सोमवार, 31 अगस्त 2015

शोमैन,शोकेस और शोबाजी उर्फ शोशेबाज़ी


राजनीति अब पहले जैसी स्याह सफ़ेद नहीं रह गई है। वह मल्टीकलर हो चली है। पुराने ज़माने की भाषा में बोले तो  ईस्टमैन कलर। अब इसके शोकेस में बहुरंगी सामान और सरोकार रखे दिखते हैं। पहले शोमैन सिर्फ रुपहले पर्दे की दुनिया तक सीमित थे। अब वे हर जगह हैं । राजनीति में हर दल के पास अमूमन अपना शोमैन है। जिनके पास नहीं है वे उसे शिद्दत से खोजने में लगे हैं। अब चुनाव जीतने के लिए नारों ,उलाहनों वादों ,पोस्टर, विज्ञापन ,ज्ञापन और मैनिफैस्टो से काम नहीं चलता। बिना सम्यक शोबाजी  के सारे प्रयास अकारथ हो जाते हैं। वर्तमान में सारा जोर इस बात को लेकर होता है कि किसकी पोशाक की ‘चमकार’ दूसरे के पहनावे से अधिक है। बाहरी  आवरण से अंदरूनी गुणवत्ता की शिनाख्त होती है।
जब भी किसी राज्य में चुनाव नज़दीक आते  हैं तमाम  प्रकार के शोशेबाज़ ब्रांड  डिटरेजेंट बाज़ार में आ जाते हैं। शो बिजनस में राजनीतिक मंतव्यों से अधिक कीमियागरी महत्वपूर्ण होती है। सोना वही ,जिसमें चमक हो। सिर्फ हो ही नहीं वरन सबको दिखे भी। होने के मुकाबले दिखना बड़ी चीज होती है। शुद्धता या खरेपन को कोई नहीं पूछता। जो चमकता है वह खोटा होने के बावजूद मार्केट में चल जाता है। कांतिहीन हुआ तो ऐसे ही पड़ा रह जाता है।
बाज़ार ने पूरी सोच को बदल डाला है। वह हर जगह है। उसके होने को कोई नकार नहीं सकता। वह प्यार में भले न हो पर  उसके इज़हार में बाकायदा  है। उसकी मौजूदगी भले ही आभासी हो लेकिन उसकी पूरी आनबान शान वास्तविक है। गर्म रेत पर फुलाए गए मक्के के दानों को तब तक कोई नहीं पूछता जब तक वो किसी मॉल के स्टॉल पर पॉपकॉर्न बनकर कांच के मर्तबान में फुदकते हुए न दिखायी दे । दिखावे से सब चलता है। दिखने से हर चीज बिक जाती है। शोकेस की पारदर्शिता का अपना तिलस्म होता है। बाज़ार ऐसी ही टोटकों से चलता है। सिर्फ चलता ही  नहीं सरपट दौड़ने  लगता है।
राजनीति के घाट पर अब ‘संतन’ की भीड़ यूँही  नहीं जुटती। उसे जुटाने के लिए बड़े जतन करने पड़ते है।उसके लिए पूरी व्यवस्था और जुगाड़ करना पड़ता है। तम्बू तानने पड़ते है।पंडाल सजाने पड़ते हैं। अपने मंतव्यों की सलीके से नुमाईश करके गोलबंद होना पड़ता है। जनता को बरगलाना पड़ता है। सब्ज बाग दिखाने होते हैं। मरुस्थल में बागवानी की बात करनी पडती है। सभा स्थल पर उपस्थित श्रोताओं को ‘जैकारे’ के लिए बार -बार उकसाना पड़ता है। मीडिया को साधना होता है कि वे सही वक्त पर अपने कैमरे वाइड एंगिल पर पैन करें ताकि जनसैलाब उमड़ता हुआ दिखाई दे। भीड़ जुटे या न जुटे पर उसकी मौजूदगी  ठीक से दिखे जरूर। प्रेस रिलीज के जरिये दस बीस लाख लोगों की उपस्थिति का आंकड़ा देना होता है। व्यापक जनसमर्थन का दावा करना होता है। हर काम पूरी मुस्तैदी से करना पड़ता है।
राजनीति में शोमैन ,शोकेस और शोबाजी की वही भूमिका है जैसे छोले भटूरे को लज़ीज़ बनाने के लिए सिरके वाली प्याज ,हरी चटनी और गर्म मसाले की।






स्मार्टनेस की कतार और मेरा शहर


देर रात खबर मिली कि मेरा शहर स्मार्ट सिटी बनने की कतार में है। जब तक कोई कतार में होता है तब तक बड़ी उम्मीद रहती है। कुछ होने जाने के मुकाबले आस का पास मिलते रहना जरूरी होता है जैसे हॉकी के  सेंटरफारवर्ड को गोल के मुहाने पर गेंद का मिल जाना। तब दो ही बात हो सकती हैं या तो खिलाड़ी ड्रिबल करके गेंद गोलपोस्ट के भीतर सरका दे या ऐसा करने में  चूक जाये। बिना कुछ करे धरे इधर उधर मटरगश्ती करने के मुकाबले ये दोनों स्थितियां बेहतर हैं। पर ऐसा हमेशा होता नहीं। जिंदगी अप्रत्याशित ढंग से घटी घटनाओं के जरिये चलती है। स्मार्टनेस बामुश्किल तमाम नसीब होती है।
सुबह होते ही पता लगा कि मेरा शहर स्मार्टनेस मिलने की होड़ से बाहर हो गया है, वह कतार में था पर अब नहीं है उसे धकिया कर हाशिए पर डाल दिया गया है अभी भी मेरे शहर के पास मौका है कि वह खुद को स्मार्ट बनने के लिए पात्र साबित करे और पुन: कतार में आ खड़ा हो स्ट्रीट समार्ट लोग अच्छी तरह जानते हैं कि कतार के चक्रव्यूह को कैसे भेदा जा सकता है वह इस भेदन की कला को अरसे से जानते हैं वे जन्मने अभिमन्यु के मानस पुत्र होते हैं एक वक्त वो भी था जब नई रिलीज होने वाली फिल्म का फर्स्ट -डे फर्स्ट -शो देखने के लिए शहर भर के जाबांज टिकट खिड़की पर जुटते थे भयंकर धक्कामुक्की के बीच कोई विरला अपने  के साथियों कि  हाथेली के जरिये जमीन से ऊपर उठता और आकाशमार्ग से उड़ता हुआ अपने हाथ को  छ: इंच बाई छ: इंच की खिड़की के भीतर पहुंचा देता असल स्मार्टनेस तो यह हुआ करती थी
स्मार्टनैस की अनेक किस्में होती हैं कुछ पैदाइशी स्मार्ट होते हैं ,देशज भाषा में कहें तो घुन्ने कुछ सिर्फ स्मार्ट होते हैं ,दिखने में एकदम चाकचौबंद ,वैसे चौपट एक किस्म वो भी है ,जिसे लोग ओवरस्मार्ट कहते-समझते हैं घर से पिता के बटुए से रुपये उड़ा लाए और साथियों को यह कर दावत दे दी कि लॉटरी लगी है मोहल्ले की लड़की किसी के साथ भाग गई और पूरे इलाके में अपने लड़की से अतरंग संबंध को खुलासा करते घूमते रहे और शक में धरे गए शक की सुईं हमेशा ओवर स्मार्ट लोगों पर ही जाकर टिकती हैलेकिन सबसे अधिक शातिर और उपयोगी होते हैं स्ट्रीट स्मार्ट लोग,जो शराब भी पीते हैं तो स्ट्रा लगाकर प्रणय निवेदन करते हैं तो सिर पर हैलमेट ओढ़ कर सडक चलती लड़की को फब्ती कसते हैं तो पैर की हवाई चप्पल हाथों में पहन कर ताकि जरूरत पड़ने पर सरपट दौड़ लगा कर उड़ान भर सके
अधिकारिक सूचना यह है कि मेरा शहर स्मार्ट सिटी बनने की कतार से बाहर खड़ा सोच रहा है कि उसे किस किस्म का स्मार्ट बनना है उद्देश्य क्लीयर हो तो वह कतार में लगने की कवायद फिर शुरू करे उसके पास हर हालात से निबटने के लिए पुख्ता योजना है सोर्स, सिफारिश, तिकड़म और पूजा अनुष्ठान वाले लोग उसे पुन: कतार में लाने के लिए जी जान लगाने को तैयार हैं

वैसे तो मेरा शहर पहले से ही खासा स्मार्ट है यहाँ की सडकें टूटी फूटी हैं ,जिस पर स्मार्ट लोग ही वाहन दौड़ा पाते हैं कानून व्यवस्था लचर है पर गुंडों से आँख बचाकर निकल जाने की तकनीक यहाँ के बाशिंदे जानते हैं बिजली अक्सर गुल रहती है तो बहते पसीने और मच्छरों से खुद को बचा कर नींद का लुत्फ़ लेना मेरा शहर सीख चुका है इसके बावजूद स्मार्टनेस का कोई तमगा मिलता है तो मिल जाए, इसमें हर्ज ही  क्या है

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आरक्षण का हार्दिक मुद्दा


मुल्क में वैसे तो किसी चीज की कमी नहीं है। सब कुछ तो है यहाँ। भरपूर आबादी है। इसका निरंतर होता विस्तार है। भांति भांति के पर्व हैं। उन्हें मनाने की विधि है। उत्सव हैं। उत्सवप्रियता है। ढोल नगाड़े है। कोलाहल है। बात बात पर लोगों के लगने वाले जमघट हैं। सड़क पर लगने वाले जाम हैं। जाम खुलने के बाद मिलने वाला आराम है। चादर हैं। उसे ओढ़ कर चैन से सोने वाले निद्रामग्न लोग  है। भ्रष्टाचार है। उसके निदान के लिए तमाम प्रकार के स्पाईकैम जैसे उपकरण और महकमे हैं। बदलती हुई ऋतुएं हैं। मानसून है। गहरे काले बादल हैं। उनके जलभरे होने का अनुमान है। बारिश की उम्मीद है। रातें हैं तरह तरह की। सुबह है अनेक प्रकार की। मुर्गे हैं रंगबिरंगे। बांग देने का समय तय नहीं। और तो और हमारे पास हार्दिक महत्वकांक्षा भी है। जातिगत आरक्षण के लिए बुलंद आवाज़ हैं। राजनीति के आसमान में उभरता हुआ नवोदित सितारा है।
जातिगत आरक्षण एक लुभावना शब्द है। इसके झंडे तले पूरी बिरादरी एकजुट हो जाती है। इसके जरिये और कुछ हो या न हो पर बड़ी आस जगती है। बेरोजगारों को लगता है कि यदि आरक्षण आया तो समझो कि सरकारी नौकरी का अपोइंटमेंट लैटर आया। सरकारी जॉब मिला तो मानो मुलायम गद्दे और गाव तकिये से सुसज्जित तख्तेताउस मिला। बिना कुछ करे धरे मासिक पगार मिलने का अवसर उपलब्ध हुआ। फाइलों पर पसर कर लोगों के ऊपर रौब ग़ालिब करने का मौका मिला। जम कर आराम फरमाने के लिए सीएल ,ईएल ,एमएल,फरलो टाइप के अवकाश अधिकारिक रूप में मिले। मेज के नीचे से प्रकट होने वाली ऊपर की आमदनी होने की संभावना बलवती हुई।
अब तक पूरा मुल्क जान गया है कि बढ़िया नौकरियां अमूमन लियाकत से नहीं मिलती। वे या तो सिफारिश से मिलती हैं या रिश्वत के बलबूते या फिर आरक्षण की महती कृपा से। और आरक्षण ऐसे ही नहीं मिल जाता उसके लिए दमदार पैरोकार की जरूरत पड़ती है। धरने, प्रदर्शन, जुलूस और जलसे आयोजित किये बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। रोटी का निवाला उसी मुहँ में जाता है जो उसे पूरे शोरोगुल के साथ देर तक बाये रहता है। आरक्षण उसी को प्राप्त होता है जो उसे दिए जाने की पुरजोर डिमांड करता है। रेलें रोकता है। जगह जगह आगजनी करवाता है। सामन्य जनजीवन ठप्प करवा देता है। यह कोई रेलवे बर्थ का रिजर्वेशन नहीं कि जो साइबर कैफे वाले के कम्प्यूटर पर उगलियाँ दौडाते ही हो जाए।  बैठे ठाले हो जाये। सामाजिक रूप से पिछडापन तभी महिमामंडित होता जब उसके साथ राजनीतिक समीकरण आ जुड़ते हैं। वरना पिछड़े हुए लोग हमेशा पिछड़ते चले जाते हैं।
मुल्क के हर राज्य के पास न्यूनतम एक न एक निजी आइकन है। ठीक वैसे ही जैसे धरती पर जगमगाने की ख्वाईश रखने वाले लोगों के पास पर्सनल स्वप्निल आसमान होता है। आकाश में जगह पाने का मंसूबा बांधने के लिए अंधभक्तों के मजबूत कंधों की दरकार होती है। मानना होगा कि एक नए नवेले आरक्षण पुरुष का अभ्युदय हो चुका है। उसके लिए यह मुरादों भरे दिन हैं।
आरक्षण पुरुष जी के महती प्रयासों से किसी को रिजर्वेशन मिले या नहीं लेकिन यह तय है कि उनके लिए राजनीतिक भविष्य की सीट बुक हो ली है। इस अनिश्चय से भरी दुनिया में रिजर्व सीट पर पसरने की बात ही कुछ और होती है। और जब तक ऐसा होना संभव न हो तब तक सीट पर रुमाल ,अंगोछा, हवाई चप्पल, मोबाइल ,खैनी की डिब्बी टाइप कुछ रख कर उसे बाकायदा घेरने की जुगत की  जा सकती है। घेराबंदी से रिजर्वेशन खुद ब खुद प्रकट हो जाता है।
आरक्षण एक ऐसा सपना है जिसे इस मुल्क की अधिसंख्य आबादी अपने जीते जी कम से कम एक बार तो जरूर देखती ही है।





बुधवार, 26 अगस्त 2015

बाजार का गिरना


बाज़ार के धडाम से गिर जाने की खबर है।  यह बात अर्धसत्य है। वह किसी मासूम आदमी की तरह काई पर फिसल कर नहीं गिरा।  वह बड़ी तामझम के साथ सलीके से गिरा है।  उसके  गिरने में नियति का कोई लेना देना नहीं ।  वह पूर्वनियोजित तरीके से धराशायी हुआ है।  वह मुहँ के बल नही गिरा।  उसने अपने चेहरे का क्षत-विक्षत होने से बचा लिया है।  या कह सकते हैं कि उसको  इसी तरह से गिरने के लिए प्रोग्राम किया गया था।  यह एकदम प्रायोजकीय आयोजन है।  प्रयोजकीय बोले तो स्पांसर्ड।  उसी तरह से विज्ञापनीय जैसे कोल्डड्रिंक से गला तर होते ही भय के आगे जीत का प्रकट हो जाना।
बाजार को पता था कि एक दिन उसे गिरना है।  उसे अपनी भूमिका का अच्छे से पता है।  एक एक डायलाग कंठस्थ है।  जो गिरता है ,उठता भी वही है टाइप का।  जब घटाटोप अँधेरा होता है तब उजाले की उम्मीद सबसे प्रबल होती है।  जो कभी चारों खाने चित नहीं हुआ उसे क्या पता कि हारने का दर्द क्या होता है।  बिना पराजय के विजय का कोई मतलब नहीं होता।  बाजार का अजब  दर्शन शास्त्र है और गजब जिंदा बने रहने  का अर्थशास्त्र।  इसका अपना प्रभामंडल होता है और धूलधसरित होकर उबरने की रणनीति।
बाजार कहता है कि आओ और मुझमें समाहित हो जाओ।  भरी जेब लेकर आओ और उसे मुझ पर न्योछावर कर रीती  जेब चले जाओ।  खूब शॉपिंग करो और यहाँ शोकेस में सजी हर अंडबंड चीज को खरीद कर ले जाओ।  खाओ पियो और जश्न मनाओ।  उत्सवप्रिय बनो और मौज मस्ती में डूबो उतराओ।  जेब यदि रिक्त हो  जाए तो फ़िक्र न करो ,खूब कर्ज लो मगन होकर जीवन का जश्न मनाओ।  तमाम महाकवियों और शायरों ने कर्ज की उपदेयता के बारे कसीदे यूहीं नहीं काढ रखे हैं  हैं।  कर्ज लेने से कर्ज देने वाले का भला होता है।  जो इसे दिलवाता है, वह भी अपनी क्षमता भर इसमें अपनी चोंच डुबो लेता है।  कर्ज के घी से बने व्यजंनों से सेहत सुधरती है और इससे क्रय की मय से सुरूर और कालजयी शायरी प्रकट होती है।  कर्ज की नकदी से बाज़ार पनपता है।  इसके प्रताप से दलाल पनपते हैं।  यह अलग बात है कि कर्ज की वजह से बाजार झटका खा जाता है।  गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में ---वाली स्प्रिट हो तो कहना पड़ता है कि यह गिरना भी कोई गिरना है लल्लू।  
बाज़ार अल्लूओं -लल्लुओं के चिंतानिमग्न होने से नहीं चलता।  वह अपनी गति से चलता है।  बिलकुल घड़ी की सुईं की तरह, गोलाकार।  निरंतर उठता  और उतराता  हुआ।  पेंडुलम की तरह इधर से उधर डोलता हुआ। यहाँ वही चलता है जो बिकता है।  यहाँ पालतू रचनात्मकता चलती है फालतू लोगों को यह बुहार कर यह तुरंत हाशिए पर धरे डस्टबिन में डाल देता है।  अपने गिर पड़ने की स्थिति में यह किसी को स्यापा करने की इजाज़त नहीं देता।  रुदालियों के लिए इसके यहाँ कोई स्पेस नहीं है।  बाज़ार हर हाल में बिंदास रहता है।
बाज़ार में अप्रत्याशित ढंग से कुछ घटित नहीं होता।  दलाल स्ट्रीट पूर्वानुमान के तहत चलती है।  निवेशक की पूँजी डूबती है तो ब्रोकरों की झोली तब भी भरती है।  बाज़ार की एक जेब के नीचे अनेक जेबें होती हैं।  एक जेब में सुराख़ होता है तो पैसा टनटनाता हुआ दूसरी जेब में जा गिरता है।  किसी का कुछ खोता है तभी दूसरा कुछ हांसिल करता है।  सही मायनों में यह गिरना और उठना एकदम नाटकीय होता है।
देखते रहें ,गिरा हुआ बाज़ार कर्ज में मिली उम्मीद के जरिये देखते ही देखते फिर उठ कर खड़ा हो जायेगा।  


मंगलवार, 25 अगस्त 2015

डान और उम्मीद एक जिंदा लफ्ज़ हैं !
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डान सो रहा है। यह खबर कन्फर्म है। पर यह अधिकारिक नहीं है। क्योंकि उसकी नींद उसके  होने का दस्तावेजी सबूत नहीं है। वह अनिद्रा का रोगी नहीं। इस बात को उसकी बीवी ने फोन पर बताया है। वह डान की ब्याहता पत्नी है। डान की पत्नी अकसर अपने खाबिंद के मामले में बोदे झूठ नहीं बोला करती। वे मिडिलचियों की पत्नियों जैसे डाउनमार्केट झूठ नहीं बोलतीं। उनके पास करने लायक इससे बड़े अनेक काम होते हैं।  मसलन बुर्ज खलीफा के नए खरीदे गए फ्लैटों की चाभियों के गुच्छे को कमर में लटकाने के लिए रत्नजडित कमरबंद खरीदने का। आईएसआई चीफ जैसे लोगों की बीवियों के  बर्थडे और मैरिज एनिवर्सरी की तारीखें याद रख कर उन्हें दिली मुबारकबाद देने और बेशकीमती गिफ्ट भिजवाने का। डान के दुनिया भर में फैले ‘कनेक्शनों’ का मोबाइल नम्बर याद रखने का ताकि उन्हें जब धमकाने की जरूरत पड़े तो वह उसे अपने पति को बता सके।
डान को जब विभिन्न मुल्कों की पुलिस खोजती है तब वह चैन से नींद का लुत्फ़ लेता है। जब गोपीचंद जासूस उसे तलाशते हुए खुद सो जाते हैं, तब वह जागता है। स्नान ध्यान के बाद अपनी बीवी के हाथ के बने मिस्से आटे के परांठे खाता है और हींग जीरे के छोंक वाली छाछ ठाठ से पीता है। वह खा पीकर डकार भी लेता है।  गुप्तचरों ने उसके डकार की ऑडियों रिकार्डिंग की है। डकार किसी के होने का पुख्ता सबूत और भलाचंगा होने की पहचान होती है। इससे उसके कहीं न कहीं होने की पुष्टि होती है।  
यह बात एकदम पक्की है कि डान है। वह जिंदा है। उसके जीता जागता होने का सबूत है कि वह बाकायदा नाश्ता करता है। जानकार सूत्रों की मानें तो वह चौके में टाट की बोरी पर आलथी पालथी मारकर बैठता है। नाश्ता कर लेने के बाद वह वहीँ प्लेट में गिलास के पानी से हाथ धोता है और बीवी के पल्लू से हाथ पोंछता है। वह बड़ा घरेलू किस्म का आदमी है।  दुनिया के लिए वह भले डान हो लेकिन अपनी पत्नी के लिये तो निरा निरीह पति है।  
डान वाकई डान है।  उसे पकड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। दो मुल्कों के बीच वह उच्चस्तरीय वार्ता शुरू और खत्म करने का कारक और सबसे बड़ी उम्मीद है।
उम्मीद और डान ,दो मुल्कों के राजनय के लिए जिंदा लफ्ज़ हैं ।





सोमवार, 24 अगस्त 2015

अस्सी पार की प्याज


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प्याज अस्सी पर पहुँच गई , हर तरफ चुप्पी है। बनारस के अस्सी घाट पर भरीपूरी फिल्म बन गई, चहुँ ओर सन्नाटा है। वक्त घड़ियों के भीतर टिक टिक करता चल रहा है ,फिर भी ख़ामोशी है। जिन्हें पैकेज मिलना तय था ,मिल गया। कहीं कोई हर्षोल्लास नहीं है। सोना गिर कर फिर चढ़ गया ,कोई सुगबुगाहट नहीं। सातवें पे कमीशन की प्रस्तावित रिपोर्ट के बारे में डरावनी खबरें आ रही हैं ,बाबू लोग इसके बावजूद अपने भाग्य या सरकार को नहीं कोस रहे है।  आबूधाबी में मंदिर बनेगा ,लोगों ने इस खबर को एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया है। पेट्रोल और डीजल के दाम कभी घटते हैं तो कभी बढ़ते हैं। कहीं कोई हाहाकार या जयकार नहीं। दो कान होने का महत्व अब समझ आया कि वे  होते ही इसलिए है कि बात को एक से सुनकर दूसरे से अनसुना कर दिया जाये।
संसद का सत्रावसान हो चुका है।  सब अपने अपने काम पर लौट गए हैं।  नेता चीख पुकार से थके गले के साथ सुस्ता रहे हैं।  वे अपने चुनाव क्षेत्र में खुद के गले में मालाएं डलवा रहे हैं।  फूलों के सुगन्धित स्पर्श से रोग जल्द मिटेगा ,ऐसा उनका अनुमान है।  राजनीति से उपजे रोग अनुमानी इलाज से ठीक होते हैं।  उनसठ लोग साठ करोड़ देकर जेल प्रवास से बच गए।  धन की महिमा अपरम्पार है।  पैसा हाथ का मैल नहीं ,हैंडवाश है। इसके जरिये रक्तरंजित हाथ बड़ी आसानी से धुल जाते हैं। धुल कर ताजा खुली डेटाल की बोतल की तरह महकते हैं।
प्याज़ के साथ इसकी गंध का संकट जुड़ा है। इससे सब्जी जायकेदार बनती है। कच्ची प्याज कुतरने का अलग आनंद है। इस कतरते हुए आँखें पानी से लबालब हो जाती हैं। इतनी पनीली हो जाती हैं कि बच्चे चाहें तो इसमें कागज की नाव तैरा सकते हैं।  इसकी कीमत बढ़ती है तो लोगों को इसकी याद सताती है।  इसे डाउनमार्केट सब्जी समझने वाले इसकी ओर आकर्षित होते हैं।  उनके लिए यह स्टेट्स सिम्बल बन जाती है।  वे इसकी गंध को अपने मनपसंद डियो से बेहतर आंकने लगते हैं।
प्याज़ के प्रति आसक्ति रखने वाले भी उसे खा पाने में असमर्थ रह जाने के बावजूद शांत हैं।  उन्हें पता है कि सावन का महीना चल रहा है।  इस माह में प्याज तामसिक होती है।  इसका सेवन निषेध है। लेकिन जो इसके महंगा होने पर इसे खाना अफोर्ड कर पा रहे हैं उनके लिए यह फ़कत अगस्त का महीना है। ये लोग वो हैं जिनका कहना और मानना है कि संडे हो या मंडे खूब खाओ अंडे। ये बिंदास लोग हैं।  खाने पीने के मामले में कतई बेतकल्लुफ।  इनकी जिंदगी में सावन सिर्फ कभी कभार गाने बजाने में आता है।  ये उदारमना लोग सब्जी वाले से सब्जी की कीमत पर विमर्श नहीं करते।  मोलभाव नहीं करते। इनके लिए तो सब्जी वाले द्वारा मुफ्त का धनिया, पुदीना, हरीमिर्च और  सलाम का मिलना ही काफी है। इज्जत बड़ी चीज है।  
प्याज़ प्यार तो नहीं है फिर भी प्यार से कुछ कम भी नहीं। प्यार के मामले में ख़ामोशी की अपनी डिप्लोमेसी होती है।  इसी तरह प्याज को लेकर अधिक शोरगुल न करने की परिपाटी है। प्यार और प्याज हमारी कामनाओं के गोपनीय ठिकाने हैं। इनको लेकर सार्वजनिक प्रदर्शन अशालीन माना जाता है। 
प्याज अस्सी पार की हुई तो होने दो। कल हो सकता है सैंकड़े को छू ले। अस्सी पार की प्याज़ हो या प्यार ,होती है कमाल की चीज। 
इसे भक्तिभाव से जीवन के अन्य उतार चढ़ावों की तरह अपलक निखारते रहो।


    

बुधवार, 19 अगस्त 2015

बहस : सेक्युलर मुल्क का राजधर्म


समय तेजी से बदल रहा है। परस्पर संवाद का अंदाज़ और टोन बदल रही है। राजनीति के सर्वोच्च पटल पर इतना शोरोगुल रहा कि जनता को पूछना पड़ा रहा कि हंगामा है क्यूँ बरपा ? ये लोग ‘जनहित’ में एक दूसरे से इतना उलझ क्यों रहे हैं ? लोग यही समझे पा रहे हैं कि वे निजी कारणों से संघर्षरत हैं। वैसे भी राजनीति और इसके तहत होने वाली डिबेट में निजता जैसा कुछ बचा नहीं है। सब गडमड हो गया है। सरकार बहादुर इतनी तेजी में हैं कि जो सवाल यहाँ मुल्क के भीतर उठते हैं ,वह उसका जवाब यूएई में देते हैं। वह बहस में नहीं उलझते सिर्फ अपनी बात कहते हैं। उनके एकालाप पर तालियाँ पिटती हैं। प्रलाप से लोकप्रियता बढ़ती है।
डिबेट में कटुता होती है। विद्वता के अतिरेक का दर्शन होता है। सामने वाले को नीचा दिखाने का उपक्रम होता है। जिसके भीतर जो होता है , वही परोसता है। तर्क- दर -तर्क रखते हुए मुहँ लाल सुर्ख हो जाते हैं। गला सूखने लगता है। फिर भी शास्त्रर्थी पानी  की घूँट तक नहीं पीते हैं। उन्हें आशंका रहती है  कि उनके ऐसा करने से बहस की नैतिकता का भंग होना न मान लिया जाये। लोग कहेंगे कि वह तर्क वितर्क की बजाय पानी पी- पी कर कोस रहा है। आजकल की बिल्लियाँ  शिकार पकड़ पाने में असफल होने पर खिसिया कर खम्बा नहीं नोचती। वे मुहँ नोचने के लिए सही मौके तलाशती हैं।
यह खिसियाने का समय नहीं है। यह एकालापी  प्रपंच काल है। आरोप का जवाब प्रत्यारोप है। कद्दावर दिखने के लिए बौनों की सोहबत अपरिहार्य है। इतिहास के काले पन्नों का विज्ञापन वक्त की जरूरत  है। मांग के हिसाब से इतिहास में मनभावन रंग भरे जाते हैं। सास बहु वाली पारंपरिक भाषा का जमकर राजनीतिक इस्तेमाल होता है। साप्ताहिक पैंठ वाली किचकिच शैली सर्वमान्य है। मोलभाव का अर्थशास्त्र है। रैपर की महत्ता है। दिखावे से बाजार भाव तय होते हैं।
मानसून सत्र का सत्रावसान हुआ। उसे तो होना ही था। बिना कोई सार्थक कार्यकलाप  हुए मुल्क की हर समस्या धुल गई। बरसों से ऐसा ही होता आया है। एक बूँद धरती पर गिरे बिना सदन का गरिमामय तन तरबतर हो  गया। बहस में सबने एक दूसरे  की कमियों खामियों का खूब बखान किया। ऐसा करते हुए पुरखों को भी सलीके से याद कर लिया गया।
कोई कह रहा है कि यह चुल्लूभर पानी में डूब मरने जैसा प्रसंग है। उन्हें नहीं पता कि राजनीति में इस तरह जीना मरना नहीं होता। हर काम के लिए बहस का प्रावधान है। बहस  से पहले हल्लाबोल होना जरूरी है। बहस के बीच टोकाटाकी करने की इजाज़त है। चुल्लू भर पानी से कुछ नहीं होता ,डूबने उतराने के लिए गहरे पानी की दरकार होती है।
हमेशा से लोकतंत्र इसी तरह से पुष्पित और पल्लवित होता रहा  है। पर्याप्त खाद पानी मिले बिना यह पनपता रहता है। वह अमरबेल है। देश का क्या ,वह तो सदा रामभरोसे चलता आया  है।
एक सेक्युलर मुल्क का यही राजधर्म है ,जिस पर कोई बहस नहीं।











मंगलवार, 18 अगस्त 2015

बैन लगा कर हटाना बड़ी बात है !

मैगी से प्रतिबंध  हटा। वह इसलिए हटा क्योंकि लगा था। इस बीच पॉर्न पर पाबंदी लगी थी। वह अंततः नहीं रही। जो जन्म लेता है वो एक दिन मरता भी है। यह आध्यात्मिक सच है। वैज्ञानिक सच इस सत्य के विपरीत है। विज्ञान के हिसाब से द्रव्य अविनाशी है। वह न पैदा होता है न मिटता है ,बस रूपांतरित होता है। लगभग यही बात भगवत गीता में कही गई है। लेकिन गीता साइंस की किताब नहीं है। वह धार्मिक पुस्तक है। भगवान कृष्ण विज्ञानी नहीं ईश्वर थे। उनके नाम कोई डिग्री या रिसर्च पेपर नहीं था। वह कभी किसी लेबोट्री में नहीं गए। उनके पास अपनी बातों का पक्ष प्रबल करने के लिए ग्रंथों की कोई सूची नहीं थी। तब अहम सवाल यह है कि क्या बैन या पाबंदी को द्रव्य की श्रेणी में रखा जाये या नहीं ? वैसे तो ऐसे तमाम प्रकरणों में किसी न किसी प्रकार द्रव्य की उपस्थिति रहती है। बैन के लगने और उठने से ही सरकारी महकमों और अदालतों का मार्केट फ्रेंडली चेहरा सामने आता है। यह अलग बात है कि महकमों की ओट में कहीं न कहीं अकसर सरकार और उसके सरोकार होते हैं।
जब तक मैगी थी तो जिंदगी कितनी आसान और पुरसुकून थी। बस दो मिनट में ममत्व और मैगी प्रकट हो जाती थी। पलक झपकते ही दुलार की मसालेदार रेसिपी खाने की मेज पर सज जाती थी। जब तक पॉर्न की सहज उपलब्धता थी तब तक जीवन रसमय था। उस पर पाबंदी आयद हुई तो पता चला कि जीवन किस कदर दुरूह और तमाम तरह की आशंकाओं से भरा हुआ है। लोगों के मन में तरह तरह के ख्याल आने लगे कि यह सरकार तो बड़ी दुष्ट है। आज कम्प्युटर तक घुसपैठ कर रही है कल वह बैडरूम में क्लोज सर्किट कैमरा या पीपिंग टॉम की मौजूदगी बाध्यकारी कर देगी। सरकार ने आननफानन में अपना आदेश वापस लिया उसे अन्तोत्ग्त्वा ऐसा करना ही था। सही समय पर करना था। मौका ताड़ कर करना था। राजनीति में टाइमिंग का पृथक शास्त्र है।  इस यूटर्न से बात साफ़ हुई कि ये सरकार भले ही निकम्मी हो ,पर है उदारमना। इससे सरकार की साख का चाहे जो हुआ हो पर उसकी छवि तो उज्ज्वल हुई। इमेज बड़ी चीज है। यह बड़ी मुश्किल से बनती, संवरती और निखरती है। साख बिगड़ जाये तो येनकेनप्रकारेण सुधर जाती है। छवि बनाने में मिलियन डॉलर का निवेश करना पड़ता है।
अब पॉर्न भी है। मैगी के पुनरागमन की संभावना है। सदन में सत्तापक्ष का बहुमत है। विपक्ष के फेफड़ों में चीखने की ताकत और भुजाओं में बल है। उनके नेता के हाथ में हिंदी में बोलने लायक रोमन में लिखे टेक्स्ट की पर्ची हैं। नाक की मुडेर पर बैठा सरकार के प्रति गुस्सा है और जमी जमाई दुकान उखड़ जाने का क्षोभ है। दोनों का डैडली कम्बिनेशन है। जीएसटी के लिए लघु सत्र आहूत करने की सुगबुगाहट है। एक दूसरे की पोलखोल की देशव्यापी तैयारी है। मंगल पर सुंदर महिला की मौजूदगी की नासा ब्रांड खबर है। चाँद के पार जीवन के चिन्ह मिलने की अस्फुट जानकारी है। सुदूर मुल्कों में रह रहे देशभक्तों के जखीरे मिलने की खुशखबरी  है। इनके जरिये देशप्रेम की भावना की स्वदेशी मार्केट में कमी की भरपाई होने की उम्मीद है।
फिलवक्त सरकार अवांतर प्रसंगों में बिजी है। जब उसे मौका मिलेगा तो वह प्याज के सेवन पर पाबंदी लगाने जैसा कुछ करेगी। जब इसके खिलाफ आवाज उठेगी तो वह  आंशिक बैन हटा देगी। प्याज को कच्चा खाने पर पाबंदी लगी रहेगी।
इस बीच प्याज के दाम घटेंगे तो लोगों को  कहना पड़ेगा कि अजी कहो कुछ भी। यह सरकार तो वाकई बहुत यूजर फ्रेंडली है।    

शनिवार, 8 अगस्त 2015

उसके न होने के बावजूद उसका होना

  
वह कासिम है। वह कासिम नहीं है। वह नावेद है। वह नावेद नहीं है। वह उधमपुर में बीएसएफ पर हमला करता पकड़ा गया। वह हमला नहीं कर रहा था,घायल जवानों की मरहम पट्टी करने गया था। वह पाकिस्तानी है। वह पाकिस्तानी नहीं है क्योंकि वह वहां के डाटाबेस में नहीं है। तब वह कौन है ? कहाँ से आया है? इतने किन्तु परन्तु के बाद भी  कुछ भी न होने के बावजूद ,वह है। वह मुस्कुरा रहा है। मुस्कराता हुआ एकदम लाफिंग बुद्धा लग रहा है। हँसता हुआ बता रहा है कि उसका एक मुल्क है, भाई बहन हैं ,अम्मी अब्बू हैं। उनके पास फोन है। उनके फोन का नम्बर है। फोन पर कोई कह रहा है  कि वह उसका  बदनसीब बाप है। पर वह पकड़ा गया आतंकी किसी का  बेटा नहीं है। किसी बाप के होने भर से जरूरी नहीं कि कोई उसका बेटा भी हो जाये। मुल्क के कुछ कोनों मे सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि धरपकड़ की कहानी में झोल है।
वह चाल- ढाल, शक्ल- सूरत और तौर तरीके से कसाब जैसा लगता है। अब वह आने वाले दिनों में उसकी तरह का ही लगता रहेगा। हो सकता है कि वह एक दिन जेल में बिरियानी खाने की जिद करे। उसकी फरमाइश पूरी भले ही न हो लेकिन इस बात पर बहस जरूर होगी कि हर आतंकी बिरियानी ही क्यों खाता है। क्या बिरियानी में आतंक का केसर घुला होता है ? वह  हरेभरे सलाद की बात क्यों नहीं करता ? क्या आतंकवाद का कोई पृथक कलर कोड नहीं होता ? यह कैसा आतंकवाद है ? जिसका अपना कोई रंग नहीं है।
वह पकड़ लिया गया है तो जाहिर है कि उससे पूछताछ भी जरूर होगी। सघन जाँच पड़ताल होगी। वह जांच एजेन्सियों को तरह -तरह की कहानी सुनायेगा। जिनमें से कुछ किस्से मनगढंत होंगे। अकसर हार्डकोर क्रिमनल शानदार किस्सागो होते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि प्रत्येक बढ़िया किस्सागो दुर्दांत अपराधी भी हो। इससे कुछ साबित नहीं होता।  इससे मीडिया वालों को टीआरपी बढ़ाने के लिए कच्चा माल मिलता है।  आंतकियों के कथोकथन  बड़े चाव से सुने पढ़े जाते हैं।
कसाब  जब तक जिंदा रहा तब तक हमारी भावनाओं के झुनझुने को बजाता रहा। वह देशभक्ति की बॉलकनी में टंगा विंड चाइम था। हवा के हल्के से झोंके से हौले हौले टनटनाता हुआ। 
कसाब नावेद का रूप धर टंगने के लिए फिर आ गया है।



बुधवार, 5 अगस्त 2015

डिजिटल इंडिया में रामखिलावन

digital India


वक्त के थपेड़ों ने रामखिलावन की आत्ममुग्धता पर सवालिया निशान लटका दिया है । ब्यूटी सैलून वाले ने साफ़ कह दिया है कि उसके पास ऐसी कोई फेसक्रीम, ब्लीच, लोशन या तकनीक नहीं कि वह उसे पहले जैसा नूर लौटा सके । कॉस्मेटिक सर्जन ने भी यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए हैं कि वह उसे दर्शनीय बनाने के लिए चाहे जितनी कोशिश कर ले, पर उससे कुछ हो पायेगा इसमें संदेह है । इस फैशनपरस्त युग में वह इस मामले में कोई गारंटी देने का जोखिम नहीं उठा सकता । उसे समझ आ रहा है कि उम्र के हाट से होकर गुजरा समय लौट कर नहीं आता । अतीत की कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं होती ।
रामखिलावन धीरे धीरे अवसाद की गहरी खाई में उतरता जा रहा था । दर्पण उसे डराने लगा है । उसे यकीन नहीं हो रहा कि तेजी से बदलते जीवन मूल्यों के बीच दर्पण ने सच को झुठलाना अभी तक नहीं सीखा है । वह सच बोलने की युगों पुरानी डाउनमार्केट जिद पर क्यों अड़ा है ? तिस पर तुर्रा यह कि लड़कियां तो लड़कियां उनकी मम्मियों ने भी उसे अंकल कहना शुरू कर दिया है । ये जो अंकल का विशेषण है, उसने केशव से लेकर अमीर खुसरो तक सभी को अपने ज़माने में बहुत बेचैन किया है । अब परेशान होने की बारी रामखिलावन की है ।
रामखिलावन उन्नत तकनीक के इस समय में हार मानने को तैयार नहीं । उसने अपने लैपटॉप में गूगल सर्च पर जाकर ओल्डएज रेमिडी, मैडिसिन, योग ,आयुर्वद ,एंटीआक्सीडेंट, एंटीअंकल डिवाइस जैसे कीवर्ड डाल कर गहन रिसर्च की ।और जब नतीजे आये तो वह चौंक गया ।तमाम ऑनलाइन शापिंग पोर्टल पर बुढ़ापे को जड़मूल से गायब करने की तकनीक व उपकरण उसे मिले । वह समझ गया कि डिजिटल दुनिया में सब कुछ मिलता है जिंदादिली के साथ मरने और कलात्मक तजवीज़ से लेकर शताब्दियों तक जवान बने रहने के उपचार तक ।यहाँ पर सपने घटी दरों से लेकर बेहद ऊँची कीमत पर कैश ऑन डिलीवरी के आधार पर बिकने के लिए रखे हैं ।यहाँ क्रांति करने के नुस्खे भी बिकते हैं और पूंजीवादी अवधारणा के हितार्थ कुटिल मुखौटे भी ।जिसकी जेब या क्रेडिट कार्ड में जितना हो दम, वह उसके अनुरूप अपने लिए झूठे आश्वासन या असरदार रसायन या फिर दिल को बहलाने वाले ग़ालिब के ख्याल , जो चाहे खरीद ले । अनेक उपकरण व रसायन ऐसे भी बिक्री के लिए हैं जिनके साथ ‘बाय वन गेट वन’ की तर्ज पर संताबंता टाइप चुटकलों की किताब मुफ्त मिलती है ।
रामखिलावन जब गूगल पर धूनी रमाने के बाद बाहर आया तो वह परम ज्ञान को प्राप्त हो चुका था ।अब प्रज्ञावान बनना है तो गूगल की शरण में जाना ही होता है ।समस्त परमसंत वहाँ समय–असमय आवाजाही करते रहते हैं ।उसने जान लिया था कि काल चक्र की गति को यदि अपने अनुकूल बनाना है तो डिजिटली डिजटल हो जाओ ।सच को परास्त करना है तो फरेब का ऐसा डिजिटल मेकअप करो कि वह सत्य से अधिक कांतिमय हो जाये । कम्प्यूटर के फोटोशॉप पर जाकर अपने लिए मनोवांछित प्रभामंडल बना लो ।बेहतरीन डायलाग डिलीवरी की माइक्रोचिप अपने भीतर प्रत्यारोपित करवा कर रातों रात लाखों करोड़ों दिलों की धड़कन बन जाओ ।
रामखिलावन ने तय किया है कि वह अब पहले वाला निरा निरीह अंकल बन कर नहीं रहेगा । वह अपनी आगे की जिंदगी को डिजिटल होने के गौरव के साथ ‘वाई -फाई ‘ होकर जियेगा । डिजिटल इंडिया में वह खूब फबेगा।

पॉर्न में हटा बैन अब चैन ही चैन



यह उस समय की बात है जब पॉर्न के अधिकांश कोनों पर सरकारी ताला लटक चुका था और मैं हस्बेमामूल उसकी मास्टर की को ढूँढता हुआ हरिभजन सुन रहा था। उदास आदमी बाय डिफॉल्ट भक्तिभाव से भर जाता है।  तभी कमरे के दरवाजे पर हलचल हुई।  मैंने आननफानन में गूगल सर्च से पॉर्न के  कीवर्ड को दिव्यात्मा से रिप्लेस किया।  यह करने के बाद मैं संभल पाता कि हाथों में किसी चैनल का माइक संभाले अपने कुछ गुर्गों के साथ एक सुदर्शना धम्म से कमरे में नमूदार हुई।  उसने अपने हाथ में माइक इस अंदाज़ में थामा था जैसे पुराने ज़माने की खामोश कॉमेडी फिल्मों का ओवरसाईज जूता पहनने वाला विदूषक डॉक्टर का रोल करता हुआ बड़े आकार की सिरिंज लेकर आता और मरीज़ संभल पाए इससे पूर्व ही उसके नितम्ब को भेद देता था।  तब मरीज़ कराहता था और थियेटर में बैठे दर्शक हो हो करके हँसते थे।  उन दिनों पराई तकलीफें प्रहसन बनती थीं।  आज तक परपीड़ा में आनंद का भाव कालजयी है।
सुदर्शना एकदम मेरे इतने समीप आ गई कि उसकी साँसों की गमक से पता लगने लगा कि बंदी ने ब्रेकफास्ट में किसी लहसुनिया व्यंजन का सेवन किया है और काम पर पहुँचने की जल्दबाजी में टूथपेस्ट का इस्तेमाल करना भूल गई है।  मैं उसे मुख और दांतों के हाइजीन पर ताकीद करता कि उसने अपने माइक को मेरे मुख से अड़ाते हुए पूछा : आपके कम्प्यूटर में पॉर्न है ?
-नहीं ,इसमें वायरस है।  मैंने कहा।
-कौन सा वाला ? उसने अगला सवाल दागा।
-वही, जिसके जरिये बिना कुछ करे धरे हमारी निजता वायरल हो जाती है।
-मतलब?
-मतलब यह कि वायरस सरकार से अधिक पावरफुल है। सरकार अडल्ट कंटेंट पर पाबंदी लगाती है ,वह उसे इस तरह हमारे नाम से फैला देता है कि उसे हमारे सिवा हर कोई देख पाता है।
-सीधा जवाब दो।  तुम्हारी मेमोरी में पॉर्न है ? उसकी आवाज़ सख्त थी।
-जी नहीं ।  उसमें पॉर्न तो क्या पॉपकॉर्न भी नहीं है।  शयद कुछ कुकीज हों।  मैं डाइबेटिक हूँ इसलिए कुकीज से दूर रहता हूँ।  मैंने बात स्पष्ट की।
-तब तुम रात दिन ऑनलाइन रह कर करते क्या हो? मुझे उसके इस प्रश्न में छुपा जासूस दिखा। मैं समझ गया कि इसके हाथ में जो उपकरण है वह माइक या सिरिंज नहीं ,डॉक्टरी स्टेथोस्कोप है,बीमारी परखने के लिए?
-वही करता हूँ जो काम पूरे मुल्क के चमगादड़ और बौद्धिक करते हैं। मैंने लम्बी सांस फेफड़ों में भर कर अपनी बौद्धिकता की भनक दी।
-चमगादड़ तो उलटे लटकते हैं। आप क्या करते हैं? उसने जिरह की।
-हम भी अन्य बुद्धिजीवियों की तरह कम्प्यूटर से उलटे लटक कर चिंतन करते हैं। उलटे लटकने से सोच प्रगाढ़ होती है। मैंने जानकारी दी।
इतना सुनते ही वह समझ गई कि वह गलत जगह पर आ गई है। उसने पुरजोर आवाज में कहा- लैट्स गो ।  उसने यह निर्देश कुछ इस तरह से दिया जैसे कमांडर अपनी पैदल सेना कदमताल का निर्देश देता है। वे अपने उपकरण सँभालते हुए चल दिए।  
-कहाँ ? मैंने सहमते हुए पूछा।
-कहीं नहीं।  तुम यहीं बैठो। जब पॉर्न मिल जाये तो बताना। उसने कड़क कर कहा।
- जी ….. मैंने कहा।  उसकी बात मैं समझ नहीं पाया । हालाँकि तब मैं कहना तो ‘हम्म’ चाह रहा था लेकिन हडबडाहट में मुहँ से सिर्फ ‘जी’ निकल पाया।  नाज़ुक मौकों पर अकसर मैं ऐसे ही चूक कर बैठता हूँ।
वह धडधडाती हुई चली गई।  मेरा घर किसी पुल के आसपास बना होता तो मैं कहता –वह किसी रेल सी गुजरती है /मैं किसी पुल स थरथराता हूँ।
वह चली गई।  तभी व्हाट्स एप पर खबर आई।  पोर्नोग्राफी से बैन हटा।  
अब चैन ही चैन है।  अब मैं बेख़ौफ़ कह सकता हूँ कि मेरे कम्प्यूटर में तो जाने क्या क्या अगडम सगड़म रहता है,उसे तो जब चाहो ब्लॉक कर दो ,लेकिन हमारी स्मृति में तो  यकीनन अतृप्त लालसाओं और कुंठाओं का स्थाई वास है।उस पर कोई प्रतिबंध लगे तो बात बने !

स्ट्रीट -स्मार्ट कीट पतंगे और उनकी स्मार्टस्मार्टनेस

आदमी को स्मार्ट बनने के लिए बड़े जतन करने पड़ रहे  हैं।  बनने से अधिक दिखना महत्वपूर्ण हो चला है। जेब के वजन का स्मार्टनैस से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। जेब में  कीर्ति की भागीरथी का उद्गम होता है। इसके बावजूद स्ट्रीट समार्ट बनने की होड़ में वह ‘मिडियोकर’ समझे जाने वाले कीट पतंगों से निरंतर पिछड़ता जा रहा है। आदमी कीटनाशक बनाता है ,कीट उसकी काट की तरकीब ढूंढ लाते हैं।  वह उसे पकड़ने  के लिए उसके पीछे भागता है ,पतंगे तुरंत हवा हवाई हो जाते हैं। कीट पतंगों के सर्वनाश के लिए लगभग सारे उपाय व्यर्थ हो गए हैं। अब तो मच्छरों ने गुन गुन तक करना बंद कर दिया है। वे बड़ी ख़ामोशी से कान पर लैंड करते हैं । डंक चुभाते हैं। रक्तपान का लुत्फ़ लेते  हैं।  फुर्र हो जाते हैं।  उन्होंने  गुपचुप अपना काम करते रहने की तकनीक विकसित कर ली है।
कुछ समय पूर्व बैटरी ऑपरेटिड रैकेट बाजार में आया था। टेनिस या बैडमिंटन के रैकेट सरीखा।  इससे खेल ही खेल में सानिया मिर्ज़ा या साइना नेहवाल बनने की गलतफहमी का रियाज़ करते हुए इधर उधर मंडरा रहे दुष्ट  मच्छरों को सरलता से मारा जा सकता था। यह मक्खी मारने वाले मुहावरे को साकार करने के लिए बना परिष्कृत वैज्ञानिक समाधान था। लोगों को घर बैठ कर मच्छर  मारते हुए भी यही लगता  रहता है  कि वे मलेरिया मुक्त भारत के निर्माण में अपना अतुलनीय योगदान दे रहे हैं।  वैसे भी कुछ होने के मुकाबले उसका लगना बड़ी बात होती है।
आदमी का कीट पतंगों से सनातन बैरभाव  रहा है। जब से एक फ़िल्मी गीत में मच्छर को नपुंसकता का कारक निरुपित किया गया है ,तब से तो मच्छरों के खिलाफ उसने सीधी जंग छेड़ दी है। मच्छर भी अपनी जान पर मंडरा रहे इस खतरे से परिचित हैं। अब पता चला है कि वे उस मारक रैकेट को देखते ही अन्तर्ध्यान हो जाते हैं और इधर उधर छुप जाते हैं। हर घर और फ़्लैट में अमूमन टाण्ड या दुछत्ती बनती ही इसलिए है ताकि वे वहाँ जाकर सरलता से शरण ले सकें। छतों या बालकनी में पानी भरे पात्र इसीलिए रखे जाते हैं ताकि मच्छर आराम से अपनी आबादी बढ़ा सकें। वास्तव में ये स्थान और जलभरे पात्र  हमारी सदाशयता का नमूने भी हैं।  इससे हमारी समस्त ब्रह्मांड के प्राणीमात्र के प्रति दयालुता और उदारता का पता चलता है।  
यह बात तय है कि कीटपतंगे अब पहले जैसे निरीह नहीं रहे। शमा की सुंदरता पर जान गंवाने वाले परवानों का अस्तित्व केवल शेरोशायरी के पन्नों में सिमट कर रह गया है। वे आदमी के सानिध्य में रहते रहते  न सिर्फ  खतरे को भांपना  वरन अपने बचाव के तरीके सीख गए हैं।  
वे अब वक्त जरूरत के हिसाब से मुखौटे धारण करने की कला सीखने की पुरजोर कोशिश में लगे हैं। उनको पता लग गया है कि बाह्य आवरण से अंतस में उजास होती है। समयानुकूल भेस से बचाव के साथ ही साथ कीर्ति चतुर्दिक होती है।
वाकई अब कीट पतंगे पहले जैसे मूढ़मति नहीं रह गए हैं। मच्छर तो अब आदमी की तरह चतुर सुजान बन गए हैं। वे आदमी बनने के काफी करीब पहुँच गए हैं।




  




सोमवार, 3 अगस्त 2015

पॉर्न की विदाई और नए कोडवर्ड की तलाश


पॉर्नग्राफी साइट्स को सरकार ने ब्लॉक करना शुरू कर दिया है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। पर अभिव्यक्ति के आज़ादी के रणबांकुरे इस पर चुप हैं। वह इस पर फासीवादी ताकतों का काला कारनामा टाइप जैसी कोई बात जोरशोर से कहना तो चाह रहे हैं लेकिन कहते हुए लजा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि यदि वे इस पर अधिक मुखर होंगे  तो बात जरा ज्यादा दूर तलक जायेगी। लोगों को  तो हर बात पर अटकल लगाने की लत हैं। ऐसे कयासों से बनी बनाई उज्ज्वल छवि धूल धसरित हो जाती है।
इंटरनेट जनित दुनिया में ‘माउस’ की सत्ता होती है।  इसके किलकने भर से न सिर्फ मित्र अमित्र बन जाते हैं वरन सारा परिदृश्य ही रूपांतरित हो जाता है। जब तक पॉर्न सहज उपलब्ध था तब तक ये दुनिया किस कदर सनसनीखेज़ और उदार लग रही थी। यहाँ सब कुछ उपलब्ध दिखता था। लगता था कि दिव्य अशरीरी प्यार के बरअक्स दैहिक प्रेम के प्रदर्शन और इज़हार का चौबीसों घंटे और प्रतिदिन खुलने वाला सुपरमार्केट खुला है। तमाम वर्जनाओं की मौजूदगी के बीच ऐसे गोपनीय गलियारे हैं जिनमें आदमी अपनी इमेज को धूमिल होने के अपराधबोध के  बिना निर्भीक होकर आ जा सकता है।
पॉर्न की नेट से सम्पूर्ण विदाई की आशंका ने बता दिया है कि टेक्नोलॉजी से बड़ा कोई विचार नहीं। तकनीक वह लाठी है जिसके हाथ में होती है उसकी सिर्फ भैंस ही नहीं तमाम अवधारणायें बाय डिफॉल्ट उसकी हो जाती हैं। भैंस तो जिस खूंटे से जा बंधेगी वहां दुही जायेगी। जिसका भैंस पर एकाधिकार होगा वह उसके दूध की कीमत तय करेगा।
पॉर्न जा रहा है। इसकी कुछ नायिकाओं ने समय रहते अपने लिए नए ठिकाने ढूंढ लिए हैं। बदलती तकनीक के साथ नैतिकता जैसे शब्द चपटे हो गए हैं और जीवन मूल्य वही सार्थक बचे हैं जो चटपटे हैं। वह वक्त गया जब ऊँची दुकानों के फीके पकवान बिक जाते थे। अब वही बिकाऊ है जो अपने बाह्य स्वरुप में दिखाऊ है। हलवाई की दुकान के वही पकवान बिकते हैं जिसके पास ग्राहक के रूप में स्थाई खाऊ हैं। पोर्नोग्राफी के हाट पर उत्तेजक व्यंजन दिखते रहे हैं।  ये नज़ारे जब न होंगे तब इसके लिए कुछ चोर दरवाजे तलाशे जायेंगे।अलीबाबा के ज़माने से गोपन दरवाजों के खुलने के लिए कूट शब्द इज़ाद होते रहे हैं।
एक कोडवर्ड निरर्थक हुआ तो क्या नया कोडवर्ड उसकी जगह रीसैट हो जायेगा
@निर्मल गुप्त