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गधे दरअसल गधे ही होते हैं

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गधे पर राष्ट्रव्यापी विमर्श जारी है।बेचारे को इस बात का पता भी नहीं।वह मैदान में इधर उधर विचरता हरी घास चर रहा है।बीच बीच में वह दुलत्ती झाड़ने की प्रेक्टिस करता है तो वातावरण में धूल उठती है।देखने वाले समझते हैं कि वह विमर्श के लिए कोई जरूरी सवाल उठा रहा है या उठाने की कोशिश कर रहा है।सवाल जब उठाये जाते हैं तो गर्द तो उड़ती ही है। आजकल गधों पर राजनीति हो रही है जबकि गधे की कोई अपनी पौलिटिक्स नहीं होती सिर्फ राग होता है।ढेंचू ढेंचू की बड़ी मासूम –सी डिप्लोमेसी होती है।वह खुश होते हैं तब गर्दन उठा कर रेंकते हैं ,जब नाराज़ होते हैं तो पिछले पैर फटकारते हैं।कभी कभी कुछ गधे रेंकते भी हैं और दुलत्ती भी चलाते हैं।ऐसे गधे दरअसल पहुंचे हुए विमर्शवादी होते हैं।इनके पास एक पूँछ के अलावा कुत्ते जैसी अदृश्य दुम भी होती है ,जिसे वे अपने आकाओं के आगे गुपचुप तरीके से हिलाते हैं।बड़े हौले से ‘खी-खी’ भी करते हैं।निरीह दिखते हैं पर बेहद शातिर होते हैं।सांस भी पूर्वनिर्धारित योजना के तहत लेते हैं।नींद में बडबडाते हैं तो भी सरोकारों के आलोक में।उनके पास मुखौटों का भंडार है।एक से बढकर मुखौटे।चेहरे पर चढाने वाले…

शराफ़त नहीं है फिर भी....

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शराफ़त के टोकरे को ताख पर रखे पर्याप्त समय बीत गया है।इस बीच मेरे घर के पिछवाड़े  बहने वाला नाले में इतना गंदा पानी बह चुका है कि अब इसके भीतर की तरलता समाप्त हो चुकी हैं।यही हाल शराफ़त का भी है,यह लोकाचार में विचरते विचरते इतना ठोस हो गयी है कि एकदम ठस्स हो चली है।इसी किसी वजह के चलते रुपहले पर्दे की बेमिसाल नृत्यांगना ने कहा था –शराफ़त छोड़ दी हमने। यह क्रांतिकारी बयान उन्होंने  ठुमकते हुए दिया ,तब दर्शकों ने सिनेमाघरों में इतने सिक्के इस कदर उछाले कि उसका यह वक्तव्य, जो दरअसल एक प्रस्ताव भी था,सिक्काबंद खनक के साथ ध्वनिमत से पारित हो गया।तब से आज तक जो शराफ़त यहाँ वहां कभी कभार दिख भी जाती है,वह वास्तव में शराफ़त नहीं,उसकी डुप्लीकेट है।अनुकृति नहीं डुप्लीकेट ,जैसे महात्मा बुद्ध की चीन में बनी प्रतिमा ,जिसे हम बेहद आदरभाव से लाफिंग बुद्धा कहते हैं। चुनावी समय में चारों ओर शराफ़त ही शराफ़त दिख रही है जैसे कभी हर शहर गाँव कस्बे की दीवारों पर बन्दर छाप लाल दंत मंजन के इश्तेहार ही इश्तहार दिखते थे।जैसे मुगली घुट्टी 555 के बगलगीर शराफ़त से भरी किलकारी मारता नवजात शिशु रहता था ।जैसे कल्लन पतंगसाज की…

तुला में फुदकता मतवाद

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अमुक जी आजकल कहाँ हैं?यह एक ऐसा सवाल है जो समय समय पर किसी न किसी बहाने उठता या उठाया जाता रहा है। वास्तव में यह अमुक जी और कुछ नहीं रिक्त स्थान पर लगे डाॅट है। रिक्त स्थान पूर्ति के लिए छोड़ दी गयी खाली जगह।एसएमएस की शैली में कहा और समझा जाए तो स्पेस।जब हम खुद को समझने में निर्णायक रूप से पराजित हो जाते हैं तब दूसरों की जिन्दगी का अतापता पूछना शुरू करते हैं।यह पूछताछ ऐसी ही है जैसे कोई नकटा दूसरों की नाक की कुशलक्षेम जानने के बहाने कुतरी हुई नाक के विषय में जानकर तसल्ली पाए।  अमुक जी के बारे में जानना इतना सरल भी नहीं होता पर खोज पड़ताल की जाए तो उनका पता लगा लेना इतना कठिन भी नहीं ।मैंने फोटो फ्रेम करने वाले मुसद्दी लाल जी से दरयाफ्त की तो उन्होंने बताया कि वह अभी दो चार दिन पहले लोहिया जी की तस्वीर मढ़वाते हुए दुकान पर बरामद हुए थे।इससे पहले बाबा जी का लेमिनेट किया चित्र ले गये थे।इसके बाद उस भगवाधारी बाबाजी को कोट पेंट वाले बाबा साहब से बदल कर ले गये थे।एक दिन अन्ना का आदमकद चित्र ढूंढते हुए आये थे जब वह उन्हें नहीं मिला तो बन्दर नचाते मदारी का फोटो यह कह कर ले गये कि यह भी ठीक है।इससे…

जलीकट्टू और सिर पर उगे नुकीले सींग

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अढाई हज़ार साल से हम जलीकट्टू खेलते हुए मरखने बैलों को साध रहे हैं।सैकड़ों बरसों से हम एक दूसरे के कंधे पर पाँव रख कर दही की हांडी चकनाचूर कर रहे हैं।गत अनेक दशकों से हम अपने बच्चों को भविष्य के लिए प्रशिक्षित करने के नाम पर तोते जैसी रटंत विद्या में प्रवीण बना रहे हैं।वर्तमान में हम अतीत के चोटिल परन्तु महिमामंडित संस्कृति में संतति के लिए गोलमटोल ‘पे पैकेज’ टटोल रहे हैं।बदलते वक्त के साथ हम खुद को लेशमात्र बदलने को तैयार नहीं।गंदगी से बजबजाती नालियों को हम इसलिए साफ़ करने को तैयार नहीं क्योंकि स्वच्छता से हमारी युगीन असहमति रही है।जीवन मूल्य तेजी से उल्ट पलट हो रहे हैं लेकिन हम अपनी परम्पराओं के वैभव के समर्थन में डटे हैं।हमारे सिरों पर नुकीले सींग उग आये हैं।
बैल के सींग पर लटके सोने चांदी के सिक्के पाने या लूटने पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। लूटपाट ही हमारी महत्वकांक्षा है।आकाश में लटकी हांडियों को फोड़ कर उसमें रखे द्रव्य को पाने की वीरता सर्वकालिक है। लेकिन इसमें जोखिम है।सबको पता है कि नो रिस्क ,नो गेम।जिस काम में रिस्क फैक्टर न हो वह तो घर की चौखट पर बैठकर लडकियों द्वारा खेले जाने …

मुंह फुलाने की वजह

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लालकिले से भाषण हो गया।हर बरस ऐसा ही होता है।इस बार अनेक समानांतर भाषण भीहुए।एक से बढ़ कर एक।तब यह देशज कहावत बड़ी याद आई-शेर का भाई बघेरा,एक कूदे तीन दूजा कूदे तेरा।एक भाषण तो फिर भी डेढ़ दो घंटे चलने के बाद थम गया था लेकिन तमाम किस्म के अन्य भाषण उपसंहार तक पहुंचे बिना अभी तक जारी हैं।यह सोशल मीडिया का ईजाद किया सोप ऑपेरा है। इस बीच साक्षी और सिन्धु ने ओलम्पिक में देश का नाम रोशम कर दिया। 'बहरहाल' के उपसर्ग के बाद रुके हुए भाषण फिर शुरू हो लिए जैसे टीवी पर कमर्शियल ब्रेक के बाद धारावाहिक पुन: चल पड़ें  ,अपनी गति से।अपनी धुन में रोते कलपते और रह रह कर चीत्कार करते । लालकिले वाले भाषण के साथ –साथ जो वनलाइनर ‘ट्रौल’ कर रहे थे,वे कुछ इस तरीके के थे जैसे फर्स्ट डे फर्स्ट शो में फिल्म देखने आया हुआ कोई फिल्म समीक्षक टाइप काअतिउत्साही दर्शक आगे से आगे फिल्म के कथानक का अंदाज़ा लगाता और आवाज़-ए-बुलंद उसका ऐलान करता  चले।हर मामले में अटकल लगाना हमारा नेशनल पासटाइम है जिसमें  हम पूरी मारक भावना के साथ खिलवाड़ करते हैं.वस्तुतः यह वह  खेल है जिसमें बंद लिफाफे में रखे अलिखित खत का  मज़मून भांपा ज…

मेरी आतुरता और देशभक्ति के सस्ते विकल्प

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स्वतंत्रता दिवस बेखटके चला आ रहा है। जगह-जगह झंडे और डंडे बिक रहे हैं। लोग मोल-तोलकर खरीद रहे हैं। 69 साल के आजाद तजुर्बे से हमने सीखा है कि ठेली पर जाकर सब्जी खरीदो या इलाज के लिए अस्पताल जाओ; गुमटी से पान लगवाओ या बच्चे का बीटेक में एडमिशन करवाओ, मोल-भाव जरूर करो, वरना ठग लिए जाओगे। हालांकि इसके बावजूद हम अक्सर ठग लिए जाते हैं। वैसे भी, दूध पीते हुए मुंह उन्हीं का जलता है, जो फूंक-फूंककर घूंट भरते हैं। स्वतंत्रता दिवस के बारे में सोच-सोचकर मेरा मन भी न जाने कैसा-कैसा हो रहा है। मुझे पहले तो लगा कि मेरा मन एसिडिटी के प्रकोप से अनमना हो रहा है। कुछ कैप्सूल भी निगले, लेकिन हुआ कुछ नहीं। दिल के भीतर देशभक्ति के भाव वैसे ही उमड़ रहे हैं, जैसे कोल्ड ड्रिंक में नमक मिलाने पर झाग। मैं भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कुछ कर गुजरने के लिए आतुर हूं। मेरे पास सीमित विकल्प हैं। मेरे पास सबसे सस्ता या लगभग मुफ्त का विकल्प तो यह है कि वाट्सएप के जरिये दोस्तों को देशप्रेम से ओत-प्रोत वीडियो या ऑडियो मैसेज भेज दूं। अपने फेसबुक प्रोफाइल पर तिरंगा लहरा दूं। टीवी के सामने बैठकर लाल किले के प्राचीर से आते…

ओलंपिक का समापन और चोर की दाढ़ी में तिनका

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रियो ओलंपिक का समापन हुआ। खेल खत्म, पैसा हजम। बच्चा लोग ताली बजाओ। अफसोस से झुकी गर्दनों को फिर अकड़ने दो। अब अगले चार साल तक कोई जोखिम नहीं। आओ अब आरोप-आरोप खेलें। बीच-बीच में जब ऐसा करते हुए मन उकताए, तो पदक जीतने वाली बेटियों की शान में कसीदे काढ़ लेंगे। मुल्क की जनता को बताते रहेंगे कि हमें सिर्फ गमगीन होना ही नहीं वरन विजय का जश्न मनाना भी आता है। हमें अपने मुकद्दर पर पछताना ही नहीं, गौरवान्वित महसूस करना भी आता है। एक अरब 25 करोड़ लोगों के लिए ये दो पदक ऐसे हैं, जैसे डूबते को तिनके का सहारा। मगर यह ध्यान रहे, अपने यहां चोर की दाढ़ी में भी तिनके का मिथकीय घोंसला पाया जाता है। जब तक ओलंपिक हुए, तब तक हर रात हम किसी अप्रत्याशित स्वदेशी जीत का सपना लेकर सोए और हर सुबह फेल्प्स या बोल्ट की अप्रतिम जीत की खबर सुनकर जागते रहे। वैश्विक परिदृश्य में खुद को रखकर मानवीय कामयाबी का यशगान करते रहे। लोगों को यह बता-बताकर आश्वस्त होते रहे कि पराजय की आद्र्रता भरे अंधकार में ही उजाले के अंकुर उपजते हैं। हर हार में जीत के अदृश्य गुलदान सजे होते हैं। ‘बेटर लक नेक्स्ट टाइम’ कहने से किसी की देशभक्ति पर…