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October, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छोटे जी क्यों पकड़े गये?

छोटेजी धरे गये।बाली में पकड़े गये।उनकी उम्र इतनी बाली भी न थी फिर भी। बरेली में पकड़े जाते तो कुछ और बात होती। वहां गिरे मिथकीय झुमके को खोजता हुआ कोई भी अपनी सुधबुध खोकर गिरफ़्त में आ सकता है। बड़ेजी यह ढूँढ-ढकोल  जैसा फिजूल का काम नहीं करते।उनके पास इस तरह का काम करने के लिए तमाम तरह के कारिंदे हैं। यही वजह है कि वह मस्त रहते हैं-एकदम रिलेक्स।वह दोस्तों के साथ घर की बैठक में बैठकर मज़े से ‘पपलू’ खेलते है।वह लगातार जीतते जाते हैं।दोस्त लोग बड़ेजी के ताश कौशल पर हैरान हैं।अपनी जीत पर उनके ठहाके गली के बाहर नुक्कड़ तक साफ़ सुनाई देते हैं।बड़ेजी की बेगम पान के जोड़े के साथ धीरे हंसने की सलाह भिजवा चुकी हैं। मुलाज़िम कान में बता आया है कि छोटा पकड़ा जा चुका है। “जो पपलू नहीं खेलेगा वह पकड़ा ही जाएगा” ,कह कर वह इतनी जोर से हंसे कि दोस्त बिना वज़ह जाने उनकी हंसी-ख़ुशी में शामिल हो लिये। सारा ‘अंडरवर्ड’ ताज्जुब में है कि छोटा ‘घरघुसरा’ था फिर भी पकड़ा गया।बड़ेजी बिंदास रहते  हैं। खाते पीते  मौज़ करते हैं।दरियादिल इतने कि गुप्तचर भाइयों के प्रमोशन की  खातिर जहाँ -तहां जाकर फोटो भी खिंचवा आते  है।राशनकार्ड या ड…

भूकम्प आया तो क्यों आया

दिल्ली हिली।भूकम्प आया।यह पता नहीं कि कौन सी बात पहले हुई।अफगानिस्तान के हिन्दुकुश इलाके में हिंदुत्व के होने का पता पहले लगा या लुटियन ज़ोन में रखी अटकलों की  लुटिया पहले छलकी।लेकिन कुछ न कुछ हुआ ज़रूर जो लोग बिना हिलेडुले एक दूसरे से पूछने लगे- व्हाट हैप्पिंड।फ़ोन घनघना उठे।व्हाट्स एप पर चिंताओं की चीलें चिंचियाने लगीं।आशंकाओं की फिरकनी घूमने लगी।फेसबुक अचानक गुलज़ारहो गया।गुलज़ार जी का  गीत याद आने लगा- इब्नबतूता पहन कर जूता।दिक्कत तब आ खड़ी हुई कि उनकी उलटबांसियों जैसी कविताओं को लेकर लोगों के भीतर फिट मैमोरी कार्डों ने बगावत कर दी।तब मुनव्वर राणा बहुत याद आये।पर समस्या यह पैदा हुई कि उनके अशआरों में से कौन से वाले याद किये जाएँ और किन्हें दरकिनार किया जाए।इस बंदे के बारे में यही पता नहीं कि वह आखिर कौन से पाले में खड़ा है।भूकम्प के खिलाफ या उसके समर्थन में। दिल्ली में  भूकम्प आया तो भरी दोपहरी में आया।लंच टाइम के बाद तब आया जब शहर की औरतें डबल बैड पर लेट कर टीवी के रिमोट से घरेलू राजनीति के दांवपेंच सीखती हैं।आदमी अपने-अपने दफ्तरों में खाना खाकर ऊँघने के लिए मौका तलाशते हैं।दिहाड़ी मज़दूर …

धप्प से आया बाज़ार

अखबार आ गया।रबर के छल्ले में लिपटा हुआ।वह ‘धप्प’ की आवाज़ के साथ बॉलकनी में गिरा।मुझे पता  था कि उसमें देश दुनिया की तमाम खबरें होंगी।इंटरनेट और टीवी न्यूज़ चैनलों की सूचना क्रांति के बावजूद हर तरह के समाचारों के लिए अख़बार पर हमारा आदिम यकीन बरक़रार है।युगीन विश्वास इतनी जल्दी खत्म नहीं होते।कहा जाता है कि आइन्स्टीन की पढने की मेज पर घोड़े की नाल सजती थी।हमारे मुल्क में विदेश से चिकित्सा विज्ञान में परास्नातक की डिग्री लिए डाक्टर के क्लीनिक की चौखट पर हरीमिर्च और नीबू लटकते हैं।विज्ञान और ढकोसले सदा मजे से साथ -साथ रहते आये हैं।बीएमडब्लू के साथ तांगा खींचता मरियल घोड़ा बिना हीनभावना के साथ दुलकी चाल से चलता है। छोटे बड़े शहरों के ऊपरी मंजिल पर रहने वालों के लिए सुबह अमूमन बॉलकनी से होकर ‘धप्प’ की आवाज़ के साथ ही आती है।शहरों के अधिकांश मुर्गों को पता है कि उनकी हैसियत अब दाल से बदतर हो चली है। वह बांग देना अकसर भूलते जाते हैं।वैसे भी दाल के भाव आसमान छूने के साथ उनकी जान पहले से अधिक झंझट में जा फंसी है।सहमाहुआ मुर्गा हो या आदमी अपने काम से काम रखता है। उस दिन भी ‘धप्प’ से अख़बार आया।मैं क्रिक…

कहाँ है टोबा टेक सिंह?

वह कद में नाटा और शरीर से स्थूल है।वह फिजिकली छोटा मोटा है।उसे यकीन है कि वह लेखक कद्दावर है।एक दिन वह  ऊँचे दरख्त पर कुल्हाड़ी लेकर जा बैठा और उसी डाल को काटने लगा जिस पर बैठा हुआ था।एक राहगीर ने पूछ लिया–अरे भाई यह क्या करते हो? उसने  प्रश्नकर्ता की ओर हिकारत से  देखा।उसी तरह देखा जैसे महान लेखक अमूमन पाठक की तरफ देखते हैं।कहा -दिखता नहीं क्या?मैं पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलता हुआ यहाँ तक पहुंचा हूँ। “आप आखिर करना क्या चाह रहे हैं?” जिज्ञासु राहगीर असल में राहगीर नहीं सुबह-सवेरे टहलने वाला है।उसने जिरह जारी रखी।मार्निंग वॉकर स्वभावतः दार्शनिक टाइप के होते हैं।वह बात में से बात निकालते जाते हैं और संवाद का सिरा कभी गुम नहीं होने देते। “आपके पास कैमरा है?” ऊपर से आवाज़ आई जो दरअसल सवाल की शक्ल में थी।”आपके पास माइक है?” दूसरा सवाल भी पेड़ से नीचे उतरा। राहगीर अचकचाया।उसने अपने बचाव के लिए जेब से मोबाइल निकाल लिया।पहले जिस तरह संकट प्रकट होने पर आम आदमी लाठी डंडा या पत्थर उठाता था अब मोबाईल उठा लेता है। “मैं समझ गया।आप फेसबुक वाले है”।पेड़ से इस बार अनुमान नमूदार हुआ । -नहीं।मैं ब्लागर हूँ।क्या…

लौटाने के मौसम में न गलने वाली अरहर की दाल

मौसम आते जाते रहते हैं।सर्द गर्म तीखे नरम मस्त मुलायम।आजकल मुल्क के बुद्धिजीवियों के बीच पुरस्कार सम्मान आदि लौटाने आपाधापी मची है।वे पूरे मनोयोग से अकादमियों को प्रशस्ति पत्र वापिस कर रहे हैं। यह काम करते हुए उनके चेहरे उसी तरह तमतमाए हुए हैं जैसे उन्हें प्राप्त करते हुए चमचमाए हुए थे।वैसे उनका तमतमाना ‘बाई डिफॉल्ट’ चमचमाने जैसे ही है। दीवाली आ रही है। इसकी  भनक मिलते ही घर की साफ़ सफाई के लिए अभियान की रूपरेखा बनने लगती है। कम्युनल टाइप के लोग यह काम खुलेआम करते हैं। बुद्धिवादी लोग गुपचुप तरीके से करते हैं। समाज के सेक्युलर तानेबाने  के लिए यह  गोपनीयता जरूरी भी है। शैल्फ़ में सजे या दीवारों पर टंगे पुरस्कारों को लौटानाभी आवश्यक  है ताकि सरोकारों पर जमी धूल साफ़ हो और वे उसे नये रंग में रंगवा सकें। कल मैडम जी पूछ रही थीं – कालोनी के सारे लेखक कुछ न कुछ लौटा आये हैं ।आप कुछ न वापिस किये। -मेरे पास तो सिर्फ अपनी नादानियाँ हैं। कहो तो वही  लौटा दूं ? मैंने पूछा। -यह चीज तो रद्दीवाले भी न उठाते। तुम तो रहने ही दो। ।उन्होंने तुनक कर कहा। -अरे याद आया ।कहो तो बरसों पहले की गयी मूर्खता सौंप  दूँ …

डेंगू ,चिड़ियाँ ,गाय और भावुकता

डेंगू क्या आया, बेचारी चिड़ियों और गली मोहल्लों में भटकने वाली गायों को पीने के लिए साफ़ पानी मिलना दूभर हो गया।सबको पता लग गया कि डेंगू वाला मच्छर साफ़ पानी में पनपता है। चिड़ियों के लिए घर की छत पर रखे जलपात्र और सार्वजनिक नांद रीती कर दी गयीं।एक की वजह से दूसरे की जान सांसत में आ गयी। अब देखिये न ,बिल्ली छीके पर टंगी दूध मलाई की मटकी ढूंढती घर में आई तो सारे चूहे बिल में जा छिपे ,अलबत्ता वह मुंडेर बैठे कबूतर को चट कर गयी।मटकी फ्रिज में सुरक्षित बची रही।बिल्ली भी भूखी नहीं रही।सब अपने-अपने मंतव्यों में कमोबेश कामयाब रहे।कबूतर की जान गयी सो गयी बाकी चीज तो बचगयीं। यह बिल्लियों के लिए मनोनुकूल  समय है।उनके पास खुद को बनाये रखने के तमाम विकल्प हैं।वह दूध दही से लेकर चूहा और साग़भाजी से लेकर कबूतर तक सब खा लेती है। चटखारे लेकर खाती है लेकिन चपर चपर की आवाज़ को दूर तक नहीं जाने देती। दबे पाँव चलती है।चालाकी का होना उसके डीएनए में बताया जाता है। इस बात की पुष्टि अभी होनी बाकी है।अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर व्यंग्य रचा जाता है।आलोचना के लिए प्रमाणित लैब की जांच रिपोर्ट अपरिहार्य होती है। बिल्ली ने …