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January, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गणतन्त्र और उसकी आभासी दुनिया

इस बार  सारे मुल्क को पता लगा कि हमारे यहाँ गणतन्त्र है  l एक अदद गणतन्त्र दिवस है  l सिर्फ वह है ही नहीं एकदम टेलरमेड स्वरुप में  है  lअपनी पूरी धमक के साथ है  l मिसाईल , टैंक , लोक की स्वरलहरी और जाबांजों करतबों की  सघन उपस्थिति  के बीच है  lवीवीआईपी ,वीआईपी और साधारणजन के मध्य सुरक्षित अंतराल में है  lलोकतंत्र की अनेक परतें हैं  l सबका अपना -अपना जनतंत्र है  l राजपथ पर उल्लास दिखा  l सलीके से पूरी धज के साथ कदमताल दिखी  l बादलों से आच्छादित आसमान से पानी की बूंदों की शैतानी दिखी   l ठंड ने जनता ठिठुराया    l छातों ने अपनी  युगीन उपयोगिता का कौशल दिखाया  lबयान बहादुरों ने सोशल मीडिया पर  अपनी ‘विट’ को भरपूर प्रदर्शन किया  lराष्ट्रवाद जगह -जगह विभिन्न रूपों में ओवरफ्लो करता दृष्टिगोचर हुआ  l रुक रुक कर बारिश हुई  lछाते बार –बार खुले और बार –बार बंद हुए  lकुछ लोग इसी काम मशगूल रहे  l जिनके पास सुविधा और विशेषाधिकार था ,उनके छाते कारिंदे संभालते  रहे  l जिनके पास यह  प्रिवलेज नहीं था वे उन दिनों को याद करके पछताते  रहे जब छाते उनके सिर पर खुद -ब -खुद खुल जाया करते थे  lतब उनके हाथ उन्मुक…

बड़ी योजनाबद्ध नीति

योजना आयोग अब नीति बनाएगा और इसी नाम से जाना और पुकारा जायेगा  lएक तरीके से देखा जाये तो यह निर्णय नीतिगत रूप में ठीक  है  lबिना नीति के बनी हुई कोई योजना होती है भला ! जैसे हलुआ खाने की नीयत हो ,खिलाने वाले की योजना हो लेकिन ऐसा कुछ खाने खिलाने की नीति न हो तब सब कुछ नियति की मुंडेर पर जा टिकता है   l हर सरकार के पास प्रत्येक  मसले  का हल तय करने के लिए बेहतरीन मुंडेर होती हैं lउनकी सार्वकालिक और सार्वभौमिक नीति होती है कि नीति बनाओ ,बनवाओ,गाल बजाओ और योजनाबद्ध तरीके से विकास के एजेंडे को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ जाओ  l कार्यशील सरकारें सदैव इतनी व्यस्त रहती हैं कि वे किसी मुंडेर पर बैठकर नहीं बतियाती  lबतकही का काम सरकारी वेतनभोगी कारिंदों का है  lयही काम उन पर सर्वाधिक फबता  है  l कारिंदे अपनी –अपनी आरामदायक रिवाल्विंग चेयरनुमा मुंडेरों  पर पसरे नीति - अनीति जैसे गूढ़ विषय पर गूगल सर्च के जरिये माथापच्ची में लगे हैं  lउनके पास करने लायक बस यही काम बचा है  l इसे वे पूरी मुस्तैदी से कर रहे हैं  lउनके पास  विमर्श के सिवा कोई योजना नहीं है  lयोजना बनाने का काम उन्होंने ऊपर वाले के हाथों मे…

वर्डकप फ़ुटबाल में जर्मनी का जीतना

उस रात वर्डकप फ़ुटबाल का फाइनल मैच चल रहा था । दोनों टीम एक दूसरे पर गोल करने को जूझ रही थी ।  मुल्क के समस्त खेलबहादुर अपनी अपनी नींद से लड़ते हुए आँखें टीवी पर टिकाये जाग रहे थे । वे अर्जन्टीना की जीत का सामूहिक सपना देख रहे थे ।  उन्हें लग रहा था कि  अर्जन्टीना जीता तो मानो टीम इंडिया जीत जायेगी । मैसी के हाथ विजय की ट्राफी आई तो समझो उनके मोहल्ले से लेकर एन राजधानी  तक उनकी उम्मीदों की बुलेट ट्रेन पहुँच जायेगी । गाज़ा में इजराइली बमबारी रुक जायेगी । गरीब और गरीब बनने से बच जायेंगे । नुक्कड़ वाला पनवाड़ी पान में चूने की उपयुक्त मात्रा लगाना शुरू कर देगा । दूध वाला दूध में से पानी की मिकदार घटा देगा । रिश्वती बाबू एक काम रिश्वत लेकर करने के साथ दूसरा काम घटी दरों पर कर देगा ।उन्हें लग रहा था कि जर्मनी की जीत हुई तो अनर्थ हो जायेगा । बेचारे मेजबान ब्राजील के जले पर नमक छिड़क जायेगा । नेमार को रीढ़ की हड्डी में लगी चोट के इलाज के लिए केरल आने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ेगा । सांभा डांस पर विश्व्यापी प्रतिबंध लग जायेगा । दिल्ली में धरने वाली सरकार काबिज हो जायेगी । घरेलू गैस के दाम दस रुपये प्र…

मानसून और सूखता हुआ अचार ,,,,

श्रीमानजी ने दफ्तर से लौट कर घर में घुसते ही खबर दी कि मानसून अब वाकई  आ पहुंचा है |नाऊ इट इज़ आफिशियल ।यह सुनते ही मैडमजी चिहुंकी - तुम्हें कैसे पता  ? यह कह कर उन्होंने आंगन में सूखने के लिए रखे अचार बनाने के लिए कटे हुई आम की फांखों की ओर देखा फिर आसमान को निहारा । मुझे फेसबुक से पता लगा ।उन्होंने बताया । ये मुए फेसबुक वाले जब देखो तभी अफवाह उड़ाते रहते हैं ।तुम दफ्तर में काम करते हो या फेसबुक पर लटके  रहते हो ? मैडम जी के भीतर से  बॉस की आवाज़  आई  । श्रीमान जी ने मामला जटिल होते देख चुप्पी साध ली ।उन्होंने जीवन के तल्ख़ तजुर्बे से सीखा है कि बॉस जब सवाल  करे तो खामोश हो जाओ   ।मैडम जी और बॉस एक ही थैली के चट्टे बट्टे होते हैं ।उनसे तर्क वितर्क करना  व्यर्थ  है । मैडम जी के मन में चिंता के बादल उमड़ने घुमड़ने लगे ।वह टीवी पर सास बहू के  अनवरत द्वंद्व का सीरियल देखते हुए भी अपनी तीसरी आँख  मानसून  पर टिकाये रहीं  ।उन्हें मानसून के आने की पदचाप अनचाहे मेहमान के आ धमकने की सूचना जैसी लग रही थी । श्रीमान जी ने  ‘आये रे बदरा’ टाइप कोई भूलाबिसरा गीत गुनगुनाया  तो उन्हें वह  उस खलनायक जैसे लगे  जो…

इंस्टेंट कामयाबी का शार्टकट

बरेली के बाज़ार में सिंघम और दबंग की  वेशभूषा में दो पुलिसकर्मी वाचिक शैली में हुदहुद करते  झुमका तलाश रहे थे कि तभी उच्च अधिकारियों की उन पर निगाह पड़ी और आननफानन में वे  निलम्बित कर दिए गए | उनके ऊपर आरोप है कि वह अपनी ड्यूटी के सम्यक निर्वहन की जगह अपनी -अपनी प्रेयसी को रिझाने के लिए  हीरोपंती में मशगूल थे | जबकि सच यह है कि वे किसी वीरोदत्त नायक की तरह  ऐसे निष्काम कर्म में लगे थे ,जिसके बाय प्रोडक्ट के रूप में उन्हें प्यार व्यार जैसी कोई चीज  मिलने की उम्मीद भर   थी | हमारे मुल्क में अक्सर आम आदमी  शंकाओं के बीच जन्म लेता है  और पालने में ही  दबंग या सिंघम टाइप के किसी  महामानव में परिवर्तित होने का सपना देखता है | आम धारणा है कि फ़िल्मी पात्रों के अनुरूप  एकाध काला चश्मा ,थोड़े बहुत स्टंट और शारीरिक सौष्ठव को पा लेने  भर से बात बन जाती है  |एक बार ये नायकोचित खूबियां येनकेनप्रकारेण पा लीं जाएँ  तो  जिंदगी खुद-ब-खुद  मानीखेज़ बन जाती है  | इस मुल्क में नामवर लोगों के साथ  उनकी अनुकृतियों  की हमेशा  खूब डिमांड  रहती है  | एक समय था जब रुपहले परदे पर औसत कद के और थुलथुल काया वाले एक सुपर …

हिंदी दिवस नहीं इंडी दिवस

हिंदी दिवस आ रहा है  ।उसके आने की सुगबुगाहट दफ्तर के हिंदी अधिकारी की मेज के इर्दगिर्द पूरी शिद्दत से महसूस होने लगी है  । इस मौके पर बंटने वाले पुरस्कारों के कोटेशन वाली लालफीते वाली फाइलें तेजी से इधर उधर हो रही हैं  ।इस अवसर पर लगने वाले पोस्टर बैनर के प्रूफ न मिलने के कारण अधिकारी जी तनाव में हैं और इसी की वजह से अपने मातहतों को अंग्रेजी में कस कर डाट पिला चुके हैं  । वह इस कदर  तनाव में हैं कि  चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों  को हरियाणवी में और अपनी स्टेनो को पंजाबी में ताकीद देते देखे गए हैं  ।इसके बावजूद छोटे बड़े बाबू , जो पूरे साल पूर्ण मनोयोग से हिंदी की खिल्ली उड़ाते हैं  ,इस दिन  को लेकर कुछ इस तरह उत्साहित हैं जैसे सिंथेटिक  दूध का कारोबार करने वाले  नवरात्र में भगवती जगरण के लिए 501 रुपये की रसीद कटवा  कर होते हैं  ।ऐसा मौका पूरे साल में एक बार आता है जब मन हिंदी हिंदी हो जाता है  । हिंदी दिवस पर हिंदी  की तारीफ में कुछ इस अंदाज़ में की जाती है  जैसे किसी हुतात्मा की शोकसभा में प्रखर वक्ता  अपने शोकाकुल बयान युगों युगों से पढ़ते आये हैं  ।  हिंदी दिवस पर भाई लोग  हिंदी को लेकर ऐसे…

जीवन तो मंगल पर ही है ,,,,,

आओ मेरे मुल्क के फोटोशॉप वीरों ,अपनी मेधा से कल्पना का ऐसा आभासी छौंक लगाओ कि मंगल पर मल्टीप्लेक्स और स्काईक्रेपर्स के  जंगल और रियलस्टेट के लाभप्रद धंधे का श्रीगणेश हो जाये ।याद रहे जीवन मंगल पर ही है धरती पर तो बस यह दिखता भर  है
।हम मंगल पर सबसे पहले जा पहुंचे । कुछ काम हमेशा बड़ी सफाई से सर्वप्रथम कर लेते हैं । हमारे मुल्क में नलों में पीने का साफ पानी पहुंचे न पहुंचे उसे पहुँचाने का श्रेय लेकर सरकारी विज्ञापन समय पूर्व पहुँच जाते हैं ।मरते हुए मरीज के पास एम्बुलेंस और उचित चिकित्सा मिलने  से पूर्व ही उसके पास गेट वैल सून का ऑटो जेनरेटिड एसएमएस पहुंच जाता है । भूखे के पास दाल रोटी पहुँचने से पहले डकार लेने की नीमहकीमी तजवीज़ पहुँच जाती है ।गंदगी बुहारने से पहले झाड़ू की गुणवत्ता और उसके मंतव्य पर राष्ट्रव्यापी विमर्श शुरू हो जाता है ।किताब छप कर बाजार में आने से पहले उसकी चौर्यगाथा सार्वजनिक हो जाती है ।विवाह के फेरे होने से पहले होने वाले बच्चों को लेकर जनसंख्या के आंकड़ों पर लोग सवालिया निशान लगाने लगते हैं ।हर मामले में सबसे पहले होने के बावजूद हम सशंकित रहते  हैं ।
अब पूरे मुल्क के…

काला धन और काला छाता ,,,,,

मेरे पास काला धन नहीं है और इसकी वजह मेरा नैतिकतावादी होना कतई नहीं है lमेरे पास काला छाता भी नहीं है क्योंकि मैं कभी कभार बारिश द्वारा भिगो दिए जाने को लेकर  कभी खौफज़दा नहीं रहा lहालंकि मुझे यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि काला धन और छाते का होना  खुद को बाज़ार के अनुरूप बनाने के लिए कितना जरूरी होता है lजिनके पास काला धन होता है या होने की अफवाह होती है उनका सोशल स्टेट्स बड़ा दर्शनीय होता है lजनता धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के लिए चंदा आदि प्राप्त करने के लिए ऐसे ही लोगों के दरबार में हाजिरी लगाते हैं l लोग इनको धनपशु भी कहते हैं और इनकी चरण वन्दना भी करते हैं lहम जिनसे नफ़रत करते हैं उनसे ही  सबसे ज्यादा प्यार भी तो करते हैं  l ये काला धन ही वास्तव में आदमी में दमक पैदा करता  है l सरकार पर काले धन को लेकर विपक्षी जो दवाब बना रहे हैं उससे यह बात एकदम साफ़ हो चली है कि अब संतोष धन के मुकाबले काला धन अधिक कल्याणकारी  है lइसकी  गंध आते ही भाईलोगों की राल टपकने लगती है lयह बात सबको पता है कि यदि यह काला धन  प्रकट हुआ तो किसी न किसी की जेब में अवस्थित भी होगा ही lसामान्य विज्ञान का सिद्धांत ह…

अब मरना आसान हुआ !

ख़ुदकुशी करने की योजना बना रहे लोगों के लिए  इससे बड़ी खुशखबरी क्या हो सकती है कि अब मरने की कोशिश करना अपराध नहीं रहा  lअब जो चाहे जब चाहे स्वेच्छा से मरने का पूरा प्रयास कर  सकता है lवैसे भी अधिकतर लोग यही मानते आये हैं कि वे  अरसे से डेली बेसिस पर मर मर कर जीते रहे हैं l यह सही है कि मौत जब आती है तब आ ही जाती है पर किसी के बुलाने ,पुकारने या टेरने से हरगिज नहीं आती lग़ालिब ने कह रखा है –मौत का एक दिन मुअय्यन है ,नींद क्यों रात भर नहीं आती lइस शेर से यह सवाल भी उठता है कि जो घोड़े बेचकर लम्बी तान के निश्चिंत सोते हैं क्या उनके लिए मरने का दिन पूर्वनिर्धारित  नहीं होता ? मौत किसी को नहीं बख्शती ,चाहे वह राजा हो रंक ,दुराचारी हो या पुजारी या फिर कुंभकर्ण हो या अनिंद्रा रोगी कोई लल्लू जगधर l आम आदमी के लिए इस मुल्क में  जीना कभी आसान नहीं रहा lउसे पग पग पर तमाम तरीके की दुश्वारियों झेलनी होती  है lबिजली का बिल जमा करना हो या नया कनेक्शन लेना हो , गैस कनेक्शन के लिए केवाईसी जमा करनी हो या बच्चे का स्कूल में दाखिला करवाना हो या  या फिर किसी मामले में थाने में रपट लिखानी हो ,मसला कुछ भी हो ,उ…

लगभग यू जैसा यू टर्न

यूटर्न को लेकर आजकल राजनीतिक पटल पर गहन विमर्श चल रहा है  । चिंतक नाराज हैं कि लोग इतना अधिक यूटर्न  ले रहे हैं ।  यह बात कमोबेश सच भी है हम यूटर्न समय से होकर गुजर रहे हैं  । लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जिसे पर इतनी अधिक माथापच्ची की जाये  । यूटर्न आज की  सच्चाई है । लुटियन की नई दिल्ली के अलावा भी एक भरीपूरी दिल्ली और पूरा मुल्क है जिसके  कच्चे पक्के रास्ते  इस कदर पेचीदा हैं कि यदि इस पर यूटर्न न लिये  जायें  तो वे आपको धराशाही करके अपने वक्त से बाहर कर देने में जरा भी विलम्ब नहीं करते  । सब जानते हैं कि जो यूटर्न ले पाने में समय रहते असफल रहते हैं  वे  अपने अहंकार से लदे -फदे   इतिहास की कंदराओं में चले  जाते हैं या समय के  डस्टबिन में फेंक  दिए जाते हैं  । जिन्हें  वर्तमान में लौटना होता है उन्हें  एक न एक दिन  यूटर्न लेना ही होता है  । वैसे भी  सीधी सपाट रास्ते  आमतौर से गंतव्यों तक पहुँचने में नकामयाब ही रहते हैं  । यूटर्न लेना एक श्रमसाध्य कला है ।राजनीति में खुद को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए इसे साधना अपरिहार्य है ।जिसे यूटर्न लेना नहीं आता वह राजधानी के सघन ट्रेफिक में  सुबह…

फ़ाइल के पन्नों का गुम होना

एक सरकार होती है lउसके पास फाईलों का अम्बार होता है lएक जाँच एजेंसी होती है lउसके पास पड़ताल का अधिकार होता है lफाइलों में तरह तरह की टीप होती हैं lआदेश होते हैं lनिर्देशों का  अनवरत क्रम होता है lइनके ही सहारे सरकार की हनक का प्रदर्शन होता है lकहा जाता  है कि  सरकार की फाइलों के आसपास सभी आकार प्रकार के चूहे मटरगश्ती करते हैं lहालाँकि ये चूहे सरकरी तन्त्र का हिस्सा नहीं होते lफिर भी ये अपने हिस्से की फाइलों में से दर्ज सूचनाओं को कुतर कुतर कर खा लेते हैं lये चूहे बड़े चूज़ी होते हैं lबहुत देख परख कर ही परम गोपनीय या महत्वपूर्ण जानकारियों को उदरस्थ करते हैं l ये फाइलें बड़े काम की होती हैं lइनके जरिये ही सरकार चलती है lये न हों तो सरकार का चलना तो क्या घिसटना ही दूभर हो जाये