मंगलवार, 23 अगस्त 2016

मुंह फुलाने की वजह


लालकिले से भाषण हो गया।हर बरस ऐसा ही होता है।इस बार अनेक समानांतर भाषण भी  हुए।एक से बढ़ कर एक।तब यह देशज कहावत बड़ी याद आई-शेर का भाई बघेरा,एक कूदे तीन दूजा कूदे तेरा।एक भाषण तो फिर भी डेढ़ दो घंटे चलने के बाद थम गया था लेकिन तमाम किस्म के अन्य भाषण उपसंहार तक पहुंचे बिना अभी तक जारी हैं।यह सोशल मीडिया का ईजाद किया सोप ऑपेरा है। इस बीच साक्षी और सिन्धु ने ओलम्पिक में देश का नाम रोशम कर दिया। 'बहरहालके उपसर्ग के बाद रुके हुए भाषण फिर शुरू हो लिए जैसे टीवी पर कमर्शियल ब्रेक के बाद धारावाहिक पुन: चल पड़ें  ,अपनी गति से।अपनी धुन में रोते कलपते और रह रह कर चीत्कार करते ।
लालकिले वाले भाषण के साथ साथ जो वनलाइनर ट्रौल’ कर रहे थे,वे कुछ इस तरीके के थे जैसे फर्स्ट डे फर्स्ट शो में फिल्म देखने आया हुआ कोई फिल्म समीक्षक टाइप का  अतिउत्साही दर्शक आगे से आगे फिल्म के कथानक का अंदाज़ा लगाता और आवाज़-ए-बुलंद उसका ऐलान करता  चले।हर मामले में अटकल लगाना हमारा नेशनल पासटाइम है जिसमें  हम पूरी मारक भावना के साथ खिलवाड़ करते हैं.वस्तुतः यह वह  खेल है जिसमें बंद लिफाफे में रखे अलिखित खत का  मज़मून भांपा जाता है। सिर्फ भांपा ही नहीं जाता ,उसकी व्याख्या भी की जाती है. यह खेल यदि ओलम्पिक में रहा होता तो हम कभी का रियो से गोल्ड मैडल लेकर स्वदेश आ गये होते।इसमें हमारे समक्ष टिकने वाला कोई न होता.
इतना  लंबा चौड़ा भाषण सुनने के बाद भी कुछ पारखी कह रहे हैं कि लो जी,अपने भाषण में मान्यवर ने सोलर कुकर,गोबर गैस प्लांट और चाइनीज़ मांझे के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं।कोई कह रहा है कि उन्हें कम से कम आलू टिक्की बर्गर के बढ़ते दामों और ब्रांडेड पिज्जा में घटते कुरकुरेपन पर तो कुछ न कुछ कहना ही चाहिए था।उन्होंने गिलगिट तक का जिक्र कर दिया तो क्या उन्हें रंग बदलने वाले गिरगिटों की बढ़ती जनसंख्या पर अपनी चिंता जगजाहिर नहीं करनी चाहिए थी?बलूचिस्तान की बात के साथ उन्हें अलूचे की खेती और उसके समर्थन मूल्य पर भी अपनी राय जनता के सामने रखनी चाहिए थी.सबके पास कोई न कोई चिंता है और मुंह को गुब्बारे की तरह फुलाने के लिए तमाम पुख्ता वजह।
भाषण के कंटेंट को लेकर कुछ तो इस तरह उदास और उत्तेजित हैं जैसे उनके टिफिन को कोई दुष्ट कौआ चुपके से ले उड़ा हो।जैसे किसी ने बिना पेंच लड़ाये ही उनकी आसमान चूमती  पतंग की डोर की हत्थे से काट दिया हो।ऐसे भी लोग हैं जो इस कदर कुपित है कि यदि  उनका बस चले तो मान्यवर को सफाई का मौका दिए बिना खड़े-खड़े ही बर्खास्त  कर दें।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

मेरी आतुरता और देशभक्ति के सस्ते विकल्प

स्वतंत्रता दिवस बेखटके चला आ रहा है। जगह-जगह झंडे और डंडे बिक रहे हैं। लोग मोल-तोलकर खरीद रहे हैं। 69 साल के आजाद तजुर्बे से हमने सीखा है कि ठेली पर जाकर सब्जी खरीदो या इलाज के लिए अस्पताल जाओ; गुमटी से पान लगवाओ या बच्चे का बीटेक में एडमिशन करवाओ, मोल-भाव जरूर करो, वरना ठग लिए जाओगे।
हालांकि इसके बावजूद हम अक्सर ठग लिए जाते हैं। वैसे भी, दूध पीते हुए मुंह उन्हीं का जलता है, जो फूंक-फूंककर घूंट भरते हैं। स्वतंत्रता दिवस के बारे में सोच-सोचकर मेरा मन भी न जाने कैसा-कैसा हो रहा है। मुझे पहले तो लगा कि मेरा मन एसिडिटी के प्रकोप से अनमना हो रहा है। कुछ कैप्सूल भी निगले, लेकिन हुआ कुछ नहीं। दिल के भीतर देशभक्ति के भाव वैसे ही उमड़ रहे हैं, जैसे कोल्ड ड्रिंक में नमक मिलाने पर झाग। मैं भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कुछ कर गुजरने के लिए आतुर हूं। मेरे पास सीमित विकल्प हैं।
मेरे पास सबसे सस्ता या लगभग मुफ्त का विकल्प तो यह है कि वाट्सएप के जरिये दोस्तों को देशप्रेम से ओत-प्रोत वीडियो या ऑडियो मैसेज भेज दूं। अपने फेसबुक प्रोफाइल पर तिरंगा लहरा दूं। टीवी के सामने बैठकर लाल किले के प्राचीर से आते भाषण को सुनकर आंखों के कोर को पोंछते हुए हथेली पीटूं। इससे फायदा यह होगा कि देशभक्ति के घरेलू प्रदर्शन के साथ-साथ स्वास्थ्य लाभ भी मिल जाएगा। हर्र लगे न फिटकरी, रंग हो जाए तिरंगा।
मैं देशप्रेमी हूं, इसमें तो कोई शक नहीं, मगर वह प्यार भी क्या, जो छलकता हुआ दिखाई न दे? जमाना ही ऐसा है, जिसमें जंगल में नाचने वाले मोर को भी नृत्य कला का प्रमाण देना पड़ता है। मैं असमंजस में हूं। इस मौके पर देशभक्ति के नारों का उद्घोष करने को जी चाहा, तो मैं क्या करूं? क्या जय हिंद, जय भारत या वंदे मातरम जैसे नारे लगा सकता हूं? मैंने जनता से सोशल मीडिया के जरिये पूछा है कि वे बताएं कि इस तरह के नारों को लगाने से मेरी सेक्युलर छवि पर कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा? देखते हैं कि देश की प्रबुद्ध जनता इस बारे में क्या कहती है।

ओलंपिक का समापन और चोर की दाढ़ी में तिनका


रियो ओलंपिक का समापन हुआ। खेल खत्म, पैसा हजम। बच्चा लोग ताली बजाओ। अफसोस से झुकी गर्दनों को फिर अकड़ने दो। अब अगले चार साल तक कोई जोखिम नहीं। आओ अब आरोप-आरोप खेलें। बीच-बीच में जब ऐसा करते हुए मन उकताए, तो पदक जीतने वाली बेटियों की शान में कसीदे काढ़ लेंगे।
मुल्क की जनता को बताते रहेंगे कि हमें सिर्फ गमगीन होना ही नहीं वरन विजय का जश्न मनाना भी आता है। हमें अपने मुकद्दर पर पछताना ही नहीं, गौरवान्वित महसूस करना भी आता है। एक अरब 25 करोड़ लोगों के लिए ये दो पदक ऐसे हैं, जैसे डूबते को तिनके का सहारा। मगर यह ध्यान रहे, अपने यहां चोर की दाढ़ी में भी तिनके का मिथकीय घोंसला पाया जाता है।
जब तक ओलंपिक हुए, तब तक हर रात हम किसी अप्रत्याशित स्वदेशी जीत का सपना लेकर सोए और हर सुबह फेल्प्स या बोल्ट की अप्रतिम जीत की खबर सुनकर जागते रहे। वैश्विक परिदृश्य में खुद को रखकर मानवीय कामयाबी का यशगान करते रहे। लोगों को यह बता-बताकर आश्वस्त होते रहे कि पराजय की आद्र्रता भरे अंधकार में ही उजाले के अंकुर उपजते हैं। हर हार में जीत के अदृश्य गुलदान सजे होते हैं। ‘बेटर लक नेक्स्ट टाइम’ कहने से किसी की देशभक्ति पर सवालिया निशान थोड़े लग जाने वाला है।
खेल खत्म हुए, तो अब लग रहा है कि हमारे भीतर अजीब खालीपन पसर गया है। जैसे बारात चली गई हो और झूठे बरतन,कागज की प्लेट व टिशु पेपर जनवासे में यहां-वहां पड़े रह गए हों। हवा के तेज प्रवाह में खनकते और बिखरते हुए। बात-बात पर मुंह बिसराने वाले बारात बहादुर अनायास निठल्ले हो गए हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि वे अब करें, तो क्या करें? कारवां गुजर गया है, तो चिंतकों ने आंख पर काले चश्मे चढ़ा लिए हैं, ताकि गुबार से सम्यक बचाव हो।
रियो के बाद लोगों की नजर देश की सीमाओं की ओर है। अब उनकी नजर इस फ्रंट के जरिये होने वाले मनोरंजन पर है। खेल न हो, तो यह खींचतान ही सही, कुछ न कुछ तो होना ही है जिंदगी जीने के लिए।