शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

केक में बदलता समाजवाद


नेताजी पिच्छ्त्तर के होने जा रहे है| उनके समाजवाद का पूरा कुनबा किसी न किसी रूप में सत्ता के शीर्ष पर या उसके इर्दगिर्द काबिज है| वह भीष्म पितामह की तरह किंग मेकर की अतुलनीय भूमिका में हैं |हर ओर खुशहाली है| उनके राज्य में खूब पेन्शन ,भत्ते ,इनाम ,इकराम ,पद और लेपटॉप बंट रहे हैं| अपनों के बीच मुक्तहस्त से रेवडियाँ बांटी और खायी जा रही हैं|
नेताजी का जन्मदिन करीब है|सेलिब्रेशन का अवसर है और दस्तूर भी | रामपुर में जोरशोर से उत्सव की तैयारी चल रही हैं |केक बनाने वाले ओवरटाइम कर रहे हैं | केक काटने के लिए रामपुरी छुरों पर धार रखी जा रही है उनके सामने पूरे पिच्छ्त्तर किलोग्राम का लज़ीज़ केक बनाने की चुनौती है | छुरों पर उसे सलीके से कटवाने का दायित्व है |  महारानी विक्टोरिया के ज़माने की बग्गी आयात होकर सीधे इंग्लेंड से आ रही है|  उसे हांकने वाले घोड़े जाने किस देसी विदेशी अस्तबल से आयेंगे इसी बग्गी में सवार होकर जुलूस की शक्ल में वह केक काटने के लिए आधी रात को समारोह स्थल पर जायेंगे| कभी आधी रात को मुल्क ने आज़ादी को आते देखा था अब वह समाजवादी अवधारणा के एक बड़े केक में तब्दील होने  और टुकड़े टुकड़े होने के अभूतपूर्व परिदृश्य का साक्षी बनेगा |
एक ओर समजवादी केक बन रहा है | दूसरी ओर धर्म कम्बल ओढ़ कर रामपाल के रूप में जेल जा रहा है | सेकुलर लोग दोनों मामलों पर अहलादित हैं | उनके लिए बारात और वारदात दोनों दर्शनीय होते हैं | समाजवादी जी अपने जन्म दिन पर पन्द्रह किलोमीटर पांच घंटे में नाप कर प्रदेश और अपनी समाजवादी धज को नई दमक देंगे | धर्म और समाजवाद नए रूप में सामने है |एक का रूप उजागर हुआ दूसरे का कुछ दिन में हो जायेगा |
समय बदल गया है अब नेताओं और संतों के कद की शिनाख्त उनके कृतित्व से कम उनके द्वारा एकत्र किये गए आग्नेयास्त्रों से होती है | बर्थडे पर बनने वाले केक के वजन और आकार से होती है | केक के जरिये ही नेता का जनाधार विस्तार पाता |कीर्ति चातुर्दिक होती है| व्यक्तित्व सुदर्शन बनता है| केक की महक के प्रभाव से जनता के भीतर अपने नेता के प्रति भक्तिभाव जागता है |केक की सुगंध से नेता सुनामधन्य बनता है |प्रशासन उसके समक्ष कोर्निस करता है शासन नतमस्तक होता है | चमचे जलतरंग की तरह बज उठते हैं नेता का चेहरा केक के प्रताप से ताजे खिले गुलाब की तरह खिल जाता है |उसके प्रभामंडल में चाँद सितारे टंक जाते हैं |
एक समय था जब फ़्रांस की रानी ने वहां की भूखी जनता को रोटी न मिल पाने की हालत में केक खाने की सलाह दी थी |रानी को पता था कि जनता जब केक खायेगी तभी तो वो विरोध ,धरना ,प्रदर्शन ,निंदा और व्यर्थ की चिल्लपौं छोड़ कर उसकी जयजयकार करेगी| केक में एक खूबी यह भी तो होती है कि उसे खाते हुआ  आदमी एकदम स्वामीभक्त हो जाता है| उसके झबरीली दुम उग आती है जो वक्त जरूरत खूब हिलती है|
समाजवाद के उन्नयन और प्रदेश की खुशहाली के लिए जरूरी है कि सही रूप रंग आकार प्रकार और वजन का केक साल दर साल इसी तरह बनता और  काटता रहे| वह  जियें हजारों साल ,हर साल के दिन हों केक समान  |



बुधवार, 12 नवंबर 2014

पूत के पाँवों का विस्तार


दफ्तर से लौट कर श्रीमान ने घर की चौखट पर कदम रखा तो मैडम जी ने खबर दी : कुछ सुना आपने ? किसी सनसनीखेज़ खबर को सुनने के लिए उनके कान वैसे ही फड़फड़ाये जैसे नांद में मनचाहा चारा देख कर पशु अपने कान हाथ से झलने वाले पंखे की तरह हिलाते हैं | उन्होंने  कहा तो कुछ नहीं बस सहज भाव से अपने चेहरे पर प्रश्नचिन्ह ठीक वैसे ही टांग दिया जैसे दूधिये गाय या भैंस को दुहते समय मापनी  को बाल्टी के किनारे लटका देते हैं |मापनी  की इस लटकन से होता यह है कि दूध की बाल्टी झागों से भरकर ‘फ्रेशमिल्क’ का ‘लुक’ देने लगती है और माप में प्रति किलोग्राम लगभग सौ - दोसौ ग्राम की घटतोल भी हो जाती  है |
मैडम जी ने श्रीमान जी की  फर्जी जिज्ञासा को तुरंत दरकिनार किया और कहा : तुम्हें कुछ पता भी है कि तुम्हारे बेटे ने आज क्या किया ? यह कहते हुए हुए उनकी आवाज़ लगभग महानायक जैसी हो गई | धीर - गम्भीर किसी गहरे कुएं से आती आवाज़ जैसी |श्रीमान जी तुरंत समझ गए कि आवाज में गहराई का स्तर खतरे के निशान से ऊपर है | मामला सीरियस है |उन्होंने तुरंत पूछा : हुआ क्या ?
मैडम जी ने बताया कि तुम्हारे दो वर्षीय नौनिहाल को नाक तक पोंछने की तमीज़ तो आई नहीं और उसने तेवर दिखाने अभी से शुरू कर दिए |श्रीमान जी चुप रहे और उन्होंने अपनी आँखें इस अंदाज़ में फड़फड़ाई जैसे अमूमन नादान बच्चे सुनाई जा रही कहानी में पेंच आ जाने पर झपकाते हैं |मैडम जी ने बात आगे बढ़ाई : आज इसे मैंने पड़ोसी के लॉन में जाकर शैतानी करने से रोका तो इसने मेरा हाथ झटक दिया |आखें तरेरी |इतना सुनने के बाद भी श्रीमान जी चुप्पी साधे रहे |मैडम जी ने खुलासा किया : और तो और ,अब तो साहबजादे गाली में देना सीख गए हैं | इसने मुझे गाली भी दी |
यह सुनते ही श्रीमान जी का मुहँ कोल्ड्रिंक की वो  बोतल बन गया जिसमें किसी ने चुटकी भर नमक डाल दिया हो |उन्होंने  कहा : तो यह कहो न कि हमारा बेटा एकदम बिलावल हो गया है | यह कह कर उन्होंने अपनी कहिन पर खुद को दाद देते हुए “हो हो हो हो” की आवाज़ निकाली |मैडम जी ने डपटा : स्टेंडअप कामेडियन मत बनो |बी सीरियस |
श्रीमान जी ने आननफानन में वही गंभीरता ओढ़ ली जिसे वो बॉस के चैम्बर में प्रवेश करते समय ओढ़ते थे |उन्होंने अत्यंत नाप तोल कर एक एक शब्द को सलीके से चबाते चुभलाते हुए कहना शुरू किया : देखो मैडम जी , इसे कभी  तो गाली वाली देना ,छीन झपट को सीखना ही था |हाँ ,यह काम  जरा जल्दी सीख गया है  |लगता है  हमारे  बेटे में   बड़ा होने का उतावलापन  है |
मैडम जी ने ताज्जुब से श्रीमान जी की ओर देखा और कहा : यह मसखरी का नहीं बेहद सीरियस मसला है |
श्रीमान जी ने अपनी बात जारी रखी : पूत के पाँव पालने में दिख जाते हैं |मुझे तो इसके पदचिन्ह किसी बड़े घर के  दामादश्री  बनने  के गंतव्य की ओर जाते दिख रहे हैं |
इतना सुनते ही मैडम जी की बोलती बंद हो गई और वह चकित होकर कभी श्रीमान जी को तो  कभी बालकनी की रेलिंग पर लटक कर कालोनी में पड़े खाली प्लॉटों पर नजर टिकाये अपने सुपुत्र को निहारने लगीं |





मंगलवार, 11 नवंबर 2014

माननीय बनने का चक्कर


एक माननीय ने दूसरे माननीय से कहा कि वह  उसे  एक दो नहीं पूरे सौ करोड़ धन  दे  ,वह उन्हें  मान -सम्मान ,ओहदा , प्रतिष्ठा ,हनक , कनक और वीआईपी स्टेट्स की चमक देंगे   |दूसरा माननीय कह रहा है कि वह  अपनी चमक दमक बरक़रार रखने के लिए तत्पर हैं  |उसे पाने के लिए वह सब कुछ दे सकते  हैं   लेकिन घूस नहीं दे सकते  |आखिर उनका   भी तो कोई आत्मसम्मान  है |घूस देने का काम आम आदमी करते  है ,माननीय नहीं |वे तो जो लेते, पाते या हड़पते  हैं ,ससम्मान और साधिकार करते हैं |
यह तो सबको पता है कि राजनीति के  हाट में सब कुछ बेचा और खरीदा जाता  है |दिलचस्प बात यह है कि इस मंडी में खरे से अधिक खोटे सिक्के  चलते हैं  |यहाँ  नयनाभिराम सिद्धांतों के गैस भरे गुब्बारे आसमान में ऊँची उड़ान भरते हैं |जरा सी तेज हवा चली नहीं कि ये गुब्बारे उड़ कर कहीं के कहीं पहुँच जाते हैं |एक्स पार्टी का गुब्बारा  वाई पार्टी की छत पर उतर जाता है |कुछ गुब्बारे तो इतने कुशल होते हैं कि जिस छत पर संयोगवश या दुर्घटनावश जा उतरते  हैं उसी पर अपना आधिपत्य जमा कर जेड पार्टी बना लेते हैं |
माननीय वही बनता है जो सत्ता के आरामघर तक पहुँचाने वाली हर संकरी गली का रास्ता जानता है |आम रास्ते पर चल कर अपना गंतव्य ढूंढते लोग हमेशा अटके रह जाते हैं |उनकी महत्वाकांक्षी पतंग को कोई भी काट देता है |जनधन में सदैव ठन ठन ही रहता है और काला धन गोरा बनने के लिए गोपन खातों की शरण ले लेता है |
यह बात एकदम सही है कि माननीय कभी अपनी अंतरात्मा से समझौता नहीं करते |उनके भीतर जब कुछ पाने की लालसा पनपती है तो वे उसे मार्केट रेट पर खरीद लेते हैं |एमआरपी पर माल खरीदना या बेचना जायज होता है |ऐसा करने से माननीयशब्द  की गरिमा जस की तस बनी रहती है |मोलभाव करके माल की खरीद फरोख्त भी हो जाती है और आत्मा पर फिजूल का दवाब भी नहीं बनता |
माननीय बनना बनाना मिलियन डॉलर या यूरो का व्यवसाय है |राजनीति भी अन्य धंधों की तरह एक कारोबार है |बाज़ार का नियम है कि जो धंधा लाभप्रद होता है वह कभी निंदनीय या गंदा नहीं होता |दलाल स्ट्रीट पर जो नैतिकता की बात करता है या दुहाई देता है उसे मार्केट पिटा हुआ मोहरा या आर्थिक व मानसिक रूप से लगभग दिवालिया मान लेता है |
दो माननीय विशुद्ध लेनदेन के मसले पर भिड़ रहे हैं लेकिन लड़ रहे हैं बेहद सलीके के साथ |उनके द्वंद्व में भी अजब एहतियात है ताकि कल जब दुबारा हाथ मिलाएं तो शर्मिन्दा न होना पड़े |एक कह रहा है कि माननीय जी अपने माननीयपन  के विस्तार के लिए सौ करोड़ दे रहे थे |दूसरे माननीय जी कह रहे हैं कि न उन्होंने किसी को कभी कुछ दिया, न उनसे किसी ने  कुछ माँगा |उन्हें तो जीवन में जो भी  मिला ऐसे ही प्राप्त हुआ  जैसे किसी  मुहँ बाये सोते आलसी के मुख में झड़बेरी का बेर टपक पड़े  | जैसे मायूस बिल्ली के भाग्य से छीकें पर रखा दही बिखर जाये |जैसे लम्बी छुट्टी लेकर गई कामवाली बाई पति से बीच पिकनिक में अनबन हो जाने के कारण काम पर वापस लौट आये |

मानना होगा कि माननीय लोग तमाम मतभेदों और मनभेदों के बावजूद एक दूसरे की गरिमा का बड़ा ख्याल रखते हैं |ये बड़ी सरलता से लाखों करोड़ों के मसले को एक प्रहसन में तब्दील कर देते हैं |