खेल जैसा खेल न हुआ


खेल खेल ही होता है।इसमें एक जीतता तो दूसरा हार जाता है।चुपचाप बैठ कर निरपेक्ष भाव से खेल को सिर्फ निहारने अधिक स्वास्थ्यवर्धक कुछ हो ही नहीं सकता।न दिल जोर -जोर से धडकता है और न मुट्ठियाँ बाँधने या दांत भींचने की जरूरत पड़ती है। कमजोर दिल वालों के लिए हार्ट अटेक का खतरा भी उत्पन्न नहीं होता।देह की शिराओं में रक्त प्रवाह नॉर्मल बना रहता है। और तो और जयकारे लगाने में ऊर्जा का अपव्यय भी नहीं होता।दर्शक जब तक तटस्थ दृष्टा बने रहते हैं तब तक वाकई वे एकदम भद्र पुरुष लगते हैं और खेल एकदम जेंटिलमैन टाइप का स्पोर्ट।कोई जीते,कोई पराजित हो –इससे हमें क्या टाइप का चिंतन उपजता है।
दो टीम के खिलाडियों के खेल कौशल के मध्य जब मुल्क ,जज्बात,राजनीति और बाज़ार आ जाते हैं तब खेल खेल न रह कर छायायुद्ध बन जाता है।यह अलग बात है कि कुछ लोग इसे  देशप्रेम की डिफॉल्ट अभिव्यक्ति कहते और मान कर चलते हैं।यह सबको पता है कि जंग ,मोहब्बत और क्रीड़ापूर्ण हुडदंग में हर बात और वारदात  जायज़ होती है।चीखना चिल्लाना, गाली गलौच, उछलना -कूदना ,हथेली पीटना ,पटाखे फोड़ना आदि भी इसका अपरिहार्य हिस्सा होता है।वैसे कहा और माना तो  यही जाता है कि ऐसे नाज़ुक वक्त पर ही पता लगता है कि किसके भीतर भक्तिभाव के ज्वालामुखी में खौलता हुआ लावा किस मिकदार में है।देशभक्ति और देशद्रोही के सर्टिफिकेट वितरित करने के लिए यह लिटमस टैस्ट का दुर्लभ मौका भी  होता  है और कमोबेश दस्तूर भी।
हमेशा की तरह इस बार भी एक देश की टीम हार गयी।दूसरी जीत गयी।इनाम, इकराम, ट्राफी और ख़िताब जिन्हें मिलने थे मिल  गये।न किसी ने गम से बोझिल अढ़ाई मन के सिर को हथेलियों में थामा,न पुराने टीवी सेट को मीडिया के कैमरों के सामने फोड़ा, न किसी ने लड्डुओं का भोग लगवाया,न घंटे घड़ियाल बजे  और  न कोई क्रिकेट का कुल देवता अवतरित हुआ।न किसी खलनायक बने खिलाड़ी के घर को उन्मादियों ने घेरा।  सिर्फ इतना ही नहीं,कोई ‘शांतिदूत’ पड़ोसी के चकनाचूर हुए टीवी के लिए सद्भावना का ‘क्विक -फिक्स’ देने की पेशकश करता भी दृष्टिगोचर नहीं  हुआ।मानना होगा कि इस बार खेल तो हुआ लेकिन खेल जैसा बाकायदा खेल न हुआ।इकहरा खेल हुआ। खेल के भीतर कई खेल न हुए। यदि हुए  भी हों  तो उनका स्टिंग टाइप का भंडाफोड़ नहीं हुआ। मैदान में हुए खेल तभी सनसनी पैदा करते हैं  जब अदृश्य ताकतें अपना काम ज़रा ढंग से करती हैं।जब दो दलों की हार और जीत में तेईसवें खिलाड़ी के सक्रिय रूप से  उपस्थित होने का पुष्ट या अपुष्ट सुराग मिल जाता है।
इस बार चौके छक्के तो खूब जड़े गये ।हारते –हारते टीमें जीती और लगभग मैच जीत चुकी टीम अंततः पराजित भी हुई।आखिरी ओवर की चार गेंदों पर चार गगनचुम्बी छक्के भी लगे।पर सच यही है कि  वैसा मज़ा नहीं आया जैसे मजे की लोग आस लगाये थे।पैसा वसूल नहीं हुआ।विजेताओं ने मैदान में खूब धमाल किया लेकिन उनके कमाल में मन रमा नहीं।
शायद वक्त बदल गया है।अब अब्दुल्ला इतने मासूम नहीं रहे कि बेगानी शादी में प्रेमदीवानी मीरा की तरह मगन होकर नाचने लगें।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ओलंपिक का समापन और चोर की दाढ़ी में तिनका

मुंह फुलाने की वजह

जलीकट्टू और सिर पर उगे नुकीले सींग