मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

तेरा कुछ ना होगा कालिया!


शोले वाले गब्बर की बड़ी याद आ रही है।उसके रिवाल्वर में छ: की जगह तीन गोलियां थी।मरने लायक भी तीन थे।तीनों बचे।बचे तो गब्बर हँसा। बोला,तीनों बच गये। तीनों के तीनों बच गये स्स्स...।वे भी हँसे तो गब्बर ने  गोलियां चला दीं।वे मर गये।काम तमाम हो गया।तीनों को उनकी करनी की सज़ा मिल गयी।झटपट मामला निपट गया।फिल्म हिट हो गयी।
अभिनेता की गाड़ी ने फुटपाथ पर सोते लोगों को ‘हिट’ किया। उन्हें सम्भलने का मौका भी नहीं दिया।सोने वाले चिरनिद्रा में चले गये।मुकदमा चला।चलता रहा।घिसटता रहा।नये से नये पेंच सामने आते रहे।दांवपेंच चलते रहे।उठापटक होती रही। दलील दर दलील दी जाती रहीं।नूरा कुश्ती होती रही।न्याय का हथोड़ा उठा और फिर हवा में ठहर गया।ठहरा तो ठहरा ही रहा।हवा में ठिठका काठ का हथोड़ा दर्शकों को  भरमाता रहा।उनमें से कुछ की तो साँस ही अटक गयी।रुक-सी गई।रुक-रुक कर चलती रही।न्याय की देवी की आँखें,बंधी हुई पट्टी के नीचे खुलबंद होती रहीं।निचली अदालत से ऊँची अदालत में मामला सरक आया।पहले सजा बुली।सज़ा की न्यूज़  ‘ब्रेक’ होने को  थी कि न्याय की  मुस्तैद कुर्सी ने आनन फानन में जमानत दे दी।सब कुछ पलक झपकते हुआ।टीवी पर आँख गड़ाये बैठे पारंपरिक रोमांचप्रेमी मनमसोस कर रह गये।न्याय की यह जल्दबाजी बर्दाश्त नहीं हुई।
दर्शकों को लगता रहा कि कानून के लंबे हाथ अभिनेता के गले तक अब पहुंचे कि तब पहुंचे।लेकिन नहीं पहुंचे।रुपहले लोगों तक कानून के हाथ पहुँचते-पहुँचते अकसर यूँही ठिठक जाते हैं।लोकप्रियता का अपना भोकालहोता है।ये लोग सदा ‘हिट’ रहते हैं।हिट रहते हैं तो हर हाल में ‘फिट’ रहते हैं। हर व्यवस्था में फिट बैठ जाते हैं।ये चलती हुई गाड़ी में पैर पर पैर रखे चैन से पसरे ऊँघते हैं।इनकी गाड़ी खुद-ब-खुद चलती है।जेसिका लाल गोली लगने से मरी थी।शुरू में यही कहा गया था कि उसे किसी ने नहीं मारा।दरअसल वह बेचारी तो सीधी सादी गति से जाती गोली के सामने पड़ गई थी।जिसने भी यह बात सुनी,उसी ने मुस्करा के कहा था-च्च...च्च...बेचारी।
अब भी यही बात सामने आई है कि नींद में चलते लोग फुटपाथ पर खरामा-खरामा चलती गाड़ी के चक्के के नीचे नासमझी के चलते आ गये।च्च...च्च... बेचारे!
अंततः कुर्सी ने गहन चिंता के साथ फैसला सुनाया।अभिनेता ससम्मान बरी हुए।उनकी रिहाई बाध्यता थी।जनभावना के अनुरूप थी।अभिनेता जी को सशरीर अदालत में आना पड़ा,यह न्याय की जीत है,इससे यही साबित हुआ।उनको बुलाना न्यायिक रूप से बाध्यकारी था,वरना न्याय को पुड़िया में बाँध कर उनके बंगले पर भी भिजवाया जा सकता था।अभिनेता के तमाम पंखे (फैन) बिना करेंट के हर्षातिरेक  से फड़फड़ा उठे।सबको पता लगा कि हर्ष की अतिशयता से विद्धुत ऊर्जा उपजती है।
गैर इरादतन का मसला तो मजे-मजे में सुलझ गया।अब काले हिरण की इरादतन हत्या का मामला बचा है।
कोई उनकी मृतात्मा से यह न पूछे कि तेरा क्या होगा कालिया।श्याम वर्ण को कालिया कहना ‘रेशियल’ कमेन्ट है।मृग बुरा मान जायेंगे।



गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

ग्लोबल वार्मिंग बनाम लोकल वार्मिंग


पेरिस में दुनिया भर के मुल्क जलवायु परिवर्तन के मसले पर विचार करने के लिए एकत्र हुए हैं।वहां कुल जमा कितने देश हैं, इसका किसी को ठीक से पता नहीं।जिस होटल में वे ठहराए गये हैं,उनका कहना है कि वे 200 हैं। जबकि गूगल की बात पर यकीन किया जाये तो सर्वमान्य और विवादग्रस्त मुल्कों की संख्या 181 से लेकर 189 के बीच है। इससे तो यही पता लग रहा है कि मुल्कों को गिनना भी मेंढक तोलने जैसा है।गूगल वाले कन्फ्यूज़ हैं और होटल वाले मुतमईन।वे ‘भूलचूक लेनी देनी’ की सदाशयता के साथ ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर के समय पूरी  दो सौ प्लेट गिन पा रहे हैं।
पेरिस में ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा गरमाया हुआ है।हमारे यहाँ दफ़्तर के बाबूओं के चेहरे तमतमाए हुए हैं।ठण्ड आ पहुंची है और स्टोरकीपर रूम हीटरों के मरम्मत के लिए टेंडर की फ़ाइल दबाये बैठा है।ऑफिस का वातावरण इस मुद्दे पर इतना गरमाया हुआ है कि बाबू लोगों का बस चले तो वे अपनी-अपनी कमीजें उतारकर खूंटियों पर टांग दें।यदि बड़े साहब के पास उनकी लीव ट्रेवल कन्सेशन(एलटीसी) की  फ़ाइल पैंडिंग पड़ी नहीं रह गयी  होंती तो वे पेरिस जाकर अपनी प्रॉब्लम की फ़ाइल को फ़ीते से बाँध कर नोट ज़रूर ‘पुटअप’ कर आते।
ठण्ड आ रही है।दुनिया के साथ चिरोंजीमल हलवाई भी ‘वार्मिंग’ की समस्या से जूझ रहा है।उसे सब्सीडी वाले गैस सिलेण्डर मिलने बंद होने की डरावनी खबर मिल रही है।कहा जा रहा है कि देशभक्त वही माना जाएगा जो सब्सीडी का त्याग करेगा।वह खुद को भक्त तो मानता है लेकिन महंगा गैस सिलेंडर लेने की अनिवार्यता हज़म नहीं कर पा रहा। उसकी कढ़ाही की ‘वार्मिंग’ का मामला उलझा हुआ है।उसकी भट्टी घटी दरों पर मिली गैस से ठीक तरीके से धधकती है।कौन जाने कमर्शियल सिलेंडर से जली आग पर तली जलेबी कचौरी में से वो पहले वाला स्वाद आये या न आये।
ग्लोबल वार्मिंग वाले राजनेता आइफ़िल टावर के बगलगीर हो कर फटाफट फ़ोटो उतरवा रहे हैं।एक दूसरे को गले लगा कर पारस्परिक देशज रिश्तों की गर्माहट की  थाह पा रहे हैं।विकसित राष्ट्र विकास की ओर अग्रसर मुल्कों को ग्लोबल वार्मिंग के मायने डिक्शनरी में से देख कर बता रहे है।पेरिस वाली ग्लोबल वार्मिंग और हमारी लोकल किस्म की गर्माहट का फ़लक में जमीन आसमान का फ़र्क है। हमारी समस्या ढाबा स्तर की है और पेरिस की सोच फाइव सितारा है।उनको हरदम वार्मिंग टाइप मुद्दों की जरूरत रहती है.हम ठिठुरन से बचने के लिए गर्म ऊनी कपड़ों और सूखी लकड़ियों को लेकर चिंतित हैं। हमारी समस्या जैसे तैसे सिर छुपाने की है उनके सरोकार अपनी छत को हाईटैक बनाने की है.हम अपनी भूख से परेशान हैं और वे सलाद की गुणवत्ता को लेकर बहस में उलझे है.लोकल से ग्लोबल होने के बीच बहुत कुछ उलट पलट हो जाता है.
पेरिस में इकट्ठा हुए ग्लोबल राजनेताओं को दफ़्तर के बाबुओं,चिरोंजीमल हलवाई और आमजन की लोकल लेकिन जेनुइन समस्याओं का तो अतापता भी नहीं है।


रविवार, 29 नवंबर 2015

जब पुरस्कार मिलेगा


मुझे पुरस्कार कभी नहीं मिला ।चूंकि वह मिला नहीं इसलिए मुझसे कभी किसी चैनल वाले ने पूछा नहीं कि पुरस्कृत होकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ।हर मौके पर पूछने के लिए उनके पास इसी टाइप के कुछ शाश्वत सवाल होते है। महाभारत काल में भी यदि वह होते तो संजय से जरूर पूछते कि धृतराष्ट्र को युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनाते समय उसे कैसा महसूस हो रहा है। चैनलों का प्रादुर्भाव तब हुआ नहीं था इसलिए वे चूक गए। हालाँकि उस दौरान इसी तरह के सवाल पूछने का काम यक्ष ने किया। लब्बेलुआब यह कि सवाल ओर उसे पूछने वाले सदा मौजूद रहे। सनातन रूप से हम हमेशा सवालिया रहे हैं ।
मुझे कोई इनाम ,इकराम, पद ,ओहदा टाइप चीज कभी नहीं मिली इसलिए इस  तरह के प्रश्नों से महरूम रहा। इसके बावजूद मुझे यकीन है कि कभी न कभी कोई मुझसे इस तरह का सवाल पूछेगा जरूर। हो सकता है कि कोई धपाक से अवतरित हो और यही पूछ बैठे कि आपको कभी कुछ नहीं मिला , अब आप कैसा अनुभव कर रहे हैं। इस अंदेशे को देखते हुए मैंने ऐसे प्रश्नों और उनसे उठने वाले अनुपूरक प्रश्नों के उत्तर तैयार कर रखे है। आशंकाएं चाहे जैसी हो उन्हें कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मुल्क का मेरे जैसा हर मिडिलची ,जिंदगी को इसी तरह से जीता आया है।
मैं हर सुबह इसी उम्मीद के साथ उठता हूँ कि घर की खिड़की पर खड़े होकर बाहर देखूंगा तो वहां मुझे चैनल वालों की ओबी वैन की कतार और माइक संभालते सुदर्शन पुरुषों और महिलाओं का जमघट दिखाई देगा। तब मैं सबसे पहले ड्रेसिंग टेबिल पर जाकर अपने उजड़े हुए बालों और दाढ़ी को सलीके से संवारूँगा। आँखों में उनीदेपन को प्रगाढ़ करूँगा। किचिन में जाकर एक कप ग्रीन टी बनाकर सोचूंगा कि जो रट रखा है उसमें कितना याद रहा है। संभावित सवालों की फेहरिस्त मन ही मन तैयार करूँगा। फिर बेहद मंथर गति से चलता हुआ ऊपर की मंजिल से सीढ़ियों के जरिये इस अंदाज़ में नीचे उतरूंगा जिससे देखने वालों को लगे कि बंदा एकदम बिंदास है।
मुझे देखते ही वे मेरी ओर लपकेंगे। मैं उनसे बड़ी स्टाइल से कहूँगा –हैंग ऑन ,हैंग ऑन लेडीज़ एंड जेन्टिलमैन। ऐसी बातों से आदमी बड़ा लिटरेरी लगता है।
-सर अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं ? शर्तिया पहला सवाल यह होना है ।
-मुझे बिलकुल ऐसा लग रहा कि जैसे ग्लुको मीटर में शुगर लेवल की रीडिंग बिलो हंड्रेड आई हो जबकि मैं  रात में दवा खाना भूल गया था। मेरा जवाब होगा।
-नाईस पंच सर । जीरो फिगर वाली कोई रिपोर्टर तब यही कहेगी।
- इस स्तर तक पहुँचने  के लिए आपको कितनी मेहनत करनी पड़ी ? अधपकी दाढ़ी वाला रिपोर्टर अपनी आस्तीन में छुपा कर रखे गए शोधपूर्ण सवालों में से एक सवाल मेरी ओर उछलेगा।
-बिलो हंड्रेड तक शुगर लेवल को लाने के लिए मुझे जिम जाकर वर्कआउट करने के सारे फायदे कंठस्थ करने पड़े। इन्फैक्ट कल देर रात तक मैं उन्हें ही याद कर रहा था।
यह सवाल सुनकर दाढ़ीवाले को लगेगा कि उसका तो पहला सवाल ही अकारथ  गया। वह अपनी आस्तीन में से दूसरा प्रश्न ढूंढें तब तक उन्हें धकियाता हुआ जल्दबाज किस्म का कोई पूछ बैठेगा – आप लिखते कैसे हैं ?
-पहले मैं बाकयदा बालपैन से लिखता था। अब कम्प्युटर पर उँगलियों से लिखता हूँ। मेरी  बात पूरी भी नहीं हो पायेगी कि कोई कुछ पूछने को होगा तो उसे मैं लगभग बुद्ध की मुद्रा में दायीं हथेली उठाकर रोक दूंगा।
- मेरे कृतित्व में  बालपेन का महती योगदान रहा  है । यह कह कर मैं अपनी बात पूरी करूँगा।
- वो कैसे ?  वो कैसे ? चारों ओर से सवाल उठेंगे।
-वो ऐसे  कि पहले तो मैं उसी से ही लिखता था। अब मैं उससे अपना कान खुजाता  हूँ। जितना अधिक मैं ऐसा करता हूँ उतना ही बेहतर लिख पाता हूँ। मैं उन्हें ब्रेकिंग न्यूज़ टाइप की बाईट दूंगा । इसके बाद मैं यह क्षेपक कथा भी सुना दूंगा कि एक समय की बात है कि मेरा बालपेन गुम हो गया……. जब तक वह गायब रहा मैं चाह कर भी  सार्थक लेखन के नाम पर कुछ लिख नहीं पाया।
- अपने सरोकारों के बारे में कुछ कहना चाहेंगे ? दाढ़ीवाला अब तक अनेक बार आस्तीन से अपना मुहँ पूँछ चुका होगा। वह ऊँची आवाज़ में झल्ला कर पूछेगा।
-मेरे सरोकार और कान एकदम साफ़ हैं। इन्हें जब तक खुजलाते और सहलाते रहो तब तक यह ठीक रहते हैं। कान और सरोकार लगभग ऐसे ही अपना काम करते हैं।  मेरा जवाब होगा।
-सुनने में आया है कि आपको जो इनाम मिलने जा रहा है वह झुमरीतलैया ब्रांड का है? दाढ़ीवाले की  बैचैनी बढ़ेगी तो वह तिनके से दांत कुरेदता हुआ जरूर पूछेगा।
-पता नहीं दोस्त ,आप कह रहे हैं तो यह बात सही ही होगी। इनाम ब्रांडेड है ,क्या यह काफी नहीं?  मैं तो छींकने के लिए जो नसवार इस्तेमाल करता हूँ वह भी हंसिया और हथोड़ा ब्रांड की होती है। मेरी कलम लोटस मार्का है और कम्प्युटर साइकिल छाप। मेरी टेबिल पर रखा लैम्प लालटेन मार्का  है ,जो केवल बडबुक बडबुक कहने से रौशन होता है। आप इसी बात से मेरे सरोकारों  का अंदाज़ा लगा सकते हैं। मेरा मानना है कि हमेशा ब्रांडेड लिखो ,ब्राडेड पढ़ो। मैं उसे ब्रांड की महिमा गिनाऊँगा।
-आगे आपकी योजना क्या है ? जीरो फिगर की ओर से सवाल आएगा।
- स्टेट्स यथावत बनाये रखने की। मेरा उत्तर उसे हैरान करेगा।
-मैं पूरी कोशिश करूँगा कि फास्टिंग का मेरा शुगर लेवल कभी सैकड़ा पार न करे। मैं उसकी जानकारी में इजाफा कर दूँगा।
इसके बाद मैं उन्हें नमस्कार करूँगा। उनके सवाल वहीँ फर्श पर बिना चुगे दानों की तरह बिखर कर रह जायेंगे। मैं धीरे धीरे सीढियां चढ़ता हुआ खुद से पूछूँगा कि अरे यार ,अब तो कोई बता दे कि मुझे इनाम दिया किसने है। तब मैं एक सपना जागती आँखों से और देखूंगा कि मेरा शुगर लेवल ग्लुकोमीटर में आई किसी एरर की वजह से बेहद घट गया है और मैं फ्रिज में रखे लड्डू को बिना किसी अपराधबोध के खा सकता हूँ। हमारी जिंदगियों के ऐसे अजूबे सिर्फ और सिर्फ एरर की वजह से ही होते हैं। वाकई ऐसी त्रुटियां दिलफरेब होती हैं।
अभी मुझे कोई इनाम मिला नहीं है। लेकिन उसे मिलने की स्थिति से निबटने के लिए मेरी तरफ से तैयारी पूरी है। यानी मामला अब देने वालों के हाथ में है। इसका एक मतलब यह भी है कि मामला पचास प्रतिशत उम्मीद का है और उम्मीद अभी भी एक जिन्दा लफ्ज़ है।
मैंने अभी अभी खिड़की से बाहर गली में देखा है वहां एक गड्ढे में भरे बरसाती पानी में जंगली कबूतर अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए स्नान में निमग्न है।
सोच रहा हूँ कि  चलो अच्छा हुआ जो इनाम न मिला। मिलता तो ये मीडिया वाले भीड़ लगाते और इन बेचारे कबूतरों को यहाँ से उड़ कर कहीं और जाना पड़ता। हो सकता है कि वे उस दिन बिन नहाये ही रह जाते।
किसी भी इनाम मिलने के मुकाबले परिंदों को इस तरह किल्लोल करते देख पाना, यकीनन बड़ी बात है।

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

अपेक्षा और उपेक्षा के बीच


लोकतंत्र की खासियत है कि उसमें कोई ‘ऑनपेपर’ उपेक्षित नहीं रहता।रहता हो तो भी कहलाता नहीं। भले ही उसकी जिंदगी में अपेक्षित कुछ भी घटित न हो पाता हो लेकिन आस हमेशा बरक़रार रहती है।जो खुद को उपेक्षित कहता दिखे तो मान लें कि वह परामर्श मण्डल का माननीय सदस्य बनने की गति को प्राप्त हो चुका है।  
सिर को छुपाने के लिए एक अदद छत ढूंढता आदमी प्रोपट्री डीलर के सुसज्जित ऑफिस में पहुँच कर बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं पाल बैठता है।डीलर छंटा हुआ होता है। वह उसे आशियाने की सुंदर छटा दिखाता है।फ़्लैट के सामने स्विमिंग पूल वाला सपना  आरओ के चिल्ड पानी के साथ परोसता है।आदमी की आँखें तैराकी करती अप्रतिम सुन्दरियों की कल्पना मात्र से  चमक उठती हैं।बात होते-होते लच्छेदार प्रलोभनों  के झुरमुट और रिबेट के आश्वासनों की पगडण्डी से होती हुई हाऊसिंग लोन पर जा टिकती है।मिडिल क्लास ख्वाहिश हमेशा बैंक के लोन अफसर की टेबिल पर रखे लाफिंग बुद्धा की प्रतिमा के करीब  जाकर ठिठकती है।अफसर उसे  उसके जिंदा होने के  पुख्ता प्रमाण के साथ वांछित दस्तावेजों की लम्बी फेहरिस्त थमा देता है।इसके बाद वे दोनों हाथ उठाकर ठहाका लगाता है। अपेक्षा उपेक्षा के प्रति बेपरवाह हो जाती है।
घर आकर वह उस फेहरिस्त का गहन अध्ययन करे इससे पहले अपेक्षित सवाल घरवाली की ओर से प्रकट होता है। “क्या रहा अपने घर का?”यह एक शाश्वत सवाल है जिसे सदियों से पत्नियाँ धर्मपत्नी होने की आड़ में पूछती आयी हैं।ठीक उसी तरह जैसे टीवी एंकर पूछते हैं कि अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं।
आदमी जो इत्तेफ़ाक से पति भी है।किराये के घर की खिड़की से पोखर में नहाती हुई भैंसों को निहारता हुआ कहता है,कोशिश कर रहा हूँ। एक न एक दिन ये पोखर पूल में तब्दील होगा  और भैंसे टूपीस वाली बिकनी पहने कैलेंडर गर्ल बन जाएँगी।यह बात वह कहता नहीं,अपेक्षा करता है।उसने सुना है कि सपने हर हाल में रहने चाहियें।भले ही वे मुंगेरीलाल के हसीन सपने टाइप के हों। बड़ा खतरनाक होता है सपनों का मर जाना।
आदमी अपने घर के सपने के साथ, जब भी मौका मिलता है, बैंक के लोन वाले अफसर के पास जाता है। वह अफसर की ओर बड़ी अपेक्षा से देखता है।अफसर उपेक्षा प्रदर्शित करता हुआ अपने लेपटॉप पर पोगो या कैंडी क्रैश खेलता रहता है।अपेक्षा और उपेक्षा एक दूसरे के धैर्य का इम्तेहान लेते हैं।बीच- बीच में प्रोपट्री डीलर मोबाईल पर खबर देता रहता है कि अब तो जिम और स्पा का प्रावधान भी हो गया है।वह स्पा के बारे में गूगल सर्च से टेक्स्ट और इमेज़ की समस्त जानकारी जुटाता है और मुदित हो जाता है।  
तमाम प्रकार की उपेक्षाओं के मध्य जनता  की अपेक्षायें चीन की एलइडी बल्बों वाली रंग-बिरंगी झालर झिलमिलाती रहती है।जलबुझ करती है।तयशुदा पैटर्न में रंग बिखराती है।दोनों शब्द  एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।सिक्का चाहे खोटा हो,पर होते उसके भी दो पहलू ही हैं।अब उसे  कोई अपेक्षा कहे या उपेक्षा, इससे हमारे लोकतंत्र की सेहत पर असर ही क्या पड़ता है।


रविवार, 22 नवंबर 2015

समय तो वाकई बदल गया है


वक्त बदल गया है।मौसम भी बदला है।ऋतुएं जल्दी-जल्दी अपने पन्ने पलट रही हैं।जब से नई सरकार आई है रातों -रात बहुत कुछ बदल गया है।अमनपसंद कबूतर खूंखार हो गये हैं।गुटरगूं गुटरगूं की जगह गुर्राते हुए लगने लगे हैं। गौरेया के बारे में उड़ती हुए बेपर की खबर यह आ रही है कि वह पड़ोसी मुल्क में आतंकवाद के प्रशिक्षण के लिए गयी है।आपसी राम राम में स्वार्थी तत्वों को साम्प्रदायिकता की धमक सुनाई देने लगी है।लोग एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए चौबीसों घंटे नये से नये मुहावरे रच रहे  है।यहाँ तक कि मेरे घर के बाहर लगे गुलमोहर के पेड़ पर लाल फूल फुनगी पर लगने लगे है।इसकी छोटी-छोटी पत्त्तियाँ धरती पर बिखर कर सिर्फ मासूम पत्ती नहीं, गंदगी लगने लगी हैं।स्वच्छता अभियान वालों का टोला इस गंदगी के बावत मुझे और गुलमोहर को सख्त शब्दों में चेता चुका है।इसका परिणाम यह हुआ कि पेड़ ने फूलों को पत्तों की ओट में छुपा लिया ,पर पत्तियों को फैलाना बदस्तूर कायम रखा है।दरख्त कमोबेश आदतन जिद्दी होते हैं।हालाँकि मैं सहमा हुआ हूँ।
सब कह रहे है तो ठीक ही कह रहे हैं कि अब समय पहले जैसा नहीं रहा।लोकतंत्र में जब बहुमत कुछ कहता है तो उसे बाय डिफॉल्ट सत्य मान लिया जाता है।अब टाइम पहले की तरह दीवार पर टंग कर पेंडुलम की तरह चुपचाप दोलन नहीं करता।और न ही कलाई में बंधी घड़ी की तरह दबी आवाज़ में टिक-टिक करता है।वह गुपचुप अंदाज़ में मोबाइल के भीतर चलता है।उसी मोबाइल में जहाँ सहिष्णुता जैसे किसी मुद्दे के साइड बाय साइड घुइयाँ की सब्जी की रेसिपी डिस्कस होती है।जहाँ टमाटर के महंगेपन के साथ मूली के सस्तेपन पर गहन विमर्श होता है।जहाँ ब्रोकली के भाव तीनसौ पचास रूपये प्रति किलो से बढ़ कर तीनसौ साठ होने पर चिंता जाहिर की जाती है।जहाँ बेबी कॉर्न के दाम घटने पर बधाईयाँ गाई जाती हैं।हर जरूरी बहस का बीज वक्तव्य सब्जी मंडी से फ्री में मिलने वाले धनिये पुदीने के साथ चला आता है।
यह ऐसा देशज कालखंड है।जब सरसों के तेल के बाज़ार भाव में उछाल की शिकायत सयुंक्त राष्ट्र संघ के पटल पर अवलोकनार्थ और आवश्यक कार्यवाही हेतु रखी जाती है।देसी टालरेंस के मुद्दे को लेकर देशी-विदेशी लेखकों के दस्ते घुटनों पर झुक कर इंग्लेंड की महारानी से कातर शब्दों में गुहार करते देखे गये हैं।उनकी अभिव्यक्ति ग्लोबल है।उनकी ख्याति इंटरनेशनल। सरोकार युनिवर्सल।उन्हें याद नहीं कि अब इण्डिया इंग्लिश्स्तान का उपनिवेश नहीं, आज़ाद मुल्क है। वास्तव में बहुआयामी वैचारिकता बड़ी भुलक्कड़ होती है।नादानी को ऐतिहासिक भूल कहना उनकी मनभावन अदा है।
मुल्क की हांडी में महागठबंधन ब्रांड की उम्मीदों से भरी लज़ीज़ बिरियानी पक रही है।बीरबल की मिथकीय खिचड़ी मुल्क की स्मृति से नदारद है क्योंकि अब मुर्गी दाल से सस्ती हो चली है।टमाटर के दाम टिंडे के स्तर तक पहुँच गये है।लहसुन के दाम अनार की बराबरी कर रहे हैं।मटर और कीवी की औकात एक जैसी हो गयी है।गंवार की फली सेब के भाव बिक रही है।सुबह सवेरे नीबू पानी ग्रहण करने वाले संतरे को सस्ता पा ऑरेंज जूस पी रहे हैं।बढ़ते दामों के बीच सस्ते विकल्प मौजूद हैं।एक तरह से देखा जाये तो थोड़े-बहुत अच्छे दिन इधर -उधर आ गये हैं।मज़े से कदमताल कर रहे हैं।जनता की सहभागिता का आह्वान कर रहे हैं।
मानना होगा कि यह अर्धसत्यों  से भरा बेहद कन्फ्यूजन से भरा नयनाभिराम समय  है।

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

सरकार का विदेश जाना और जनता का नकचढ़ापन


सरकार से जनता की अपेक्षाएं निरंतर बढ़ती जा रही है।अपेक्षाओं का यह विस्तार वैसा ही है जैसे घर में आने वाली बहू को लेकर अकसर ससरालियों का होता है।यह होना शाश्वत है। महिला सशक्तिकरण की तमाम मुनादियों के बावजूद है।मुल्क में बढ़ती असहिष्णुता के बीच है।बीचों बीच है।प्रजा से राजा के असंवादी होते हुए भी है।
सरकार घुमक्कड़ है।वह लगातार गतिमान रहती है।उसकी गति किसी कम्पनी के सेल्समैन-सी है।सेल्समैन स्थान स्थान पर घूम घूम कर अपना माल खपाता है।।सबको पता है कि कुशल सेल्समैन कभी खाली हाथ घर नहीं लौटते।वे वापस आते हैं तो यात्रा में मैले हो गये कपड़ों के साथ बच्चों के लिए रेवड़ी गज्जक या लौलीपौप लेकर जरूर आते है। बच्चे उसे पा मगन हो जाते हैं।तब घरवाली पूछती है कि सबके लिए लाये ,मेरे लिए क्या लाये। सेल्समैन इसे सुन पति में तब्दील हो जाता है। भावविभोर हो कहता है-तुम्हारे लिए मैं हूँ न। पत्नी नाक सिकोड़ती है।वह बैग में गूदड़ बनी पतलून की जेब से रोल्ड गोल्ड का रत्नजड़ित हार निकाल कर दिखाता है। पत्नी की नाक फड़फड़ा उठती है।कोई नहीं जानता कि उसकी नाक प्रेमभाव से फडकी या छींकने के पूर्व तैयारी के रूप में।
सरकार विदेश प्रवास पर है।जनता झींक रही है।उसे  नहीं पता कि वह उनके लिए सात समन्दर पार से क्या लाने वाली है।वह सोच रही है कि काश उनके लिए वहां से परस्पर रिश्तों की थोड़ी गर्माहट ही ले आयें।वहां के किसी बगीचे से वैचारिक सदाशयता की हरीतिमा ले आये।विलायती गाय के दूध से बनी रबड़ी या छेने के रसगुल्ले ले आये।कुछ न कुछ लेकर आयें जरूर।केवल पूँजी निवेश का ढपोर शंख फूंकते न चली आये।वे वहां से झुनझुने न लायें।अभी किसी राज्य में चुनाव सन्निकट भी तो नहीं है।
जनता बड़ी आस के साथ सरकार की घर वापसी की बाट जोह रही है।उसे उम्मीद है कि वह इस बार कोहनूर हीरा लेकर आएगी।इक्कीस ग्राम का हीरा लाने में अधिक बोझ भी नहीं ढोना पड़ेगा।  
जनता की उम्मीद और हौसले बढ़ते जा रहे हैं।वह सेल्समैन की घरवाली नहीं ,जो रोलगोल्ड से बहल जाए।वह कोहनूर ऐसे मांग रही है जैसे लोग पड़ोसी के घर से दही ज़माने के लिए जामन मांग लिया करते हैं।
जनता अब नकचढ़ी हो चली है।

रविवार, 15 नवंबर 2015

#‎पेरिसबर्निंग‬ उर्फ़ बर्निंग इण्डिया



मुल्क में जब धर्मान्धता के खिलाफ़ निर्णायक युद्ध जीत लेने के बाद विजयी सेना जश्न मना रही थी कि तभी पटना से पहले पेरिस में आतिशबाज़ी होने लगी।हंसी ख़ुशी के लड्डुओं के फूटने के लिए पेट कितने विस्तृत हो गये हैं।सीरिया में ड्रोन हमले में मरने वाले रणबांकुरों की आत्मा के लिए शान्तिपाठ करने के लिए उन्होंने पेरिस में उपयुक्त ठिकाना जा ढूंढा। पेरिसबर्निंग के हैशटैग के साथ सोशलमीडिया पर बधाई गायी जाने लगी।उसकी अनुगूंज देश की सहिष्णुतावादी ताकतों के ड्राइंगरूम में भी सुनाई दे रही हैं।तालियों का नेशनलिस्ट कोरस हमारी संवेदनशीलता की निशानदेही करने लगा। 
पेरिस में जो हुआ उसे तो होना ही था।इसके लिए फ़्रांस खुद जिम्मेदार है।वहां की जीवन शैली और विचारों का खुलापन पूरे विश्व के लिए खतरा जो बनता जा रहा है।उससे अत्याधुनिक हथियारों के जरिये ही विनम्रता के साथ निबटा जा सकता है।हमारे यहाँ तो जातिगत सरोकार ही साम्प्रदायिकता को धूल चटा सकने में कारगर हैं।अब हम इत्मिनान के साथ हैशटैग इण्डिया बर्निंग की बाट जोह सकते हैं। 
हम उत्सवधर्मी लोग हैं।एक पर्व निपटता है कि दूसरे के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है।वस्तुतः उत्सव हमारी स्मृति सदा मौजूद रहता है।बाज़ार इसके लिए पलक पाँवड़े बिछाये रहते हैं।उसकी निगाह हर बारात और वारदात में से मुनाफ़े का अंकगणित खोज लेती हैं। 
मैंने आज किसी प्रगतिशील को सुबह सवेरे ज़लेबी कचौरी उदरस्थ करते देखा।वह अपने गुब्बारे जैसे पेट में उन्हें हवा की तरह भर रहे थे।ठोस से ठोस चीज को गैस में बदलने की कीमियागिरी उन्हें बखूबी आती है। 
मैंने पूछ लिया,आप इतना सामंती नाश्ता कैसे कर सकते हैं।वह मेरे मूर्खतापूर्ण सवाल पर ‘हो हो’ कर दुर्लभ हंसी हँसे। वह हँसे तो उनकी तोंद में हिलोर-सी उठीं। वह बोले ,महोदय हम कोई रसास्वादन नहीं कर रहे।अपने सरोकारों के बैलून में पर्याप्त गर्म हवा भर रहे हैं ताकि वह खुले आसमान में देर तक उड़ सके। 
“पेरिस में जो हुआ ,उसके बार कुछ कहेंगे सर।“ मैंने पूछा। 
उन्होंने जवाब दिया,”जब तक पेस्ट्री और चॉकलेट की दुकानों पर सेल्स प्रमोशन के लिए एके -सैंतालीस ,हथगोले आरडीएक्स टाइप फ्रीबी दी जाती रहेगी तब तक तो यही होना है।ऊर्जावान बच्चे तो ऐसी छुटपुट नादानियाँ करते ही हैं।“ 
“पर मैंने तो आपको यह कहते सुना था कि जब तक ज़लेबी कचौड़ी की दुकान पर हथियार मिलते रहेंगे तब तक यही सब होता रहेगा?” मैंने सवाल दागा। 
”हाँ तब कहा था जब तक मैं इस दुकान तक नहीं आया था।यहाँ आकर जब हथियार नहीं दिखे तो अपनी राय बदल ली।“उन्होंने कहा। 
“इस तरह तो आप रिविजनिस्ट हुए।“ मैंने टोका। 
“यह विचार का संशोधन नहीं ,विकास है।हमारी विचारधारा ज़लेबी की चाशनी में डूबी मक्खी नहीं है कि उसे बिना देखे सुनें निगल लें।“ अब उनकी आवाज़ में तुर्शी थी। 
मेरे अटपटे सवालों की वजह से उनकी तोंद जल्द फूल कर कुप्पा हो गयी।मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही वह तोंद के सहारे आकाशमार्ग से घर की ओर बढ़ लिए। 
सतह से उठते हुए आदमी के पाँव धरती पर अकसर टिक भी कहाँ पाते हैं।वह पेरिस की घटना का अपडेट पाने के लिए बाल सुलभ कौतुहल से लबरेज़ थे।
@हरिभूमि में प्रकाशित

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

उलटा-पुलटा और बल्लीमारान वाली बात

मैं वार्निंग वॉक के चक्कर में लगभग घिसट रहा था।वैसे तो मैं दुलकी चाल चल रहा था। देखने वालों को भी शायद ऐसा ही लग रहा हो।पर मुझे असलियत का पता था।मैं भी उन हज़ारों बुद्धिजीवियों जैसा हूँ ,जिन्हें यथार्थ का बोध तो होता है लेकिन वो उसे अभिव्यक्त नहीं करते।वो तब कोई बात खुल कर कहते हैं जब आसन्न खतरा टल चुका होता है।वे किशोर वय में हुए प्यार का इज़हार तब करते हैं जब उनके सीनियर सिटीजन बनने की बाकयदा मुनादी हो चुकी होती है।हम आदतन चिड़ियों द्वारा खेत चुग जाने के बाद पूर्ण मनोयोग से ‘हुर्र हुर्र’ करते हैं।
मैं वाकई थक चुका था इसलिए तेज़ कदमों से चल रहा था।तेज़ पदचालन की कोई धार्मिक या मेडिकल वज़ह नहीं थी।मैं तो सिर्फ थकन से उपजी ऊब से जल्द से जल्द निज़ात पाने की कोशिश कर रहा था। मार्निंग वॉक का यह अनुष्ठान खत्म हो और मैं काउच पर पसर कर देश दुनिया के मसलों पर ढंग से चिंतन कर सकूँ।मैं अपने कम्फर्ट ज़ोन में ही कुछ सोच पाता हूँ।
मेरे लिए मार्निंग वॉक ठीक उसी तरह से और उतनी ही मिकदार में बाध्यकारी है, जिस तरह से बीट कांस्टेबल का आती-जाती रिक्शाओं के हुड पर अपना डंडा फटकार कर चौथ वसूलना।।जैसे परचुनिए द्वारा नौकर से सुबह दुकान खोलते ही मिर्च की खाली बोरियों को फटकार कर तह लगावाना।जैसे दफ़्तर के बाबू के लिए क्लोज़सर्किट कैमरे की निगरानी में मनमसोस कर काम करना। इसके बावजूद कुछ न कुछ ऐसा जरूर है कि सुबह-सवेरे वॉक पर जाना धीरे-धीरे पान मसाले जैसी लत बनता जा रहा है।
पर मुल्क का हर मार्निंग वॉकर मेरे जैसा नहीं है।मसलन मैं वॉक करते हुए चुपचाप रहता हूँ जबकि अधिकांश लोग इस समय का सदुपयोग खुलेआम प्रभु के सुमरन में करते हैं। इतने पुरजोर तरीके से राम का नाम लेते हैं कि पेड़ों पर बैठे अलसाये पक्षी बिना पंख तौले खुले आसमान की ओर रुख कर लेते हैं।सड़क के किनारे अंगड़ाई लेते कुत्ते चौकन्ने होकर भौकने लगते हैं।भले ही इन लोगों के बगल में अदृश्य छुरी रहती हो पर मुँह पर रब का जिक्र ही रहता है।हो सकता है मैं भी अपनी चुप्पी के बीच कोई बगावती ख्याल पकाता हूँ।
मैं मॉर्निंग वॉक उसी तरह से करता हूँ ,जिस तरह से लोग अमूमन सदियों से करते रहे हैं। हर बढ़ते कदम को उँगलियों पर गिनता और उनका योग जीने लायक उम्र में करता हुआ।गुज़रे हुए वक्त को रिकॉल करने का यह सनातन तरीका है।लेकिन सब ऐसे नहीं हैं। नये समय में नई तकनीक आ रही है। एक दिन एक सज्जन मुझे उलटे चलते हुए मिले। सहज कौतुहलवश मैंने पूछ लिया –महोदय यह क्या?
-यह वक्त के खिलाफ़ चाल है।महोदय ने कहा।
-कौन से समय के विरुद्ध ? मैंने पूछा।
-इस क्रूर समय के खिलाफ जिससे हम गुज़र रहे है।बात में कविताई थी सो बात ठीक से पल्ले नहीं पड़ी।पर मैं इतना समझ गया कि बंदा पहुंचा हुआ है।
वह निरंतर उलटा चलता रहा।मैं सवाल दर सवाल पूछता सीधे-सादे तरीके से उसके पीछे- पीछे।कुछ ही देर में मीडिया वाले कैमरा और माइक लेकर आ गये। उन लोगों ने मुझे धकिया कर पीछे किया।मैंने उसके पास जाने की कोशिश की।उन्होंने मुझे रोक दिया,कहने लगे-आपका काम वॉक करना है।उसे चुपचाप करते रहें। ज्यादा बड़बड़ न करें।
-हम भी मुंह में जुबान रखते हैं ….मैंने मिर्ज़ा मरहूम के मार्फ़त अपनी बात कहने की कोशिश की।
-ऐसी बल्लीमारान वाली सीधी-सादी बात अब कौन सुनता है मियां।मुद्दा उठाने-धरने का शौक फरमाते हैं तो कुछ ऑफबीट करो। जरा कुछ उलटा-पुलटा करो ना।
मुझे पता नहीं यह बात मीडिया वालों के हज़ूम ने कही या मेरे मन ने। पर मैंने साफ़-साफ़ यह बात तब सुनी जरूर।
@निर्मल गुप्त

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

छोटे जी क्यों पकड़े गये?


छोटेजी धरे गये।बाली में पकड़े गये।उनकी उम्र इतनी बाली भी न थी फिर भी। बरेली में पकड़े जाते तो कुछ और बात होती। वहां गिरे मिथकीय झुमके को खोजता हुआ कोई भी अपनी सुधबुध खोकर गिरफ़्त में आ सकता है। बड़ेजी यह ढूँढ-ढकोल  जैसा फिजूल का काम नहीं करते।उनके पास इस तरह का काम करने के लिए तमाम तरह के कारिंदे हैं। यही वजह है कि वह मस्त रहते हैं-एकदम रिलेक्स।वह दोस्तों के साथ घर की बैठक में बैठकर मज़े से ‘पपलू’ खेलते है।वह लगातार जीतते जाते हैं।दोस्त लोग बड़ेजी के ताश कौशल पर हैरान हैं।अपनी जीत पर उनके ठहाके गली के बाहर नुक्कड़ तक साफ़ सुनाई देते हैं।बड़ेजी की बेगम पान के जोड़े के साथ धीरे हंसने की सलाह भिजवा चुकी हैं। मुलाज़िम कान में बता आया है कि छोटा पकड़ा जा चुका है। जो पपलू नहीं खेलेगा वह पकड़ा ही जाएगा ,कह कर वह इतनी जोर से हंसे कि दोस्त बिना वज़ह जाने उनकी हंसी-ख़ुशी में शामिल हो लिये।
सारा ‘अंडरवर्ड’ ताज्जुब में है कि छोटा ‘घरघुसरा’ था फिर भी पकड़ा गया।बड़ेजी बिंदास रहते  हैं। खाते पीते  मौज़ करते हैं।दरियादिल इतने कि गुप्तचर भाइयों के प्रमोशन की  खातिर जहाँ -तहां जाकर फोटो भी खिंचवा आते  है।राशनकार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस बनवा कर उसकी फोटोस्टेट कॉपी उन्हें मुहेया करा देते हैं।बेगम को कह रखा है कि अपना कोई हिन्दुस्तानी भाईबंद जासूस या गोपीचंद आये तो उस बिना शर्बत पिलाये न जाने देना।बेगम मुंह सिकोड़ती तो कहते  कि बेफिक्र रहो।वे भी बाल बच्चे वाले हैं।वे अपना काम करने में  लगे हैं ,जैसे हम।आप उनकी आवभगत करती रहें।
छोटा हमेशा छुप कर रहा।किसी को अपने होने की भनक तक न लगने दी।घर और भेष बदलता रहा।बंद कमरे की सिर्फ दीवारों पर ही नहीं दरवाजे पर लगी सिटकनी से लेकर बिस्तर पर बिछी चादर तक पर शक करता रहा।न कभी खुल कर हँसा, न कभी ढंग से बोला।हरदम तीनसौ साठ डिग्री पर गर्दन घुमाता रहा।इसके लिए उसने गुपचुप गर्दन की सर्जरी तक कराई ताकि वह सरलता से चारों ओर घूम सके।
छोटा चौकस था।उसके पास रिवाल्विंग गर्दन थी।गोपनीय तंत्र था।फूंक-फूंक कर ‘चिल्ड’ दूध को पीने का मंत्र जानता था।तमाम तीन तिकड़म का पता था।दबे पाँव चलने में कुशल था, फिर भी वो पकड़ा गया।यदि कोई यक्ष होता  तो वह यह सवाल जरूर उठाता कि छोटा ही कयों पकड़ में आया?इसका सीधा सादा जवाब यह है कि बड़ा बड़ा होता है और छोटा छोटा ही होता है। लेकिन यक्ष जैसे लोग ऐसे जवाबों से संतुष्ट नहीं हुआ करते।
मैं धर्मराज नहीं एकदम दुनियादार हूँ।लेकिन मुझे इस प्रश्न का सटीक उत्तर पता है। पकड़ा वो जाता है ,जिसके पास जनसंपर्क (पीआर) का चातुर्य नहीं होता।यह बात सब जानते हैं कि जो पकड़ा जाए वो नौसिखिया चोर और जो धरपकड़ से बच निकले वह डाॅन ,जिसे तमाम मुल्कों की पुलिस ढूंढती नहीं ,छुप्प्म-छुपाई का खेल खेलती है।





मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

भूकम्प आया तो क्यों आया


दिल्ली हिली।भूकम्प आया।यह पता नहीं कि कौन सी बात पहले हुई।अफगानिस्तान के हिन्दुकुश इलाके में हिंदुत्व के होने का पता पहले लगा या लुटियन ज़ोन में रखी अटकलों की  लुटिया पहले छलकी।लेकिन कुछ न कुछ हुआ ज़रूर जो लोग बिना हिलेडुले एक दूसरे से पूछने लगे- व्हाट हैप्पिंड।फ़ोन घनघना उठे।व्हाट्स एप पर चिंताओं की चीलें चिंचियाने लगीं।आशंकाओं की फिरकनी घूमने लगी।फेसबुक अचानक गुलज़ार हो गया।गुलज़ार जी का  गीत याद आने लगा- इब्नबतूता पहन कर जूता।दिक्कत तब आ खड़ी हुई कि उनकी उलटबांसियों जैसी कविताओं को लेकर लोगों के भीतर फिट मैमोरी कार्डों ने बगावत कर दी।तब मुनव्वर राणा बहुत याद आये।पर समस्या यह पैदा हुई कि उनके अशआरों में से कौन से वाले याद किये जाएँ और किन्हें दरकिनार किया जाए।इस बंदे के बारे में यही पता नहीं कि वह आखिर कौन से पाले में खड़ा है।भूकम्प के खिलाफ या उसके समर्थन में।
दिल्ली में  भूकम्प आया तो भरी दोपहरी में आया।लंच टाइम के बाद तब आया जब शहर की औरतें डबल बैड पर लेट कर टीवी के रिमोट से घरेलू राजनीति के दांवपेंच सीखती हैं।आदमी अपने-अपने दफ्तरों में खाना खाकर ऊँघने के लिए मौका तलाशते हैं।दिहाड़ी मज़दूर हमेशा की तरह काम में जुटे होते हैं।छोले भटूरे वाला काम निबटा कर कढ़ाई मांजने की जुगत में होता है। चाय वाला व्यस्त रहता है।चायवाले अमूमन सबसे अधिक बिजी रहते हैं। उनके सपनों और बातों का भगौना हरदम खदबदाता रहता है।
भूकम्प आया तो सही। पर बेवक्त आया।इसे आना ही था तो कायदे से आता।पहले से बता कर आता।दरवाजा नॉक करके या गला खंखार कर आता।भलेमानस की तरह आता।
सोशल मीडिया वालों को तैयारी का मौका देता।उन्हें पहले से पता होता तो चाणक्य की तस्वीर के साथ अपने कथोकथन इधर-उधर चिपकाते।तुहर की दाल से भूकम्प का नाता जोड़ते।उत्तर भारत वाले बताते कि जब तक अरहर तुहर की दाल नहीं बनी थी तब तक भूकम्प आता भी था तो कितने सलीके से आता था।
खैर भूकम्प को आना था, सो आ गया।रिक्टर स्केल पर चाहे जिस तरह से आया ,धरती की सतह पर आकर ठिठक गया। कुछ दीवारें ,चंद पंखे और ड्राइंगरूम में रखे एकाध एक्वेरियम का पानी हिला कर चला गया।कुछ और चीजें भी हिली होंगी पर पूर्वसूचना न होने से सेल्फीवीर उनकी तस्वीर लेने से चूक गये।
अब सबको पता लग गया है कि अच्छा समय और भूकम्प कभी भी आ सकता है।इसलिए मोबाइल की बैटरी हर समय फुल रहनी चाहिए ताकि फेसबुक पर स्टेट्स फटाफट अपडेट किया जा सके।ऐसे मौकों के लिए अनमोल वचनों का रेडी स्टॉक डेस्कटॉप पर हिफ़ाज़त के साथ रखा होना जरूरी है।यही वह मौका होता है जब किसी को भी सराहा या गरियाया जा सकता है।भूकम्प से हानि हुई तो यह सरकार निकम्मी है। बच गये तो यह सरकार के सद्कर्म है।बाल ही बाल बचे तो इसका श्रेय खानपान की आदत,पूजा पद्धति या ऊपरवाले को दिया जा सकता है।
भूकम्प आने की भनक मिलते ही कुछ लोगों का तुरंत पता लग गया कि इसमें अतिवादी संगठनों  द्वारा फैलाई गयी धार्मिक असहिष्णुता का हाथ है।भूकम्प से दिल्ली हिली है तो पूरे मुल्क के भीतर भी कुछ न कुछ विचलन हुआ ही होगा।
बिहार के अलावा अन्य राज्यों में इसका  क्या असर हुआ ,यह बात ज़रा देर से पता लगेगी। अलबत्ता बिहार अपना हाल मतगणना वाले दिन बता देगा।

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

धप्प से आया बाज़ार


अखबार आ गया।रबर के छल्ले में लिपटा हुआ।वह ‘धप्प’ की आवाज़ के साथ बॉलकनी में गिरा।मुझे पता  था कि उसमें देश दुनिया की तमाम खबरें होंगी।इंटरनेट और टीवी न्यूज़ चैनलों की सूचना क्रांति के बावजूद हर तरह के समाचारों के लिए अख़बार पर हमारा आदिम यकीन बरक़रार है।युगीन विश्वास इतनी जल्दी खत्म नहीं होते।कहा जाता है कि आइन्स्टीन की पढने की मेज पर घोड़े की नाल सजती थी।हमारे मुल्क में विदेश से चिकित्सा विज्ञान में परास्नातक की डिग्री लिए डाक्टर के क्लीनिक की चौखट पर हरीमिर्च और नीबू लटकते हैं।विज्ञान और ढकोसले सदा मजे से साथ -साथ रहते आये हैं।बीएमडब्लू के साथ तांगा खींचता मरियल घोड़ा बिना हीनभावना के साथ दुलकी चाल से चलता है।
छोटे बड़े शहरों के ऊपरी मंजिल पर रहने वालों के लिए सुबह अमूमन बॉलकनी से होकर धप्प की आवाज़ के साथ ही आती है।शहरों के अधिकांश मुर्गों को पता है कि उनकी हैसियत अब दाल से बदतर हो चली है। वह बांग देना अकसर भूलते जाते हैं।वैसे भी दाल के भाव आसमान छूने के साथ उनकी जान पहले से अधिक झंझट में जा फंसी है।सहमाहुआ मुर्गा हो या आदमी अपने काम से काम रखता है।
उस दिन भी धप्प से अख़बार आया।मैं क्रिकेट के स्लिप के खिलाड़ी की तरह डाइव मारकर उसे लपकने के लिए लपका। कैच छूट गया।वो तो छूटना ही था।गेंद हो या अख़बार जब तक हवा में रहते हैं, कोई आवाज़ नहीं करते। गिरते हैं तो धप्प करते हैं।तब दर्शक या पाठक के मुहं से निकलता है –ओह। मैंने अखबार हाथ में थामा तो तुरंत कह उठा –अहा। अहा इसलिए क्योंकि फ्रंटपेज पर खबर नहीं किसी ऑनलाइन पोर्टल का दीवाली बोनान्जा का विज्ञापन सजा था।तरह तरह के इलेक्ट्रानिक उपकरणों की नयनाभिराम तस्वीरों और अविश्वसनीय ऑफर के साथ। मुझे पता था कि नीचे कहीं कंडीशंस एप्लाई शब्द जरूर  दुबका होगा।
इस बीच मैंने इंडेकशन स्टोव पर चाय का पानी रखा। अख़बार का पन्ना उलटा। वहां बाज़ार पसरा था। बत्तीस जीबी के मैमोरी कार्ड से लेकर पावर बैंक और लेडीज नाईट वियर से लेकर लेपटॉप तक सब कुछ वहां था।उसमें खूब खरीददारी करके दीपावली को ढंग  से सेलिब्रेट करने की बात की गयी थी।इसी तरह आगे के पेज थ्री और पेज फोर पर कोई न कोई अपना सामान लिए बैठा दिखाई दिया। सबके पास मेगा सेल थी।रिबेट का प्रलोभन था।लक्ष्मी गणेश जी हर जगह नेपथ्य में मुस्कराते दिख रहे थे।मुझे लगा बाज़ार ने पर्व मनाने की नयी तकनीक दे दी है।हो सकता है अब दिवाली के दिये पावर बैक से जलें।लेपटॉप पर लक्ष्मी जी की आरती हो।बिकनी पहन कर त्यौहार का जश्न मने।मैमोरी कार्ड में ऐतिहासिक उमंग सलीके से सहेजी जाए।
पेज पांच पर जब तक मैं पहुंचा तो चाय का पानी उबलने लगा। मैंने झटपट चाय की पत्ती चीनी दूध डाला। अख़बार पर नजर डाली तो वहां खबरें मौजूद थीं।बेहद लज्जित सी।अपने में सिकुड़ी हुई ।उनको भी लग रहा होगा कि अब हमारी यही औकात रह गयी है।बाज़ार बड़ों बड़ों की दुर्गति कर देता है।इस बीच चाय भगोने से बाहर उबलने को थी कि मैंने लपक के इंडेकशन ऑफ किया।
चाय का सिप लेते हुए खबर पढनी शुरू की।किसी विकास योजना के उद्घाटन की बासी खबर मिली।किसी मंत्री द्वारा अपने भाषण में की गयी साहित्य संस्कृति की मौलिक मीमांसा दिखी।किस रंग और प्रजाति का कुत्ता घर में पालना मुफीद होगा, ऐसी एडवाइजरी टाइप  अंतराष्ट्रीय खबर पढ़ने को मिली।
मैं समझ गया कि अब आने वाले दिनों में सुबह की धमाकेदार शुरुआत विभिन्न विज्ञापनों के जरिये आने वाले मेगा ऑफर के जरिये ही होनी है।बाज़ार बड़ी मुश्किल से खबरों के लिए स्पेस छोड़ेगा।

   


कहाँ है टोबा टेक सिंह?


वह कद में नाटा और शरीर से स्थूल है।वह फिजिकली छोटा मोटा है।उसे यकीन है कि वह लेखक कद्दावर है।एक दिन वह  ऊँचे दरख्त पर कुल्हाड़ी लेकर जा बैठा और उसी डाल को काटने लगा जिस पर बैठा हुआ था।एक राहगीर ने पूछ लिया–अरे भाई यह क्या करते हो? उसने  प्रश्नकर्ता की ओर हिकारत से  देखा।उसी तरह देखा जैसे महान लेखक अमूमन पाठक की तरफ देखते हैं।कहा -दिखता नहीं क्या?मैं पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलता हुआ यहाँ तक पहुंचा हूँ।
“आप आखिर करना क्या चाह रहे हैं?” जिज्ञासु राहगीर असल में राहगीर नहीं सुबह-सवेरे टहलने वाला है।उसने जिरह जारी रखी।मार्निंग वॉकर स्वभावतः दार्शनिक टाइप के होते हैं।वह बात में से बात निकालते जाते हैं और संवाद का सिरा कभी गुम नहीं होने देते।
“आपके पास कैमरा है?” ऊपर से आवाज़ आई जो दरअसल सवाल की शक्ल में थी।”आपके पास माइक है?” दूसरा सवाल भी पेड़ से नीचे उतरा।
राहगीर अचकचाया।उसने अपने बचाव के लिए जेब से मोबाइल निकाल लिया।पहले जिस तरह संकट प्रकट होने पर आम आदमी लाठी डंडा या पत्थर उठाता था अब मोबाईल उठा लेता है।
“मैं समझ गया।आप फेसबुक वाले है”।पेड़ से इस बार अनुमान नमूदार हुआ ।
-नहीं।मैं ब्लागर हूँ।क्या अपने पर्सनल ब्लॉग के लिए तस्वीर ले सकता हूँ?उसके इस सवाल में सोशल मीडिया वाली जल्दबाजी है ।राहगीर कम मार्निंग वॉकर कम ब्लॉगर ने गुलेल की तरह मोबाईल पेड़ वाले की और ताना और पूछा,आपका नाम?पेड़ से कोई जवाब नहीं आया । उसने अपना सवाल बुलंद आवाज़ में फिर दोहराया।ऊपर वाला चुप रहा।जब तीसरी बार यही सवाल फिर आया तो पेड़ की कोटर में बैठे उल्लू ने आखें मिचमिचाते हुए बाहर झाँका और बताया: वह अपनी निजी जानकारी अजनबियों से शेयर नहीं करता।
“क्या आप उनके प्रवक्ता हैं?”जमीन से उठा सवाल कोटर तक गया।
“प्रवक्ता नहीं उनका वेल विशर।जब से आदमी आदमी की जान का दुश्मन बना है तब से हम उसके शुभचिंतक बन गये हैं”।उल्लू ने बताया और फट से कोटर का दरवाज़ा बंद कर लिया ।
राहगीर ने हुम्म किया  और बडबडाता हुआ अपने रास्ते चल दिया।उसने ब्लॉग पर सारा वाकया लिखा। पेड़ पर टंगे ‘छोटे मोटे’ की तस्वीर चस्पा की ।उसे फेसबुक और ट्विटर पर शेयर किया।पोस्ट वायरल हो गयी।कुछ ही देर में पेड़ के नीचे मीडिया का जमघट लग गया।
पेड़ पर बैठे आदमी ने कुल्हाड़ी को बगल की डाल पर अटका दिया।जेब से कंघा निकाल कर बाल संवारे ।कमीज का कॉलर दुरुस्त किया।
“आपका नाम?” नीचे से पहला सवाल आया।
”सिर्फ काम की बात करें”।ऊपर से सुझाव मिला।
”आप वहां क्यों टंगे हैं”? किसी ने पूछा।
”इस असहिष्णु और क्रूर समय में लेखक यहीं सुरक्षित रह सकता है”, जवाब मिला।
”कैसे कैसे”? अनेक प्रश्न एक साथ आये।
“पेड़ शरण देने से पहले मजहब नहीं पूछता।इसकी कोटर में रहने वाले उल्लू उदार हैं ।मेरी पर्सनल फ्रीडम की कद्र करते हैं”।ब्रेकिंग न्यूज़ –ब्रेकिंग न्यूज़ ,पेड़ के नीचे चीख पुकार शुरू हुई “आपका नाम क्या है सर?” नीचे से ससम्मान गुहार हुई ।“मेरा नाम है बिशन सिंह वल्द सआदत हसन मंटो।मजहब जेड़ा नाम मुहब्बत।
“आप पेड़ पर बैठ कर क्या रहे हैं”? सवाल में हैरानी थी।
“मैं अपना पिंड टोबा टेक सिंह ढूंढ रहा हूँ”? आपको पता हो तो बताएं? आवाज़ में नमी थी जिसे सबने महसूस किया।
“आप आखिर कहना या करना क्या चाहते हैं? मीडिया वालों ने पूछा।
औपड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि तुर दि दाल आफ दि बीफ़ ते कलबुर्गी ते अकादमी अवार्ड”।पेड़ की डाल पर बैठे आदमी ने तल्ख स्वर में कहा और कुल्हाड़ी से फिर वही डाल काटने लगा जिस पर वह बैठा था।

मेरा नाम बिशन सिंह..... नहीं..... कबीर है.....नहीं नही......कालिदास है।वह बुदबुदाता रहा।मीडिया वाले उसके डाल से गिरने या उतरने का इंतजार किये बिना आगे बढ़ लिये।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

लौटाने के मौसम में न गलने वाली अरहर की दाल


मौसम आते जाते रहते हैं।सर्द गर्म तीखे नरम मस्त मुलायम।आजकल मुल्क के बुद्धिजीवियों के बीच पुरस्कार सम्मान आदि लौटाने आपाधापी मची है।वे पूरे मनोयोग से अकादमियों को प्रशस्ति पत्र वापिस कर रहे हैं। यह काम करते हुए उनके चेहरे उसी तरह तमतमाए हुए हैं जैसे उन्हें प्राप्त करते हुए चमचमाए हुए थे।वैसे उनका तमतमाना ‘बाई डिफॉल्ट’ चमचमाने जैसे ही है।
दीवाली आ रही है। इसकी  भनक मिलते ही घर की साफ़ सफाई के लिए अभियान की रूपरेखा बनने लगती है। कम्युनल टाइप के लोग यह काम खुलेआम करते हैं। बुद्धिवादी लोग गुपचुप तरीके से करते हैं। समाज के सेक्युलर तानेबाने  के लिए यह  गोपनीयता जरूरी भी है। शैल्फ़ में सजे या दीवारों पर टंगे पुरस्कारों को लौटाना भी आवश्यक  है ताकि सरोकारों पर जमी धूल साफ़ हो और वे उसे नये रंग में रंगवा सकें।
कल मैडम जी पूछ रही थीं – कालोनी के सारे लेखक कुछ न कुछ लौटा आये हैं ।आप कुछ न वापिस किये।
-मेरे पास तो सिर्फ अपनी नादानियाँ हैं। कहो तो वही  लौटा दूं ? मैंने पूछा।
-यह चीज तो रद्दीवाले भी न उठाते। तुम तो रहने ही दो। ।उन्होंने तुनक कर कहा।
-अरे याद आया ।कहो तो बरसों पहले की गयी मूर्खता सौंप  दूँ किसी को? मैंने कहा।
मैडम जी को मेरी कही  बात ठीक से समझ न आई तो उन्होंने पलकें ठीक उसी तरह झपझपाई जैसे ड्राइंग रूम के शोकेस में दशकों से रखी जापानी गुड़िया जरा- सा हिलने पर झपकाती है।यह गुड़िया कभी प्यार में आकंठ डूबे युवक ने अपनी प्रेयसी पत्नी को दी थी। इस जापानी गुड़िया का जानने लायक अतीत सिर्फ इतना  है कि उसे लाने वाला युवक मैं था।
-अरे हाँ याद आया। उस जापानी गुड़िया को लौटा दूं। शोकेस में जगह बनेगी तो वहां कोई रिमोट वाला गुड्डा  लाकर रख देंगे।
मैडम जी को यह तो लगा कि मैंने कोई चुभती हुई बात कही ।पर वह उसे ठीक से समझ न पाई तो बोली –अजी बातें बनाना बंद करो और जाओ,परचूनिए को अरहर की वो दाल वापस दे आओ ,जो लाख कोशिशों के बाद और प्रेशर कुकर द्वारा सीटी दर सीटी बजाने के बावजूद गलती नहीं। यह कह उन्होंने दाल मुझे थमा दी।
दो सौ रुपये प्रति किलोग्राम वाली दाल का पैकेट लिए मैं सोच रहा हूँ कि क्या खुद को लेखक मानने की गलतफहमी के बावजूद बस यही चीज है हमारे पास वापस लौटाने के लिए?

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

डेंगू ,चिड़ियाँ ,गाय और भावुकता


डेंगू क्या आया, बेचारी चिड़ियों और गली मोहल्लों में भटकने वाली गायों को पीने के लिए साफ़ पानी मिलना दूभर हो गया।सबको पता लग गया कि डेंगू वाला मच्छर साफ़ पानी में पनपता है। चिड़ियों के लिए घर की छत पर रखे जलपात्र और सार्वजनिक नांद रीती कर दी गयीं।एक की वजह से दूसरे की जान सांसत में आ गयी। अब देखिये न ,बिल्ली छीके पर टंगी दूध मलाई की मटकी ढूंढती घर में आई तो सारे चूहे बिल में जा छिपे ,अलबत्ता वह मुंडेर बैठे कबूतर को चट कर गयी।मटकी फ्रिज में सुरक्षित बची रही।बिल्ली भी भूखी नहीं रही।सब अपने-अपने मंतव्यों में कमोबेश कामयाब रहे।कबूतर की जान गयी सो गयी बाकी चीज तो बच गयीं।
यह बिल्लियों के लिए मनोनुकूल  समय है।उनके पास खुद को बनाये रखने के तमाम विकल्प हैं।वह दूध दही से लेकर चूहा और साग़भाजी से लेकर कबूतर तक सब खा लेती है। चटखारे लेकर खाती है लेकिन चपर चपर की आवाज़ को दूर तक नहीं जाने देती। दबे पाँव चलती है।चालाकी का होना उसके डीएनए में बताया जाता है। इस बात की पुष्टि अभी होनी बाकी है।अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर व्यंग्य रचा जाता हैआलोचना के लिए प्रमाणित लैब की जांच रिपोर्ट अपरिहार्य होती है।
बिल्ली ने कबूतर मार कर खाया,यह बात तो पक्की है। लेकिन कब और क्यों खाया , इसकी पड़ताल होनी शेष है। यह बात यदि सही हो कि वह नौ सौ चूहे खाकर तीर्थाटन कर आई थी ,इससे यह साबित नहीं होता कि वह मासूम है। वैसे भी भोजन की परम्परा से किसी का सदाचरण तय नहीं होता।भोज्य पदार्थों में मिलावट के जरिये धनकुबेर बनने वाले अकसर बड़े धार्मिक बने दिखते हैं।मुल्क की अस्मिता को मुनाफ़े की तराजू पर रख पर बेच देने वाले पर्यावरण संरक्षण के हक़ में सबसे पहले नारा बुलंद करते हैं।नकली दवाइयों का कारोबार करने वाले समाजसेवी के गेटअप में देवदूत टाइप के लगते हैं।
यह कांव कांव करने वाले कौओं ,पल पल रंग बदलते गिरगिटों ,उभयलिंगी मच्छरों, स्वामिभक्त कुत्तों, मुहं बिचकाने वाले बंदरों और हर बात पर चुप्पी साध लेने वालों के लिए ठीकठाक समय है। बाकी लोगों को बचे रहने के लिए दूसरे की थाली में रखी रोटी की जात की मुखबरी करनी  होगी।थाली में रखी सब्जी का धर्म बताना होगा। किसी न किसी टोली में शामिल होकर जैकारा करना होगा ।
ध्यान रहे , डेंगू का वायरस मौसमी है,बीत जायेगा। जब तक वायरस सक्रिय रहेगा चिकित्सा का धंधा करने वालों के यहाँ उत्सव का सा माहौल रहता है।गरीबी भूख,प्यास और कुपोषण के जरिये कोई वोटबैंक नहीं बनता। इससे किसी नेता की छवि न निर्मित होती है ,न बिगड़ती है। इसलिए इस पर कोई डिबेट नहीं होती ।आहार  की प्रकृति के अनुसार सेक्युलरिज्म का सार्टिफिकेट जारी होता  है। दूसरों को चिढ़ा चिढ़ा कर खाने खिलाने से अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रकट होती है। इससे पता चलता है कि आप मुल्क के दस प्रतिशत विद्वानों की जमात में हैं।इस पर बयान दर बयान जारी होते हैं।   
चिड़ियों के लिए रखे पानी के पात्र देर-सवेर भर दिए जायेंगे। गायों के लिए सेवाभाव से दिया जाने वाला चारा और पानी फिर मिलने लगेगा। आजकल हमारी भावुकता जरा सहमी हुई है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।


मंगलवार, 29 सितंबर 2015

डिजिटल पड़ोसियों का आना

यह आकाशवाणी नहीं है।यह खबर ऊपर से आई है इसलिए सच ही होगी।वैसे हमें ये जमीनी सच नहीं पता कि सोलहवीं मंजिल पर एकाकी रहने वाली बूढ़ी महिला के घुटनों का दर्द आजकल कैसा है। बगल के फ़्लैट में रहने वाली आंटी अपने इकलौते बेटे के सीरिया में मार डाले जाने के बाद किस हाल में हैं।उन्होंने अब अपने जिन्दा बने रहने की कौन सी तरकीब इज़ाद की है। सोलहवीं मंजिल वाली बिल्डिंग की  लिफ्ट ख़राब हो जाने पर ग्राउंड फ्लोर पर फिजियो के पास सिकाई के लिए कैसे आती जाती होंगी।हम अपने पड़ोसियों की जिंदगी में  उसूलन नहीं झाँका करते। अच्छे भले पड़ोसी इसी प्रकार के होते हैं।
समय तेजी से बदल रहा  है।अच्छे दिनों की आहट महसूस की जा रही है। अफवाह और हकीकत का फ़र्क मिट गया है। इस अंतर पर लोग चिंतित भी नहीं हैं। देशभक्ति अमरीका आदि मुल्कों में रह रहे प्रवासी भारतियों के बीच ओवरफ्लो कर रही है।  कन्फर्म सूचना यह है कि फेसबुक, टि्वटर, गूगल, इंस्टाग्राम नाम के हमारे नए पड़ोसी  आये हैं। ये ब्रह्मांड के किस माले पर  रहते हैं ,यह तो नहीं पता पर हमारी कामनाओं के कबाडखाने में इनका आवास  है। इनके घर की ओर जाने वाले रास्ते हरदम चौपट खुले रहते हैं। ये किसी से पड़ोसी धर्म निभाने की कोई उम्मीद नहीं रखते। इनके पास आने जाने के लिए किसी औचारिकता की कोई जरूरत नहीं। दरवाजे पर खड़ा कोई गार्ड आगंतुक से उसकी  हैसियत की पूछताछ और जामा तालाशी नहीं लेता। और तो और जूतों में आतंकवादी की आईडी भी नहीं ढूंढता।
फेसबुक है तो समझो सब कुछ है।सब चाकचौबंद है।बगल वाले फ़्लैट में रहने वाले मंगतू का पूरा नाम भले ही ठीक से पता न हो पर बनाना रिपब्लिक की किसी गली कूंचे में रहने वाली मार्गरीटा के पालतू कुत्ते की दुम की तफ़सील का हमें ठीक से पता है। वह दिन में कितनी बार किसके सामने झबरीले बालों वाली पूँछ हिलाता है ,यह भी जानकारी है। अलबत्ता उसकी दुम सीधी करने वाला कोई उपकरण ऑनलाइन नहीं मिल पाया है। गाँव में रह रही मां के दमे का इलाज भले ही न करा पाते हों पर झुमरीतलैया के ओल्डएज होम में रहने वाला कब खांसता है, उसका हमें भली प्रकार मालूम रहता है।उसकी इस बीमारी को लेकर फीलिंग सेड हैश टैग डाल कर हम अपनी चिंता को जाहिर करने से कभी नहीं चूकते। सेल्फी ने तो इन नये डिजिटल पड़ोसियों के सहकार से जिंदगी को कितना नयनाभिराम बना दिया है।कोई भी मौका हो उसमें से सेल्फी के लिए जगह निकल ही आती है जैसे खचाखच भरी बस में बावर्दी सिपाही के लिए पसरने का माकूल स्थान।
ट्विटर ने तो कमाल ही कर दिया है। सुनसान बेनूर जीवन को नीले रंग वाली आयतित चिड़िया की चहचाहट से भर दिया। रोज की घरेलू चिक चिक को ट्वीट में तब्दील कर दिया ।पत्नियों के लिए पति से बात बात पर रूठ कर अबोला शुरू कर देने वाले  समयसिद्ध हथियार की धार कुंद हो चली है। पत्नी ट्वीट करती है – ऐसा कब तक चलेगा ? पति का ट्वीट आता है – जब तक ट्विटर एकाउंट हैक नहीं होता। पत्नी गूगल पर हैकिंग के गुर तलाशती हुई रूठना भूल जाती है।ट्विटर ने सारे पेचीदा मसले एक सौ चालीस कैरेक्टर में समेट दिए है।
व्हाट्स एप पर कॉपी पेस्ट वाली शेरो शायरी के जरिये बड़े से बड़ा झूठ बेहद मासूमियत के साथ बोल, सुन और देख लिया जाता है।गूगल की ओट में तमाम मूर्खतायें बड़े मज़े से सिर छुपा लेती हैं। इंस्टाग्राम भी कुछ न कुछ करता ही रहता है।
ये नये पड़ोसी क्या आये जिंदगी किस कदर आसान और ग्लोबल हो गयी है।