पे कमीशन का सातवाँ घोड़ा और तलहटी में खड़ा ऊंट


अंतत: पे कमीशन के अस्तबल का सातवाँ घोड़ा छूट निकला।कल तक जो लोग इसे लेकर बड़ी –बड़ी खुशफहमी पाले बैठे थे,वे गमज़दा हैं।उन्हें अब पता लगा  कि खुशफहमी ही दरअसल गलतफहमी होती है। जैसे किसी से प्यार का अहसास-ए-गुल तभी तक मन को भरमाता है जब तक वह मिसेज गुलबदन बनकर बाकायदा रोज लौकी की सब्जी में हींग जीरे का छौंक  नहीं लगाने लगती।दूरस्थ पहाड़ तभी तक नयनाभिराम लगते हैं जब तक उसके नजदीक पहुँच कर आदमी ऊंट में रूपांतरित नहीं हो जाता।तब उसे पता लगता है कि अरे वह तो ऊंचे  पहाड़ की तलहटी में जा पहुंचा एक अदद उदास मसखरा है।
पे कमीशन की रिपार्ट क्या आई ,गंदे नाले के मुहाने पर बने दड़बानुमा मकानों को स्वीमिंगपूल या पार्क फेसिंग विला कहकर बेचने वाले प्रोपर्टी डीलर से लेकर मौत के बाद जीवन को स्वार्गिक आनंद से भर देने का दावा करने वाला बीमा कम्पनी के  एजेंट तक सभी उसी तरह  सक्रिय हो गये हैं जैसे मानसून की पहली बौछार के बाद धरती के भीतर के तमाम जीवजन्तु धरती की सतह पर सक्रिय हो उठते हैं।यकीनन यह पाताललोकवासियों  के लिए मुरादों भरा आभासी मौसम है।बाज़ार के पास करेंसी नोटों से  भरी हुई ‘ओवरसाइज’ जेबों को बेचने के लिए कुछ न कुछ हमेशा मौजूद रहता है।
पे कमीशन  की रिपोर्ट ने बीते ज़माने में  टाइमपास के लिए सुलझाई जाने वाली वर्ग पहेली फिर उपलब्ध करा दी है।सुडुकू के जरिये दिमाग का ताजादम रखने वाले नवपेंशनधारियों के लिए यह रिपोर्ट  महज एक रिपोर्ट ही नहीं वरन सम्पूर्ण मानसिक व्यायामशाला भी है,जिसके जरिये वे अपने-अपने केलकुलेटर पर दिमागी घोड़ों को सरपट दौड़ा और जम्प करा रहे  हैं।बार–बार अलग-अलग फार्मूलों के तहत पेंशन को घटा- बढ़ा कर कभी उदास तो कभी मुदित हो लेते  हैं।
बाकी सब तो ठीक ,लेकिन इस अफवाह ने बड़ी सनसनी फैला दी है कि सरकार यह मार्मिक अपील करके कर्मचारियों को धर्म संकट में डालने वाली है कि वे रेल किराये में सीनियर सिटीजन को मिलने वाली रियायत और गैस सब्सीडी की तरह वेतन वृद्धि लेने से स्वेच्छा से इंकार करके देश के विकास में अपना महती योगदान दे।
कुछ सच भी बिलकुल अफवाहों जैसे लगते जरूर हैं,लेकिन वे निरी अफवाह नहीं होते


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