शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

छोटे जी क्यों पकड़े गये?


छोटेजी धरे गये।बाली में पकड़े गये।उनकी उम्र इतनी बाली भी न थी फिर भी। बरेली में पकड़े जाते तो कुछ और बात होती। वहां गिरे मिथकीय झुमके को खोजता हुआ कोई भी अपनी सुधबुध खोकर गिरफ़्त में आ सकता है। बड़ेजी यह ढूँढ-ढकोल  जैसा फिजूल का काम नहीं करते।उनके पास इस तरह का काम करने के लिए तमाम तरह के कारिंदे हैं। यही वजह है कि वह मस्त रहते हैं-एकदम रिलेक्स।वह दोस्तों के साथ घर की बैठक में बैठकर मज़े से ‘पपलू’ खेलते है।वह लगातार जीतते जाते हैं।दोस्त लोग बड़ेजी के ताश कौशल पर हैरान हैं।अपनी जीत पर उनके ठहाके गली के बाहर नुक्कड़ तक साफ़ सुनाई देते हैं।बड़ेजी की बेगम पान के जोड़े के साथ धीरे हंसने की सलाह भिजवा चुकी हैं। मुलाज़िम कान में बता आया है कि छोटा पकड़ा जा चुका है। जो पपलू नहीं खेलेगा वह पकड़ा ही जाएगा ,कह कर वह इतनी जोर से हंसे कि दोस्त बिना वज़ह जाने उनकी हंसी-ख़ुशी में शामिल हो लिये।
सारा ‘अंडरवर्ड’ ताज्जुब में है कि छोटा ‘घरघुसरा’ था फिर भी पकड़ा गया।बड़ेजी बिंदास रहते  हैं। खाते पीते  मौज़ करते हैं।दरियादिल इतने कि गुप्तचर भाइयों के प्रमोशन की  खातिर जहाँ -तहां जाकर फोटो भी खिंचवा आते  है।राशनकार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस बनवा कर उसकी फोटोस्टेट कॉपी उन्हें मुहेया करा देते हैं।बेगम को कह रखा है कि अपना कोई हिन्दुस्तानी भाईबंद जासूस या गोपीचंद आये तो उस बिना शर्बत पिलाये न जाने देना।बेगम मुंह सिकोड़ती तो कहते  कि बेफिक्र रहो।वे भी बाल बच्चे वाले हैं।वे अपना काम करने में  लगे हैं ,जैसे हम।आप उनकी आवभगत करती रहें।
छोटा हमेशा छुप कर रहा।किसी को अपने होने की भनक तक न लगने दी।घर और भेष बदलता रहा।बंद कमरे की सिर्फ दीवारों पर ही नहीं दरवाजे पर लगी सिटकनी से लेकर बिस्तर पर बिछी चादर तक पर शक करता रहा।न कभी खुल कर हँसा, न कभी ढंग से बोला।हरदम तीनसौ साठ डिग्री पर गर्दन घुमाता रहा।इसके लिए उसने गुपचुप गर्दन की सर्जरी तक कराई ताकि वह सरलता से चारों ओर घूम सके।
छोटा चौकस था।उसके पास रिवाल्विंग गर्दन थी।गोपनीय तंत्र था।फूंक-फूंक कर ‘चिल्ड’ दूध को पीने का मंत्र जानता था।तमाम तीन तिकड़म का पता था।दबे पाँव चलने में कुशल था, फिर भी वो पकड़ा गया।यदि कोई यक्ष होता  तो वह यह सवाल जरूर उठाता कि छोटा ही कयों पकड़ में आया?इसका सीधा सादा जवाब यह है कि बड़ा बड़ा होता है और छोटा छोटा ही होता है। लेकिन यक्ष जैसे लोग ऐसे जवाबों से संतुष्ट नहीं हुआ करते।
मैं धर्मराज नहीं एकदम दुनियादार हूँ।लेकिन मुझे इस प्रश्न का सटीक उत्तर पता है। पकड़ा वो जाता है ,जिसके पास जनसंपर्क (पीआर) का चातुर्य नहीं होता।यह बात सब जानते हैं कि जो पकड़ा जाए वो नौसिखिया चोर और जो धरपकड़ से बच निकले वह डाॅन ,जिसे तमाम मुल्कों की पुलिस ढूंढती नहीं ,छुप्प्म-छुपाई का खेल खेलती है।





मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

भूकम्प आया तो क्यों आया


दिल्ली हिली।भूकम्प आया।यह पता नहीं कि कौन सी बात पहले हुई।अफगानिस्तान के हिन्दुकुश इलाके में हिंदुत्व के होने का पता पहले लगा या लुटियन ज़ोन में रखी अटकलों की  लुटिया पहले छलकी।लेकिन कुछ न कुछ हुआ ज़रूर जो लोग बिना हिलेडुले एक दूसरे से पूछने लगे- व्हाट हैप्पिंड।फ़ोन घनघना उठे।व्हाट्स एप पर चिंताओं की चीलें चिंचियाने लगीं।आशंकाओं की फिरकनी घूमने लगी।फेसबुक अचानक गुलज़ार हो गया।गुलज़ार जी का  गीत याद आने लगा- इब्नबतूता पहन कर जूता।दिक्कत तब आ खड़ी हुई कि उनकी उलटबांसियों जैसी कविताओं को लेकर लोगों के भीतर फिट मैमोरी कार्डों ने बगावत कर दी।तब मुनव्वर राणा बहुत याद आये।पर समस्या यह पैदा हुई कि उनके अशआरों में से कौन से वाले याद किये जाएँ और किन्हें दरकिनार किया जाए।इस बंदे के बारे में यही पता नहीं कि वह आखिर कौन से पाले में खड़ा है।भूकम्प के खिलाफ या उसके समर्थन में।
दिल्ली में  भूकम्प आया तो भरी दोपहरी में आया।लंच टाइम के बाद तब आया जब शहर की औरतें डबल बैड पर लेट कर टीवी के रिमोट से घरेलू राजनीति के दांवपेंच सीखती हैं।आदमी अपने-अपने दफ्तरों में खाना खाकर ऊँघने के लिए मौका तलाशते हैं।दिहाड़ी मज़दूर हमेशा की तरह काम में जुटे होते हैं।छोले भटूरे वाला काम निबटा कर कढ़ाई मांजने की जुगत में होता है। चाय वाला व्यस्त रहता है।चायवाले अमूमन सबसे अधिक बिजी रहते हैं। उनके सपनों और बातों का भगौना हरदम खदबदाता रहता है।
भूकम्प आया तो सही। पर बेवक्त आया।इसे आना ही था तो कायदे से आता।पहले से बता कर आता।दरवाजा नॉक करके या गला खंखार कर आता।भलेमानस की तरह आता।
सोशल मीडिया वालों को तैयारी का मौका देता।उन्हें पहले से पता होता तो चाणक्य की तस्वीर के साथ अपने कथोकथन इधर-उधर चिपकाते।तुहर की दाल से भूकम्प का नाता जोड़ते।उत्तर भारत वाले बताते कि जब तक अरहर तुहर की दाल नहीं बनी थी तब तक भूकम्प आता भी था तो कितने सलीके से आता था।
खैर भूकम्प को आना था, सो आ गया।रिक्टर स्केल पर चाहे जिस तरह से आया ,धरती की सतह पर आकर ठिठक गया। कुछ दीवारें ,चंद पंखे और ड्राइंगरूम में रखे एकाध एक्वेरियम का पानी हिला कर चला गया।कुछ और चीजें भी हिली होंगी पर पूर्वसूचना न होने से सेल्फीवीर उनकी तस्वीर लेने से चूक गये।
अब सबको पता लग गया है कि अच्छा समय और भूकम्प कभी भी आ सकता है।इसलिए मोबाइल की बैटरी हर समय फुल रहनी चाहिए ताकि फेसबुक पर स्टेट्स फटाफट अपडेट किया जा सके।ऐसे मौकों के लिए अनमोल वचनों का रेडी स्टॉक डेस्कटॉप पर हिफ़ाज़त के साथ रखा होना जरूरी है।यही वह मौका होता है जब किसी को भी सराहा या गरियाया जा सकता है।भूकम्प से हानि हुई तो यह सरकार निकम्मी है। बच गये तो यह सरकार के सद्कर्म है।बाल ही बाल बचे तो इसका श्रेय खानपान की आदत,पूजा पद्धति या ऊपरवाले को दिया जा सकता है।
भूकम्प आने की भनक मिलते ही कुछ लोगों का तुरंत पता लग गया कि इसमें अतिवादी संगठनों  द्वारा फैलाई गयी धार्मिक असहिष्णुता का हाथ है।भूकम्प से दिल्ली हिली है तो पूरे मुल्क के भीतर भी कुछ न कुछ विचलन हुआ ही होगा।
बिहार के अलावा अन्य राज्यों में इसका  क्या असर हुआ ,यह बात ज़रा देर से पता लगेगी। अलबत्ता बिहार अपना हाल मतगणना वाले दिन बता देगा।

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

धप्प से आया बाज़ार


अखबार आ गया।रबर के छल्ले में लिपटा हुआ।वह ‘धप्प’ की आवाज़ के साथ बॉलकनी में गिरा।मुझे पता  था कि उसमें देश दुनिया की तमाम खबरें होंगी।इंटरनेट और टीवी न्यूज़ चैनलों की सूचना क्रांति के बावजूद हर तरह के समाचारों के लिए अख़बार पर हमारा आदिम यकीन बरक़रार है।युगीन विश्वास इतनी जल्दी खत्म नहीं होते।कहा जाता है कि आइन्स्टीन की पढने की मेज पर घोड़े की नाल सजती थी।हमारे मुल्क में विदेश से चिकित्सा विज्ञान में परास्नातक की डिग्री लिए डाक्टर के क्लीनिक की चौखट पर हरीमिर्च और नीबू लटकते हैं।विज्ञान और ढकोसले सदा मजे से साथ -साथ रहते आये हैं।बीएमडब्लू के साथ तांगा खींचता मरियल घोड़ा बिना हीनभावना के साथ दुलकी चाल से चलता है।
छोटे बड़े शहरों के ऊपरी मंजिल पर रहने वालों के लिए सुबह अमूमन बॉलकनी से होकर धप्प की आवाज़ के साथ ही आती है।शहरों के अधिकांश मुर्गों को पता है कि उनकी हैसियत अब दाल से बदतर हो चली है। वह बांग देना अकसर भूलते जाते हैं।वैसे भी दाल के भाव आसमान छूने के साथ उनकी जान पहले से अधिक झंझट में जा फंसी है।सहमाहुआ मुर्गा हो या आदमी अपने काम से काम रखता है।
उस दिन भी धप्प से अख़बार आया।मैं क्रिकेट के स्लिप के खिलाड़ी की तरह डाइव मारकर उसे लपकने के लिए लपका। कैच छूट गया।वो तो छूटना ही था।गेंद हो या अख़बार जब तक हवा में रहते हैं, कोई आवाज़ नहीं करते। गिरते हैं तो धप्प करते हैं।तब दर्शक या पाठक के मुहं से निकलता है –ओह। मैंने अखबार हाथ में थामा तो तुरंत कह उठा –अहा। अहा इसलिए क्योंकि फ्रंटपेज पर खबर नहीं किसी ऑनलाइन पोर्टल का दीवाली बोनान्जा का विज्ञापन सजा था।तरह तरह के इलेक्ट्रानिक उपकरणों की नयनाभिराम तस्वीरों और अविश्वसनीय ऑफर के साथ। मुझे पता था कि नीचे कहीं कंडीशंस एप्लाई शब्द जरूर  दुबका होगा।
इस बीच मैंने इंडेकशन स्टोव पर चाय का पानी रखा। अख़बार का पन्ना उलटा। वहां बाज़ार पसरा था। बत्तीस जीबी के मैमोरी कार्ड से लेकर पावर बैंक और लेडीज नाईट वियर से लेकर लेपटॉप तक सब कुछ वहां था।उसमें खूब खरीददारी करके दीपावली को ढंग  से सेलिब्रेट करने की बात की गयी थी।इसी तरह आगे के पेज थ्री और पेज फोर पर कोई न कोई अपना सामान लिए बैठा दिखाई दिया। सबके पास मेगा सेल थी।रिबेट का प्रलोभन था।लक्ष्मी गणेश जी हर जगह नेपथ्य में मुस्कराते दिख रहे थे।मुझे लगा बाज़ार ने पर्व मनाने की नयी तकनीक दे दी है।हो सकता है अब दिवाली के दिये पावर बैक से जलें।लेपटॉप पर लक्ष्मी जी की आरती हो।बिकनी पहन कर त्यौहार का जश्न मने।मैमोरी कार्ड में ऐतिहासिक उमंग सलीके से सहेजी जाए।
पेज पांच पर जब तक मैं पहुंचा तो चाय का पानी उबलने लगा। मैंने झटपट चाय की पत्ती चीनी दूध डाला। अख़बार पर नजर डाली तो वहां खबरें मौजूद थीं।बेहद लज्जित सी।अपने में सिकुड़ी हुई ।उनको भी लग रहा होगा कि अब हमारी यही औकात रह गयी है।बाज़ार बड़ों बड़ों की दुर्गति कर देता है।इस बीच चाय भगोने से बाहर उबलने को थी कि मैंने लपक के इंडेकशन ऑफ किया।
चाय का सिप लेते हुए खबर पढनी शुरू की।किसी विकास योजना के उद्घाटन की बासी खबर मिली।किसी मंत्री द्वारा अपने भाषण में की गयी साहित्य संस्कृति की मौलिक मीमांसा दिखी।किस रंग और प्रजाति का कुत्ता घर में पालना मुफीद होगा, ऐसी एडवाइजरी टाइप  अंतराष्ट्रीय खबर पढ़ने को मिली।
मैं समझ गया कि अब आने वाले दिनों में सुबह की धमाकेदार शुरुआत विभिन्न विज्ञापनों के जरिये आने वाले मेगा ऑफर के जरिये ही होनी है।बाज़ार बड़ी मुश्किल से खबरों के लिए स्पेस छोड़ेगा।

   


कहाँ है टोबा टेक सिंह?


वह कद में नाटा और शरीर से स्थूल है।वह फिजिकली छोटा मोटा है।उसे यकीन है कि वह लेखक कद्दावर है।एक दिन वह  ऊँचे दरख्त पर कुल्हाड़ी लेकर जा बैठा और उसी डाल को काटने लगा जिस पर बैठा हुआ था।एक राहगीर ने पूछ लिया–अरे भाई यह क्या करते हो? उसने  प्रश्नकर्ता की ओर हिकारत से  देखा।उसी तरह देखा जैसे महान लेखक अमूमन पाठक की तरफ देखते हैं।कहा -दिखता नहीं क्या?मैं पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलता हुआ यहाँ तक पहुंचा हूँ।
“आप आखिर करना क्या चाह रहे हैं?” जिज्ञासु राहगीर असल में राहगीर नहीं सुबह-सवेरे टहलने वाला है।उसने जिरह जारी रखी।मार्निंग वॉकर स्वभावतः दार्शनिक टाइप के होते हैं।वह बात में से बात निकालते जाते हैं और संवाद का सिरा कभी गुम नहीं होने देते।
“आपके पास कैमरा है?” ऊपर से आवाज़ आई जो दरअसल सवाल की शक्ल में थी।”आपके पास माइक है?” दूसरा सवाल भी पेड़ से नीचे उतरा।
राहगीर अचकचाया।उसने अपने बचाव के लिए जेब से मोबाइल निकाल लिया।पहले जिस तरह संकट प्रकट होने पर आम आदमी लाठी डंडा या पत्थर उठाता था अब मोबाईल उठा लेता है।
“मैं समझ गया।आप फेसबुक वाले है”।पेड़ से इस बार अनुमान नमूदार हुआ ।
-नहीं।मैं ब्लागर हूँ।क्या अपने पर्सनल ब्लॉग के लिए तस्वीर ले सकता हूँ?उसके इस सवाल में सोशल मीडिया वाली जल्दबाजी है ।राहगीर कम मार्निंग वॉकर कम ब्लॉगर ने गुलेल की तरह मोबाईल पेड़ वाले की और ताना और पूछा,आपका नाम?पेड़ से कोई जवाब नहीं आया । उसने अपना सवाल बुलंद आवाज़ में फिर दोहराया।ऊपर वाला चुप रहा।जब तीसरी बार यही सवाल फिर आया तो पेड़ की कोटर में बैठे उल्लू ने आखें मिचमिचाते हुए बाहर झाँका और बताया: वह अपनी निजी जानकारी अजनबियों से शेयर नहीं करता।
“क्या आप उनके प्रवक्ता हैं?”जमीन से उठा सवाल कोटर तक गया।
“प्रवक्ता नहीं उनका वेल विशर।जब से आदमी आदमी की जान का दुश्मन बना है तब से हम उसके शुभचिंतक बन गये हैं”।उल्लू ने बताया और फट से कोटर का दरवाज़ा बंद कर लिया ।
राहगीर ने हुम्म किया  और बडबडाता हुआ अपने रास्ते चल दिया।उसने ब्लॉग पर सारा वाकया लिखा। पेड़ पर टंगे ‘छोटे मोटे’ की तस्वीर चस्पा की ।उसे फेसबुक और ट्विटर पर शेयर किया।पोस्ट वायरल हो गयी।कुछ ही देर में पेड़ के नीचे मीडिया का जमघट लग गया।
पेड़ पर बैठे आदमी ने कुल्हाड़ी को बगल की डाल पर अटका दिया।जेब से कंघा निकाल कर बाल संवारे ।कमीज का कॉलर दुरुस्त किया।
“आपका नाम?” नीचे से पहला सवाल आया।
”सिर्फ काम की बात करें”।ऊपर से सुझाव मिला।
”आप वहां क्यों टंगे हैं”? किसी ने पूछा।
”इस असहिष्णु और क्रूर समय में लेखक यहीं सुरक्षित रह सकता है”, जवाब मिला।
”कैसे कैसे”? अनेक प्रश्न एक साथ आये।
“पेड़ शरण देने से पहले मजहब नहीं पूछता।इसकी कोटर में रहने वाले उल्लू उदार हैं ।मेरी पर्सनल फ्रीडम की कद्र करते हैं”।ब्रेकिंग न्यूज़ –ब्रेकिंग न्यूज़ ,पेड़ के नीचे चीख पुकार शुरू हुई “आपका नाम क्या है सर?” नीचे से ससम्मान गुहार हुई ।“मेरा नाम है बिशन सिंह वल्द सआदत हसन मंटो।मजहब जेड़ा नाम मुहब्बत।
“आप पेड़ पर बैठ कर क्या रहे हैं”? सवाल में हैरानी थी।
“मैं अपना पिंड टोबा टेक सिंह ढूंढ रहा हूँ”? आपको पता हो तो बताएं? आवाज़ में नमी थी जिसे सबने महसूस किया।
“आप आखिर कहना या करना क्या चाहते हैं? मीडिया वालों ने पूछा।
औपड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि तुर दि दाल आफ दि बीफ़ ते कलबुर्गी ते अकादमी अवार्ड”।पेड़ की डाल पर बैठे आदमी ने तल्ख स्वर में कहा और कुल्हाड़ी से फिर वही डाल काटने लगा जिस पर वह बैठा था।

मेरा नाम बिशन सिंह..... नहीं..... कबीर है.....नहीं नही......कालिदास है।वह बुदबुदाता रहा।मीडिया वाले उसके डाल से गिरने या उतरने का इंतजार किये बिना आगे बढ़ लिये।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

लौटाने के मौसम में न गलने वाली अरहर की दाल


मौसम आते जाते रहते हैं।सर्द गर्म तीखे नरम मस्त मुलायम।आजकल मुल्क के बुद्धिजीवियों के बीच पुरस्कार सम्मान आदि लौटाने आपाधापी मची है।वे पूरे मनोयोग से अकादमियों को प्रशस्ति पत्र वापिस कर रहे हैं। यह काम करते हुए उनके चेहरे उसी तरह तमतमाए हुए हैं जैसे उन्हें प्राप्त करते हुए चमचमाए हुए थे।वैसे उनका तमतमाना ‘बाई डिफॉल्ट’ चमचमाने जैसे ही है।
दीवाली आ रही है। इसकी  भनक मिलते ही घर की साफ़ सफाई के लिए अभियान की रूपरेखा बनने लगती है। कम्युनल टाइप के लोग यह काम खुलेआम करते हैं। बुद्धिवादी लोग गुपचुप तरीके से करते हैं। समाज के सेक्युलर तानेबाने  के लिए यह  गोपनीयता जरूरी भी है। शैल्फ़ में सजे या दीवारों पर टंगे पुरस्कारों को लौटाना भी आवश्यक  है ताकि सरोकारों पर जमी धूल साफ़ हो और वे उसे नये रंग में रंगवा सकें।
कल मैडम जी पूछ रही थीं – कालोनी के सारे लेखक कुछ न कुछ लौटा आये हैं ।आप कुछ न वापिस किये।
-मेरे पास तो सिर्फ अपनी नादानियाँ हैं। कहो तो वही  लौटा दूं ? मैंने पूछा।
-यह चीज तो रद्दीवाले भी न उठाते। तुम तो रहने ही दो। ।उन्होंने तुनक कर कहा।
-अरे याद आया ।कहो तो बरसों पहले की गयी मूर्खता सौंप  दूँ किसी को? मैंने कहा।
मैडम जी को मेरी कही  बात ठीक से समझ न आई तो उन्होंने पलकें ठीक उसी तरह झपझपाई जैसे ड्राइंग रूम के शोकेस में दशकों से रखी जापानी गुड़िया जरा- सा हिलने पर झपकाती है।यह गुड़िया कभी प्यार में आकंठ डूबे युवक ने अपनी प्रेयसी पत्नी को दी थी। इस जापानी गुड़िया का जानने लायक अतीत सिर्फ इतना  है कि उसे लाने वाला युवक मैं था।
-अरे हाँ याद आया। उस जापानी गुड़िया को लौटा दूं। शोकेस में जगह बनेगी तो वहां कोई रिमोट वाला गुड्डा  लाकर रख देंगे।
मैडम जी को यह तो लगा कि मैंने कोई चुभती हुई बात कही ।पर वह उसे ठीक से समझ न पाई तो बोली –अजी बातें बनाना बंद करो और जाओ,परचूनिए को अरहर की वो दाल वापस दे आओ ,जो लाख कोशिशों के बाद और प्रेशर कुकर द्वारा सीटी दर सीटी बजाने के बावजूद गलती नहीं। यह कह उन्होंने दाल मुझे थमा दी।
दो सौ रुपये प्रति किलोग्राम वाली दाल का पैकेट लिए मैं सोच रहा हूँ कि क्या खुद को लेखक मानने की गलतफहमी के बावजूद बस यही चीज है हमारे पास वापस लौटाने के लिए?

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

डेंगू ,चिड़ियाँ ,गाय और भावुकता


डेंगू क्या आया, बेचारी चिड़ियों और गली मोहल्लों में भटकने वाली गायों को पीने के लिए साफ़ पानी मिलना दूभर हो गया।सबको पता लग गया कि डेंगू वाला मच्छर साफ़ पानी में पनपता है। चिड़ियों के लिए घर की छत पर रखे जलपात्र और सार्वजनिक नांद रीती कर दी गयीं।एक की वजह से दूसरे की जान सांसत में आ गयी। अब देखिये न ,बिल्ली छीके पर टंगी दूध मलाई की मटकी ढूंढती घर में आई तो सारे चूहे बिल में जा छिपे ,अलबत्ता वह मुंडेर बैठे कबूतर को चट कर गयी।मटकी फ्रिज में सुरक्षित बची रही।बिल्ली भी भूखी नहीं रही।सब अपने-अपने मंतव्यों में कमोबेश कामयाब रहे।कबूतर की जान गयी सो गयी बाकी चीज तो बच गयीं।
यह बिल्लियों के लिए मनोनुकूल  समय है।उनके पास खुद को बनाये रखने के तमाम विकल्प हैं।वह दूध दही से लेकर चूहा और साग़भाजी से लेकर कबूतर तक सब खा लेती है। चटखारे लेकर खाती है लेकिन चपर चपर की आवाज़ को दूर तक नहीं जाने देती। दबे पाँव चलती है।चालाकी का होना उसके डीएनए में बताया जाता है। इस बात की पुष्टि अभी होनी बाकी है।अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर व्यंग्य रचा जाता हैआलोचना के लिए प्रमाणित लैब की जांच रिपोर्ट अपरिहार्य होती है।
बिल्ली ने कबूतर मार कर खाया,यह बात तो पक्की है। लेकिन कब और क्यों खाया , इसकी पड़ताल होनी शेष है। यह बात यदि सही हो कि वह नौ सौ चूहे खाकर तीर्थाटन कर आई थी ,इससे यह साबित नहीं होता कि वह मासूम है। वैसे भी भोजन की परम्परा से किसी का सदाचरण तय नहीं होता।भोज्य पदार्थों में मिलावट के जरिये धनकुबेर बनने वाले अकसर बड़े धार्मिक बने दिखते हैं।मुल्क की अस्मिता को मुनाफ़े की तराजू पर रख पर बेच देने वाले पर्यावरण संरक्षण के हक़ में सबसे पहले नारा बुलंद करते हैं।नकली दवाइयों का कारोबार करने वाले समाजसेवी के गेटअप में देवदूत टाइप के लगते हैं।
यह कांव कांव करने वाले कौओं ,पल पल रंग बदलते गिरगिटों ,उभयलिंगी मच्छरों, स्वामिभक्त कुत्तों, मुहं बिचकाने वाले बंदरों और हर बात पर चुप्पी साध लेने वालों के लिए ठीकठाक समय है। बाकी लोगों को बचे रहने के लिए दूसरे की थाली में रखी रोटी की जात की मुखबरी करनी  होगी।थाली में रखी सब्जी का धर्म बताना होगा। किसी न किसी टोली में शामिल होकर जैकारा करना होगा ।
ध्यान रहे , डेंगू का वायरस मौसमी है,बीत जायेगा। जब तक वायरस सक्रिय रहेगा चिकित्सा का धंधा करने वालों के यहाँ उत्सव का सा माहौल रहता है।गरीबी भूख,प्यास और कुपोषण के जरिये कोई वोटबैंक नहीं बनता। इससे किसी नेता की छवि न निर्मित होती है ,न बिगड़ती है। इसलिए इस पर कोई डिबेट नहीं होती ।आहार  की प्रकृति के अनुसार सेक्युलरिज्म का सार्टिफिकेट जारी होता  है। दूसरों को चिढ़ा चिढ़ा कर खाने खिलाने से अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रकट होती है। इससे पता चलता है कि आप मुल्क के दस प्रतिशत विद्वानों की जमात में हैं।इस पर बयान दर बयान जारी होते हैं।   
चिड़ियों के लिए रखे पानी के पात्र देर-सवेर भर दिए जायेंगे। गायों के लिए सेवाभाव से दिया जाने वाला चारा और पानी फिर मिलने लगेगा। आजकल हमारी भावुकता जरा सहमी हुई है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।