रविवार, 29 नवंबर 2015

जब पुरस्कार मिलेगा


मुझे पुरस्कार कभी नहीं मिला ।चूंकि वह मिला नहीं इसलिए मुझसे कभी किसी चैनल वाले ने पूछा नहीं कि पुरस्कृत होकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ।हर मौके पर पूछने के लिए उनके पास इसी टाइप के कुछ शाश्वत सवाल होते है। महाभारत काल में भी यदि वह होते तो संजय से जरूर पूछते कि धृतराष्ट्र को युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनाते समय उसे कैसा महसूस हो रहा है। चैनलों का प्रादुर्भाव तब हुआ नहीं था इसलिए वे चूक गए। हालाँकि उस दौरान इसी तरह के सवाल पूछने का काम यक्ष ने किया। लब्बेलुआब यह कि सवाल ओर उसे पूछने वाले सदा मौजूद रहे। सनातन रूप से हम हमेशा सवालिया रहे हैं ।
मुझे कोई इनाम ,इकराम, पद ,ओहदा टाइप चीज कभी नहीं मिली इसलिए इस  तरह के प्रश्नों से महरूम रहा। इसके बावजूद मुझे यकीन है कि कभी न कभी कोई मुझसे इस तरह का सवाल पूछेगा जरूर। हो सकता है कि कोई धपाक से अवतरित हो और यही पूछ बैठे कि आपको कभी कुछ नहीं मिला , अब आप कैसा अनुभव कर रहे हैं। इस अंदेशे को देखते हुए मैंने ऐसे प्रश्नों और उनसे उठने वाले अनुपूरक प्रश्नों के उत्तर तैयार कर रखे है। आशंकाएं चाहे जैसी हो उन्हें कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मुल्क का मेरे जैसा हर मिडिलची ,जिंदगी को इसी तरह से जीता आया है।
मैं हर सुबह इसी उम्मीद के साथ उठता हूँ कि घर की खिड़की पर खड़े होकर बाहर देखूंगा तो वहां मुझे चैनल वालों की ओबी वैन की कतार और माइक संभालते सुदर्शन पुरुषों और महिलाओं का जमघट दिखाई देगा। तब मैं सबसे पहले ड्रेसिंग टेबिल पर जाकर अपने उजड़े हुए बालों और दाढ़ी को सलीके से संवारूँगा। आँखों में उनीदेपन को प्रगाढ़ करूँगा। किचिन में जाकर एक कप ग्रीन टी बनाकर सोचूंगा कि जो रट रखा है उसमें कितना याद रहा है। संभावित सवालों की फेहरिस्त मन ही मन तैयार करूँगा। फिर बेहद मंथर गति से चलता हुआ ऊपर की मंजिल से सीढ़ियों के जरिये इस अंदाज़ में नीचे उतरूंगा जिससे देखने वालों को लगे कि बंदा एकदम बिंदास है।
मुझे देखते ही वे मेरी ओर लपकेंगे। मैं उनसे बड़ी स्टाइल से कहूँगा –हैंग ऑन ,हैंग ऑन लेडीज़ एंड जेन्टिलमैन। ऐसी बातों से आदमी बड़ा लिटरेरी लगता है।
-सर अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं ? शर्तिया पहला सवाल यह होना है ।
-मुझे बिलकुल ऐसा लग रहा कि जैसे ग्लुको मीटर में शुगर लेवल की रीडिंग बिलो हंड्रेड आई हो जबकि मैं  रात में दवा खाना भूल गया था। मेरा जवाब होगा।
-नाईस पंच सर । जीरो फिगर वाली कोई रिपोर्टर तब यही कहेगी।
- इस स्तर तक पहुँचने  के लिए आपको कितनी मेहनत करनी पड़ी ? अधपकी दाढ़ी वाला रिपोर्टर अपनी आस्तीन में छुपा कर रखे गए शोधपूर्ण सवालों में से एक सवाल मेरी ओर उछलेगा।
-बिलो हंड्रेड तक शुगर लेवल को लाने के लिए मुझे जिम जाकर वर्कआउट करने के सारे फायदे कंठस्थ करने पड़े। इन्फैक्ट कल देर रात तक मैं उन्हें ही याद कर रहा था।
यह सवाल सुनकर दाढ़ीवाले को लगेगा कि उसका तो पहला सवाल ही अकारथ  गया। वह अपनी आस्तीन में से दूसरा प्रश्न ढूंढें तब तक उन्हें धकियाता हुआ जल्दबाज किस्म का कोई पूछ बैठेगा – आप लिखते कैसे हैं ?
-पहले मैं बाकयदा बालपैन से लिखता था। अब कम्प्युटर पर उँगलियों से लिखता हूँ। मेरी  बात पूरी भी नहीं हो पायेगी कि कोई कुछ पूछने को होगा तो उसे मैं लगभग बुद्ध की मुद्रा में दायीं हथेली उठाकर रोक दूंगा।
- मेरे कृतित्व में  बालपेन का महती योगदान रहा  है । यह कह कर मैं अपनी बात पूरी करूँगा।
- वो कैसे ?  वो कैसे ? चारों ओर से सवाल उठेंगे।
-वो ऐसे  कि पहले तो मैं उसी से ही लिखता था। अब मैं उससे अपना कान खुजाता  हूँ। जितना अधिक मैं ऐसा करता हूँ उतना ही बेहतर लिख पाता हूँ। मैं उन्हें ब्रेकिंग न्यूज़ टाइप की बाईट दूंगा । इसके बाद मैं यह क्षेपक कथा भी सुना दूंगा कि एक समय की बात है कि मेरा बालपेन गुम हो गया……. जब तक वह गायब रहा मैं चाह कर भी  सार्थक लेखन के नाम पर कुछ लिख नहीं पाया।
- अपने सरोकारों के बारे में कुछ कहना चाहेंगे ? दाढ़ीवाला अब तक अनेक बार आस्तीन से अपना मुहँ पूँछ चुका होगा। वह ऊँची आवाज़ में झल्ला कर पूछेगा।
-मेरे सरोकार और कान एकदम साफ़ हैं। इन्हें जब तक खुजलाते और सहलाते रहो तब तक यह ठीक रहते हैं। कान और सरोकार लगभग ऐसे ही अपना काम करते हैं।  मेरा जवाब होगा।
-सुनने में आया है कि आपको जो इनाम मिलने जा रहा है वह झुमरीतलैया ब्रांड का है? दाढ़ीवाले की  बैचैनी बढ़ेगी तो वह तिनके से दांत कुरेदता हुआ जरूर पूछेगा।
-पता नहीं दोस्त ,आप कह रहे हैं तो यह बात सही ही होगी। इनाम ब्रांडेड है ,क्या यह काफी नहीं?  मैं तो छींकने के लिए जो नसवार इस्तेमाल करता हूँ वह भी हंसिया और हथोड़ा ब्रांड की होती है। मेरी कलम लोटस मार्का है और कम्प्युटर साइकिल छाप। मेरी टेबिल पर रखा लैम्प लालटेन मार्का  है ,जो केवल बडबुक बडबुक कहने से रौशन होता है। आप इसी बात से मेरे सरोकारों  का अंदाज़ा लगा सकते हैं। मेरा मानना है कि हमेशा ब्रांडेड लिखो ,ब्राडेड पढ़ो। मैं उसे ब्रांड की महिमा गिनाऊँगा।
-आगे आपकी योजना क्या है ? जीरो फिगर की ओर से सवाल आएगा।
- स्टेट्स यथावत बनाये रखने की। मेरा उत्तर उसे हैरान करेगा।
-मैं पूरी कोशिश करूँगा कि फास्टिंग का मेरा शुगर लेवल कभी सैकड़ा पार न करे। मैं उसकी जानकारी में इजाफा कर दूँगा।
इसके बाद मैं उन्हें नमस्कार करूँगा। उनके सवाल वहीँ फर्श पर बिना चुगे दानों की तरह बिखर कर रह जायेंगे। मैं धीरे धीरे सीढियां चढ़ता हुआ खुद से पूछूँगा कि अरे यार ,अब तो कोई बता दे कि मुझे इनाम दिया किसने है। तब मैं एक सपना जागती आँखों से और देखूंगा कि मेरा शुगर लेवल ग्लुकोमीटर में आई किसी एरर की वजह से बेहद घट गया है और मैं फ्रिज में रखे लड्डू को बिना किसी अपराधबोध के खा सकता हूँ। हमारी जिंदगियों के ऐसे अजूबे सिर्फ और सिर्फ एरर की वजह से ही होते हैं। वाकई ऐसी त्रुटियां दिलफरेब होती हैं।
अभी मुझे कोई इनाम मिला नहीं है। लेकिन उसे मिलने की स्थिति से निबटने के लिए मेरी तरफ से तैयारी पूरी है। यानी मामला अब देने वालों के हाथ में है। इसका एक मतलब यह भी है कि मामला पचास प्रतिशत उम्मीद का है और उम्मीद अभी भी एक जिन्दा लफ्ज़ है।
मैंने अभी अभी खिड़की से बाहर गली में देखा है वहां एक गड्ढे में भरे बरसाती पानी में जंगली कबूतर अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए स्नान में निमग्न है।
सोच रहा हूँ कि  चलो अच्छा हुआ जो इनाम न मिला। मिलता तो ये मीडिया वाले भीड़ लगाते और इन बेचारे कबूतरों को यहाँ से उड़ कर कहीं और जाना पड़ता। हो सकता है कि वे उस दिन बिन नहाये ही रह जाते।
किसी भी इनाम मिलने के मुकाबले परिंदों को इस तरह किल्लोल करते देख पाना, यकीनन बड़ी बात है।

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

अपेक्षा और उपेक्षा के बीच


लोकतंत्र की खासियत है कि उसमें कोई ‘ऑनपेपर’ उपेक्षित नहीं रहता।रहता हो तो भी कहलाता नहीं। भले ही उसकी जिंदगी में अपेक्षित कुछ भी घटित न हो पाता हो लेकिन आस हमेशा बरक़रार रहती है।जो खुद को उपेक्षित कहता दिखे तो मान लें कि वह परामर्श मण्डल का माननीय सदस्य बनने की गति को प्राप्त हो चुका है।  
सिर को छुपाने के लिए एक अदद छत ढूंढता आदमी प्रोपट्री डीलर के सुसज्जित ऑफिस में पहुँच कर बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं पाल बैठता है।डीलर छंटा हुआ होता है। वह उसे आशियाने की सुंदर छटा दिखाता है।फ़्लैट के सामने स्विमिंग पूल वाला सपना  आरओ के चिल्ड पानी के साथ परोसता है।आदमी की आँखें तैराकी करती अप्रतिम सुन्दरियों की कल्पना मात्र से  चमक उठती हैं।बात होते-होते लच्छेदार प्रलोभनों  के झुरमुट और रिबेट के आश्वासनों की पगडण्डी से होती हुई हाऊसिंग लोन पर जा टिकती है।मिडिल क्लास ख्वाहिश हमेशा बैंक के लोन अफसर की टेबिल पर रखे लाफिंग बुद्धा की प्रतिमा के करीब  जाकर ठिठकती है।अफसर उसे  उसके जिंदा होने के  पुख्ता प्रमाण के साथ वांछित दस्तावेजों की लम्बी फेहरिस्त थमा देता है।इसके बाद वे दोनों हाथ उठाकर ठहाका लगाता है। अपेक्षा उपेक्षा के प्रति बेपरवाह हो जाती है।
घर आकर वह उस फेहरिस्त का गहन अध्ययन करे इससे पहले अपेक्षित सवाल घरवाली की ओर से प्रकट होता है। “क्या रहा अपने घर का?”यह एक शाश्वत सवाल है जिसे सदियों से पत्नियाँ धर्मपत्नी होने की आड़ में पूछती आयी हैं।ठीक उसी तरह जैसे टीवी एंकर पूछते हैं कि अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं।
आदमी जो इत्तेफ़ाक से पति भी है।किराये के घर की खिड़की से पोखर में नहाती हुई भैंसों को निहारता हुआ कहता है,कोशिश कर रहा हूँ। एक न एक दिन ये पोखर पूल में तब्दील होगा  और भैंसे टूपीस वाली बिकनी पहने कैलेंडर गर्ल बन जाएँगी।यह बात वह कहता नहीं,अपेक्षा करता है।उसने सुना है कि सपने हर हाल में रहने चाहियें।भले ही वे मुंगेरीलाल के हसीन सपने टाइप के हों। बड़ा खतरनाक होता है सपनों का मर जाना।
आदमी अपने घर के सपने के साथ, जब भी मौका मिलता है, बैंक के लोन वाले अफसर के पास जाता है। वह अफसर की ओर बड़ी अपेक्षा से देखता है।अफसर उपेक्षा प्रदर्शित करता हुआ अपने लेपटॉप पर पोगो या कैंडी क्रैश खेलता रहता है।अपेक्षा और उपेक्षा एक दूसरे के धैर्य का इम्तेहान लेते हैं।बीच- बीच में प्रोपट्री डीलर मोबाईल पर खबर देता रहता है कि अब तो जिम और स्पा का प्रावधान भी हो गया है।वह स्पा के बारे में गूगल सर्च से टेक्स्ट और इमेज़ की समस्त जानकारी जुटाता है और मुदित हो जाता है।  
तमाम प्रकार की उपेक्षाओं के मध्य जनता  की अपेक्षायें चीन की एलइडी बल्बों वाली रंग-बिरंगी झालर झिलमिलाती रहती है।जलबुझ करती है।तयशुदा पैटर्न में रंग बिखराती है।दोनों शब्द  एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।सिक्का चाहे खोटा हो,पर होते उसके भी दो पहलू ही हैं।अब उसे  कोई अपेक्षा कहे या उपेक्षा, इससे हमारे लोकतंत्र की सेहत पर असर ही क्या पड़ता है।


रविवार, 22 नवंबर 2015

समय तो वाकई बदल गया है


वक्त बदल गया है।मौसम भी बदला है।ऋतुएं जल्दी-जल्दी अपने पन्ने पलट रही हैं।जब से नई सरकार आई है रातों -रात बहुत कुछ बदल गया है।अमनपसंद कबूतर खूंखार हो गये हैं।गुटरगूं गुटरगूं की जगह गुर्राते हुए लगने लगे हैं। गौरेया के बारे में उड़ती हुए बेपर की खबर यह आ रही है कि वह पड़ोसी मुल्क में आतंकवाद के प्रशिक्षण के लिए गयी है।आपसी राम राम में स्वार्थी तत्वों को साम्प्रदायिकता की धमक सुनाई देने लगी है।लोग एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए चौबीसों घंटे नये से नये मुहावरे रच रहे  है।यहाँ तक कि मेरे घर के बाहर लगे गुलमोहर के पेड़ पर लाल फूल फुनगी पर लगने लगे है।इसकी छोटी-छोटी पत्त्तियाँ धरती पर बिखर कर सिर्फ मासूम पत्ती नहीं, गंदगी लगने लगी हैं।स्वच्छता अभियान वालों का टोला इस गंदगी के बावत मुझे और गुलमोहर को सख्त शब्दों में चेता चुका है।इसका परिणाम यह हुआ कि पेड़ ने फूलों को पत्तों की ओट में छुपा लिया ,पर पत्तियों को फैलाना बदस्तूर कायम रखा है।दरख्त कमोबेश आदतन जिद्दी होते हैं।हालाँकि मैं सहमा हुआ हूँ।
सब कह रहे है तो ठीक ही कह रहे हैं कि अब समय पहले जैसा नहीं रहा।लोकतंत्र में जब बहुमत कुछ कहता है तो उसे बाय डिफॉल्ट सत्य मान लिया जाता है।अब टाइम पहले की तरह दीवार पर टंग कर पेंडुलम की तरह चुपचाप दोलन नहीं करता।और न ही कलाई में बंधी घड़ी की तरह दबी आवाज़ में टिक-टिक करता है।वह गुपचुप अंदाज़ में मोबाइल के भीतर चलता है।उसी मोबाइल में जहाँ सहिष्णुता जैसे किसी मुद्दे के साइड बाय साइड घुइयाँ की सब्जी की रेसिपी डिस्कस होती है।जहाँ टमाटर के महंगेपन के साथ मूली के सस्तेपन पर गहन विमर्श होता है।जहाँ ब्रोकली के भाव तीनसौ पचास रूपये प्रति किलो से बढ़ कर तीनसौ साठ होने पर चिंता जाहिर की जाती है।जहाँ बेबी कॉर्न के दाम घटने पर बधाईयाँ गाई जाती हैं।हर जरूरी बहस का बीज वक्तव्य सब्जी मंडी से फ्री में मिलने वाले धनिये पुदीने के साथ चला आता है।
यह ऐसा देशज कालखंड है।जब सरसों के तेल के बाज़ार भाव में उछाल की शिकायत सयुंक्त राष्ट्र संघ के पटल पर अवलोकनार्थ और आवश्यक कार्यवाही हेतु रखी जाती है।देसी टालरेंस के मुद्दे को लेकर देशी-विदेशी लेखकों के दस्ते घुटनों पर झुक कर इंग्लेंड की महारानी से कातर शब्दों में गुहार करते देखे गये हैं।उनकी अभिव्यक्ति ग्लोबल है।उनकी ख्याति इंटरनेशनल। सरोकार युनिवर्सल।उन्हें याद नहीं कि अब इण्डिया इंग्लिश्स्तान का उपनिवेश नहीं, आज़ाद मुल्क है। वास्तव में बहुआयामी वैचारिकता बड़ी भुलक्कड़ होती है।नादानी को ऐतिहासिक भूल कहना उनकी मनभावन अदा है।
मुल्क की हांडी में महागठबंधन ब्रांड की उम्मीदों से भरी लज़ीज़ बिरियानी पक रही है।बीरबल की मिथकीय खिचड़ी मुल्क की स्मृति से नदारद है क्योंकि अब मुर्गी दाल से सस्ती हो चली है।टमाटर के दाम टिंडे के स्तर तक पहुँच गये है।लहसुन के दाम अनार की बराबरी कर रहे हैं।मटर और कीवी की औकात एक जैसी हो गयी है।गंवार की फली सेब के भाव बिक रही है।सुबह सवेरे नीबू पानी ग्रहण करने वाले संतरे को सस्ता पा ऑरेंज जूस पी रहे हैं।बढ़ते दामों के बीच सस्ते विकल्प मौजूद हैं।एक तरह से देखा जाये तो थोड़े-बहुत अच्छे दिन इधर -उधर आ गये हैं।मज़े से कदमताल कर रहे हैं।जनता की सहभागिता का आह्वान कर रहे हैं।
मानना होगा कि यह अर्धसत्यों  से भरा बेहद कन्फ्यूजन से भरा नयनाभिराम समय  है।

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

सरकार का विदेश जाना और जनता का नकचढ़ापन


सरकार से जनता की अपेक्षाएं निरंतर बढ़ती जा रही है।अपेक्षाओं का यह विस्तार वैसा ही है जैसे घर में आने वाली बहू को लेकर अकसर ससरालियों का होता है।यह होना शाश्वत है। महिला सशक्तिकरण की तमाम मुनादियों के बावजूद है।मुल्क में बढ़ती असहिष्णुता के बीच है।बीचों बीच है।प्रजा से राजा के असंवादी होते हुए भी है।
सरकार घुमक्कड़ है।वह लगातार गतिमान रहती है।उसकी गति किसी कम्पनी के सेल्समैन-सी है।सेल्समैन स्थान स्थान पर घूम घूम कर अपना माल खपाता है।।सबको पता है कि कुशल सेल्समैन कभी खाली हाथ घर नहीं लौटते।वे वापस आते हैं तो यात्रा में मैले हो गये कपड़ों के साथ बच्चों के लिए रेवड़ी गज्जक या लौलीपौप लेकर जरूर आते है। बच्चे उसे पा मगन हो जाते हैं।तब घरवाली पूछती है कि सबके लिए लाये ,मेरे लिए क्या लाये। सेल्समैन इसे सुन पति में तब्दील हो जाता है। भावविभोर हो कहता है-तुम्हारे लिए मैं हूँ न। पत्नी नाक सिकोड़ती है।वह बैग में गूदड़ बनी पतलून की जेब से रोल्ड गोल्ड का रत्नजड़ित हार निकाल कर दिखाता है। पत्नी की नाक फड़फड़ा उठती है।कोई नहीं जानता कि उसकी नाक प्रेमभाव से फडकी या छींकने के पूर्व तैयारी के रूप में।
सरकार विदेश प्रवास पर है।जनता झींक रही है।उसे  नहीं पता कि वह उनके लिए सात समन्दर पार से क्या लाने वाली है।वह सोच रही है कि काश उनके लिए वहां से परस्पर रिश्तों की थोड़ी गर्माहट ही ले आयें।वहां के किसी बगीचे से वैचारिक सदाशयता की हरीतिमा ले आये।विलायती गाय के दूध से बनी रबड़ी या छेने के रसगुल्ले ले आये।कुछ न कुछ लेकर आयें जरूर।केवल पूँजी निवेश का ढपोर शंख फूंकते न चली आये।वे वहां से झुनझुने न लायें।अभी किसी राज्य में चुनाव सन्निकट भी तो नहीं है।
जनता बड़ी आस के साथ सरकार की घर वापसी की बाट जोह रही है।उसे उम्मीद है कि वह इस बार कोहनूर हीरा लेकर आएगी।इक्कीस ग्राम का हीरा लाने में अधिक बोझ भी नहीं ढोना पड़ेगा।  
जनता की उम्मीद और हौसले बढ़ते जा रहे हैं।वह सेल्समैन की घरवाली नहीं ,जो रोलगोल्ड से बहल जाए।वह कोहनूर ऐसे मांग रही है जैसे लोग पड़ोसी के घर से दही ज़माने के लिए जामन मांग लिया करते हैं।
जनता अब नकचढ़ी हो चली है।

रविवार, 15 नवंबर 2015

#‎पेरिसबर्निंग‬ उर्फ़ बर्निंग इण्डिया



मुल्क में जब धर्मान्धता के खिलाफ़ निर्णायक युद्ध जीत लेने के बाद विजयी सेना जश्न मना रही थी कि तभी पटना से पहले पेरिस में आतिशबाज़ी होने लगी।हंसी ख़ुशी के लड्डुओं के फूटने के लिए पेट कितने विस्तृत हो गये हैं।सीरिया में ड्रोन हमले में मरने वाले रणबांकुरों की आत्मा के लिए शान्तिपाठ करने के लिए उन्होंने पेरिस में उपयुक्त ठिकाना जा ढूंढा। पेरिसबर्निंग के हैशटैग के साथ सोशलमीडिया पर बधाई गायी जाने लगी।उसकी अनुगूंज देश की सहिष्णुतावादी ताकतों के ड्राइंगरूम में भी सुनाई दे रही हैं।तालियों का नेशनलिस्ट कोरस हमारी संवेदनशीलता की निशानदेही करने लगा। 
पेरिस में जो हुआ उसे तो होना ही था।इसके लिए फ़्रांस खुद जिम्मेदार है।वहां की जीवन शैली और विचारों का खुलापन पूरे विश्व के लिए खतरा जो बनता जा रहा है।उससे अत्याधुनिक हथियारों के जरिये ही विनम्रता के साथ निबटा जा सकता है।हमारे यहाँ तो जातिगत सरोकार ही साम्प्रदायिकता को धूल चटा सकने में कारगर हैं।अब हम इत्मिनान के साथ हैशटैग इण्डिया बर्निंग की बाट जोह सकते हैं। 
हम उत्सवधर्मी लोग हैं।एक पर्व निपटता है कि दूसरे के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है।वस्तुतः उत्सव हमारी स्मृति सदा मौजूद रहता है।बाज़ार इसके लिए पलक पाँवड़े बिछाये रहते हैं।उसकी निगाह हर बारात और वारदात में से मुनाफ़े का अंकगणित खोज लेती हैं। 
मैंने आज किसी प्रगतिशील को सुबह सवेरे ज़लेबी कचौरी उदरस्थ करते देखा।वह अपने गुब्बारे जैसे पेट में उन्हें हवा की तरह भर रहे थे।ठोस से ठोस चीज को गैस में बदलने की कीमियागिरी उन्हें बखूबी आती है। 
मैंने पूछ लिया,आप इतना सामंती नाश्ता कैसे कर सकते हैं।वह मेरे मूर्खतापूर्ण सवाल पर ‘हो हो’ कर दुर्लभ हंसी हँसे। वह हँसे तो उनकी तोंद में हिलोर-सी उठीं। वह बोले ,महोदय हम कोई रसास्वादन नहीं कर रहे।अपने सरोकारों के बैलून में पर्याप्त गर्म हवा भर रहे हैं ताकि वह खुले आसमान में देर तक उड़ सके। 
“पेरिस में जो हुआ ,उसके बार कुछ कहेंगे सर।“ मैंने पूछा। 
उन्होंने जवाब दिया,”जब तक पेस्ट्री और चॉकलेट की दुकानों पर सेल्स प्रमोशन के लिए एके -सैंतालीस ,हथगोले आरडीएक्स टाइप फ्रीबी दी जाती रहेगी तब तक तो यही होना है।ऊर्जावान बच्चे तो ऐसी छुटपुट नादानियाँ करते ही हैं।“ 
“पर मैंने तो आपको यह कहते सुना था कि जब तक ज़लेबी कचौड़ी की दुकान पर हथियार मिलते रहेंगे तब तक यही सब होता रहेगा?” मैंने सवाल दागा। 
”हाँ तब कहा था जब तक मैं इस दुकान तक नहीं आया था।यहाँ आकर जब हथियार नहीं दिखे तो अपनी राय बदल ली।“उन्होंने कहा। 
“इस तरह तो आप रिविजनिस्ट हुए।“ मैंने टोका। 
“यह विचार का संशोधन नहीं ,विकास है।हमारी विचारधारा ज़लेबी की चाशनी में डूबी मक्खी नहीं है कि उसे बिना देखे सुनें निगल लें।“ अब उनकी आवाज़ में तुर्शी थी। 
मेरे अटपटे सवालों की वजह से उनकी तोंद जल्द फूल कर कुप्पा हो गयी।मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही वह तोंद के सहारे आकाशमार्ग से घर की ओर बढ़ लिए। 
सतह से उठते हुए आदमी के पाँव धरती पर अकसर टिक भी कहाँ पाते हैं।वह पेरिस की घटना का अपडेट पाने के लिए बाल सुलभ कौतुहल से लबरेज़ थे।
@हरिभूमि में प्रकाशित

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

उलटा-पुलटा और बल्लीमारान वाली बात

मैं वार्निंग वॉक के चक्कर में लगभग घिसट रहा था।वैसे तो मैं दुलकी चाल चल रहा था। देखने वालों को भी शायद ऐसा ही लग रहा हो।पर मुझे असलियत का पता था।मैं भी उन हज़ारों बुद्धिजीवियों जैसा हूँ ,जिन्हें यथार्थ का बोध तो होता है लेकिन वो उसे अभिव्यक्त नहीं करते।वो तब कोई बात खुल कर कहते हैं जब आसन्न खतरा टल चुका होता है।वे किशोर वय में हुए प्यार का इज़हार तब करते हैं जब उनके सीनियर सिटीजन बनने की बाकयदा मुनादी हो चुकी होती है।हम आदतन चिड़ियों द्वारा खेत चुग जाने के बाद पूर्ण मनोयोग से ‘हुर्र हुर्र’ करते हैं।
मैं वाकई थक चुका था इसलिए तेज़ कदमों से चल रहा था।तेज़ पदचालन की कोई धार्मिक या मेडिकल वज़ह नहीं थी।मैं तो सिर्फ थकन से उपजी ऊब से जल्द से जल्द निज़ात पाने की कोशिश कर रहा था। मार्निंग वॉक का यह अनुष्ठान खत्म हो और मैं काउच पर पसर कर देश दुनिया के मसलों पर ढंग से चिंतन कर सकूँ।मैं अपने कम्फर्ट ज़ोन में ही कुछ सोच पाता हूँ।
मेरे लिए मार्निंग वॉक ठीक उसी तरह से और उतनी ही मिकदार में बाध्यकारी है, जिस तरह से बीट कांस्टेबल का आती-जाती रिक्शाओं के हुड पर अपना डंडा फटकार कर चौथ वसूलना।।जैसे परचुनिए द्वारा नौकर से सुबह दुकान खोलते ही मिर्च की खाली बोरियों को फटकार कर तह लगावाना।जैसे दफ़्तर के बाबू के लिए क्लोज़सर्किट कैमरे की निगरानी में मनमसोस कर काम करना। इसके बावजूद कुछ न कुछ ऐसा जरूर है कि सुबह-सवेरे वॉक पर जाना धीरे-धीरे पान मसाले जैसी लत बनता जा रहा है।
पर मुल्क का हर मार्निंग वॉकर मेरे जैसा नहीं है।मसलन मैं वॉक करते हुए चुपचाप रहता हूँ जबकि अधिकांश लोग इस समय का सदुपयोग खुलेआम प्रभु के सुमरन में करते हैं। इतने पुरजोर तरीके से राम का नाम लेते हैं कि पेड़ों पर बैठे अलसाये पक्षी बिना पंख तौले खुले आसमान की ओर रुख कर लेते हैं।सड़क के किनारे अंगड़ाई लेते कुत्ते चौकन्ने होकर भौकने लगते हैं।भले ही इन लोगों के बगल में अदृश्य छुरी रहती हो पर मुँह पर रब का जिक्र ही रहता है।हो सकता है मैं भी अपनी चुप्पी के बीच कोई बगावती ख्याल पकाता हूँ।
मैं मॉर्निंग वॉक उसी तरह से करता हूँ ,जिस तरह से लोग अमूमन सदियों से करते रहे हैं। हर बढ़ते कदम को उँगलियों पर गिनता और उनका योग जीने लायक उम्र में करता हुआ।गुज़रे हुए वक्त को रिकॉल करने का यह सनातन तरीका है।लेकिन सब ऐसे नहीं हैं। नये समय में नई तकनीक आ रही है। एक दिन एक सज्जन मुझे उलटे चलते हुए मिले। सहज कौतुहलवश मैंने पूछ लिया –महोदय यह क्या?
-यह वक्त के खिलाफ़ चाल है।महोदय ने कहा।
-कौन से समय के विरुद्ध ? मैंने पूछा।
-इस क्रूर समय के खिलाफ जिससे हम गुज़र रहे है।बात में कविताई थी सो बात ठीक से पल्ले नहीं पड़ी।पर मैं इतना समझ गया कि बंदा पहुंचा हुआ है।
वह निरंतर उलटा चलता रहा।मैं सवाल दर सवाल पूछता सीधे-सादे तरीके से उसके पीछे- पीछे।कुछ ही देर में मीडिया वाले कैमरा और माइक लेकर आ गये। उन लोगों ने मुझे धकिया कर पीछे किया।मैंने उसके पास जाने की कोशिश की।उन्होंने मुझे रोक दिया,कहने लगे-आपका काम वॉक करना है।उसे चुपचाप करते रहें। ज्यादा बड़बड़ न करें।
-हम भी मुंह में जुबान रखते हैं ….मैंने मिर्ज़ा मरहूम के मार्फ़त अपनी बात कहने की कोशिश की।
-ऐसी बल्लीमारान वाली सीधी-सादी बात अब कौन सुनता है मियां।मुद्दा उठाने-धरने का शौक फरमाते हैं तो कुछ ऑफबीट करो। जरा कुछ उलटा-पुलटा करो ना।
मुझे पता नहीं यह बात मीडिया वालों के हज़ूम ने कही या मेरे मन ने। पर मैंने साफ़-साफ़ यह बात तब सुनी जरूर।
@निर्मल गुप्त