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August, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शोमैन,शोकेस और शोबाजी उर्फ शोशेबाज़ी

राजनीति अब पहले जैसी स्याह सफ़ेद नहीं रह गई है।वह मल्टीकलर हो चली है। पुराने ज़माने की भाषा मेंबोले तो  ईस्टमैन कलर। अब इसके शोकेस में बहुरंगी सामान और सरोकार रखे दिखते हैं। पहले शोमैन सिर्फ रुपहले पर्दे की दुनिया तक सीमित थे। अब वे हर जगह हैं । राजनीति में हर दल के पास अमूमन अपना शोमैन है। जिनके पास नहीं है वे उसे शिद्दत से खोजने में लगे हैं। अब चुनाव जीतने के लिए नारों ,उलाहनों वादों ,पोस्टर, विज्ञापन ,ज्ञापन और मैनिफैस्टो से काम नहीं चलता। बिना सम्यक शोबाजी  के सारे प्रयास अकारथ हो जाते हैं। वर्तमान में सारा जोर इस बात को लेकर होता है कि किसकी पोशाक की ‘चमकार’ दूसरे के पहनावे से अधिक है। बाहरी  आवरण से अंदरूनी गुणवत्ता की शिनाख्त होती है। जब भी किसी राज्य में चुनाव नज़दीक आते  हैं तमाम  प्रकार के शोशेबाज़ ब्रांड  डिटरेजेंट बाज़ार में आ जाते हैं। शो बिजनस में राजनीतिक मंतव्यों से अधिक कीमियागरी महत्वपूर्ण होती है। सोना वही ,जिसमें चमक हो। सिर्फ हो ही नहीं वरन सबको दिखे भी। होने के मुकाबले दिखना बड़ी चीज होती है। शुद्धता या खरेपन को कोई नहीं पूछता। जो चमकता है वह खोटा होने के बावजूद मार्केट…

स्मार्टनेस की कतार और मेरा शहर

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देर रात खबर मिली कि मेरा शहर स्मार्ट सिटी बनने की कतार में है। जब तक कोई कतार में होता है तब तक बड़ी उम्मीद रहती है। कुछ होने जाने के मुकाबले आस का पास मिलते रहना जरूरी होता है जैसे हॉकी के  सेंटरफारवर्ड को गोल के मुहाने पर गेंद का मिल जाना। तब दो ही बात हो सकती हैं या तो खिलाड़ी ड्रिबल करके गेंद गोलपोस्ट के भीतर सरका दे या ऐसा करने में  चूक जाये। बिना कुछ करे धरे इधर उधर मटरगश्ती करने के मुकाबले ये दोनों स्थितियां बेहतर हैं। पर ऐसा हमेशा होता नहीं। जिंदगी अप्रत्याशित ढंग से घटी घटनाओं के जरिये चलती है। स्मार्टनेस बामुश्किल तमाम नसीब होती है। सुबह होते ही पता लगा कि मेरा शहर स्मार्टनेस मिलने की होड़ से बाहर हो गया है, वह कतार में था पर अब नहीं है। उसे धकिया कर हाशिए पर डाल दिया गया है। अभी भी मेरे शहर के पास मौका है कि वह खुद को स्मार्ट बनने के लिए पात्र साबित करे और पुन: कतार में आ खड़ा हो। स्ट्रीट समार्ट लोग अच्छी तरह जानते हैं कि कतार के चक्रव्यूह को कैसे भेदा जा सकता है। वह इस भेदन की कला को अरसे से जानते हैं। वे जन्मने अभिमन्यु के मानस पुत्र होते हैं। एक वक्त वो भी था जब नई रिलीज होने…

आरक्षण का हार्दिक मुद्दा

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मुल्क में वैसे तो किसी चीज की कमी नहीं है। सब कुछ तो है यहाँ। भरपूर आबादी है। इसका निरंतर होता विस्तार है। भांति भांति के पर्व हैं। उन्हें मनाने की विधि है। उत्सव हैं। उत्सवप्रियता है। ढोल नगाड़े है। कोलाहल है। बात बात पर लोगों के लगने वाले जमघट हैं। सड़क पर लगने वाले जाम हैं। जाम खुलने के बाद मिलने वाला आराम है। चादर हैं। उसे ओढ़ कर चैन से सोने वाले निद्रामग्न लोग  है। भ्रष्टाचार है। उसके निदान के लिए तमाम प्रकार के स्पाईकैम जैसे उपकरण और महकमे हैं। बदलती हुई ऋतुएं हैं। मानसून है। गहरे काले बादल हैं। उनके जलभरे होने का अनुमान है। बारिश की उम्मीद है। रातें हैं तरह तरह की। सुबह है अनेक प्रकार की। मुर्गे हैं रंगबिरंगे। बांग देने का समय तय नहीं। और तो और हमारे पास हार्दिक महत्वकांक्षा भी है। जातिगत आरक्षण के लिए बुलंद आवाज़ हैं। राजनीति के आसमान में उभरता हुआ नवोदित सितारा है। जातिगत आरक्षण एक लुभावना शब्द है। इसके झंडे तले पूरी बिरादरी एकजुट हो जाती है। इसके जरिये और कुछ हो या न हो पर बड़ी आस जगती है। बेरोजगारों को लगता है कि यदि आरक्षण आया तो समझो कि सरकारी नौकरी का अपोइंटमेंट लैटर आया। सरक…

बाजार का गिरना

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बाज़ार के धडाम से गिर जाने की खबर है।  यह बात अर्धसत्य है। वह किसी मासूम आदमी की तरह काई पर फिसल कर नहीं गिरा।  वह बड़ी तामझम के साथ सलीके से गिरा है।  उसके  गिरने में नियति का कोई लेना देना नहीं ।  वह पूर्वनियोजित तरीके से धराशायी हुआ है।  वह मुहँ के बल नही गिरा।  उसने अपने चेहरे का क्षत-विक्षत होने से बचा लिया है।  या कह सकते हैं कि उसको  इसी तरह से गिरने के लिए प्रोग्राम किया गया था।  यह एकदम प्रायोजकीय आयोजन है।  प्रयोजकीय बोले तो स्पांसर्ड।  उसी तरह से विज्ञापनीय जैसे कोल्डड्रिंक से गला तर होते ही भय के आगे जीत का प्रकट हो जाना। बाजार को पता था कि एक दिन उसे गिरना है।  उसे अपनी भूमिका का अच्छे से पता है।  एक एक डायलाग कंठस्थ है।  जो गिरता है ,उठता भी वही है टाइप का।  जब घटाटोप अँधेरा होता है तब उजाले की उम्मीद सबसे प्रबल होती है।  जो कभी चारों खाने चित नहीं हुआ उसे क्या पता कि हारने का दर्द क्या होता है।  बिना पराजय के विजय का कोई मतलब नहीं होता।  बाजार का अजब  दर्शन शास्त्र है और गजब जिंदा बने रहने  का अर्थशास्त्र।  इसका अपना प्रभामंडल होता है और धूलधसरित होकर उबरने की रणनीति। बाज…
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डान और उम्मीद एक जिंदा लफ्ज़ हैं ! ,,,, डान सो रहा है।यह खबर कन्फर्म है। पर यह अधिकारिक नहीं है। क्योंकि उसकी नींद उसके  होने का दस्तावेजी सबूत नहीं है। वह अनिद्रा का रोगी नहीं। इस बात को उसकी बीवी ने फोन पर बताया है। वह डान की ब्याहता पत्नी है। डान की पत्नी अकसर अपने खाबिंद के मामले में बोदे झूठ नहीं बोला करती। वे मिडिलचियों की पत्नियों जैसे डाउनमार्केट झूठ नहीं बोलतीं। उनके पास करने लायक इससे बड़े अनेक काम होते हैं।  मसलन बुर्ज खलीफा के नए खरीदे गए फ्लैटों की चाभियों के गुच्छे को कमर में लटकानेके लिए रत्नजडित कमरबंद खरीदने का। आईएसआई चीफ जैसे लोगों की बीवियों के  बर्थडे और मैरिज एनिवर्सरी की तारीखें याद रख कर उन्हें दिली मुबारकबाद देने और बेशकीमती गिफ्ट भिजवाने का। डान के दुनिया भर में फैले ‘कनेक्शनों’ का मोबाइल नम्बर याद रखने का ताकि उन्हें जब धमकाने की जरूरत पड़े तो वह उसे अपने पति को बता सके। डान को जब विभिन्न मुल्कों की पुलिस खोजती है तब वह चैन से नींद का लुत्फ़ लेता है। जब गोपीचंद जासूस उसे तलाशते हुए खुद सो जाते हैं, तब वह जागता है। स्नान ध्यान के बाद अपनी बीवी के हाथ के बने मिस्से…

अस्सी पार की प्याज

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,,,, प्याज अस्सी पर पहुँच गई , हर तरफ चुप्पी है। बनारस के अस्सी घाट पर भरीपूरी फिल्म बन गई, चहुँ ओर सन्नाटा है। वक्त घड़ियों के भीतर टिक टिक करता चल रहाहै ,फिर भी ख़ामोशी है। जिन्हें पैकेज मिलना तय था ,मिल गया। कहीं कोई हर्षोल्लास नहीं है। सोना गिर कर फिर चढ़ गया ,कोई सुगबुगाहट नहीं। सातवें पे कमीशन की प्रस्तावित रिपोर्ट के बारे में डरावनी खबरें आ रही हैं ,बाबू लोग इसके बावजूद अपने भाग्य या सरकार को नहीं कोस रहे है।  आबूधाबी में मंदिर बनेगा ,लोगों ने इस खबर को एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया है। पेट्रोल और डीजल के दाम कभी घटते हैं तो कभी बढ़ते हैं। कहीं कोई हाहाकार या जयकार नहीं। दो कान होने का महत्व अब समझ आया कि वे  होते ही इसलिए है कि बात को एक से सुनकर दूसरे से अनसुना कर दिया जाये। संसद का सत्रावसान हो चुका है।  सब अपने अपने काम पर लौट गए हैं।  नेता चीख पुकार से थके गले के साथ सुस्ता रहे हैं।  वे अपने चुनाव क्षेत्र में खुद के गले में मालाएं डलवा रहे हैं।  फूलों के सुगन्धित स्पर्श से रोग जल्द मिटेगा ,ऐसा उनका अनुमान है।  राजनीति से उपजे रोग अनुमानी इलाज से ठीक होते हैं।  उनसठ …

बहस : सेक्युलर मुल्क का राजधर्म

समय तेजी से बदल रहा है। परस्पर संवाद का अंदाज़ और टोन बदल रही है। राजनीति के सर्वोच्च पटल पर इतना शोरोगुल रहा कि जनता को पूछना पड़ा रहा कि हंगामा है क्यूँ बरपा ? ये लोग ‘जनहित’ में एक दूसरे से इतना उलझ क्यों रहे हैं ? लोग यही समझे पा रहे हैं कि वे निजी कारणों से संघर्षरत हैं। वैसे भी राजनीति और इसके तहत होने वाली डिबेट में निजता जैसा कुछ बचा नहीं है। सब गडमड हो गया है। सरकार बहादुर इतनी तेजी में हैं कि जो सवाल यहाँ मुल्क के भीतर उठते हैं ,वह उसका जवाब यूएई में देते हैं। वह बहस में नहीं उलझते सिर्फ अपनी बात कहते हैं। उनके एकालाप पर तालियाँ पिटती हैं। प्रलाप से लोकप्रियता बढ़ती है। डिबेट में कटुता होती है। विद्वता के अतिरेक का दर्शन होता है। सामने वाले को नीचा दिखाने का उपक्रम होता है। जिसके भीतर जो होता है , वही परोसता है। तर्क- दर -तर्क रखते हुए मुहँ लाल सुर्ख हो जाते हैं। गला सूखने लगता है। फिर भी शास्त्रर्थी पानी  की घूँट तक नहीं पीते हैं। उन्हें आशंका रहती है  कि उनके ऐसा करने से बहस की नैतिकता का भंग होना न मान लिया जाये। लोग कहेंगे कि वह तर्क वितर्क की बजाय पानी पी- पी कर कोस रहा है।…

बैन लगा कर हटाना बड़ी बात है !

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मैगी से प्रतिबंध  हटा। वह इसलिए हटा क्योंकि लगा था। इस बीच पॉर्न पर पाबंदी लगी थी। वह अंततः नहीं रही। जो जन्म लेता है वो एक दिन मरता भी है। यह आध्यात्मिक सच है। वैज्ञानिक सच इस सत्य के विपरीत है। विज्ञान के हिसाब से द्रव्य अविनाशी है। वह न पैदा होता है न मिटता है ,बस रूपांतरित होता है। लगभग यही बात भगवत गीता में कही गई है। लेकिन गीता साइंस की किताब नहीं है। वह धार्मिक पुस्तक है। भगवान कृष्ण विज्ञानी नहीं ईश्वर थे। उनके नाम कोई डिग्री या रिसर्च पेपर नहीं था। वह कभी किसी लेबोट्री में नहीं गए। उनके पास अपनी बातों का पक्ष प्रबल करने के लिए ग्रंथों की कोई सूची नहीं थी। तब अहम सवाल यह है कि क्या बैन या पाबंदी को द्रव्य की श्रेणी में रखा जाये या नहीं ? वैसे तो ऐसे तमाम प्रकरणों में किसी न किसी प्रकार द्रव्य की उपस्थिति रहती है। बैन के लगने और उठने से ही सरकारी महकमों और अदालतों का मार्केट फ्रेंडली चेहरा सामने आता है। यह अलग बात है कि महकमों की ओट में कहीं न कहीं अकसर सरकार और उसके सरोकार होते हैं। जब तक मैगी थी तो जिंदगी कितनी आसान और पुरसुकून थी। बस दो मिनट में ममत्व और मैगी प्रकट हो जाती थी…

उसके न होने के बावजूद उसका होना

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वह कासिम है। वह कासिम नहीं है। वह नावेद है। वह नावेद नहीं है।वह उधमपुर में बीएसएफ पर हमला करता पकड़ा गया। वह हमला नहीं कर रहा था,घायल जवानों की मरहम पट्टी करने गया था। वह पाकिस्तानी है। वह पाकिस्तानी नहीं है क्योंकि वह वहां के डाटाबेस में नहीं है। तब वह कौन है ? कहाँ से आया है? इतने किन्तु परन्तु के बाद भी  कुछ भी न होने के बावजूद ,वह है। वह मुस्कुरा रहा है। मुस्कराता हुआ एकदम लाफिंग बुद्धा लग रहा है। हँसता हुआ बता रहा है कि उसका एक मुल्क है, भाई बहन हैं ,अम्मी अब्बू हैं। उनके पास फोन है। उनके फोन का नम्बर है। फोन पर कोई कह रहा है  कि वह उसका  बदनसीब बाप है। पर वह पकड़ा गया आतंकी किसी का  बेटा नहीं है। किसी बाप के होने भर से जरूरी नहीं कि कोई उसका बेटा भी हो जाये। मुल्क के कुछ कोनों मे सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि धरपकड़ की कहानी में झोल है। वह चाल- ढाल, शक्ल- सूरत और तौर तरीके से कसाब जैसा लगता है। अब वह आने वाले दिनों में उसकी तरह का ही लगता रहेगा। हो सकता है कि वह एक दिन जेल में बिरियानी खाने की जिद करे। उसकी फरमाइश पूरी भले ही न हो लेकिन इस बात पर बहस जरूर होगी कि हर आतंकी बिरियानी ही …

डिजिटल इंडिया में रामखिलावन

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वक्त के थपेड़ों ने रामखिलावन की आत्ममुग्धता पर सवालिया निशान लटका दिया है । ब्यूटी सैलून वाले ने साफ़ कह दिया है कि उसके पास ऐसी कोई फेसक्रीम, ब्लीच, लोशन या तकनीक नहीं कि वह उसे पहले जैसा नूर लौटा सके । कॉस्मेटिक सर्जन ने भी यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए हैं कि वह उसे दर्शनीय बनाने के लिए चाहे जितनी कोशिश कर ले, पर उससे कुछ हो पायेगा इसमें संदेह है । इस फैशनपरस्त युग में वह इस मामले में कोई गारंटी देने का जोखिम नहीं उठा सकता । उसे समझ आ रहा है कि उम्र के हाट से होकर गुजरा समय लौट कर नहीं आता । अतीत की कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं होती ।
रामखिलावन धीरे धीरे अवसाद की गहरी खाई में उतरता जा रहा था । दर्पण उसे डराने लगा है । उसे यकीन नहीं हो रहा कि तेजी से बदलते जीवन मूल्यों के बीच दर्पण ने सच को झुठलाना अभी तक नहीं सीखा है । वह सच बोलने की युगों पुरानी डाउनमार्केट जिद पर क्यों अड़ा है ? तिस पर तुर्रा यह कि लड़कियां तो लड़कियां उनकी मम्मियों ने भी उसे अंकल कहना शुरू कर दिया है । ये जो अंकल का विशेषण है, उसने केशव से लेकर अमीर खुसरो तक सभी को अपने ज़माने में बहुत बेचैन किया है । अब परेशान होने की बारी र…

पॉर्न में हटा बैन अब चैन ही चैन

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यह उस समय की बात है जब पॉर्न के अधिकांश कोनों पर सरकारी ताला लटक चुका था और मैं हस्बेमामूल उसकी मास्टर की को ढूँढता हुआ हरिभजन सुन रहा था। उदास आदमी बाय डिफॉल्ट भक्तिभाव से भर जाता है।  तभी कमरे के दरवाजे पर हलचल हुई।  मैंने आननफानन में गूगल सर्च से पॉर्न के  कीवर्ड को ‘दिव्यात्मा’ से रिप्लेस किया।  यह करने के बाद मैं संभल पाता कि हाथों में किसी चैनल का माइक संभाले अपने कुछ गुर्गों के साथ एक सुदर्शना धम्म से कमरे में नमूदार हुई।  उसने अपने हाथ में माइक इस अंदाज़ में थामा था जैसे पुराने ज़माने की खामोश कॉमेडी फिल्मों का ओवरसाईज जूता पहनने वाला विदूषक डॉक्टर का रोल करता हुआ बड़े आकार की सिरिंज लेकर आता और मरीज़ संभल पाए इससे पूर्व ही उसके नितम्ब को भेद देता था।  तब मरीज़ कराहता था और थियेटर में बैठे दर्शक हो हो करके हँसते थे।  उन दिनों पराई तकलीफें प्रहसन बनती थीं।  आज तक परपीड़ा में आनंद का भाव कालजयी है। सुदर्शना एकदम मेरे इतने समीप आ गई कि उसकी साँसों की गमक से पता लगने लगा कि बंदी ने ब्रेकफास्ट में किसी लहसुनिया व्यंजन का सेवन किया है और काम पर पहुँचने की जल्दबाजी में टूथपेस्ट का इस्तेमाल …

स्ट्रीट -स्मार्ट कीट पतंगे और उनकी स्मार्टस्मार्टनेस

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आदमी को स्मार्ट बनने के लिए बड़े जतन करने पड़ रहे  हैं।  बनने से अधिक दिखना महत्वपूर्ण हो चला है। जेब के वजन का स्मार्टनैस से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। जेब में  कीर्ति की भागीरथी का उद्गम होता है। इसके बावजूद स्ट्रीट समार्ट बनने की होड़ में वह ‘मिडियोकर’ समझे जाने वाले कीट पतंगों से निरंतर पिछड़ता जा रहा है। आदमी कीटनाशक बनाता है ,कीट उसकी काट की तरकीब ढूंढ लाते हैं।  वह उसे पकड़ने  के लिए उसके पीछे भागता है ,पतंगे तुरंत हवा हवाई हो जाते हैं। कीट पतंगों के सर्वनाश के लिए लगभग सारे उपाय व्यर्थ हो गए हैं। अब तो मच्छरों ने गुन गुन तक करना बंद कर दिया है। वे बड़ी ख़ामोशी से कान पर लैंड करते हैं ।डंक चुभाते हैं। रक्तपान का लुत्फ़ लेते  हैं।  फुर्र हो जाते हैं।  उन्होंने  गुपचुप अपना काम करते रहने की तकनीक विकसित कर ली है। कुछ समय पूर्व बैटरी ऑपरेटिड रैकेट बाजार में आया था। टेनिस या बैडमिंटन के रैकेट सरीखा।  इससे खेल ही खेल में सानिया मिर्ज़ा या साइना नेहवाल बनने की गलतफहमी का रियाज़ करते हुए इधर उधर मंडरा रहे दुष्ट  मच्छरों को सरलता से मारा जा सकता था। यह मक्खी मारने वाले मुहावरे को साकार करने के लिए बन…

पॉर्न की विदाई और नए कोडवर्ड की तलाश

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पॉर्नग्राफी साइट्स को सरकार ने ब्लॉक करना शुरू कर दिया है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। पर अभिव्यक्ति के आज़ादी के रणबांकुरे इस पर चुप हैं। वह इस पर फासीवादी ताकतों का काला कारनामा टाइप जैसी कोई बात जोरशोर से कहना तो चाह रहे हैं लेकिन कहते हुए लजा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि यदि वे इस पर अधिक मुखर होंगे  तो बात जरा ज्यादा दूर तलक जायेगी। लोगों को  तो हर बात पर अटकल लगाने की लत हैं। ऐसे कयासों से बनी बनाई उज्ज्वल छवि धूल धसरित हो जाती है। इंटरनेट जनित दुनिया में ‘माउस’ की सत्ता होती है।  इसके किलकने भर से न सिर्फ मित्र अमित्र बन जाते हैं वरन सारा परिदृश्य ही रूपांतरित हो जाता है। जब तक पॉर्न सहज उपलब्ध था तब तक ये दुनिया किस कदर सनसनीखेज़ और उदार लग रही थी। यहाँ सब कुछ उपलब्ध दिखता था। लगता था कि दिव्य अशरीरी प्यार के बरअक्स दैहिक प्रेम के प्रदर्शन और इज़हार का चौबीसों घंटे और प्रतिदिन खुलने वाला सुपरमार्केट खुला है। तमाम वर्जनाओं की मौजूदगी के बीच ऐसे गोपनीय गलियारे हैं जिनमें आदमी अपनी इमेज को धूमिल होने के अपराधबोध के  बिना निर्भीक होकर आ जा सकता है। पॉर्न की नेट से सम्प…