मंगलवार, 29 मार्च 2016

लोकतंत्र ,हॉर्सट्रेडिंग और दाल भात में मूसलचंद


हमारा बहुत बड़ा मुल्क है।योरोपीय संघ से अधिक उदारमना लोकतंत्र।लोकतंत्र है इसी वजह से यहाँ सरकारें निरंतर चुन-चुन कर बनती रहती हैं।चलती रहती है।हिलती रहती हैं।डोलती रहती है।हिलने-डुलने के बावजूद बाकायदा कायम रहती हैं।सरकार के लोग इधर उधर जाकर लुकछुप कर खुसुर पुसुर करने लगते हैं।हॉर्स ट्रेडिंग होने लगती है।निष्ठाओं के  हाट सज जाते हैं।घोड़े अस्तबल में खड़े-खड़े ही घुड़दौड़ जीतने  और हारने लगते हैं।यह अलग बात है कि बीच–बीच में यत्र तत्र  राष्ट्रपति शासन दाल भात में मूसलचंद के रूप में प्रकट हो जाता है।
जनता दिल थाम कर अदृश्य घोड़ों के करतब देखती है।कान लगा कर  घोड़ों का हिनहिनाना सुनती हैं।बड़े मनोयोग से स्टिंग ऑपरेशन को निहारती है।लेकिन तनिक भी विचलित नहीं होती।उसे हारते -हारते जीत और जीतते -जीतते हार देखने का प्रगाढ़ अनुभव है।फटाफट क्रिकेट ने उसे इसका आदी बना दिया है।सबको यह पता है कि हर अच्छी और बुरी चीज के पीछे अकसर किसी न किसी का हाथ,दैवीय कृपा अथवा रुपहली चरण पादुका का कमाल होता है।
आजकल के घोड़े बड़े फ्लेक्सिबल होते हैं।जिनमें वांछित लचीलापन नहीं होता उनकी टांग टूट जाती है या तोड़ दी जाती है।लचीले घोड़े कभी किसी रेस में पराजित नहीं होते।वही सरकार को बनाने और गिराने के कारक होते हैं।जनतंत्र में जब असमंजस पनपता है तब यही घोड़े खुद को अपने प्राइज टैग के साथ प्रस्तुत कर देते हैं।बिना टैग वाला घोड़ा खच्चर होता है।अपनी पीठ पर दूसरों का बोझ ढोता है।दुर्गम और संकरी पगडंडियों पर धर्मभीरूओं को अपने उपर लाद कर तीर्थाटन कराता है।हांफता है।आस्थाओं की दिव्य गुफाओं के मुहाने तक स्थूलकाय लोगों को लाने- ले जाने का बेगार करता है।
अधिकांश स्थानों पर सरकारें जिद्दी फफूंद की तरह जमी रहती हैं।बड़े मजे से ये चलती  रहती हैं।भले ही गतिमान न हों लेकिन सर्वशक्तिमान हैं।चप्पे चप्पे पर विद्यमान हैं।
वह सरकार भी भला कोई सरकार है ,जिसे हॉर्स ट्रेडिंग और तमाम झंझावातों में खुद को टिकाये रखने की कला न आती हो।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

वाचिक परम्परा के विप्लव पुरुष का आगमन


मुल्क को एक नया नकोर आइकन मिला।बोरियत में आकंठ डूबे राजनीतिक विमर्श को नवजात मुहावरा मिल गया है।चर्चा के चरखे को  ऊदी हुई कपास मिली।विधान सभाओं के आसन्न चुनावों के लिए दमदार मुद्दा मिला है।इतिहास के पन्नों में दर्ज़ होने लायक नायक अवतरित हुआ है।आज़ादी लफ्ज़ को अभिनव व्याख्याकार प्राप्त हुआ।प्रेरणादायक बलिदानियों का रेप्लिका उपलब्ध हुआ।मुबारक हो,बड़े दिनों के बाद वर्तमान के सुनसान आंगन में भविष्य में होने वाली क्रांति की संभावना की बिगुलनुमा किलकारी गूंजी।
सबको पता लगा कि सम्प्रभुता सम्पन्न मुल्क को अभी और अधिक आज़ादी की जरूरत है।उसे मुक्ति चाहिए मोटी बंद किताबों से।उसे निजात पाना है कृशकाय किन्तु चौपट खुले ऐतिहासिक संदर्भों से।उसे खुद को पृथक करना है अपने भूगोल से।क्रांति की हर ज्ञात अवधारणा से विरत होकर विप्लव की खिचड़ी के लिए नई रेसिपी इज़ाद करनी है।मुंगेरी लाल के हसीन सपनों को अमली जामा पहनाना है।वाचिक परम्परा के विप्लव पुरुष का आगमन यकीनन आह्लादकारी है।
समय –समय पर करिश्माई अवतार धरा के भ्रमण पर आते  रहते हैं।ये बड़े नाटकीय अंदाज़ में आते हैं।आते ही हवा में बंद मुट्ठियाँ उछालते हैं।पंजों के बल उचक कर अपने आदमकद होने की घोषणा करते हैं।अपने भक्तों से कहते हैं कि वे पुरातनपंथी भक्तगणों के खिलाफ़ सवाल उठा रहे हैं।इसके बाद वे अपने जादुई हैट में से सरोकारों का  खरगोश फुदकते हुए दिखाते हैं।कभी-कभी खरगोश की जगह सफ़ेद कबूतर हवा में उड़ा देते हैं।मौके की नज़ाकत को भांप कब किसे फुदकाना या उड़ाना है,त,भलीभांति जानते हैं।
मिथकीय गाथाएं गवाह है कि असाधारण प्रतिभाएं कभी मेटरनिटी होम में सामान्य परिस्थिति में  और तयशुदा रीति से जन्म नहीं लिया करतीं।ये कभी जरथुस्त की तरह हंसते गाते पैदा होती हैं तो कभी किसी बुद्धपुरुष की तरह जन्मते ही पांच कदम चलती हैं।
आजकल जो आइकन जन्म लेते हैं वे तुरत फुरत सोशल मीडिया पर चस्पा हो जाते हैं।ट्विटर पर ट्रेंड बनकर चहुँओर इतराते हैं।इनके मंतव्य बड़े हाईफाई टाइप के वाईफाई होते हैं।
ख़ुशामदीद विप्लव!तुम्हारे द्वारा आने वाले समय में पकाई जाने वाली खिचड़ी का गरीबी रेखा के नीचे चहलकदमी कर रही मुल्क की अधिसंख्य कुपोषित जनता को बड़ी बेसब्री से इंतजार है।









रविवार, 6 मार्च 2016

गोरेपन की क्रीम और कालापन


होली लगभग आ पहुंची है।मौसम गरमा गया है।हरेभरे पेड़ों की अच्छी भली रंगत काली हो गई हैं।इनके लिए अभी तक किसी लवली क्रीम की इजाद नहीं हुई।यदि हो भी गयी होती तब भी इससे क्या होता?हद से हद पत्तियों का रंग गोरा चिट्टा हो जाता।हरीतिमा तो फिर भी नदारद रहती।जिंदगी यूँ स्याह सफ़ेद नहीं होती।इसकी इबारतें तभी खुशगवार लगती हैं जब तक उसमें सारे रंग और शेड मौजूद रहें।एक अतिलोकप्रिय उपन्यास के जरिये पता लग चुका है कि ग्रे के फिफ्टी शेड्स होते हैं।इसी तरह हर रंग में रंगों की अनेक परतें होती हैं।प्रिज्म पारदर्शी प्रकाश को इन्द्रधनुषी रंगों में विभक्त कर देता है।
पूँजीगत सोच और राजनीति के मामले में हम अभी तक सिर्फ दो रंगों में अटके हुए है। धन या तो काला होगा या सफ़ेद।राजनीति में सरोकार जब भी प्रकट होंते हैं  तो सदैव ब्लैक एंड व्हाईट में सामने आते हैं।सांवला सलोना स्वरुप तमाम मिथकीय गाथाओं में मौजूद होने के बावजूद हमारी स्मृति में गोरी त्वचा ही रहती है।कारनामे कालिमा से भरपूर होते हैं और मंतव्य हमेशा उजले ही होते हैं।करतूतें भले काली हों कमीज के कॉलर सफेद होते हैं।
होली के लिए रंग अनेक होते हैं।लेकिन काले पेंट की डिमांड अपने चरम पर रहती है।इस मौके पर दूसरों का मुंह काला करने में जो मजा ही कुछ अलग होता है।लाल हरे पीले नीले रंग में वह आनंद कहाँ? रोजमर्रा के जीवन में अपराध करते हुए कोई रंगे हाथ  पकड़ा जाता है तो भी कहा यही जाता है कि मुहँ काला हो गया।लेकिन जिसका मुंह कुदरतन श्याम रंग होता है,उनके मुख का क्या होता होगा।काले पर चाहे जिस रंग की जितनी परत चढ़ाओ वह तो जस का तस रहता है।काले रंग की  महिमा अपरम्पार है।जब तक यह कालापन है तब तक लवली की उपादेयता और बाज़ार है।
राजनीति में काला रंग सिर्फ रंग नहीं होता वरन पूर्ण राजनय होता है।यह रंग डराता भी है और ब्लैक इज ब्यूटीफुल के मुहावरे के साथ रिझाता भी है।डार्क एंड हैंडसम के फैशन स्टेटमैंट के साथ लुभावने विमर्श का बीज मंत्र भी है यह।हर तरह की कालिमा के साथ श्वेत रंग की उम्मीद सदा रहती है। इतना सब होने पर भी गोरापन देने वाली  क्रीम का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोलता है।
होली के पर्व से ऐन पहले लवली के जिक्र ने मुल्क की जनता को मुस्कुराने में मजबूर कर दिया है।सोशल साइट्स पर वनलाइनर के उत्पादकों के समक्ष बौद्धिक सम्पदा की चोरी का खतरा प्रकट हो गया है।कोई नहीं जानता कि उसकी चन्द शब्दों में की गयी ठिठोली सदन में हुडदंग मचा देगी और टीवी चैनलों को बैठे बैठाये ब्रेकिंग न्यूज़ टाइप कुछ अनूठा मिल जाएगा।
रुपहले पर्दे पर ब्रांडेड बाम और चिपकाऊ एडहेसिव के बाद गोरेपन की क्रीम ने जिस तरह राजनीतिक विमर्श के पटल पर धमाकेदार आमद दर्ज की है,उससे यह तो स्पष्ट हो गया है कि आनेवाले समय में गोरेपन वाली क्रीम व्यापारिक सफलता का नया इतिहास रचेगी।नयनाभिराम विमर्श के लिए विचारधारा की नहीं गोरी काया अधिक जरूरी होती है।मन के  रंग और मकसद को कौन देखता और पूछता है?
निर्मल गुप्त