इतिहास का तंदूर


काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है।
शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है।
धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पुरजोर अपील लिए लोग उस खजांची को तलाश रहे हैं,जिनके पास वे अपनी संवेदनशीलता को अपने नाम के इन्द्राज  के साथ उसी तरह जमा कर सकें जिस तरह मांगलिक समारोहों में शगुन  की धनराशि को सदियों से जमा कराये जाने की परिपाटी रही है।
हालात बिगडैल हाथी की तरह बिगड़ते जा रहे है।बिगड़े ही जा रहे हैं।तदबीरों के विविध व्यंजनों से भरी हुई प्लेट घाटी की ओर इस तरह रवाना की जा रही हैं जैसे किसी  समारोह में फूफा या बुआ के रूठ जाने पर उनके पास कुल्फी फलूदा,रबड़ी मलाई या खस का चिल्ड शर्बत भेज दिया जाता है।तजुर्बा बताता है कि जब कोई तरकीब काम नहीं करती तब इसी तरह के घरेलू  नुस्खे या सिर्फ दुआएं ही काम कर जाती हैं।
एक न एक दिन अमन चैन तो बहाल होना ही है।आइये, यदि फिलवक्त करने लायक और कोई काम न हो तो यत्र तत्र सर्वत्र हो रही प्रार्थनाओं में अपनी भागीदारी ही दर्ज करा लें।




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