मानसून का देरी से आना और उपलब्ध विकल्पों का खुलापन


मौसम विभाग ने बता दिया है कि इस बार केरल में मानसून एक हफ्ता विलम्ब से आएगा।यह बात बताने का उसका अंदाज़ ऐसा रहा जैसे कि मानसून आया तो आया और न आया तो उसके भरोसे मत रहियो।अपने लिए बादल, बरखा, भीगी धरती की सौंधी गंध, रेन डांस, पकौड़ी की चाहत और तरल गरल रूमानी यादों आदि का इंतेज़ाम खुद ही कर लेना।विभाग ने समय रहते चेता दिया ताकि कोई गफलत न रहे।विभाग का काम है जनता को सावधान करना।ठीक उसी तरह से अवगत कराना जैसे दुकान या दफ्तर के बाहर यह बोर्ड लगा देना कि सावधान आप कैमरे की निगरानी में हैं।लेकिन अपने समान की हिफाजत खुद करें।
मौसम विभाग और सरकार की वैधानिक चेतावनी को शायद ही कोई गम्भीरता से लेता हो।जिस तरह हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता आदमी शायद ही सिगरेट की डिब्बी पर छपी ‘स्टेच्युरी वार्निंग’ को देखता या पढ़ता है ,उसी तरह बारिश के मौसम का लुत्फ़ उठाने की इच्छा रखने वाले उमड़ती घुमड़ती बदली के सहारे हाथ पर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहते।वे बारिश से जुड़े प्रत्येक साजोसामान की परफेक्ट व्यवस्था रखते हैं ,जैसे मांगलिक आयोजन पर जी भर उधम मचाने  वाले 'डीजे' के इंतजाम के साथ अपने बत्तीस जीबी की पेनड्राइव में मनभावन संगीत का जखीरा और जेनरेटर के लिए भरपूर  डीजल की व्यवस्था रखते हैं।लब्बेलुबाब यह कि अब लोग हर मौके पर तमाम उपलब्ध विकल्प खुले और उपलब्ध रखते हैं।
बारिश के दिनों वाली  मस्ती के तलबगार जानते हैं कि सावन आये या न आये ,जिया जब झूमे सावन है।वे जिया को झुमाने वाले रसायनों की कीमियागरी में माहिर हैं।सबको पता है कि घोड़े बेचकर मिलने वाली नींद को उनकी फिजिकल खरीद फरोख्त किये बिना चंद मिलीग्राम प्रशांतक की गोली  के जरिये पाया जा सकता है।बारिश के अहसास को पाना भी अब अधिक मुश्किल नहीं।बात सिर्फ मन मस्तिष्क में उठने वाली झुरझुरी की तो है,उसके लिए आवश्यक तामझाम बाज़ार के बंद या खुले दरवाज़ों के पीछे  मिल ही जाते हैं।
अब सचमुच की बारिश का इंतजार सिर्फ कागज की नाव तैराने वाले बचकाने नाविक करते हैं।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जलीकट्टू और सिर पर उगे नुकीले सींग

भगत जी ,जगत जी और मस्तराम की पकौड़ी

शराफ़त नहीं है फिर भी....