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January, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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इतिहास के खुले पन्ने और फड़फड़ाती वक्तकटी  फ़ाइलें खुलीं।इतिहास सामने आया।जिसने पढ़ा उसी ने कहा कि अरे यह तो अतीत है।सिर्फ बीते हुए दिनों का ब्यौरा है ,जिसमें न कोई सनसनी और न रोमांच की  भनक।जर्द पन्नों के हाशिये पर लिखी सरकारी बाबुओं की टीप वैसी ही है जैसी आज भी दफ्तरों के दस्तावेजों पर आमतौर पर लिखी और गोपनीय के टैग के साथ छिपा दी जाती हैं। फाइलें बंद रहती हैं तो बड़ी उत्सुकता जगाती हैं।सात तालों में बंद रहती है तो आठवें ताले के न जड़े होने का मुद्दा हवा में उछलता है।नवें या दसवें ताले की अपरिहार्यता पर गहन विमर्श होता है।ऐसी बहस अविराम  चलती हैं और तालाजड़ित फाइलों के पृष्ठों से सूचनाएँ निशब्द रिसती हैं।जानकारियां उसी तरह रिसती हैं जैसे बंद रसगुल्ले के डिब्बे से मीठा शीरा।डिब्बा बंद रहता है और तमाम शक्करखोर जीव जन्तु बड़ी शाइस्तगी के साथ उसका रसास्वादन करते हैं। एक समय था जब इतिहास से सबक सीखने की बात की जाती थी।अब इसके जरिये दूसरों की छिछालेदार की जाती है और अपने लिए महिमामंडित होने के कारक ढूंढे जाते हैं।इससे ‘सबक-वबक’ सीखना गयी-गुजरी बात हुई ,इसके पुनर्पाठ के जरिये शीत लहर की चपेट में आई …

अमन चैन और और वाशिंग मशीन

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हुए शांतिपूर्ण धमाकेहोने की खबर है।यह शांतिमय इसलिए माने जायेंगे क्योंकि मरने वालों की संख्या 15-20 से ज्यादा नहीं है।ये हमला सदाचारी दूतों का  पूरी दुनिया में अमन बहाल करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।धरा पर अमन चैन को  शायद इसी तरह आना है।पूरी दुनिया में सेक्युलरिज्म भी इसी तरह अपनी जड़े जमा पायेगा।वैसे भी धमाके बारूद,आरडीएक्स और टाइमर आदि के जरिये होते हैं और टेक्नोलोजी का कोई अलग से धर्म या धर्मग्रंथ नहीं होता।धार्मिक भावना का कोई स्थापत्य नहीं होता। आदमी का जिंदा रहना या फिर मर जाना,यह सब विधि हाथ है।या नियति और प्रारब्ध की वजह से है।शांति के इन शिखर पुरुषों के हाथ अदृश्य होते हैं।इन हाथों की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती।इनके मंतव्य बड़े गूढ़ होते हैं।इनको सिर्फ ड्रोन की अत्याधुनिक समझ ही देख पाती है।ये मानवीय समझदारी से परे होते हैं।इनके हाथों में जब तब जो असॉल्ट राइफल या रॉकेट लॉन्चर दिख जाते हैं,वे वास्तव में सद्भावना के श्वेत कपोत होते हैं।कोई उन्हें विध्वंस का सामान न समझे।शांति के इन अग्रदूतों को कोई आतंकी समझने की भूल न करे। अब तक सारी दुनिया जान गयी …

सरकार,सरोकार और लग्जरी टेक्स

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बिहार सरकार ने समोसा,जलेबी,नमकीन और मच्छर भगाने वाली टिकिया समेत कई चीजों पर "लग्जरी टैक्स" लगा दिया है। सरकार ने जनता को स्पष्ट सन्देश दे दिया है कि वह विलासिता के खिलाफ है। वह वही ऐयाशी बर्दाश्त करेगी जिस पर उसे  टेक्स मिलेगा। इसका एक मतलब यह भी हुआ कि लग्जरी चाहिए तो जेब ढीली करो। ऐशोआराम केवल उन्हीं के लिए है ,जिनकी बाजुओं में दम या जेब में भरपूर दाम हैं। मच्छर भगाना विषय भोग है।मच्छर से खुद को कटवाना हठयोग है।निरंतर कष्टों से जूझते रहना यथार्थ बोध है। डेंगू या मलेरिया यद्यपि रोग है लेकिन इससे निज़ात दिलवाने के लिए स्वास्थ्य विभाग मुस्तैद है।मच्छरों का बना रहना विभाग की कार्यकुशलता के लिए जरूरी है। इससे ही सरकार के तत्कालिक सरोकारों का पता लगता है। बेसिकली सरकारें  सुखवाद के खिलाफ़ होती हैं।उन्हें  पता है कि सुखद वातावरण में कर्मठता का क्षय होता है।मच्छर रहित माहौल में रहता आदमी दिन चढ़े तक सोता है।जागता है तो इस तरह अंगडाई लेता है मानो वह जागृत होकर धरती पर कोई अहसान कर रहा हो।सुबह की पहली चाय सुडकते हुए अखबार की खबरों को चाट चाट कर पढ़ता है। प्रत्येक खबरी चटखारे के साथ कहत…