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November, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जब पुरस्कार मिलेगा

मुझे पुरस्कार कभी नहीं मिला ।चूंकि वह मिला नहीं इसलिए मुझसे कभी किसी चैनल वाले ने पूछा नहीं कि पुरस्कृत होकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ।हर मौके पर पूछने के लिए उनके पास इसी टाइप के कुछ शाश्वत सवाल होते है। महाभारत काल में भी यदि वह होते तो संजय से जरूर पूछते कि धृतराष्ट्र को युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनाते समय उसे कैसा महसूस हो रहा है। चैनलों का प्रादुर्भाव तब हुआ नहीं था इसलिए वे चूक गए। हालाँकि उस दौरान इसी तरह के सवाल पूछने का काम यक्ष ने किया।लब्बेलुआब यह कि सवाल ओर उसे पूछने वाले सदा मौजूद रहे। सनातन रूप से हम हमेशा सवालिया रहे हैं । मुझे कोई इनाम ,इकराम, पद ,ओहदा टाइप चीज कभी नहीं मिली इसलिए इस  तरह के प्रश्नों से महरूम रहा। इसके बावजूद मुझे यकीन है कि कभी न कभी कोई मुझसे इस तरह का सवाल पूछेगा जरूर। हो सकता है कि कोई धपाक से अवतरित हो और यही पूछ बैठे कि आपको कभी कुछ नहीं मिला , अब आप कैसा अनुभव कर रहे हैं। इस अंदेशे को देखते हुए मैंने ऐसे प्रश्नों और उनसे उठने वाले अनुपूरक प्रश्नों के उत्तर तैयार कर रखे है। आशंकाएं चाहे जैसी हो उन्हें कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मुल्क का मेरे जैस…

अपेक्षा और उपेक्षा के बीच

लोकतंत्र की खासियत है कि उसमें कोई ‘ऑनपेपर’ उपेक्षित नहीं रहता।रहता हो तो भी कहलाता नहीं। भले ही उसकी जिंदगी में अपेक्षित कुछ भी घटित न हो पाता हो लेकिन आस हमेशा बरक़रार रहती है।जो खुद को उपेक्षित कहता दिखे तो मान लें कि वह परामर्श मण्डल का माननीय सदस्य बनने की गति को प्राप्त हो चुका है।   सिर को छुपाने के लिए एक अदद छत ढूंढता आदमी प्रोपट्री डीलर के सुसज्जित ऑफिस में पहुँच कर बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं पाल बैठता है।डीलर छंटा हुआ होता है। वह उसे आशियाने की सुंदर छटा दिखाता है।फ़्लैट के सामने स्विमिंग पूल वाला सपना  आरओ के चिल्ड पानी के साथ परोसता है।आदमी की आँखें तैराकी करती अप्रतिम सुन्दरियों की कल्पना मात्र से  चमक उठती हैं।बात होते-होते लच्छेदार प्रलोभनों  के झुरमुट और रिबेट के आश्वासनों की पगडण्डी से होती हुई हाऊसिंग लोन पर जा टिकती है।मिडिल क्लास ख्वाहिश हमेशा बैंक के लोन अफसर की टेबिल पर रखे लाफिंग बुद्धा की प्रतिमा के करीब  जाकर ठिठकती है।अफसर उसे  उसके जिंदा होने के  पुख्ता प्रमाण के साथ वांछित दस्तावेजों की लम्बी फेहरिस्त थमा देता है।इसके बाद वे दोनों हाथ उठाकर ठहाका लगाता है। अपेक्षा उपे…

समय तो वाकई बदल गया है

वक्त बदल गया है।मौसम भी बदला है।ऋतुएं जल्दी-जल्दी अपने पन्ने पलट रही हैं।जब से नई सरकार आई है रातों -रात बहुत कुछ बदल गया है।अमनपसंद कबूतर खूंखार हो गये हैं।गुटरगूं गुटरगूं की जगह गुर्राते हुए लगने लगे हैं। गौरेया के बारे में उड़ती हुए बेपर की खबर यह आ रही है कि वह पड़ोसी मुल्क में आतंकवाद के प्रशिक्षण के लिए गयी है।आपसी राम राम में स्वार्थी तत्वों को साम्प्रदायिकता की धमक सुनाई देने लगी है।लोग एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए चौबीसों घंटे नये से नये मुहावरे रच रहे  है।यहाँ तक कि मेरे घर के बाहर लगे गुलमोहर के पेड़ पर लाल फूल फुनगी पर लगने लगे है।इसकी छोटी-छोटी पत्त्तियाँ धरती पर बिखर कर सिर्फ मासूम पत्ती नहीं, गंदगी लगने लगी हैं।स्वच्छता अभियान वालों का टोला इस गंदगी के बावत मुझे और गुलमोहर को सख्त शब्दों में चेता चुका है।इसका परिणाम यह हुआ कि पेड़ ने फूलों को पत्तों की ओट में छुपा लिया ,पर पत्तियों को फैलाना बदस्तूर कायम रखा है।दरख्त कमोबेश आदतन जिद्दी होते हैं।हालाँकि मैं सहमा हुआ हूँ। सब कह रहे है तो ठीक ही कह रहे हैं कि अब समय पहले जैसा नहीं रहा।लोकतंत्र में जब बहुमत कुछ कहता है तो उसे…

सरकार का विदेश जाना और जनता का नकचढ़ापन

सरकार से जनता की अपेक्षाएं निरंतर बढ़ती जा रही है।अपेक्षाओं का यह विस्तार वैसा ही है जैसे घर में आने वाली बहू को लेकर अकसर ससरालियों का होता है।यह होना शाश्वत है। महिला सशक्तिकरण की तमाम मुनादियों के बावजूद है।मुल्क में बढ़ती असहिष्णुता के बीच है।बीचों बीच है।प्रजा से राजा के असंवादी होते हुए भी है। सरकार घुमक्कड़ है।वह लगातार गतिमान रहती है।उसकी गति किसी कम्पनी के सेल्समैन-सी है।सेल्समैन स्थान स्थान पर घूम घूम कर अपना माल खपाता है।।सबको पता है कि कुशल सेल्समैन कभी खाली हाथ घर नहीं लौटते।वे वापस आते हैं तो यात्रा में मैले हो गये कपड़ों के साथ बच्चों के लिए रेवड़ी गज्जक या लौलीपौप लेकर जरूर आते है। बच्चे उसे पा मगन हो जाते हैं।तब घरवाली पूछती है कि सबके लिए लाये ,मेरे लिए क्या लाये। सेल्समैन इसे सुन पति में तब्दील हो जाता है। भावविभोर हो कहता है-तुम्हारे लिए मैं हूँ न। पत्नी नाक सिकोड़ती है।वह बैग में गूदड़ बनी पतलून की जेब से रोल्ड गोल्ड का रत्नजड़ित हार निकाल कर दिखाता है। पत्नी की नाक फड़फड़ा उठती है।कोई नहीं जानता कि उसकी नाक प्रेमभाव से फडकी या छींकने के पूर्व तैयारी के रूप में। सरकार विदेश…

#‎पेरिसबर्निंग‬ उर्फ़ बर्निंग इण्डिया

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मुल्क में जब धर्मान्धता के खिलाफ़ निर्णायक युद्ध जीत लेने के बाद विजयी सेना जश्न मना रही थी कि तभी पटना से पहले पेरिस में आतिशबाज़ी होने लगी।हंसी ख़ुशी के लड्डुओं के फूटने के लिए पेट कितने विस्तृत हो गये हैं।सीरिया में ड्रोन हमले में मरने वाले रणबांकुरों की आत्मा के लिए शान्तिपाठ करने के लिए उन्होंने पेरिस में उपयुक्त ठिकाना जा ढूंढा। पेरिसबर्निंग के हैशटैग के साथ सोशलमीडिया पर बधाई गायी जाने लगी।उसकी अनुगूंज देश की सहिष्णुतावादी ताकतों के ड्राइंगरूम में भी सुनाई दे रही हैं।तालियों का नेशनलिस्ट कोरस हमारी संवेदनशीलता की निशानदेही करने लगा। 
पेरिस में जो हुआ उसे तो होना ही था।इसके लिए फ़्रांस खुद जिम्मेदार है।वहां की जीवन शैली और विचारों का खुलापन पूरे विश्व के लिए खतरा जो बनता जा रहा है।उससे अत्याधुनिक हथियारों के जरिये ही विनम्रता के साथ निबटा जा सकता है।हमारे यहाँ तो जातिगत सरोकार ही साम्प्रदायिकता को धूल चटा सकने में कारगर हैं।अब हम इत्मिनान के साथ हैशटैग इण्डिया बर्निंग की बाट जोह सकते हैं। 
हम उत्सवधर्मी लोग हैं।एक पर्व निपटता है कि दूसरे के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है।वस्तुतः उत्स…

उलटा-पुलटा और बल्लीमारान वाली बात

मैं वार्निंग वॉक के चक्कर में लगभग घिसट रहा था।वैसे तो मैं दुलकी चाल चल रहा था। देखने वालों को भी शायद ऐसा ही लग रहा हो।पर मुझे असलियत का पता था।मैं भी उन हज़ारों बुद्धिजीवियों जैसा हूँ ,जिन्हें यथार्थ का बोध तो होता है लेकिन वो उसे अभिव्यक्त नहीं करते।वो तब कोई बात खुल कर कहते हैं जब आसन्न खतरा टल चुका होता है।वे किशोर वय में हुए प्यार का इज़हार तब करते हैं जब उनके सीनियर सिटीजन बनने की बाकयदा मुनादी हो चुकी होती है।हम आदतन चिड़ियों द्वारा खेत चुग जाने के बाद पूर्ण मनोयोग से ‘हुर्र हुर्र’ करते हैं। मैं वाकई थक चुका था इसलिए तेज़ कदमों से चल रहा था।तेज़ पदचालन की कोई धार्मिक या मेडिकल वज़ह नहीं थी।मैं तो सिर्फ थकन से उपजी ऊब से जल्द से जल्द निज़ात पाने की कोशिश कर रहा था। मार्निंग वॉक का यह अनुष्ठान खत्म हो और मैं काउच पर पसर कर देश दुनिया के मसलों पर ढंग से चिंतन कर सकूँ।मैं अपने कम्फर्ट ज़ोन में ही कुछ सोच पाता हूँ।
मेरे लिए मार्निंग वॉक ठीक उसी तरह से और उतनी ही मिकदार में बाध्यकारी है, जिस तरह से बीट कांस्टेबल का आती-जाती रिक्शाओं के हुड पर अपना डंडा फटकार कर चौथ वसूलना।।जैसे परचुनिए द्वार…