गुरुवार, 30 जुलाई 2015

बयानों के कुल्ले और उसका पेटेंट



खबर है कि एक विदेशी टूथपेस्ट कम्पनी कुल्ले करने की भारतीय परम्परा का पेटेंट अपने नाम कराने की कोशिश कर रही है।  इस खबर को सुनते ही मुल्क भर के कुल्ला प्रेमी नींद से जाग उठे हैं और अपनी अपनी समझ के अनुसार कुल्ले पर कुल्ले कर रहे हैं।  लोगों को लग रहा है कि कुल्लों के जरिये सिर्फ मौखिक स्वास्थ्य की ही नहीं  सामाजिक सरकारों की नए सिरे से व्याख्या हो सकती है।
कुल्ला करना मुल्क भर की हर समस्या पर बयान देने जैसा हमारा जन्मना अधिकार है।  अभी  हम बयान देने के लिए किसी उपकरण या परमीशन  के मोहताज नहीं।  जिसको जब जहाँ मौका मिलता है वह वहां बयान उलट देता है।  इस काम के लिए चैनल उपयुक्त जगह है।  लेकिन वहां यदि स्थान न मिले तो फेसबुक ट्विटर आदि पर अपनी उलटबांसी को मजे से उसी तरह टिकाया जा सकता है जैसे ऑफीशियल पार्किंग में जगह न मिलने पर गाड़ी को किसी के मंदिर ,मज़ार या मस्जिद के आसपास चुपके से पार्क किया जाता है।यह काम करते हुए धार्मिकता ठीक उसी तरह कभी आड़े नहीं आती जैसे इन स्थानों की जमीन हथियाने में धर्म कभी रोड़े नहीं अटकाता। यह काम लोग बेहद श्रृद्धाभाव से करते हैं।     
कुल्ले करते रहने से मसूड़े सुदृढ बनते हैं।  दांतों के आभामंडल में इजाफ़ा होता है।  बयान देते रहने से मुल्क का सेक्युलर बाना रफू होता रहता है। हस्ताक्षरित स्टेटमेंट जारी करने से आदमी की छवि उज्ज्वल बनती है। ऐसे बयानों का विरोध करने से देशभक्ति की व्याख्या होती है।  बम विस्फोट में मारे गए लोगों की आत्माएं शर्मिन्दा होती हैं।  उन्हें लगता है कि वे इस तरह से क्यों मरे ? यदि मरना अपरिहार्य था तो किसी सेलेब्रिटी की भारीभरकम गाड़ी से कुचल कर पूरी आनबान शान से मरते। इससे बेहतर तो यह रहता कि कुछ इस तरह मरते कि किसी को इसकी कानोंकान खबर नहीं होती ।कीड़े मकोडों की तरह मर जाते ,चुपचाप। हालाँकि कीट पतंगे भी मरने से पहले खूब संघर्ष करते हैं।  फिर भी आदमी को न ढंग जीना आ पाया है और न मरना।  
लोगों को लगता है कि कुल्ले करना और बयान देना भी भला कोई काम जैसा है। कुल्ला वो जिसका द्रव किसी के कीमती कपड़े खराब कर दे और बयान ऐसा जो मुल्क का अमन चैन खत्म कर दे। मुहँ में थोड़ा पानी और कुछ तेजाबी शब्द भर कर उसे  बाहर बिखेर भर देने से बात नहीं बनती। उपयुक्त समय और स्थान पर जो काम किया जाता है उसके नतीजे विस्फोटक होते हैं।  पर इसे करने का सलीका न पता हो तो झंझट खड़ा हो जाता है। बयान तो फिर भी वापस लिया जा सकता है लेकिन मुहँ से बाहर आया कुल्ले का द्रव वापस नहीं होता। कुल्ले अधिक सनसनीखेज होते हैं।  
कुल्ले का साथ बयान देने का पेटेंट होना वाकई जरूरी है।  कोई फ्री में बयानों के कुल्ले क्यों करता फिरे , यदि ये काम इतना जरूरी ही है तो ऑन पेमेंट करो न !



मंगलवार, 28 जुलाई 2015

भुजंग डियो नहीं लगाते !


सुशासन जी यह खूबी है कि वह कभी गोलमोल बातें नहीं करते। जब कभी मौका मिलता है तो एकदम खरी खरी कह देते हैं। यह अलग बात कि उनके निंदकों को उनकी बातें खिसियानी हंसी में लिपटी उलटबांसी जैसी लगती हैं। निंदकों की समझ की  सीमा और राजनीति जरा हट कर होती है। बातों ही बातों में उन्होंने खुद को चन्दन कहा तो त्वरित प्रतिक्रिया हुई , अपने मुहँ मिया मिटठू। साथी जी को भुजंग कहा तो जवाब मिला कि हो सकता है कि वह हों। इस बहुरुपिया समय में कुछ भी सम्भव है। लेकिन चन्दन से लिपटे रहने की जब बात आई तो आवाज़ आई कि यह बात कुछ पची नहीं। मान्यवर , रहीम के ‘चन्दन विष व्याप्त नहीं’ वाले दोहे पर नए सिरे से विचार करें।रहीम ने जब यह बात कही होगी तब तक विज्ञान और तर्क शास्त्र इतना विकसित नहीं था। उन्होंने जो कहा लोगों ने सहज भाव से उसे मान लिया।तार्किकता के अभाव में लोगों के गर्दनें बड़ी जल्द सहमति मोड में आ जाती हैं। लेकिन अब हालात बदल लिए हैं। भुजंग  चन्दन से लिपटना तो दूर उसके आसपास फटकते भी नहीं। होशियार लोग और सांप इतनी एहतियात तो बरतते ही हैं। उनके बारे में कन्फर्म जानकारी यह है कि उन्हें चंदन की गंध हो या लड़कियों को रिझाने वाले  डियो, कतई नहीं भाते । वे तो अपनी फुफकार से ही प्रेम के इजहार , नफरत के प्रदर्शन और खौफ के संचार का काम चला लेते हैं। अलग- अलग समय पर अलग -अलग गंधों की जरूरत तो बस नेताओं को पड़ती है। जैसा अवसर हुआ वैसी सुगंध अपने तन से लपेट ली। चुनाव नजदीक दिखे तो सेक्युलर ब्रांड का इत्र छिडक लिया वरना  कोई खांटी कम्युनल सुगंध देह पर लगा कर धर्म लाभ लेते रहे। एक ही तरीके की गंध के साथ राजनीतिक मनोकामनाएं पूरी नहीं हुआ करतीं।
चंदन तस्कर वीरप्पन के इस फ़ानी दुनिया से कूच कर जाने के बाद से चंदन का ग्लैमर अब पहले जैसा रहा भी नहीं। इसलिए कोई सांप उससे चिपट कर क्यों रहेगा भला ? हालाँकि जानकार सूत्र बताते हैं कि वीरप्पन के जीते जी ही चंदन की सुवास का तिलस्म टूटने लगा था। इसलिए बाद के सालों में उसने अपना ध्यान हाथियों के उन दांतों की ओर लगा दिया था जो सिर्फ देखने दिखाने के लिए होते है। वह भविष्य दृष्टा था उसे पता था कि बाज़ार में गंध के मुकाबले दिखावटी चीजों से अधिक मुनाफा प्राप्त होता है। हमारे राजनीतिक सरोकार भी अब हाथीदांत सरीखे जैसे ही हो चले हैं। उसका चाल चेहरा और चरित्र भी हाथी की तरह वजनदार हो गया है।
 यह अधिक सत्य बोलने और व्यवहार में लाने का उपयुक्त समय नहीं है। स्पष्टवादिता आपकी जान झंझट में फंसा सकती है। सुशासन जी भी इस बात को अच्छे से समझते हैं। वह इस  अर्धसत्य से ही काम चलाने के पक्ष में खड़े दिखे  कि भुजंग के कुसंग से सज्जनों का कुछ नहीं बिगड़ता। तब तक तो कतई नहीं जब तक कि संग साथ के लिए तमाम तरह के विकल्प मौजूद हों।
अर्द्धसत्यों के जरिये, न चाहते हुए भी ,बड़े रहस्य और राजनीतिक प्रहसन प्रकट  होते रहे हैं।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

नैतिकता का आधार


मानसून के साथ मक्खी मच्छर और उमस का आगमन ठीक उसी तरह से हुआ  है जैसे बारात के जनवासे में पहुँचते ही ढोल तासे वाले बिन बुलाए तड तड करते हुए प्रकट हो जाते हैं । जब धुआं उठता  है तो आग़ के इर्दगिर्द होने अंदाज़ा स्वत: लग जाता है । राजनीतिक पटल पर जब किसी पदासीन से इस्तीफा मांगने की रुत आती है तो नैतिकता अपने आधार के साथ इस तरह खुद-ब-खुद नमूदार हो जाती है जैसे योगाभ्यासी लोग सुबह होते ही सार्वजनिक पार्क में चटाई बगल में दबा कर आ जाते हैं । जिस तरह बिना चटाई के योग नहीं हो सकता उसी प्रकार नैतिकता की ओढ़नी के बिना किसी से इस्तीफे की मांग करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है ।
वैसे तो बरसात का मौसम पेड़ से टपके हुए आम चूसने और लज्जतदार पकौड़े खाने के लिए उपयुक्त मना गया  है लेकिन जिसके  पास राजनीतिक समझ है उसके लिए  यह वक्त सरकार से लेकर इलाके के सफाईकर्मी तक को कोसने के लिए मुफीद होता है । ऐसे में यदि एकाध इस्तीफ़ा -विस्तीफा मांगने का मौका मिल जाये तो समझो गर्मागर्म समोसों के साथ मेथी की जायकेदार चटनी मुफ्त में मिल गई । जैसे उबली हुई लौकी की बेस्वाद सब्जी में प्याज ,लहसुन ,हींग ,जीरे का देसी घी में तड़का लग जाये ।
लोकतंत्र में सरकार को एक बार चुन लेने के बाद अगले पांच वर्ष तक कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन इस्तीफ़ा एक ऐसी चीज है जिसे कभी भी माँगा जा सकता है । जब ऐसा करने की कोई पुख्ता वजह न हो तो इसे बड़े आराम से नैतिकता के आधार पर माँग लिया जाता  है । इसके लिए किसी सुबूत या दस्तावेज़ या स्टिंग ऑपरेशन की क्लिपिंग की भी जरूरत नहीं पडती । इसके लिए नैतिकता ही पर्याप्त होती है ।
नैतिकता एक निरर्थक अभिव्यंजना है । भाषाविदों की मानें तो यह उसी तरह का फिजूल का शब्द है जैसे चाय के साथ शाय ,पकौड़ी के साथ शकौडी और इश्क के साथ विश्क । इसके बावजूद नैतिकता के आधार पर पचास प्रतिशत पुरुष आबादी शेष पचास प्रतिशत महिला आबादी के लिए सदियों से ड्रेस कोड तय करती आई है । इसके जरिये ही धर्म की ध्वजा अपनी पूरी धज के साथ लहराती हुई लगती है जबकि वास्तव में वह मजबूत डंडे के बल पर प्रतिष्ठित होती है और हवा के झोंके से हिलती है ।
नैतिकता का आधार एक अदृश्य बलिष्ठ डंडा होता है जिसके सहारे लोग वाकपटु और वाचाल टाइप के  लोग अपने मंतव्यों की भैंस हांक कर ले जाते हैं । अब कहावत यह होनी चाहिए कि जिसकी नैतिकता में जितना दम वह उतना अधिक दूध काढ़ ले जाये । इसके लिए भैंस या गाय को पालना  कतई जरूरी नहीं । नैतिकता का वही आधार कारगर होता है जिसके साथ बाहुबल होता है । अन्यथा नैतिकता बेहद फुसफुसी वस्तु होती है । कुछ- कुछ किसी निर्बल काया की उस बहादुरी जैसी जिसके लिए किसी पहलवान को गाली देकर तुरंत ओट में छुप जाने की जरूरत पड़ती है  ।
वास्तव में नैतिकता ताश की गड्डी  का जोकर या पपलू होती है जिसको कहीं भी फिट करके हारी हुई बाजी जीती जा सकती  है । यह कठपुतलियों मे बंधा वह डोरा है जिससे निष्प्राण विदूषक की ढपली बजाने लगती  है । राजनीति में हताश विपक्षी खेमे के लिए ये बड़े काम की होती है । इसके आधार पर वे कोई भी मांग किसी भी वक्त उठा  और वापस धर सकते हैं  । सघन निठल्लेपन के बीच नैतिकता एक गाव तकिये की तरह  है जिस पर थकी हुई रूह को टिकाकर चैन की साँस ली जाती है । नैतिकता हारे हुओं  को पराजय बोध नहीं होने देती । यह उस कागज के टुकड़े  की तरह है जिस पर शिकायत भी दर्ज की जा सकती है और इसे तोडमरोड कर हवा में तैरने वाला कनकौआ बनाया जा सकता है और जल में तिरने वाली नाव भी ।
नैतिकता निराकार होती है , यह दिखती नहीं पर होती है । पर इसका आधार होता है ,यह बात एकदम पक्की है । इसके  सहारे बड़ी बड़ी बातें और डील हो जाती हैं और किसी को भनक तक नहीं मिलती  ।

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

मानसून सत्र , रेनीडे और राजनीतिक मंतव्य


मानसून सत्र शुरू हुआ। इसे इसी तरह आरम्भ होना था जैसे यह हुआ। खूब गुलगपाडा हुआ और फिर थोड़ी हीलाहवाली के बाद पूरे दिन की छुट्टी। मीडिया सवाल दर सवाल पूछता रह गया और वे हंसते हुए निकल लिए। ठीक उसी तरह जैसे कभी फ़िल्मी नायक हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता हुआ चला जाता था। जैसे स्कूली बच्चे रेनीडे अवकाश की मुहंमागी मुराद पूरी हो जाने पर बस्तों और तख्ती को विजयध्वज को लहराते हुए घर की ओर चले जाते थे।
इसे देख याद आया कि पुराने दिनों में पाठशालाओं में भी तो ऐसा ही होता था। बच्चे बारिश के दिनों में घर से स्कूल आते थे। उनके साथ साथ चहलकदमी करते हुए जलभरे नटखट  बादल भी आ धमकते थे। बच्चे बादलों को देख हरेभरे मैदानों में खेलने के लिए मचल उठते थे।छुट्टी करने की पुरजोर मांग करते थे और मास्टरजी अंतत: पसीज जाते थे। रेनी डे हो जाता था। हालाँकि यह बात बहुत बाद में पता लगी कि उसे रेनीडे कहा जाता है। यह उस समय की बात है जब बादल बिना अधिक नखरे दिखाए चट से बरस कर पट से सबको भिगो देते थे।
यह कैसा मानसून सत्र है,जो शुरू तो हो लिया पूरे विधिविधान के साथ लेकिन न सदन में छाते लहराए ,न काली मिर्च की धूनी उड़ी ,न किसी का कॉलर किसी ने खींचा, न आपस में धरपटक हुई और न ही सदन की गरिमा तार-तार  हुई। इससे भी बड़ी बात ,कोई इस्तीफ़ा ब्रेकिंग न्यूज़ बन कर प्रकट भी नहीं हुआ। वे रिटायर्ड लोग जो बाय डिफॉल्ट सनसनी पसंद होते हैं , उनको लगा कि वे दिन भर बेकार टीवी देखते रहे। इससे बेहतर तो वे किसी थियेटर में लगी घटी दरों वाली अलीबाबा चालीस चोर टाइप कोई फिल्म ही देख आते। उससे कुछ रसरंजन तो होता। असल बात तो इंटरटेनमैंट की है ,वो चाहे जिस फॉर्मेट में आये।
आज सत्र का पहला दिन था सो रेनीडे हुआ।छुट्टी मिली। कुछ धमाल तो बनता ही है। धमाल करना नहीं आता था तो कुछ तूफानी ही कर लेते। धमाल मन से उपजता है। टीवी कैमरों के सामने सदन में लाइव फबता है। परिसर के बाहर खड़ी चैनल वालों की ओबी वैन को देख कर होता है। एंकर के माइक को देखते ही धमाल के लिए जी मचल उठता है। तूफानी गुपचुप हो जाता है। कोल्डड्रिंक का ढक्कन खोलते ही हो जाता है।बड़े सस्ते में तूफ़ान प्रकट होता है। निठल्लेपन के पलों में मस्ती आ जाती है।सदन की कैंटीन के सस्ती दरों के पकौडों के जरिये मानसून आने का आनंद कई गुना बढ़ जाता है।
सुना है सदन में रेनीडे अब कई दिन मनेगा। ऐसे ही लोग आयेंगे। कुछ देर इधर- उधर मौज मस्ती करेंगे। गपशप करेंगे। सरोकारों की दुहाई देकर कामकाज स्थगित करवाएंगे। जन आकांक्षाओं का हवाला देकर एक दूसरे को गरियायेंगे। उत्तेजना में बंद मुट्ठियाँ हवा लहराते अपने घरो की ओर चले जायेंगे।
मानसून सत्र के लाइव टेलिकास्ट के जरिये  बच्चे बच्चे को पता लग गया है कि रेनीडे अभी भी मुल्क में पूरी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। अकर्मण्यता का एक नाम रेनीडे और राजनीतिक मंतव्य भी होता  

सरकार के पास-फेल का हिसाब

बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट आने शुरू हो गए हैं। अब इन परीक्षाओं में इतने अंक लुटते हैं कि कोई फेल नहीं होता। सारे पप्पू-टप्पू टाइप के लोग पास हो जाते हैं। परीक्षक इस उदारता से अंक बांटते हैं कि यदि गणितीय बाध्यता न हो, तो वे छात्रों को सौ में से एक सौ दस नंबर दे डालें। सौ नंबर उत्तर पुस्तिका में लिखाई के और दस अंक अतिरिक्त उस सफाई के, जो हाथ की सफाई भी हो सकती है। बच्चे ज्यादा अंक पाकर कम इतराते हैं, पर अभिभावकों का सीना गर्व से अधिक फूलता है। वे नौनिहालों के नंबरों की लहलहाती फसल में आनुवांशिक कमाल देखते हैं।

सरकार को सत्ता संभाले एक साल पूरा होने वाला है। मुल्क के समस्त चिंतक सरकार के कार्यकलापों की कॉपी जांचने में लगे हंै। यहां पूर्णांक सिर्फ दस हैं। कुछ तो सरकार बनने के पहले दिन से उसका रिजल्ट बताने में लगे हैं। वे सरकार को लगातार फेल घोषित कर रहे हैं। हवा तेज चली एक नंबर घटा। हवा मंद रही, तो दो नंबर, बारिश हुई, तो तीन अंक घटे और भूंकप आया, तो दस पूर्णांक में से माइनस नौ। ऋणात्मक दस इसलिए नहीं दिए, क्योंकि भूकंप का एपिसेंटर भारत में न होकर नेपाल में था। यदि भूकंप का केंद्र बिंदु देश में होता, तो यकीनन सरकार को माइनस दस अंक मिलने थे और सरकार अपने कार्यकाल के शेष चार साल इनकी भरपाई करती रहती।

लोकतंत्र में नंबरों का बड़ा महत्व होता है। यहां औसत के आधार पर कुछ नहीं कहा जाता। सबसे बड़ी बात यह कि नंबर चलायमान होते हैं। इसकी मूल्यांकन प्रणाली भी अद्भुत होती है। धारणा के आधार पर नंबर मिलते हैं, पूर्वाग्रह के अनुसार घटते हैं और बदलती निष्ठाओं के अनुरूप रंग बदलते हैं। नंबर गेम के खिलाड़ी कभी हार नहीं मानते। वे अपनी पराजय में से जीत का उचित आंकड़ा ढूंढ लाते हैं। विपक्ष सरकार को विफल घोषित करता रहता है। सरकार का प्रचारतंत्र अपने पास होने का प्रमाणपत्र जनता को दिखाता रहता है। जनता साइबर कैफे वाले की तरह औरों के द्वारा जारी रिजल्ट बिना कोई टिप्पणी किए चुपचाप निहारती रहती है।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

अगले जन्म मोहे इंजीनियर ही कीजो .....
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उनके यहाँ से दो ढाई किलो हीरे मिले ।लोगों के घरों में तो दो ढाई किलो प्याज या आलू तक बमुश्किल तमाम मिलते हैं।इंजीनियरजी  हमारे समय के नायाब कीमियागर हैं ।उनके पास हुनर है कि जिस काली चीज को ढंग से छू भर लें तो वह हीरे में तब्दील हो जाती है।काला धन हो या श्यामल मन ,सब चमकता हुआ हीरा बन जाते हैं।और चमक भी कितनी बहुरंगी कि उसकी चकाचौंध के आगे समस्त राजनीतिक मतवाद एकाकार हो जाते हैं ।सारा प्रशासनिक तंत्र कोर्निस करने लगता है ।सारे नियम- कायदों की किताब में से रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है।
इंजीनियरजी हमारे समय के सबसे चमकदार आइकन हैं।उन्होंने धन अर्जित करने के  अपने अभूतपूर्व कौशल और मेधा से इतिहास रच दिया है।भावी टेक्नोक्रेट्स के लिए वह प्रात: स्मरणीय बन गए  हैं ,प्रेरणा का अजस्र स्रोत ।वक्त की शिला पर लिखी गई अमिट सक्सेस की गजब दास्तान।लोगों की कामनाओं में वह रच बस गए हैं।लोक में -अगले जनम मुझे इंजीनयर ही कीजो.....की स्वर लहरी गूँज रही है ।
इंजीनियरजी के पास क्या नहीं है और क्या क्या नहीं मिला इनके पास।जो मिला उससे अधिक इधर उधर रखा रह गया।बस ढाई किलो हीरे ,डेढ़ क्विंटल सोना ,दस बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ ,सौ हेक्टेयर आवासीय भूखंड ,एक सौ पिचासी फ़्लैट आदि का ही पता लगा।वह तो अपने आप में किसी बैंक के चलते फिरते स्ट्रांगरूम में रखे सामान जैसे हैं।हमारी पारदर्शी सर्वजनिक कार्य प्रणाली का आइना हैं।उनके जैसा बन पाना अनेक लोगों का ख्वाब है।वह हमारी कामनाओं  के ब्रांड एम्बेसडर है।
यह अलग बात है कि इंजिनीयर जी का सरमाया सार्वजनिक हो जाने से मुल्क भर के अवर अभियंताओं की जान सांसत में फंस गई है।सिर्फ जूनियर टाइप लोगों की ही जान झंझट में नहीं उलझी वरन अन्य चीफ के पद तक पर शोभायमानों  के हाल खराब हैं।उनकी पत्नियाँ उन्हें रात दिन यह कह कर उलाहना देती नहीं थकती कि तुम्हारे बस की न है कुछ करना धरना।उन्हें देखो न, उनकी घरवाली को अपने जेवरों को उठाने के लिए कुली बुलाने पड़ते हैं।और एक तुम हो ,बीस तीस ग्राम का जड़ाऊ हार  खरीदते हुए हांफ जाते हो।उनकी पर्सनेलिटी देखी है कभी ? तुम भी जिम जाया करो जिम।कुछ करा करो ,करने से ही  होता है।
इंजिनीयर बनना आसान हो सकता है लेकिन पद पाकर  इंजीनियरजी बनने के  बाद धन सम्पदा एकत्र करने की इंजीनियरिंग कर पाना कठिन होता है । सरकार के लिए सड़क ,फुटपाथ ,पुलिया ,मकान आदि बनवाते हुए यह भी जानना पड़ता है कि ठेकेदार से मिलीभगत से कितनी पूँजी निजी जेब तक किस तकनीक से बने  रज्जू मार्ग से कैसे पहुँचेगी।मिल- बाँट कर खाने खिलाने का पूरा ब्लू प्रिंट बनाना पड़ता है।राजनेताओं के घर गांव तक उनकी चाहतों के पुल विकसित करने होते हैं।काले धन को कार्बन का शुद्धतम रूप मानकर उन्हें हीरे में तब्दील करना पड़ता है।धन क्षणभंगुर होता है।हीरा सदा के लिए होता है।उसकी चमक कभी धूमिल नहीं होती।वह हर हाल में चमकता है।समय गुजरता जाता है लेकिन हीरे पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।हीरा आत्मा जैसा होता है –अम्रर ,अविनाशी और अदभुत।
इंजीनियरजी जीते जी इतिहास पुरुष बन गए हैं ।उनका कृतित्व और व्यक्तित्व अनुपम हीरे की तरह सदियों तक यूँही जगमगाता रहेगा।

रविवार, 19 जुलाई 2015

थैंक्यू इंद्र देवता,तुसी ग्रेट हो जी !


बारिश आ गईl बिन गरजे बादल बरस गए l धरती तरबतर हुई l इससे फिर यह साबित हुआ कि बरसने के लिए गरजने की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन बरसने के साथ गरजते भी रहें तो मामला एकदम चकाचक हो जाता है l  जिस तरह जिया के झूमने भर से सावन आ जाता है उसी तरह कभी कभी कागजी नाविकों की फरमाइश पर गली मोहल्ले की नालियां पानी से भर जाती हैं l यह पानीदार वक्त है l जिनके घरों की  छतें वाटरप्रूफ हैं ,उनके लिए छज्जे पर खड़े होकर बरखा की फुहारों का मज़ा लेने का मौसम हैl
बारिश में बतरस और ताकाझांकी के लिए उत्तम मौका होता है l बालकनी में बैठ कर,इधर उधर नजर फिराते हुए अतीत के सुनहरे पलों का पुनर्पाठ हो सकता है l यदि हरी मिर्च की चरपरी पकौड़ी गर्म चाय के साथ उपलब्ध हो तो देश दुनिया के मुद्दों पर विमर्श किया जा सकता है l यदि प्याज़ के पकौड़े मिल जाएँ तो व्यापम घोटाले पर चर्चा और उनके साथ हरी चटनी मिले तो ग्रीस के मुद्रा संकट पर बहस  की जा सकती है l  बरसाती स्नैक्स  के मैन्यू के हिसाब से चिंतन  का आकार प्रकार बदलता रहता है l पकौड़ियों की मिकदार और क्वालिटी के हिसाब से विमर्श का एजेंडा तय होता है l
बरसात आई है तो खूँटी पर टंगे छाते की याद साथ लाई हैl हालंकि छाता  आदमी को भीगने से बचाता  तो नहीं पर बचाव का  भरम जरूर पैदा करता हैl छाता जितना रंगीन होगा उससे उत्पन्न भ्रम उतना ही अधिक नयनाभिराम होगा l कुछ होने से अधिक उसके होने का वहम महत्वपूर्ण होता है l मेंढक गायब हो चुके हैं लेकिन उनकी याद किसी को नहीं आती क्योंकि उनके हिस्से की टरटर बौद्धिक कर लेते हैंl मेंढक के मुकाबले उसकी  टर्राहट बड़ी चीज है,चाहे वह जिस तरीके से आये l
अरसे से लोग कहते आये हैं कि बरसात के रातदिन  बड़े रूमानी होते है l होते होंगेl रुमानियत मौसमी होती है l वह हवा के प्रवाह ,दबाव ,तापक्रम और आद्रता के अनुरूप प्रकट होती है lकभी कभी सब कुछ होते हुए भी नहीं होती  और कभी बेवजह भी सामने आ जाती है l रुमानियत  तभी कारगर लगती  है जब वह आफिशियल हो और , उसका प्रचार प्रसार प्रमोशन सलीके से किया जाये l कार्यकुशल सरकारें हर मौके को एक इवेंट में बदल देने में निपुण होती हैं l वह इतनी विनम्र होती हैं कि हर अच्छी बात का श्रेय  खुद नहीं लेती l मसलन अच्छे मानसून की वजह से महंगाई घटने की उम्मीद को उसने भगवान  के खाते में क्रेडिट कर दिया हैl धार्मिकता की यही तो खूबी है कि वह हर बात को इधर या उधर सरका देती है l
इस बार बरसात आई है तो मौसम विज्ञानियों की कमजोर मानसून की भविष्यवाणी को ठेंगा दिखाते हुई आई हैl ऐसे में सरकार की बन आई हैl वह शीघ्र ही मुल्क भर के अख़बारों में इश्तेहार देकर कहेगी :थैंक्यू इंद्र देवता ,तुसी ग्रेट हो जी l
तरक्की पसंद सरकारें कृतज्ञता ज्ञापन में कभी नहीं चूकतींl




मंगलवार, 7 जुलाई 2015

पगडियों के जरिये तय होता मुकद्दर


यह खुद पगड़ी पहनने से अधिक दूसरों की पगडियां उछालने का मौसम अधिक है।बारिश की ऋतु तो ‘ऑन पेपर’ है।इसके होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।वैसे तो पगड़ी के सिर पर होने या न होने से भी कुछ नहीं बनता - बिगड़ता ।इसके बावजूद अदृश्य पगडियां चाहे- अनचाहे सभी प्रमुख  सिरों पर मौजूद रहती है। सरकार की पगड़ी उछालने का खेल कुछ लोग बड़े मनोयोग से खेल रहे हैं।उनका यकीन है कि सरकार की पगड़ी की कोटर में वह मिथकीय तोता रहता है , जिसमें सियासी राक्षस के प्राण बसते हैं। वे सरकार की पगड़ी को गिरा कर उसमें छिपे तोते की गर्दन मरोड़ना चाहते हैं।
तमाम पुरातनपंथी लोगों की धारणा हैं कि  बुद्धिमत्ता सिर के ऊपरी माले में बसती है जबकि सरकार सबको बताने में लगी है कि मेधा  डिजिटल होती है और इसे  माईक्रो चिप के जरिये कहीं भी संभाल कर रखा और इस्तेमाल किया जा सकता है। आधुनिक संदर्भ में पगड़ी बतौर पहनावा भले ही सिर्फ धार्मिक रह गई हो लेकिन इसके जरिये होने वाली  राजनीति पूरे उफ़ान पर है। सोशल मीडिया  के रणबांकुरे पगड़ी को लेकर बेहद सम्वेदनशील  हैं।वे समय -असमय किसी न किसी की पगड़ी उछाल देते हैं।
अतिउत्साही निंदकों का मानना है कि सत्तासीन लोग अपने  इस्तीफे अपनी पगड़ी में खोंस कर  रखते हैं । वे उसे गिरा कर उसमें से उचित इस्तीफे ढूंढ रहे हैं । जानकारों का कहना है कि तोता तो सिर्फ एक रूपक है असल मामला तो इस्तीफे का है।
पगड़ियों के भीतर- बाहर आँख मिचौनी का सनातन खेल निरंतर जारी  हैइस समय ये पगडियां फुटबॉल बन गई हैं । ये पूरे मुल्क के चिंतन में इधर से उधर उछल रही हैं।खिलाड़ी अपनी -अपनी सामर्थ्य भर उसे पकड़ते उछालते सँभालते दौड़ लगाते हांफ रहे हैं।इस खेल का गोलकीपर लंदन में बैठकर  लगातार नई फुटबॉल मैदान में भेज रहा है।वह अत्यंत प्रतिभाशाली गोलकीपर है । उसके  पास तक कोई गेंद आये ,इससे पहले वह नई बाॅल दन्न से मैदान की ओर किक कर देते हैं।  इस  समय अनेक फुटबॉल मैदान में हैं।इनमें कौन सी आफिशियल है ,इसका कुछ पता नहीं । मीडिया असलियत का पता लगाने में जुटा है। 
देखते ही देखते अनेक सत्यनिष्ठ पगडियां भी फुटबॉल बन गई हैं और खिलाड़ी इतनी शिद्दत से एक दूसरे के पाले की ओर किक मार रहे हैं कि मानो मुल्क की सवा सौ करोड़ जनसंख्या का  मुकद्दर इन्हीं के जरिये तय होना हो।

बुधवार, 1 जुलाई 2015

मानसून ,इस्तीफ़ा ,मेथी की चटनी और रेनडांस


मानसून के आ पहुँचने की अपुष्ट खबर है वह कभी ‘मे आई कम इन’ सर कह कर नहीं आता  वह ओबिडियंट स्टूडेंट जैसा  नहीं होता वह क्लासरूम के पिछले दरवाजे से किसी शैतान बच्चे की तरह दबे पाँव आता है राजनीति में भी सब कुछ खुलेआम नहीं होता अधिकतर काम चुपचाप हो जाते हैं तमाम वजहों के चलते  न होने लायक काम भी हो जाते हैं मसलन हवा का दवाब घटता है तो बादल बरस जाते हैं विक्षोभ बढ़ता है तो जलभरे काले बादल तमाम गर्जन के बावजूद नहीं बरसते राजनीति में भी अमूमन यही सब होता है ऐसा ही सदा -सदा से होता आया है मौसम विभाग और राजनीतिक पंडितों की भविष्यवाणी अकसर धूल चाट जाती है मौसम और राजनीति में  अप्रत्याशित घटित होता है होता हो या न होता हो ,पर होता हुआ –सा लगता जरूर है l
कई दिनो से  सुन रहे हैं कि मानसून मुंबई तक आ पहुंचा है मुम्बई तरबतर हो ली है l दिल्ली सहित अन्य जगहों के  सूखे खेत, खलिहान, गाँव, कस्बे उसके  आने की बाट जोह रहे हैं  लेकिन वह आने की तमाम अफवाहों के बावजूद ठीक से आ नहीं रहा यही हाल राजनीतिक हलकों में इस्तीफों का है  वे आने की पुष्ट खबरों के बावजूद  आ नहीं रहे कभी उनके लंच के समय आने का पता लगता है तो बहुत से लोग यह सोच कर लंच  स्थगित कर देते हैं कि चलो इंतजार कर लें इस्तीफ़ा आ जाये तो चैन से रोटी खाएं मानो इस्तीफ़ा ,इस्तीफा न हुआ कि मेथी की चटनी हो गया ठीक से सिलबट्टे पर पिस कर आ जाये तो रुखी सूखी रोटियों में स्वाद आये रोटियां बिलकुल समोसे जैसी चटपटी हो जाएँ l
जब से मुल्क में नई सरकार आई है तब से कुछ लोग हरदम बेचैन रहने लगे हैं वे दिन भर सरकार के खिलाफ सुबूत एकत्र करते हैं और रात को उसके इस्तीफ़ा देने का सपना देखते हैं उनका बस चले तो मानसून के विलम्ब से आने जैसे मुद्दे को लेकर चुनी हुई सरकार को खड़े खड़े बर्खास्त कर दे उनके भीतर का सेक्युलरिज्म ‘ओवरफ्लो’ करने लगता है तो वे सोशल मीडिया पर आकर धार्मिकों को खरी खोटी सुना देते हैं lवहाँ जो उनकी बात का प्रतिवाद करता है उसे वे तत्काल प्रभाव से ब्लॉक कर देते हैं l
किसी चैनल पर कोई खबरची चीखता हुआ बता देता है कि देर रात मानसून की बारिश और डिनर के  समय पर एकाध इस्तीफ़ा जरूर आ जायेगा मानसून प्रेमी   कमर कस कर तैयार हो जाते हैं  लैला मजनू टाइप के लोग बरसातों में भरने लायक ‘आहों’ का रिहर्सल शुरू कर देते हैं अतिउत्साही नौनिहाल कॉलोनी की नाली का ब्लूप्रिंट और  कागज़ की नाव बनाने की तकनीक इंटरनेट से सीखना शुरू कर देते हैं  इस्तीफ़ा मांगने वाले लोग दिल थाम कर वक्त से पहले ही उँगलियों को क्रास करके डिनर टेबिल पर जा बैठते हैं l
फ़िलहाल इस्तीफे के चक्कर में लोग डाइटिंग करते हुए अपना वजन घटा रहे हैं और मानसून भक्त  बाथरूम के शावर के नीचे रेनडांस का लुत्फ़ ले रहे हैं