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तेरा कुछ ना होगा कालिया!

शोले वाले गब्बर की बड़ी याद आ रही है।उसके रिवाल्वर में छ: की जगह तीन गोलियां थी।मरने लायक भी तीन थे।तीनों बचे।बचे तो गब्बर हँसा। बोला,तीनों बच गये। तीनों के तीनों बच गये स्स्स...।वे भी हँसे तो गब्बर ने  गोलियां चला दीं।वे मर गये।काम तमाम हो गया।तीनों को उनकी करनी की सज़ा मिल गयी।झटपट मामला निपट गया।फिल्म हिट हो गयी। अभिनेता की गाड़ी ने फुटपाथ पर सोते लोगों को ‘हिट’ किया। उन्हें सम्भलने का मौका भी नहीं दिया।सोने वाले चिरनिद्रा में चले गये।मुकदमा चला।चलता रहा।घिसटता रहा।नये से नये पेंच सामने आते रहे।दांवपेंच चलते रहे।उठापटक होती रही। दलील दर दलील दी जाती रहीं।नूरा कुश्ती होती रही।न्याय का हथोड़ा उठा और फिर हवा में ठहर गया।ठहरा तो ठहरा ही रहा।हवा में ठिठका काठ का हथोड़ा दर्शकों को  भरमाता रहा।उनमें से कुछ की तो साँस ही अटक गयी।रुक-सी गई।रुक-रुक कर चलती रही।न्याय की देवी की आँखें,बंधी हुई पट्टी के नीचे खुलबंद होती रहीं।निचली अदालत से ऊँची अदालत में मामला सरक आया।पहले सजा बुली।सज़ा की न्यूज़  ‘ब्रेक’ होने को  थी कि न्याय की  मुस्तैद कुर्सी ने आनन फानन में जमानत दे दी।सब कुछ पलक झपकते हुआ।टीवी पर आ…

ग्लोबल वार्मिंग बनाम लोकल वार्मिंग

पेरिस में दुनिया भर के मुल्क जलवायु परिवर्तन के मसले पर विचार करने के लिए एकत्र हुए हैं।वहां कुल जमा कितने देश हैं, इसका किसी को ठीक से पता नहीं।जिस होटल में वे ठहराए गये हैं,उनका कहना है कि वे 200 हैं। जबकि गूगल की बात पर यकीन किया जाये तो सर्वमान्य और विवादग्रस्त मुल्कों की संख्या 181 से लेकर 189 के बीच है। इससे तो यही पता लग रहा है कि मुल्कों को गिनना भी मेंढक तोलने जैसा है।गूगल वाले कन्फ्यूज़ हैं और होटल वाले मुतमईन।वे ‘भूलचूक लेनी देनी’ की सदाशयता के साथ ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर के समय पूरी  दो सौ प्लेट गिन पा रहे हैं। पेरिस में ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा गरमाया हुआ है।हमारे यहाँ दफ़्तर के बाबूओं के चेहरे तमतमाए हुए हैं।ठण्ड आ पहुंची है और स्टोरकीपर रूम हीटरों के मरम्मत के लिए टेंडर की फ़ाइल दबाये बैठा है।ऑफिस का वातावरण इस मुद्दे पर इतना गरमाया हुआ है कि बाबू लोगों का बस चले तो वे अपनी-अपनी कमीजें उतारकर खूंटियों पर टांग दें।यदि बड़े साहब के पास उनकी लीव ट्रेवल कन्सेशन(एलटीसी) की  फ़ाइल पैंडिंग पड़ी नहीं रह गयी  होंती तो वे पेरिस जाकर अपनी प्रॉब्लम की फ़ाइल को फ़ीते से बाँध कर नोट ज़रूर ‘पु…

जब पुरस्कार मिलेगा

मुझे पुरस्कार कभी नहीं मिला ।चूंकि वह मिला नहीं इसलिए मुझसे कभी किसी चैनल वाले ने पूछा नहीं कि पुरस्कृत होकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ।हर मौके पर पूछने के लिए उनके पास इसी टाइप के कुछ शाश्वत सवाल होते है। महाभारत काल में भी यदि वह होते तो संजय से जरूर पूछते कि धृतराष्ट्र को युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनाते समय उसे कैसा महसूस हो रहा है। चैनलों का प्रादुर्भाव तब हुआ नहीं था इसलिए वे चूक गए। हालाँकि उस दौरान इसी तरह के सवाल पूछने का काम यक्ष ने किया।लब्बेलुआब यह कि सवाल ओर उसे पूछने वाले सदा मौजूद रहे। सनातन रूप से हम हमेशा सवालिया रहे हैं । मुझे कोई इनाम ,इकराम, पद ,ओहदा टाइप चीज कभी नहीं मिली इसलिए इस  तरह के प्रश्नों से महरूम रहा। इसके बावजूद मुझे यकीन है कि कभी न कभी कोई मुझसे इस तरह का सवाल पूछेगा जरूर। हो सकता है कि कोई धपाक से अवतरित हो और यही पूछ बैठे कि आपको कभी कुछ नहीं मिला , अब आप कैसा अनुभव कर रहे हैं। इस अंदेशे को देखते हुए मैंने ऐसे प्रश्नों और उनसे उठने वाले अनुपूरक प्रश्नों के उत्तर तैयार कर रखे है। आशंकाएं चाहे जैसी हो उन्हें कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मुल्क का मेरे जैस…

अपेक्षा और उपेक्षा के बीच

लोकतंत्र की खासियत है कि उसमें कोई ‘ऑनपेपर’ उपेक्षित नहीं रहता।रहता हो तो भी कहलाता नहीं। भले ही उसकी जिंदगी में अपेक्षित कुछ भी घटित न हो पाता हो लेकिन आस हमेशा बरक़रार रहती है।जो खुद को उपेक्षित कहता दिखे तो मान लें कि वह परामर्श मण्डल का माननीय सदस्य बनने की गति को प्राप्त हो चुका है।   सिर को छुपाने के लिए एक अदद छत ढूंढता आदमी प्रोपट्री डीलर के सुसज्जित ऑफिस में पहुँच कर बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं पाल बैठता है।डीलर छंटा हुआ होता है। वह उसे आशियाने की सुंदर छटा दिखाता है।फ़्लैट के सामने स्विमिंग पूल वाला सपना  आरओ के चिल्ड पानी के साथ परोसता है।आदमी की आँखें तैराकी करती अप्रतिम सुन्दरियों की कल्पना मात्र से  चमक उठती हैं।बात होते-होते लच्छेदार प्रलोभनों  के झुरमुट और रिबेट के आश्वासनों की पगडण्डी से होती हुई हाऊसिंग लोन पर जा टिकती है।मिडिल क्लास ख्वाहिश हमेशा बैंक के लोन अफसर की टेबिल पर रखे लाफिंग बुद्धा की प्रतिमा के करीब  जाकर ठिठकती है।अफसर उसे  उसके जिंदा होने के  पुख्ता प्रमाण के साथ वांछित दस्तावेजों की लम्बी फेहरिस्त थमा देता है।इसके बाद वे दोनों हाथ उठाकर ठहाका लगाता है। अपेक्षा उपे…

समय तो वाकई बदल गया है

वक्त बदल गया है।मौसम भी बदला है।ऋतुएं जल्दी-जल्दी अपने पन्ने पलट रही हैं।जब से नई सरकार आई है रातों -रात बहुत कुछ बदल गया है।अमनपसंद कबूतर खूंखार हो गये हैं।गुटरगूं गुटरगूं की जगह गुर्राते हुए लगने लगे हैं। गौरेया के बारे में उड़ती हुए बेपर की खबर यह आ रही है कि वह पड़ोसी मुल्क में आतंकवाद के प्रशिक्षण के लिए गयी है।आपसी राम राम में स्वार्थी तत्वों को साम्प्रदायिकता की धमक सुनाई देने लगी है।लोग एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए चौबीसों घंटे नये से नये मुहावरे रच रहे  है।यहाँ तक कि मेरे घर के बाहर लगे गुलमोहर के पेड़ पर लाल फूल फुनगी पर लगने लगे है।इसकी छोटी-छोटी पत्त्तियाँ धरती पर बिखर कर सिर्फ मासूम पत्ती नहीं, गंदगी लगने लगी हैं।स्वच्छता अभियान वालों का टोला इस गंदगी के बावत मुझे और गुलमोहर को सख्त शब्दों में चेता चुका है।इसका परिणाम यह हुआ कि पेड़ ने फूलों को पत्तों की ओट में छुपा लिया ,पर पत्तियों को फैलाना बदस्तूर कायम रखा है।दरख्त कमोबेश आदतन जिद्दी होते हैं।हालाँकि मैं सहमा हुआ हूँ। सब कह रहे है तो ठीक ही कह रहे हैं कि अब समय पहले जैसा नहीं रहा।लोकतंत्र में जब बहुमत कुछ कहता है तो उसे…

सरकार का विदेश जाना और जनता का नकचढ़ापन

सरकार से जनता की अपेक्षाएं निरंतर बढ़ती जा रही है।अपेक्षाओं का यह विस्तार वैसा ही है जैसे घर में आने वाली बहू को लेकर अकसर ससरालियों का होता है।यह होना शाश्वत है। महिला सशक्तिकरण की तमाम मुनादियों के बावजूद है।मुल्क में बढ़ती असहिष्णुता के बीच है।बीचों बीच है।प्रजा से राजा के असंवादी होते हुए भी है। सरकार घुमक्कड़ है।वह लगातार गतिमान रहती है।उसकी गति किसी कम्पनी के सेल्समैन-सी है।सेल्समैन स्थान स्थान पर घूम घूम कर अपना माल खपाता है।।सबको पता है कि कुशल सेल्समैन कभी खाली हाथ घर नहीं लौटते।वे वापस आते हैं तो यात्रा में मैले हो गये कपड़ों के साथ बच्चों के लिए रेवड़ी गज्जक या लौलीपौप लेकर जरूर आते है। बच्चे उसे पा मगन हो जाते हैं।तब घरवाली पूछती है कि सबके लिए लाये ,मेरे लिए क्या लाये। सेल्समैन इसे सुन पति में तब्दील हो जाता है। भावविभोर हो कहता है-तुम्हारे लिए मैं हूँ न। पत्नी नाक सिकोड़ती है।वह बैग में गूदड़ बनी पतलून की जेब से रोल्ड गोल्ड का रत्नजड़ित हार निकाल कर दिखाता है। पत्नी की नाक फड़फड़ा उठती है।कोई नहीं जानता कि उसकी नाक प्रेमभाव से फडकी या छींकने के पूर्व तैयारी के रूप में। सरकार विदेश…

#‎पेरिसबर्निंग‬ उर्फ़ बर्निंग इण्डिया

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मुल्क में जब धर्मान्धता के खिलाफ़ निर्णायक युद्ध जीत लेने के बाद विजयी सेना जश्न मना रही थी कि तभी पटना से पहले पेरिस में आतिशबाज़ी होने लगी।हंसी ख़ुशी के लड्डुओं के फूटने के लिए पेट कितने विस्तृत हो गये हैं।सीरिया में ड्रोन हमले में मरने वाले रणबांकुरों की आत्मा के लिए शान्तिपाठ करने के लिए उन्होंने पेरिस में उपयुक्त ठिकाना जा ढूंढा। पेरिसबर्निंग के हैशटैग के साथ सोशलमीडिया पर बधाई गायी जाने लगी।उसकी अनुगूंज देश की सहिष्णुतावादी ताकतों के ड्राइंगरूम में भी सुनाई दे रही हैं।तालियों का नेशनलिस्ट कोरस हमारी संवेदनशीलता की निशानदेही करने लगा। 
पेरिस में जो हुआ उसे तो होना ही था।इसके लिए फ़्रांस खुद जिम्मेदार है।वहां की जीवन शैली और विचारों का खुलापन पूरे विश्व के लिए खतरा जो बनता जा रहा है।उससे अत्याधुनिक हथियारों के जरिये ही विनम्रता के साथ निबटा जा सकता है।हमारे यहाँ तो जातिगत सरोकार ही साम्प्रदायिकता को धूल चटा सकने में कारगर हैं।अब हम इत्मिनान के साथ हैशटैग इण्डिया बर्निंग की बाट जोह सकते हैं। 
हम उत्सवधर्मी लोग हैं।एक पर्व निपटता है कि दूसरे के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है।वस्तुतः उत्स…

उलटा-पुलटा और बल्लीमारान वाली बात

मैं वार्निंग वॉक के चक्कर में लगभग घिसट रहा था।वैसे तो मैं दुलकी चाल चल रहा था। देखने वालों को भी शायद ऐसा ही लग रहा हो।पर मुझे असलियत का पता था।मैं भी उन हज़ारों बुद्धिजीवियों जैसा हूँ ,जिन्हें यथार्थ का बोध तो होता है लेकिन वो उसे अभिव्यक्त नहीं करते।वो तब कोई बात खुल कर कहते हैं जब आसन्न खतरा टल चुका होता है।वे किशोर वय में हुए प्यार का इज़हार तब करते हैं जब उनके सीनियर सिटीजन बनने की बाकयदा मुनादी हो चुकी होती है।हम आदतन चिड़ियों द्वारा खेत चुग जाने के बाद पूर्ण मनोयोग से ‘हुर्र हुर्र’ करते हैं। मैं वाकई थक चुका था इसलिए तेज़ कदमों से चल रहा था।तेज़ पदचालन की कोई धार्मिक या मेडिकल वज़ह नहीं थी।मैं तो सिर्फ थकन से उपजी ऊब से जल्द से जल्द निज़ात पाने की कोशिश कर रहा था। मार्निंग वॉक का यह अनुष्ठान खत्म हो और मैं काउच पर पसर कर देश दुनिया के मसलों पर ढंग से चिंतन कर सकूँ।मैं अपने कम्फर्ट ज़ोन में ही कुछ सोच पाता हूँ।
मेरे लिए मार्निंग वॉक ठीक उसी तरह से और उतनी ही मिकदार में बाध्यकारी है, जिस तरह से बीट कांस्टेबल का आती-जाती रिक्शाओं के हुड पर अपना डंडा फटकार कर चौथ वसूलना।।जैसे परचुनिए द्वार…

छोटे जी क्यों पकड़े गये?

छोटेजी धरे गये।बाली में पकड़े गये।उनकी उम्र इतनी बाली भी न थी फिर भी। बरेली में पकड़े जाते तो कुछ और बात होती। वहां गिरे मिथकीय झुमके को खोजता हुआ कोई भी अपनी सुधबुध खोकर गिरफ़्त में आ सकता है। बड़ेजी यह ढूँढ-ढकोल  जैसा फिजूल का काम नहीं करते।उनके पास इस तरह का काम करने के लिए तमाम तरह के कारिंदे हैं। यही वजह है कि वह मस्त रहते हैं-एकदम रिलेक्स।वह दोस्तों के साथ घर की बैठक में बैठकर मज़े से ‘पपलू’ खेलते है।वह लगातार जीतते जाते हैं।दोस्त लोग बड़ेजी के ताश कौशल पर हैरान हैं।अपनी जीत पर उनके ठहाके गली के बाहर नुक्कड़ तक साफ़ सुनाई देते हैं।बड़ेजी की बेगम पान के जोड़े के साथ धीरे हंसने की सलाह भिजवा चुकी हैं। मुलाज़िम कान में बता आया है कि छोटा पकड़ा जा चुका है। “जो पपलू नहीं खेलेगा वह पकड़ा ही जाएगा” ,कह कर वह इतनी जोर से हंसे कि दोस्त बिना वज़ह जाने उनकी हंसी-ख़ुशी में शामिल हो लिये। सारा ‘अंडरवर्ड’ ताज्जुब में है कि छोटा ‘घरघुसरा’ था फिर भी पकड़ा गया।बड़ेजी बिंदास रहते  हैं। खाते पीते  मौज़ करते हैं।दरियादिल इतने कि गुप्तचर भाइयों के प्रमोशन की  खातिर जहाँ -तहां जाकर फोटो भी खिंचवा आते  है।राशनकार्ड या ड…

भूकम्प आया तो क्यों आया

दिल्ली हिली।भूकम्प आया।यह पता नहीं कि कौन सी बात पहले हुई।अफगानिस्तान के हिन्दुकुश इलाके में हिंदुत्व के होने का पता पहले लगा या लुटियन ज़ोन में रखी अटकलों की  लुटिया पहले छलकी।लेकिन कुछ न कुछ हुआ ज़रूर जो लोग बिना हिलेडुले एक दूसरे से पूछने लगे- व्हाट हैप्पिंड।फ़ोन घनघना उठे।व्हाट्स एप पर चिंताओं की चीलें चिंचियाने लगीं।आशंकाओं की फिरकनी घूमने लगी।फेसबुक अचानक गुलज़ारहो गया।गुलज़ार जी का  गीत याद आने लगा- इब्नबतूता पहन कर जूता।दिक्कत तब आ खड़ी हुई कि उनकी उलटबांसियों जैसी कविताओं को लेकर लोगों के भीतर फिट मैमोरी कार्डों ने बगावत कर दी।तब मुनव्वर राणा बहुत याद आये।पर समस्या यह पैदा हुई कि उनके अशआरों में से कौन से वाले याद किये जाएँ और किन्हें दरकिनार किया जाए।इस बंदे के बारे में यही पता नहीं कि वह आखिर कौन से पाले में खड़ा है।भूकम्प के खिलाफ या उसके समर्थन में। दिल्ली में  भूकम्प आया तो भरी दोपहरी में आया।लंच टाइम के बाद तब आया जब शहर की औरतें डबल बैड पर लेट कर टीवी के रिमोट से घरेलू राजनीति के दांवपेंच सीखती हैं।आदमी अपने-अपने दफ्तरों में खाना खाकर ऊँघने के लिए मौका तलाशते हैं।दिहाड़ी मज़दूर …

धप्प से आया बाज़ार

अखबार आ गया।रबर के छल्ले में लिपटा हुआ।वह ‘धप्प’ की आवाज़ के साथ बॉलकनी में गिरा।मुझे पता  था कि उसमें देश दुनिया की तमाम खबरें होंगी।इंटरनेट और टीवी न्यूज़ चैनलों की सूचना क्रांति के बावजूद हर तरह के समाचारों के लिए अख़बार पर हमारा आदिम यकीन बरक़रार है।युगीन विश्वास इतनी जल्दी खत्म नहीं होते।कहा जाता है कि आइन्स्टीन की पढने की मेज पर घोड़े की नाल सजती थी।हमारे मुल्क में विदेश से चिकित्सा विज्ञान में परास्नातक की डिग्री लिए डाक्टर के क्लीनिक की चौखट पर हरीमिर्च और नीबू लटकते हैं।विज्ञान और ढकोसले सदा मजे से साथ -साथ रहते आये हैं।बीएमडब्लू के साथ तांगा खींचता मरियल घोड़ा बिना हीनभावना के साथ दुलकी चाल से चलता है। छोटे बड़े शहरों के ऊपरी मंजिल पर रहने वालों के लिए सुबह अमूमन बॉलकनी से होकर ‘धप्प’ की आवाज़ के साथ ही आती है।शहरों के अधिकांश मुर्गों को पता है कि उनकी हैसियत अब दाल से बदतर हो चली है। वह बांग देना अकसर भूलते जाते हैं।वैसे भी दाल के भाव आसमान छूने के साथ उनकी जान पहले से अधिक झंझट में जा फंसी है।सहमाहुआ मुर्गा हो या आदमी अपने काम से काम रखता है। उस दिन भी ‘धप्प’ से अख़बार आया।मैं क्रिक…

कहाँ है टोबा टेक सिंह?

वह कद में नाटा और शरीर से स्थूल है।वह फिजिकली छोटा मोटा है।उसे यकीन है कि वह लेखक कद्दावर है।एक दिन वह  ऊँचे दरख्त पर कुल्हाड़ी लेकर जा बैठा और उसी डाल को काटने लगा जिस पर बैठा हुआ था।एक राहगीर ने पूछ लिया–अरे भाई यह क्या करते हो? उसने  प्रश्नकर्ता की ओर हिकारत से  देखा।उसी तरह देखा जैसे महान लेखक अमूमन पाठक की तरफ देखते हैं।कहा -दिखता नहीं क्या?मैं पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलता हुआ यहाँ तक पहुंचा हूँ। “आप आखिर करना क्या चाह रहे हैं?” जिज्ञासु राहगीर असल में राहगीर नहीं सुबह-सवेरे टहलने वाला है।उसने जिरह जारी रखी।मार्निंग वॉकर स्वभावतः दार्शनिक टाइप के होते हैं।वह बात में से बात निकालते जाते हैं और संवाद का सिरा कभी गुम नहीं होने देते। “आपके पास कैमरा है?” ऊपर से आवाज़ आई जो दरअसल सवाल की शक्ल में थी।”आपके पास माइक है?” दूसरा सवाल भी पेड़ से नीचे उतरा। राहगीर अचकचाया।उसने अपने बचाव के लिए जेब से मोबाइल निकाल लिया।पहले जिस तरह संकट प्रकट होने पर आम आदमी लाठी डंडा या पत्थर उठाता था अब मोबाईल उठा लेता है। “मैं समझ गया।आप फेसबुक वाले है”।पेड़ से इस बार अनुमान नमूदार हुआ । -नहीं।मैं ब्लागर हूँ।क्या…

लौटाने के मौसम में न गलने वाली अरहर की दाल

मौसम आते जाते रहते हैं।सर्द गर्म तीखे नरम मस्त मुलायम।आजकल मुल्क के बुद्धिजीवियों के बीच पुरस्कार सम्मान आदि लौटाने आपाधापी मची है।वे पूरे मनोयोग से अकादमियों को प्रशस्ति पत्र वापिस कर रहे हैं। यह काम करते हुए उनके चेहरे उसी तरह तमतमाए हुए हैं जैसे उन्हें प्राप्त करते हुए चमचमाए हुए थे।वैसे उनका तमतमाना ‘बाई डिफॉल्ट’ चमचमाने जैसे ही है। दीवाली आ रही है। इसकी  भनक मिलते ही घर की साफ़ सफाई के लिए अभियान की रूपरेखा बनने लगती है। कम्युनल टाइप के लोग यह काम खुलेआम करते हैं। बुद्धिवादी लोग गुपचुप तरीके से करते हैं। समाज के सेक्युलर तानेबाने  के लिए यह  गोपनीयता जरूरी भी है। शैल्फ़ में सजे या दीवारों पर टंगे पुरस्कारों को लौटानाभी आवश्यक  है ताकि सरोकारों पर जमी धूल साफ़ हो और वे उसे नये रंग में रंगवा सकें। कल मैडम जी पूछ रही थीं – कालोनी के सारे लेखक कुछ न कुछ लौटा आये हैं ।आप कुछ न वापिस किये। -मेरे पास तो सिर्फ अपनी नादानियाँ हैं। कहो तो वही  लौटा दूं ? मैंने पूछा। -यह चीज तो रद्दीवाले भी न उठाते। तुम तो रहने ही दो। ।उन्होंने तुनक कर कहा। -अरे याद आया ।कहो तो बरसों पहले की गयी मूर्खता सौंप  दूँ …

डेंगू ,चिड़ियाँ ,गाय और भावुकता

डेंगू क्या आया, बेचारी चिड़ियों और गली मोहल्लों में भटकने वाली गायों को पीने के लिए साफ़ पानी मिलना दूभर हो गया।सबको पता लग गया कि डेंगू वाला मच्छर साफ़ पानी में पनपता है। चिड़ियों के लिए घर की छत पर रखे जलपात्र और सार्वजनिक नांद रीती कर दी गयीं।एक की वजह से दूसरे की जान सांसत में आ गयी। अब देखिये न ,बिल्ली छीके पर टंगी दूध मलाई की मटकी ढूंढती घर में आई तो सारे चूहे बिल में जा छिपे ,अलबत्ता वह मुंडेर बैठे कबूतर को चट कर गयी।मटकी फ्रिज में सुरक्षित बची रही।बिल्ली भी भूखी नहीं रही।सब अपने-अपने मंतव्यों में कमोबेश कामयाब रहे।कबूतर की जान गयी सो गयी बाकी चीज तो बचगयीं। यह बिल्लियों के लिए मनोनुकूल  समय है।उनके पास खुद को बनाये रखने के तमाम विकल्प हैं।वह दूध दही से लेकर चूहा और साग़भाजी से लेकर कबूतर तक सब खा लेती है। चटखारे लेकर खाती है लेकिन चपर चपर की आवाज़ को दूर तक नहीं जाने देती। दबे पाँव चलती है।चालाकी का होना उसके डीएनए में बताया जाता है। इस बात की पुष्टि अभी होनी बाकी है।अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर व्यंग्य रचा जाता है।आलोचना के लिए प्रमाणित लैब की जांच रिपोर्ट अपरिहार्य होती है। बिल्ली ने …

डिजिटल पड़ोसियों का आना

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यह आकाशवाणी नहीं है।यह खबर ऊपर से आई है इसलिए सच ही होगी।वैसे हमें ये जमीनी सच नहीं पता कि सोलहवीं मंजिल पर एकाकी रहने वाली बूढ़ी महिला के घुटनों का दर्द आजकल कैसा है। बगल के फ़्लैट में रहने वाली आंटी अपने इकलौते बेटे के सीरिया में मार डाले जाने के बाद किस हाल में हैं।उन्होंने अब अपने जिन्दा बने रहने की कौन सी तरकीब इज़ाद की है। सोलहवीं मंजिल वाली बिल्डिंग की  लिफ्ट ख़राब हो जाने पर ग्राउंड फ्लोर पर फिजियो के पास सिकाई के लिए कैसे आती जाती होंगी।हम अपने पड़ोसियों की जिंदगी में  उसूलन नहीं झाँका करते। अच्छे भले पड़ोसी इसी प्रकार के होते हैं। समय तेजी से बदल रहा  है।अच्छे दिनों की आहट महसूस की जा रही है। अफवाह और हकीकत का फ़र्क मिट गया है। इस अंतर पर लोग चिंतित भी नहीं हैं। देशभक्ति अमरीका आदि मुल्कों में रह रहे प्रवासी भारतियों के बीच ओवरफ्लो कर रही है।  कन्फर्म सूचना यह है कि फेसबुक, टि्वटर, गूगल, इंस्टाग्राम नाम के हमारे नए पड़ोसी  आये हैं। ये ब्रह्मांड के किस माले पर  रहते हैं ,यह तो नहीं पता पर हमारी कामनाओं के कबाडखाने में इनका आवास  है। इनके घर की ओर जाने वाले रास्ते हरदम चौपट खुले रहते …