजी सरकार की चाकरी करते रहे और नेताजी जापानी आकाओं से टू –इन-वन टाईप के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मुफ्त में पाने के लिए अपने मुल्क से गद्दारी l उन्होंने बताया है कि मार्डन हिस्ट्री में इन लोगों के बारे में दर्ज अधिकांश इबारतें झूठ का पुलिंदा हैl वह सच्चे इतिहासबोध के  सोल प्रोप्राइटर हैl वह हमारे समय के मेधावी  गालबहादुर हैंl वह कुछ भी …