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August, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मुंह फुलाने की वजह

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लालकिले से भाषण हो गया।हर बरस ऐसा ही होता है।इस बार अनेक समानांतर भाषण भीहुए।एक से बढ़ कर एक।तब यह देशज कहावत बड़ी याद आई-शेर का भाई बघेरा,एक कूदे तीन दूजा कूदे तेरा।एक भाषण तो फिर भी डेढ़ दो घंटे चलने के बाद थम गया था लेकिन तमाम किस्म के अन्य भाषण उपसंहार तक पहुंचे बिना अभी तक जारी हैं।यह सोशल मीडिया का ईजाद किया सोप ऑपेरा है। इस बीच साक्षी और सिन्धु ने ओलम्पिक में देश का नाम रोशम कर दिया। 'बहरहाल' के उपसर्ग के बाद रुके हुए भाषण फिर शुरू हो लिए जैसे टीवी पर कमर्शियल ब्रेक के बाद धारावाहिक पुन: चल पड़ें  ,अपनी गति से।अपनी धुन में रोते कलपते और रह रह कर चीत्कार करते । लालकिले वाले भाषण के साथ –साथ जो वनलाइनर ‘ट्रौल’ कर रहे थे,वे कुछ इस तरीके के थे जैसे फर्स्ट डे फर्स्ट शो में फिल्म देखने आया हुआ कोई फिल्म समीक्षक टाइप काअतिउत्साही दर्शक आगे से आगे फिल्म के कथानक का अंदाज़ा लगाता और आवाज़-ए-बुलंद उसका ऐलान करता  चले।हर मामले में अटकल लगाना हमारा नेशनल पासटाइम है जिसमें  हम पूरी मारक भावना के साथ खिलवाड़ करते हैं.वस्तुतः यह वह  खेल है जिसमें बंद लिफाफे में रखे अलिखित खत का  मज़मून भांपा ज…

मेरी आतुरता और देशभक्ति के सस्ते विकल्प

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स्वतंत्रता दिवस बेखटके चला आ रहा है। जगह-जगह झंडे और डंडे बिक रहे हैं। लोग मोल-तोलकर खरीद रहे हैं। 69 साल के आजाद तजुर्बे से हमने सीखा है कि ठेली पर जाकर सब्जी खरीदो या इलाज के लिए अस्पताल जाओ; गुमटी से पान लगवाओ या बच्चे का बीटेक में एडमिशन करवाओ, मोल-भाव जरूर करो, वरना ठग लिए जाओगे। हालांकि इसके बावजूद हम अक्सर ठग लिए जाते हैं। वैसे भी, दूध पीते हुए मुंह उन्हीं का जलता है, जो फूंक-फूंककर घूंट भरते हैं। स्वतंत्रता दिवस के बारे में सोच-सोचकर मेरा मन भी न जाने कैसा-कैसा हो रहा है। मुझे पहले तो लगा कि मेरा मन एसिडिटी के प्रकोप से अनमना हो रहा है। कुछ कैप्सूल भी निगले, लेकिन हुआ कुछ नहीं। दिल के भीतर देशभक्ति के भाव वैसे ही उमड़ रहे हैं, जैसे कोल्ड ड्रिंक में नमक मिलाने पर झाग। मैं भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कुछ कर गुजरने के लिए आतुर हूं। मेरे पास सीमित विकल्प हैं। मेरे पास सबसे सस्ता या लगभग मुफ्त का विकल्प तो यह है कि वाट्सएप के जरिये दोस्तों को देशप्रेम से ओत-प्रोत वीडियो या ऑडियो मैसेज भेज दूं। अपने फेसबुक प्रोफाइल पर तिरंगा लहरा दूं। टीवी के सामने बैठकर लाल किले के प्राचीर से आते…

ओलंपिक का समापन और चोर की दाढ़ी में तिनका

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रियो ओलंपिक का समापन हुआ। खेल खत्म, पैसा हजम। बच्चा लोग ताली बजाओ। अफसोस से झुकी गर्दनों को फिर अकड़ने दो। अब अगले चार साल तक कोई जोखिम नहीं। आओ अब आरोप-आरोप खेलें। बीच-बीच में जब ऐसा करते हुए मन उकताए, तो पदक जीतने वाली बेटियों की शान में कसीदे काढ़ लेंगे। मुल्क की जनता को बताते रहेंगे कि हमें सिर्फ गमगीन होना ही नहीं वरन विजय का जश्न मनाना भी आता है। हमें अपने मुकद्दर पर पछताना ही नहीं, गौरवान्वित महसूस करना भी आता है। एक अरब 25 करोड़ लोगों के लिए ये दो पदक ऐसे हैं, जैसे डूबते को तिनके का सहारा। मगर यह ध्यान रहे, अपने यहां चोर की दाढ़ी में भी तिनके का मिथकीय घोंसला पाया जाता है। जब तक ओलंपिक हुए, तब तक हर रात हम किसी अप्रत्याशित स्वदेशी जीत का सपना लेकर सोए और हर सुबह फेल्प्स या बोल्ट की अप्रतिम जीत की खबर सुनकर जागते रहे। वैश्विक परिदृश्य में खुद को रखकर मानवीय कामयाबी का यशगान करते रहे। लोगों को यह बता-बताकर आश्वस्त होते रहे कि पराजय की आद्र्रता भरे अंधकार में ही उजाले के अंकुर उपजते हैं। हर हार में जीत के अदृश्य गुलदान सजे होते हैं। ‘बेटर लक नेक्स्ट टाइम’ कहने से किसी की देशभक्ति पर…