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June, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इसरो के सेटेलाईट और एबोनाईट के पुराने रिकार्ड

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इसरो ने फिर रिकार्ड तोड़ दिया।एबोनाईट के रिकार्ड वाला पुराना समय होता तो यह सुनते ही इसरार की अम्मी ने पहले तो अपने शैतान बच्चे को कूटना था।इसके बाद इसरार के अब्बा को कोसना था कि इत्ते बड़े हो लिए लेकिन इनका  गानों -शानों को सुनने का शौक न गया।घर भर को इन मुए रिकार्डों का कबाड़खाना बनाये हैं।यह वह वक्त था जब रिकार्ड  बजते कम ठिठकते अधिक थे।घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के, हाय धडके क्यों धडके....टाइप का जब गाना चलता था तो सुनने वालों को पता होता था कि इसे कहीं न कहीं अटकना जरूर है। समय बदल गया है।अब कोई इसरार बेवजह मार नहीं खाता।रिकार्ड बेआवाज़ टूट जाते हैं।दरअसल टूटते भी नहीं, नये बन जाते हैं।इसरो की तो आदत -सी हो चुकी है पुराने रिकार्ड तोड़ने और नये बनाने की।इसरो के विज्ञानी मेहनत करते हैं।सरकार झटपट अपनी पीठ ठोंक लेती है।विज्ञान अपना काम करता है और  भक्त  लोग इस मौके पर खुश होकर पीपल के पेड़ के नीचे कडुवे तेल के दिये जला आते हैं।यह अलग बात है कि आसमान में काले बादल उमड़ने घुमड़ने के बाद भी नहीं बरसते तो विपक्षी कयास लगा लेते हैं कि हो न हो, ऐसा इसरो के किसी सेटेलाईट की नीयत में खोट की वजह से हुआ है।वर…

उड़ता हुआ पंजाब और हंसती कुर्सी

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उड़ता पंजाब आख़िरकार रिलीज हो गयी।एक फिल्म समीक्षक को कहते सुना गया कि यह फिल्म लंबी दौड़ का घोड़ा है।इससे पहले तो यही लग रहा था कि यह फिल्म फिल्म न होकर कोई परिंदा है,जिसके पंख कतरने और न कतरे जाने को लेकर विवाद है।खबर तो यह भी आई थी कि फिल्म रुपहले पर्दे पर आने से पहले ही लीक हो गयी।तब सवाल उठा  था कि यह फिल्म है या किसी स्कूली बच्चे का लंच बॉक्स कि उसमें से परोंठे के साथ रखे अचार में से तेल रिस जाए।
एक समय था जब किस्सा कुर्सी का खूब उड़ा था।जब यह किस्सा चारों ओर मंडरा रहा था तब भी कुछ  लोग सोच रहे थे कि फर्नीचर की दुकान पर जहाँ-तहां बिकने वाली कुर्सी को लेकर इतनी शाब्दिक तलवारें  क्यों भांजी जा रही है।एक ब्रांड की कुर्सी यदि नहीं जंच रही  तो न सही,दूसरी ले आओ।इसी तरह की बात जब किसी ने नाई की दुकान पर सार्वजनिक रूप से कही  तो ग्राहक के बाल कतरता बारबर मास्टर फिस्स से हंसा।उससे भी अधिक जोर से कुर्सी हंसी।देर तक हिचकोले लेती रही।उसका हिलना तब रुका जब बाल कटवाने वाले ने कहा-हे कुर्सी ,यह बात तुम्हारे बारे में नहीं, आज के राजनीतिक हालात पर टिप्पणी है।
उड़ता पंजाब बिना उड़े ही काफी उड़ान भर चुक…

मानसून का देरी से आना और उपलब्ध विकल्पों का खुलापन

मौसम विभाग ने बता दिया है कि इस बार केरल में मानसून एक हफ्ता विलम्ब से आएगा।यह बात बताने का उसका अंदाज़ ऐसा रहा जैसे कि मानसून आया तो आया और न आया तो उसके भरोसे मत रहियो।अपने लिए बादल, बरखा, भीगी धरती की सौंधी गंध, रेन डांस, पकौड़ी की चाहत और तरल गरल रूमानी यादों आदि का इंतेज़ाम खुद ही कर लेना।विभाग ने समय रहते चेता दिया ताकि कोई गफलत न रहे।विभाग का काम है जनता को सावधान करना।ठीक उसी तरह से अवगत कराना जैसे दुकान या दफ्तर के बाहर यह बोर्ड लगा देना कि सावधान आप कैमरे की निगरानी में हैं।लेकिन अपने समान की हिफाजत खुद करें। मौसम विभाग और सरकार की वैधानिक चेतावनी को शायद ही कोई गम्भीरता से लेता हो।जिस तरह हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता आदमी शायद ही सिगरेट की डिब्बी पर छपी ‘स्टेच्युरी वार्निंग’ को देखता या पढ़ता है ,उसी तरह बारिश के मौसम का लुत्फ़ उठाने की इच्छा रखने वाले उमड़ती घुमड़ती बदली के सहारे हाथ पर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहते।वे बारिश से जुड़े प्रत्येक साजोसामान की परफेक्ट व्यवस्था रखते हैं ,जैसे मांगलिक आयोजन पर जी भर उधम मचाने  वाले 'डीजे' के इंतजाम के साथ अपने बत्तीस जीबी की पेनड्…

क्रॉस वोटिंग और भोजन-भट्ट की तोंद की परिधि

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वे क्रॉस वोटिंग करके बाहर आये तो उनके चेहरे पर गजब का नूर था।आमतौर पर ऐसी चमक क्रीम पॉलिश के बाद  जूतों में परिलक्षित होती है या ब्यूटी पार्लर से बाहर निकलती ‘आंटियों’ के मुखड़े पर दिखती है।मॉर्निंग वॉक पर  आदमी को  टहलाने गये टॉमी की टेल लेंग्वेज(दुमकी भाषा) में छलकती है या मुफ्त के मालपुए उदरस्थ करने के बाद भोजन-भट्ट की तोंद की परिधि में दमकती है।लोकतंत्र इसी प्रकार के  प्रसंगों की वजह से खुद  को महिमामंडित करता है।बीच –बीच में राज्यसभा, विधान परिषद आदि के चुनाव न हों तो राजनीति किस कदर एकरस,बोरिंग और बिना घी वाली मूंग की दाल की खिचड़ी हो कर रह जाए। ऐसे मौकों पर वोट तो सभी डालते हैं लेकिन जो मेधावी होते हैं वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर मताधिकार का इस्तेमाल करते है।पार्टी अनुशासन बड़ी चीज है लेकिन अंतरात्मा उससे भी उपयोगी  वस्तु है।इस वस्तु के इस्तेमाल का अलग विधान और वास्तु शिल्प होता है।आत्मा और जेब का जब परस्पर समन्वय होता है तब ठोस राजनीतिक मतवाद एकदम तरल हो जाते हैं।कोई माने या न माने, यह तरल सहजता ही है ,जिससे जिंस और जिंदगी का कारोबार चलता है। कहने वाले तो यहाँ तक कहने लगे हैं कि …

दुर्लभ कलाकृतियां और तसल्ली

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अमरीका ने हमारी दुर्लभ कलाकृतियां हमें लौटा दी।दो हजार साल पुराने इस सामान ने हमें अनायास बहुत भावुक कर दिया है।वर्तमान चाहे जैसा हो पर अतीत के गौरव के लेकर हमारी संवेदनशीलता बेमिसाल है। इससे उम्मीद बंधी है कि वह एक न एक दिन हमें ‘वे गुमशुदा दिन’ भी वापस दिलवा देगा, जब परों वाले तोते मैना या गौरेया नहीं,सोने की चिड़िया मुल्क की डाल डाल पर बसेरा करती थीं।जब शेर और मेमने एक ही प्याऊ पर ओक से पानी पीते थे।जब एक ही चूल्हे और हांडी में वेज और नॉनवेज व्यंजन पकते थे।जब पान की दुकानों पर यह नहीं लिखा होता था कि उधार प्यार की कैंची है।जब कैंची सिर्फ गबरू जवानों की मूंछे और लोगों के जेबें तराशने के काम आती थी।जब महिलाओं के गले से उचक्के सोने की चेन नहीं, दिल का चैन लूटने जैसी रोमांटिक वारदात को अंजाम देते थे।जब लोग  तपाक से गले मिलने से पहले एक दूसरे की आस्तीनों की तलाशी नहीं लेते थे।जब मसखरे हंसने हंसाने के लिए अपने मुंह बिचकाने के आलावा भी बहुत –सी अन्य तरह की तरकीब जानते थे। जब दुल्हन, बारात की चढ़त के समय नागिन डांस न होने की स्थिति में, दूल्हे के गले में वरमाला डालने से साफ़ इंकार करने का वैध…

खीसे निपोरते टॉपर और अंकपत्रों से टपकते नम्बर

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परीक्षाओं के परिणाम आ रहे हैं।निरंतर आये ही जा रहे हैं।एक ओर यत्र तत्र खीसे निपोरते कतिपय टॉपर अपनी मौलिक प्रतिभा से सबको  हतप्रभ करते दिख रहे हैं तो दूसरी ओर सर्वशिक्षा अभियान वाले गली -गली और मोहल्ला -मोहल्ला जाकर ‘चलो स्कूल’ की हांक लगा रहे हैं।बच्चा आनाकानी करता है तो उसे फुसलाते हैं,बहलाते हैं और फिर भी जिद पर अडिग रहे तो जबरन उठाकर वायुमार्ग से स्कूल ले जाते हैं।शैक्षिक कार्यकर्ताओं के दो जोड़ी हाथों के बीच हवा में तैरते ये बच्चे मुल्क के मुस्तकबिल के खेवनहार  हैं। बच्चा एक बार जब स्कूल जाना शुरू करता है तो कुछ दिनों में  ही वहां रम जाता है।मिड-डे मील आदि  के लिए छीना- झपटी करता हुआ वह अपना हिस्सा हथियाने का हुनर सीख जाता है।बाद में ककहरा सीखने के साथ तमाम तिकड़म भी सीख लेता है।शिक्षकों की खिदमद और चिरोरी करके परीक्षा में मनोवांछित अंक प्राप्त करने का तरीका जान लेता है।बिना ठीक से पढ़े लिखे उत्तर पुस्तिका  में समग्र ज्ञान रोप देने की कला का निष्णात काश्तकार हो जाता है।यही बच्चा  बडा होकर सबसे  अपने बौद्धिक चातुर्य का लोहा मनवाता है।अपने प्रदेश का नाम रोशन करता हैं।अपनी कीर्ति का डंक…

गरमी का है व्याकरण और तपती हुई दलील

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सूरज आसमान से दनादन आग उगल रहा है।कमरों में लगे एसी शुष्क ठंडी हवा बिखेर रहे हैं।कूलर अपने तरीके से लू के खिलाफ ‘वाटरलू’ में डटे हैं।जहाँ बिजली  की किल्लत है, वे हाथ का पंखा झलते हुए इंद्र देवता और सरकार की अक्षमता पर  सवाल उठा रहे हैं।आरटीआई वाले नेताओं की शैक्षिक योग्यता सम्बंधी सवाल पूछ पूछ कर वातावरण को ठंडाने नहीं दे रहे।खुलासों और विवादों के अगस्ता वेस्टलैंड  हेलिकॉप्टर अपनी लैंडिंग के लिए उपयुक्त स्थान और सही समय तलाश रहे हैं।सवाल बहादुर पानी के लिए मच मच मचाये लोगों से अपने सूचना के अधिकार का अतिक्रमण करते हुए पूछना चाह रहे हैं कि गन्ने के रस को  कोल्ड ड्रिंक से बेहतर को क्यों न माना जाए। यह यकीनन सूचना प्रधान समय है।नेताओं की स्कूली मार्कशीट से लेकर उनके पालतू कुत्तों को खिलाये जाने वाले बिस्कुटों  की एमआरपी पर तमाम सवाल उठाये जा रहे हैं।लगता यही है कि इसी तरह के मूलभूत प्रश्नों के जरिये जनक्रांति का बिरवा बिना उचित खाद, प्रकाश और पानी के  पनपेगा।आइपीएल-9 में लगने वाले चौके छक्कों के जरिये जनता की दुश्वारियों का समाधान देर –सवेर निकलेगा।अक्षर पटेल की हैट्रिक से पटेल आरक्षण की …

दो साल का हाल

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दो साल बीत गये।सरकार इतने बड़े –बड़े विज्ञापन न छपवाती तो शायद यह बात पता भी  नहीं चलती।आमतौर से सरकारें उसी तरह  दबे पाँव ही चलती हैं जैसे चतुर बिल्ली जो  रसोई में रखी सारी दूध मलाई चट  कर जाए और किसी को भनक तक न लगे।धडाधड़ विकास पर विकास होता चला जाए और उसका अंदाजा  तक किसी को न होने पाए।जैसे बरसात में घास की फसल ऐसी उपजे कि सब तरफ हरा ही हरा दिखने लगे।खर पतवार की ऐसी बढ़वार हो कि पौधों पर लगे फूलों  के समस्त रंग उसकी हरीतिमा में गुम हो जाए। तो वाकई दो साल पूरे हुए।इतना समय यूँही गुजर गया।सच तो यह है कि वक्त हमेशा इसी तरह गुजरता है।जन्मजात प्रेमी प्रेयसी के आगमन के इंतजार में छज्जे की रेलिंग पर टंगे के टंगे रह जाते हैं और सपनों की अदृश्य पालकी पलक झपकते आँखों  के आगे से बिना कोई सुराग छोड़े गुजर जाती है।लेकिन सरकार नहीं चाहती कि वह चुपचाप समय को बीत जाने दे।उसके पास हर पल को सेलिब्रेट करने का मौका है और दस्तूर भी।अपनी कारगुजारियों के आदमकद विज्ञापनों के परचम लहराने की अपूर्व सुविधा है।सबको पता है कि सरकारी कृत्यों का वैभव उसके सम्यक प्रदर्शन से ही प्रकट होता है। दो साल बीतने का अहसास हो या…