शुक्रवार, 29 मई 2015

दिल्ली एक सरकारें दो


सरकारों के सामने हमेशा यह समस्या रही है कि वे काम तो खूब करती  हैं लेकिन उसका सम्यक प्रदर्शन नहीं कर पातीं  मेधावी बच्चे परीक्षा में इसलिए फेल कर दिए जाते हैं कि वे एक्जामिनेशन के वक्त अपने ज्ञान को उत्तर पुस्तिका पर ठीक से धर नहीं कर पाते  इस उल्टे- पुल्टे समय में खाने पचाने से अधिक उसे दिखाने   का अधिक महत्व है   यह राजनीतिक मामला नहीं ,विशुद्ध संवाद दक्षता से जुड़ा सवाल  है  मानना होगा कि वर्तमान में सरकार अपनी उपलब्धियों को विज्ञापित करने  में कामयाब है  वह शून्य में से सफ़ेद कबूतर और खाली टोपी में से खरगोश निकाल कर दिखा देने की कला जानती है  अबकी बार जादू भरी सरकार है 
सरकारों के सामने सदा - सदा से संवाद के प्रकटीकरण की समस्या रही है  इस समय दिल्ली में दो दो संवाद प्रवीण सरकारें  हैं  एक कामधाम करने से अधिक लड़ने- झगड़ने में इस कदर तल्लीन है कि उसके पास किसी को देखने दिखाने के लिए फुरसत नहीं है  दूसरी ने किया कुछ खास  नहीं लेकिन उसके पास बिना कुछ  किये उसे  दिखाने की अभूतपूर्व स्किल  है  एक के हाथ में झाड़ू और सबको लतियाने की बेचैनी है तो दूसरे के पास हर मर्ज का इलाज करने वाली सेल्फी  है   हना न होगा कि दोनों तरह की सरकारें अपने -अपने मंतव्यों में कामयाब  हैं 
अब सरकारें सिद्धांत या कर्तव्य निर्वहन से नहीं चलती  वे चलती है वाकपटुता और इवेंट मैनेजमेंट से   लोकप्रियता बरक़रार रहती हैं एंग्रीयंगमैन टाइप की इमेज से  चमकीली पन्नी में लिपटी उस सूखी रोटी के मौखिक आशवासन से जो पराई चुपड़ी देख कर न ललचाने की नसीहत के साथ मिलती है   सरकारें अवांतर प्रसंगों की पटरी पर दौड़ती हैं  वीडियो कांफ्रेंसिंग ,मीडिया ब्रीफिंग और विपुल प्रचार के बलबूते पर गतिमान दिखती हैं 
एक समय था जब हमारे खिलाडियों के पास मारक भावना (किलर स्टिंग) नहीं थी  इसलिए वे प्रतिभावान होने के बावजूद हारते रहते थे  फिर हुआ यह कि वे इतने मारक बनते  गए कि अन्यत्र कारणों से  जीतने या हारने लगे   अब राजनीति भी खेल है इसमें सब कुछ चलता है  यह उस खटारा टैम्पू की तरह  है ,जो चलता कम धुआं अधिक छोड़ता है  सरकार उस उत्सवी घोड़े की तरह है जो चलती कम ठुमकती अधिक है  यह उस चौकीदार जैसा है जो जागते रहो की गुहार लगा कर खुद चादर तान के सो जाता है  
दिल्ली में इस समय दो तरह की सरकारें हैं  एक दूसरे की धुर विरोधी सरकार  एक कहती है हम चुने हुए हैं जी  दूसरा कहता है कि  होंगे  पर हम घुटे हुए हैं   दोनों को दिल्ली और मुल्क से प्यार है  दोनों के पास भक्तवृंद है  भक्तमंडली के पास तरह तरह के ढोल मजीरे हैं 
जहाँ दो बर्तन होंगे वहां खटकेंगे ही  सो वो खनक रहे हैं  पूरे सुर ताल और लय के साथ बज रहे हैं  अपने अपने होने की पुरजोर मुनादी करते हुए 
दिल्ली एक सरकारें दो, ‘बहोतनाइंसाफी है ! अब पसीने में तरबतर भीगी बिल्ली सी दिल्ली भला करे तो क्या करे ? उसकी जान सांसत में है 





मंगलवार, 26 मई 2015

चलो अच्छा हुआ जो गर्मी आ गई



लो आ गई गर्मीजबकि लग यह रहा था कि इस बार यह आएगी नहीं सर्दी के मौसम के बाद डायरेक्ट बरसात आ जायेगी  गर्मी नेताई आश्वासनों की तरह आते -आते अपना आगमन स्थगित कर देगी  हालाँकि इस बात पर कुछेक घनघोर आशावादियों के सिवा किसी को यकीन नहीं थाबर्फ की चुस्की बेचने वाले से लेकर एसी बनाने वाली कम्पनी के सीईओ तक और कूलर की पैडिंग घास बेचने वाले का धंधा करने वाले से लेकर आइसक्रीम पार्लर के सेल्समैन तक  सबको पता था कि गर्मी यदि यहाँ नहीं आएगी तो जायेगी कहाँ उसे तो हर हाल में आना ही होगा
मौसम कोई भी हो कभी स्थिर नहीं रहताएक आता तो दूसरा जाता हैठीक वैसे ही जैसे लोकतंत्र में एक सरकार आती तो दूसरी जाती हैकभी कभार एक सरकार चली जाती है पर उसका स्थान लेने में दूसरी सरकार ठिठक जाती हैऐसे में हॉर्स ट्रेडिंग वालों की बन आती है  छंटे हुए प्रतिनिधि तब घोड़ों में तब्दील हो जाते हैंउनमें से कुछ अरबी घोड़े बन कर मुहँमांगे दाम मिल  जाने  का ख्वाब देखते हैंकुछ खच्चर बन पाते हैं पर बिक वे भी जाते हैं ठीकठाक दाम पर राजनीति घोड़े खच्चर और गधे में भेद नहीं करती जो सहजता से मिले उसे स्वीकार करती जाती है
गर्मी के मौसम को लेकर सबकी अपनी -अपनी चिंता रहती है वह आती  तो बच्चों के लिए छुट्टियाँ लाती है  समर कैम्प के नाम पर शहरी बच्चों के लिए गुलगपाड़ा करने के मुरादों भरे दिन आते हैं  हॉबी क्लास के नाम पर कुकरी से लेकर स्केटिंग और स्विमिंग के ठंडे जल के ताल में मटरगश्ती करने की उम्मीद जगती है बैरोमीटर की निरंतर चढती सुईं को निहारते हुए मौसम विज्ञानी बनने की चाह उत्पन्न होती है  च ....च ...च ....भोत  गर्मी है’, करते हुए घर के भीतर दुबके रहने की वजह मिलती है
गर्मी अपने आगमन को बार -बार टालती जा रही थी तो सारे मुल्क को लग रहा था कि वे प्लेटफार्म पर बैठे हैं और पब्लिक एड्रेस सिस्टम से बार -बार कहा जा रहा है कि गर्मी की  ट्रेन अपने निर्धारित समय से विलम्ब से चल रही हैवह कब आएगी इसका कुछ पता नहीं  आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद हैखेदज्ञापित करने वाला उसे  प्रकट करने के तुरंत बाद  अन्य जानकारी ऐसे देने लगता है जैसे यह जो हो रहा है ,ऐसा तो होता ही है  जनता बरसों से ऐसी सूचनाएँ सुनती आई है वह परेशान होने के बावजूद विचलित नहीं होती  वह किसी से कोई सवाल नहीं करतीवह कोई प्रश्न इसलिए भी नहीं उठाती क्योंकि आकशवाणी करने का अधिकार और मैकेनिज्म रखने वाले लोगों के पास केवल मुहँ होता है ,श्रवण के लिए कान नहीं होते जनता और सरकार के बीच संवाद का रास्ता अक्सर वनवे होता है  यहाँ संवाद नहीं एकालाप चलता है
गर्मी चूँकि आ चुकी है इसलिए राजनीति के वातानुकूलित गलियारों में गहमागहमी बढ़ गई हैंनेताओं के लिए यही वक्त है कि वह बिजली ,पानी ,बीमारी, मच्छर, गरीबी ,कुपोषण आदि के मुद्दे उठायेंवे इन मसलों पर गहन विमर्श में उलझे हैं उनके सामने कम समय में अधिक काम करने की विकट चुनौती है  उन्हें ऐसे तमाम मामलो का समाधान तलाशने के लिए दुनिया भर में स्टडी टूर पर जाना है जाने से पहले ऐसे यात्रा कार्यक्रमों को सरकार से स्वीकृत कराना है
गर्मी आ गई चलो अच्छा हुआ वरना  चुस्की ,एसी ,कूलर की घास, समर कैम्प ,स्विमिंग पूलों और गर्मीवादी चिंतकों का क्या होता  


सोमवार, 18 मई 2015

सेल्फी है तो कमाल है


सेल्फी का जमाना है। दुनिया भर में सेल्फी के चर्चे हैं।यह हर जगह है ।जिराफ की तरह गर्दन को उचका कर ,मुहँ को बंदर की तरह बिचका कर और सोशल मीडिया पर उसे चिपका कर कोई भी रातोरात अपनी छवि और स्टेट्स को वायरल कर सकता है।पेट्रोल या डीजल के दाम बढ़ें तो आप उसे अपने वाहन में भरवाते हुए सेल्फी खींच कर सबको बता सकते हैं कि दाम बढ़ें या घटें ,इससे हमें क्या ? वी मीन बिजनस।
सेल्फी की संभावना हर जगह मौजूद रहती है।जब उसे खींचने का मौका नहीं मिलता तब वह हमारी स्मृति में रहती है ।अत्यंत सेल्फ्लैस तरीके से रहती है ।अपना हाथ जगन्नाथ टाइप के मोड में रहती है ।इसके लिए किसी अन्य की न तो चाहत होती है ,न  दरकार ।यह देह और आत्मा को एकाकार कर देती है ।यह हर जरूरी गैर -जरूरी पल को संजो लेती है ।इतिहास के बनने की प्रक्रिया की सूक्ष्म डिटेल्स तक को हाथ से फिसलने नहीं देती।डिजिटल इमेज तुरत फुरत वैश्विक लोकप्रियता दिला  जाती है ।राजनय के असल मुद्दे सेल्फी के सामने टिक नहीं पाते ।विदेशी मामलों के प्रकाण्ड पंडित  इस सेल्फी डिप्लोमेसी के सामने हतप्रभ रह जाते हैं।
सेल्फी खींचना एक कला है।इसकी टाइमिंग को साधना आसान नहीं। गिरगिट की गति से भी अधिक तीव्र स्पीड से रंग बदलने में कोई माहिर ही यह काम कर  पाता है। इसमें कर्ता और कारक एक ही होता है इसलिए गडबडी होने की स्थिति में दूसरे के सिर पर गलती का ठीकरा फोड़ने की गुंजाइश नहीं होती । इसके  नतीजे  फौरन प्रकट होते  है। इस तरह सेल्फी बड़ी सेल्फिश होती है।
सेल्फी से सेल्फ निखरता है। इसकी बड़ी अहमियत है।जेनरेटर में सेल्फ लगा हो तो वह बटन दबते ही बिना हत्थी  घुमाए स्टार्ट हो जाता है ।सेल्फ ठीक काम करता हो  तो नो पार्किंग में खड़ा थ्री व्हीलर ट्रेफिक पुलिस को देखते ही  नदारद हो जाता  है। बाइक में यदि सेल्फ लगा हो तो वह सवारी की किक  खाए बिना दौड़ने लगती है। जिसने सेल्फ साध लिया समझो उसने सबको साध लिया। जिसने सेल्फी खींचने के हुनर को ठीक से जान लिया उसने मानो आभासी दुनिया के दिलों को फतह कर लिया। और जो आभासी दुनिया का एकबार सिरमौर बन गया उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
सेल्फी के जरिये बड़े – बड़े काम पलक झपकते हो जाया करते हैं।सेल्फी है तो वाकई कमाल है।
निर्मल गुप्त ,208 ,छीपी टैंक ,मेरठ 250001 मोबाइल : 8171522922













गुरुवार, 14 मई 2015

झपकी क्यों खटकी ?


एक आधुनिक तानाशाह राजा ने अपने दरबारी मंत्री को इसलिए तोप से उड़वा दिया क्योंकि वह दिन के समय अपने कार्यालय में बैठा हुआ खुल्लमखुल्ला झपकी ले रहा था । पता लगा है कि वह सिर्फ इतना ही नहीं कर रहा था वरन सपने देखने की कोशिश भी कर रहा था । नींद को तो फिर भी बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन सपने देखना तो कतई कदाचार है । कदाचार से भी बढ़ कर शतप्रतिशत राजद्रोह । ऐसे में उसे वही दण्ड मिला जिसका वह पात्र था । राजे महाराजे इनाम इकराम पद ओहदे और सजा देने में कभी कृपणता नहीं बरतते । इतिहास इस प्रकार की ‘दरियादिली’ को सदियों तक याद रखता है । वह शाबाशी आदि को तो दर्ज करने में भले ही चूक जाये पर सख्त किस्म की न्यायप्रियता को स्वर्णिम अक्षरों में संजो कर रखता है ।
यह बात सबको ठीक से पता रहनी चाहिए कि गहरी नींद में बांसुरी बजाने और सपने देखने का काम राजसी होता है और इसका विशेषाधिकार सिर्फ राजा टाइप लोगों के पास सुरक्षित रहता है । प्रत्येक राजा के भीतर कमोबेश नीरो नाम का निष्णात बांसुरीवादक रहता है । जनता का सम्यक कर्तव्य है कि वे अपने राजा के स्वप्न साकार करने के लिए चौबीस पहर जागती रहे । अपने उद्यम में व्यस्त रहें । निरंतर ‘जागते रहो जागते रहो’ का उद्घोष सजगता से करे कि राजा की नींद में खलल न पड़े ।
राजहित में राजा को भरपूर नींद का मिलना जरूरी है । जनहित में जनता का हरदम जागते रहना अपरिहार्य है । सपने देखने और दिखाने का काम राजा का है । जनता का काम है इन बड़े बड़े सपनों की गाथा सुनकर पुरजोर तालियाँ पीटते हुए जय हो जय जय हो का नारा लगाना । जिसका जो काम है वह करे । अपना काम पूरे मनोयोग से करे । दिलोजान से करे । निजी सपने देखने का दुस्साहस न करे । तमाम तानाशाहों को पता है कि अतीत में अनेक झंझटो का एपिसेंटर सपनों में रहा है । इन सपनों की चिंगारी से ही सीले हुए पलीतों से विद्रोह की दावानल भड़की है । मासूम से लगने वाले सपने सही वक्त आने पर घातक विस्फोटक बन जाते हैं ।
सपने धीरे धीरे बेहद खतरनाक रूप अख्तियार करते जा रहे हैं । अब ये आँख और नींद की परिधि से बाहर आते जा रहे हैं । अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि सपने वही साकार होते हैं जो किसी नींद के मोहताज नहीं होते । यानि अब सपने बिना सोये भी देखे जाने लगे हैं । इसे केवल प्रेमिका प्रेमी जैसे लिजलिजे इश्क के होलटाइमर ही नहीं देखते वरन अन्य जुझारू कडियल युवा भी बाकायदा देखने लगे हैं । सपने देखना अब केवल कारोबार नहीं रहा ,राजनीतिक और सामाजिक सरोकार भी बन गया है । सपने असाध्य संक्रामक रोग बनते जा रहे हैं । किसी सुपरबग के जरिये फैलने वाली वैश्विक बीमारी ।
आजकल तमाम तामझाम और सात पहरों के बीच सोते हुए राजा कच्ची नींद के बीच इस आशंका से हडबड़ा कर जाग जाते हैं कि प्रजा ने बिना पलक झपकाए सपने देखने की तकनीक विकसित कर ली है ।
राजा ने झपकी लेने वाले अपने दरबारी को तोप के गोले से मार तो गिराया लेकिन इतना सब होने पर भी उसके भीतर के सपनों का समूल नाश हुआ ,इसकी कोई कन्फर्म खबर उसके पास नहीं है ।
सपने इतनी आसानी से कहाँ मरा करते हैं । तोप तलवार बंदूक बारूद के वार दर वार होने के बावजूद ये किसी न किसी प्रकार जिन्दा बने रहते हैं ।

जेल ,बेल ,खेल और डकवर्ड लुईस मैथड


उस दिन वही खबर आई जो आनी थी।सेलिब्रिटीज की निजी जिन्दगी में अनचाहे ट्विस्ट अमूमन नहीं आते।सब कुछ बहुत करीने से होता है।पूरे जोर -शोर से होता है ।तयशुदा कार्यक्रम के तहत होता है ।स्पीड के साथ होता है ।जेल होती है तो हाथों -हाथ बेल हो जाती है ।सब कुछ इतनी जल्दी होता है कि जितनी तेजी से  फुटपाथियों को हिट करके कोई   रेस भी नहीं लगा पाये । इतनी  तुरत -फुरत तो  पिक्चर का टिकट ब्लैक मार्केट में भी  नहीं मिले ।इतनी शीघ्रता से चाटवाला गोलगप्पे  में  सुराख़ कर जलजीरा भी नहीं उड़ेल पाये  । इस फुर्ती से  अनुभवी शोहदा खूबसूरत लडकी को देखने के बाद बायीं आँख का कोना ठीक से नहीं दबा पाये  । इतनी कम अवधि में आम आदमी को अदालत परिसर में  बनी फोटोस्टेट की दुकान का अतापता भी नहीं मिले  ।
सेलिब्रिटीज के लिए सब कुछ आननफानन में हो जाता है । उनकी सुपरमैन की रुपहली छवि के चलते न्याय क्या कोई भी प्रक्रिया एकदम तरल हो जाती है ।चारों ओर से एक ही आवाज आती है –भाई टेंशन नहीं लेने का ।हम लोग हैं न !
सेलिब्रिटी के साथ ज़माना रहता है वह अपने से जुड़े हर मामले को सेलिब्रेशन की गुंजाइश  ढूंढ लेते हैं  ।वह अदालत जाता है तो टीवी चैनलों पर अदालत -अदालत का खेल होने लगता है ।सजा सुनाई जाती है तो जेल -जेल की धुक्क धुक्क  करती रेल लोगों के मानस पटल पर दौड़ने लगती है ।बेल का सवाल उठते ही जिज्ञासुजन कान फड़फड़ाने लगते हैं । जनता दिल थाम कर न्याय की हर चाल को परखने  लगती है ।नेपथ्य में हारर फिल्म का साउंड ट्रेक बज उठता है ।
ऊपरी अदालत में सुनवाई शुरू होती है ।वहां से छन्न छन्न अपडेट झडबेरी के बेर की तरह टीवी स्क्रीन पर टपकने लगते हैं । लोगों का कलेजा मुहं को आने लगता है ।लगता है जैसे जीत के लिए टीम को आखिरी बाल पर पांच रन बनाने हों और बैट्समैन क्रीज पर हो ।अब आएगा मज़ा ,उत्सवधर्मी दर्शक अपने दांतों के नेलकटर से नाखून कुतरते हुए भावातिरेक में चिल्लाते हैं ।
मिल गयी .....मिल गयी ।चैनल का एंकर चिल्लाता है ।इत्ती जल्दी .....पूरा मुल्क सवाल उठाता है ।सब डकवर्ड लुईस की कारस्तानी है ,अंतत: कोई मेधावी क्रिकेट प्रेमी बताता है लगता है कि डकवर्ड लुईस मैथड से बेल भी मिलने लगी है । आईपीएल के ज़माने में कुछ भी हो सकता है

आओ चलो भूकम्प मनाएं


भूकम्प फिर आया ।ठीक उसी तरह से आया जैसे अनचाहा मेहमान बस अड्डे पर जाकर उपयुक्त बस न मिल पाने की आड़ में  लौट आता है ।गया हुआ मेहमान जब फिर -फिर लौटता है तो बड़ा खलता है । सबको पता है कि मेहमान और मछली तीसरे दिन गंधाने लगते हैं । पर क्या किया जाये जब मेहमान को झेलना मजबूरी बन जाये तो कहना पड़ता है कि चलो भूकम्प को इवेंट बनायें ।सब मिल कर भूकम्प - भूकम्प मनायें ।बेबसी जब दर्शनीय बना जाती है तो उसके जरिये हमारी सदाशयता का पुनर्पाठ होता है । मजबूरी में फंसा आदमी बड़ा काव्यमय और दार्शनिक हो जाता है ।
भूकम्प आया तो हमारे भीतर की दयालुता को जाग  उठी  ।अब अवसर है कि  घर के कबाड़ को इमदाद के रूप में बांटा जाये । पराई आपदाओं को जमकर सेलिब्रेट किया जाये ।अवसर मिले तो तबाही के मंजर को ढंग से महसूस किया जाये ।भयग्रस्त लोगों के क्लोजअप खींच कर सोशल मीडिया की दीवार पर ‘फीलिंग सेड’ के हैश के साथ चिपकाया जाये ।आवाम को पता लगना चाहिए की बंदा किस कदर संवेदनशील है कि गमगीन होने का सलीका जानता है ।
अबकी बार भूकम्प समर वेकेशन में आया है ।निठल्ले स्कूली  बच्चों के लिए मुफ्त में मिलने वाले मनरोंजन की तरह ।वे भरी दोपहरी में कॉलोनी के पार्कों में हंसी ठट्ठा करने के लिए निकल आये हैं ।एक दूसरे को पकड़ते झगड़ते और छुपते - छुपाते मौके का लुत्फ़ ले रहे हैं ।हाईटैक टीनएजर धड़ाधड़ सेल्फी खींच कर  अपने सरोकारों को लगातार शेयर करते जा  रहे हैं ।हाउ स्वीट ...हाय डैशिंग ...औसम ....सुपरब ....जैसे जुमले मोबाइल दर मोबाइल कुलांचे भर रहे हैं ।आंटियां अंकलों की सलामती कन्फर्म करने के बाद व्हाट्स एप पर आगामी किटी पार्टी के थीम पर गम्भीर मंत्रणा में उलझ गई हैं ।कुछ रिटायर्ड अंकल तो अपनी वाली को निहारते हुए बार -बार कह रहे है कि ये सरकार निकम्मी है ।उनका बस चले तो वे सरकार को खड़े खड़े ही बर्खास्त करने का हुक्म जारी कर दें ।
भूकम्प आया तो बतकही के जरिये वक्तकटी के उस्तादों की बन आई है । तीस चालीस  सेकिंड के झटके ने उन्हें कई दिनों तक विमर्श के लिए कच्चा माल उपलब्ध करा  दिया है ।वे इससे हफ़्तों अपनी योग्यता के हिसाब से रोटियां बनायेंगे  और भूकम्पीय क्षति  के अपुष्ट अनुमानों  के अचार के साथ चटखारे लेकर दूसरों के साथ मिल बाँट कर खायेंगे ।
भूकम्प कुछ लोगों के लिए बड़े लटके झटके मुहैया करा जाता है ।

बुधवार, 13 मई 2015

ऊपरवाले का अम्मा दिवस


अम्मा को ऊपर वाले ने आज़ाद कर दिया । अब यह  कन्फर्म हो गया   कि वह  बड़ा कृपालु है ।उसके यहाँ देर तो है पर अंधेर बिलकुल नहीं । उसके यहाँ न्याय का लट्टू फ्यूज उड़ जाने के बाद भी रसूख के इन्वर्टर  से जगमगाता रहता है ।जब किसी  भक्त पर आपदा आती  है तब वह द्रुतगति कार्यवाही करता है ।उसके काम करने का अंदाज़  कुछ ऐसा है जैसे किसी दफ्तर के बाबू की नथुनों  में अच्छे समय की आहट पाकर  दफ्तरों की संबंधित फ़ाइल हिरन की तरह एक मेज से दूसरी मेज पर  लांघती कुलांचे भरने लगती है ।
ऊपर वाले की माया अपरम्पार है ।उसकी मर्जी पर कोई सवालिया निशान नहीं लगा सकता ।वह तुरत फुरत दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है ।जिसका एक मतलब यह भी है कि उसके पास अत्याधुनिक मिल्क सेपरेटर होता है जो  दूध में से क्रीम पलक झपकते निकाल लेता है और पर दूध फिर भी बरकरार  रहता है ।उसे पता है कि इहलोक में जिसको जो मिलता है उसके प्रारब्ध के अनुसार मिलता है ।क्रीमी लेयर वालों को  उत्तम क्वालिटी की क्रीम मिलती है । अम्मा पर ऊपरवाले ने रहम करके नीचे वालों पर महती अनुकम्पा की ।वह जेल जातीं तो उनके गम में न जाने कितने भावावेश के चलते  असमय काल कवलित हो जाते ।तय सीमा से अधिक लोग ऊपर पहुंचते तो बैकुंठ में लम्बी लम्बी कतरे लग जातीं ।चहुँ ओर अव्यवस्था हो जाती । वहां आपाधापी के चलते समर स्पेशल ट्रेन जैसा नजारा हो जाता ।स्लीपर क्लास वाले  एसी फर्स्ट पर काबिज हो जाते ।एसी थर्ड वाले सेकिंड में और बेचारे एसी सेकिंड वाले ट्रेन में लगी शिकायत पेटिका में अपनी कम्पलेंट डाल कर अपने मुक्कदर को कोसते जनरल कम्पार्टमेंट के फर्श पर यहाँ वहां टिक पाते ।लोगों के मन में नाहक धारणा बनती कि ऊपर और नीचे में तो उन्नीस –बीस का भी फर्क नहीं है ।ऐसे में उसे अम्मा को बाइज्जत बरी करना ही था वरना उसकी अपनी छवि के दागदार हो जाने का खतरा था ।
कायदे से उसे अम्मा को मदर्स –डे के दिन रिहाई देनी थी ।पर नीचे रहने वालों ने माँ को लेकर सोशल मीडिया समेत पूरे मुल्क में  इतना हुड़दंग मचा रखा था  कि समस्त देवियाँ इतनी भावुक हो उठीं कि उन्होंने उस दिन न तो खुद कोई काम किया न अपने देवताओं को कुछ करने का मौका दिया ।वे आकाश में बैठीं निरंतर नीचे धरती पर झांकती रही और अपना स्तुतिगान सुनती रहीं ।उनके हाथ तब तक आशीर्वाद की मुद्रा में बने रहे जब तक ऐसा करना असम्भव नहीं हो गया ।देवताओं को पता था कि आज धरती पर इस कदर मदर्स डे मनाया जा रहा कि श्रवण कुमार के कंधे पर रखी बेंगी डगमगाने लगी है ।वे उसकी बेंगी का संतुलन बनाने में लगे रहे और नीचे वालों का पूरा दिन बीत गया ।
तब ऊपर वाले ने सोचा कि चलो अम्मा को सजा के खतरे से निजात देकर नीचे वालों का सहृदयता का सन्देश दिया जाये ।मदर्स –डे बीतने के बाद अम्मा दिवस  को जरा हट कर मना लिया जाये ।


शुक्रवार, 8 मई 2015

एकदम मौलिक शोक सन्देश

वह शोकाकुल थे l भूकम्प से हुई जान और माल की हानि का जायजा लेने के लिए वहाँ पहुंचे थे l उन्होंने वहां घूम घूम कर बरबादी को नजदीक से देखा l प्राकृतिक आपदा के खिलाफ उन्हें कुछ लिखना था l शोक पुस्तिका में लिखने के लिए उन्होंने अपनी अक्ल पर जोर दिया l बात बनती हुई दिखाई नहीं दी तो उन्होंने और जोर लगाया l खूब जोर लगाने से अकसर बड़े- बड़े  काम निबट जाते हैं l पर इस जोर लगाने का असर यह हुआ कि शोक सन्देश वाली इबारत तो नदारद रही अलबत्ता कहीं दूर से भैंस के रम्भाने की आवाज़ आती जरूर सुनाई पड़ी l वह तुरंत समझ गए कि भैंस अपने  को अक्ल के मामले अधिक स्ट्रीट स्मार्ट समझ रही  है  l
वह समझ में नहीं पा रहे थे  कि शोक की इस घड़ी में क्या लिखें l उन्होंने अपने मोबाइल में ‘क्लू’ मिलने की आस में झाँका तो उन्हें  स्क्रीन पर योयो हनीसिंह मटक मटक बड़ी द्रुत गति से गा रहे थे l वह गा रहे थे ,यह तो ठीक ,पर क्या गा रहे थे यह  समझ नहीं आया  l
-ओय ,हनी सिंह ठीक से गा l तेरी बात समझ में आये तो कुछ लिखूं l उन्होंने कहा l
पर बात बनी नहीं l योयो यूँही गाता रहा l उनकी समझ में आया कि ये योयो इसीलिए पॉपुलर  है क्योंकि इसकी बात किसी को समझ में नहीं आती l उन्होंने तुरंत यह बात गांठ बांधी कि जो करो ऐसा करो जो सबकी समझ से परे हो l
उन्होंने तय किया कि वह अपनी देशव्यापी ख्याति के लिए जरा हट कर सोचेंगे और काम करेंगे l वह शोक पुस्तिका के पास से हटने लगे तो उनको किसी ने याद दिलाया –सर इस ‘कितबवा’ में कुछ लिखिए न l
यह सुनते ही वह विचार निमग्न हो गए l सबसे पहले उन्होंने शोक के बारे सोचा तो उन्हें बस इतना याद आया कि इसका मतलब साॅरो होता है l यह  भी पता लगा कि ऐसे मौके पर हाथ बांध कर और मुहँ लटका कर खड़ा रहना पड़ता है l पर लिखना क्या होता है ,इसकी कोई भनक उन्हें नहीं लगी l
वह झक्क मार कर फिर अपने मोबाइल की शरण में गए l वहां उन्हें गूगल सर्च के जरिये विभिन्न विषयों पर लिखे निबन्ध मिले l उन्होंने उन निबन्धों में से मनचाहे वाक्य लिए उन्हें अपने सम्यक ज्ञान से मोडिफाई किया ताकि शोक सन्देश की  मौलिकता बनी रहे l और कोई उसे पढ़ने के बाद यह न कह पाए कि इसे अमुक टेक्स्ट से टीपा गया है l उन्होंने अपनी आँख मोबाइल के स्क्रीन पर गड़ा दी और अपनी समस्त मेधा उपयुक्त वाक्यों के संशोधन ,संवर्धन और परिमार्जन में लगा दी l
वह मग्न होकर वाक्य दर वाक्य मोबाइल में से चुन चुन कर लिखते रहे और अपने लिखे पर रीझते रहे l उन्होंने कुछ इस तरह लिखा l नेपाल एक महान देश है l यहाँ की जनता महान है और सरकार महान है l पहले यहाँ एक राजा था ,वह भी महान था l जब उसकी महानता में कुछ कमी आई तो जनता ने उसे हटा दिया l नेपाल में अनेक पर्व मनाये जाते हैं l हर उत्सव पूरे उत्साह से मनाया जाता है l यहाँ कभी कभी अर्थक्वेक टाइप की की बातें होती रहती हैं l यहाँ के बहादुर इसका मुकाबला बड़ी बहादुरी से करते हैं l इस बार अर्थ क्वेक दिन में आया इसलिए अधिक बरबादी हुई l रात में आता तो ये बहादुर जागते -जागते रहो कह कर सबको जगा देते और अर्थक्वेक किसी का कुछ न बिगाड़ पाता l ईश्वर से प्रार्थना है कि नेपाल को अर्थक्वेक से बचाए और यदि कभी आये तो सिर्फ रात में आये l
यह शोकसंदेश पढ़ने के बाद यह तो मानना होगा कि उन्होंने जो लिखा सौ फीसदी मौलिक लिखा l





एक्टर को मिली सजा के आजू –बाजू

जेल जाना किसी के बड़ा कलाकार होने की सही शिनाख्त होती है ।जेल जाता हुआ एक्टर उदारमना हो जाता है । उसकी पलकें बार बार भीग जाती हैं ।फैसला आते ही उसकी दबंगई काफूर हो जाती है ।वह बडबडाता है कि इस मुकदमे से हमारे भीतर इतने छेद हो गए  कि समझ में नहीं  आ रहा कि हम किस छेद से जेल को निहारें और किससे वकील और जज  की ओर जमानत के लिए उम्मीद से देखें  ।इस कन्फ्यूजन के समय में वह महामानव और आम आदमी के बीच लगातार आवाजाही करता हुआ बड़ा दयनीय लगता  है । उसकी सिक्स पैक वाली देह यकायक ढीली पड़ जाती है ।
नामवर एक्टर सिर्फ आदमी भर नहीं होता वह अरबों रुपये का चलता फिरता व्यवसाय होता है ।रुपहले परदे पर उसकी हर अदा और डायलॉग डिलीवरी पर जनता झूम -झूम जाती है ।वह नाचता है तो करोड़ों लोगों के पाँव थिरकने लगते हैं ।।वह विलेन को पीटता है तो जनता को लगता है कि देश -दुनिया की समस्त बुराईयों की ढंग से धुलाई हो रही है ।वह कोल्डड्रिंक की बोतल का ढक्कन भर खोलता है तो अपनी -अपनी ऊब में सिमटे हुए लोगों को जिंदगी में नयनाभिराम तूफ़ान के आने की प्रतीति होती है ।
फैसला आ गया है ।मसखरे नेपथ्य में सदियों पुराना  बाल -गीत पूरे सुर ताल और लय के साथ गा रहे हैं –पोशम्पा भाई पोशम्पा ,सौ रूपये की घड़ी चुराई ,अब तो जेल में जाना पड़ेगा ।वे झूठ -झूठ गा रहे हैं ।झूठमूठ गाते हुए सुनाई दे रहे हैं । मसखरी कर रहे हैं । एक्टर जी ने  किसी की घड़ी -वडी नहीं चुराई ,बस जल्दबाजी के चलते कुछ लोगों की जिंदगी की घड़ी बंद कर दी थी ।वह भी ऐसे लोगों कि जिनके जीने और मरने में कोई खास फर्क नहीं होता ।वास्तव में उन्होंने किसी को नहीं मारा लोग खुद –ब –खुद उनकी मोटरकार के पहियों के नीचे कुचलने के लिए आ गए थे ताकि उनका परलोक सुधर जाये। गरीब और बेसहारा लोग इस तरह से भी अपनी बैकुंठ यात्रा का रास्ता पा लेते हैं।  
आदलती फैसले ने उनके मन को  खौफ  से  भर दिया है । वह सोच रहे हैं कि  यह कैसा डर है ,जिसके आगे -पीछे ,ऊपर -नीचे केवल अकेलापन  और निराशा ही दिख रही है ।तभी उनके एक शुभचिंतक ने याद दिलाया –भाई टेंशन नहीं लेने का ।जेल के आगे बेल तो होती ही है ,उसके सिवा सजा के आजूबाजू पैरोल भी होती है ,फरलो होती है ,फ्रेंच लीव होती है ।
एक दबंग एक्टर को सजा का ऐलान होने का फ्यूचर टेंस हमेशा जेल जाना  नहीं होता ! उसे आननफानन में अंतरिम जमानत भी मिल जाती है , जितनी देर में आम आदमी कोर्ट परिसर में फोटोस्टेट की दुकान नहीं ढूँढ पाता  । मल्टीप्लेक्स में सिनेमा टिकट पाने के लिए सही खिड़की नहीं मिल पाती ।  क्रासिंग की ट्रेफिक  लाईट हरी और लाल होते रहने के बावजूद वाहन एक ही जगह जमे रहते हैं । जब तक गोलगप्पे वाला हज़ार के नोट के छुट्टे ठीक से लौटा नहीं पाता ।
कानून के हाथ लम्बे होते हैं लेकिन इतने निर्दयी नहीं होते कि एक्टर की रियल स्टोरी में रील स्टोरी वाले ट्विस्ट की आवाजाही को रोक ले। इनकी निजी जिंदगी के अंत अनिवार्य रूप से सुखांत होते हैं।