संदेश

July, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बयानों के कुल्ले और उसका पेटेंट

चित्र
खबर है कि एक विदेशी टूथपेस्ट कम्पनी कुल्ले करने की भारतीय परम्परा का पेटेंट अपने नाम कराने की कोशिश कर रही है।  इस खबर को सुनते ही मुल्क भर के कुल्ला प्रेमी नींद से जाग उठे हैं और अपनी अपनी समझ के अनुसार कुल्ले पर कुल्ले कर रहे हैं।  लोगों को लग रहा है कि कुल्लों के जरिये सिर्फ मौखिक स्वास्थ्य की ही नहीं  सामाजिक सरकारों की नए सिरे से व्याख्या हो सकती है। कुल्ला करना मुल्क भर की हर समस्या पर बयान देने जैसा हमारा जन्मना अधिकार है।  अभी  हम बयान देने के लिए किसी उपकरण या परमीशन  के मोहताज नहीं।  जिसको जब जहाँ मौका मिलता है वह वहां बयान उलट देता है।  इस काम के लिए चैनल उपयुक्त जगह है।  लेकिन वहां यदि स्थान न मिले तो फेसबुक ट्विटर आदि पर अपनी उलटबांसी को मजे से उसी तरह टिकाया जा सकता है जैसे ऑफीशियल पार्किंग में जगह न मिलने पर गाड़ी को किसी के मंदिर ,मज़ार या मस्जिद के आसपास चुपके से पार्क किया जाता है।यह काम करते हुए धार्मिकता ठीक उसी तरह कभी आड़े नहीं आती जैसे इन स्थानों की जमीन हथियाने में धर्म कभी रोड़े नहीं अटकाता। यह काम लोग बेहद श्रृद्धाभाव से करते हैं।      कुल्ले करते रहने से मसूड़े सु…

भुजंग डियो नहीं लगाते !

चित्र
सुशासन जी यह खूबी है कि वह कभी गोलमोल बातें नहीं करते। जब कभी मौका मिलता है तो एकदम खरी खरी कह देते हैं। यह अलग बात कि उनके निंदकों को उनकी बातें खिसियानी हंसी में लिपटी उलटबांसी जैसी लगती हैं। निंदकों की समझ की  सीमा और राजनीति जरा हट कर होती है। बातों ही बातों में उन्होंने खुद को चन्दन कहा तो त्वरित प्रतिक्रिया हुई , अपने मुहँ मिया मिटठू। साथी जी को भुजंग कहा तो जवाब मिला कि हो सकता है कि वह हों। इस बहुरुपिया समय में कुछ भी सम्भव है। लेकिन चन्दन से लिपटे रहने की जब बात आई तो आवाज़ आई कि यह बात कुछ पची नहीं। मान्यवर , रहीम के ‘चन्दन विष व्याप्त नहीं’ वाले दोहे पर नए सिरे से विचार करें।रहीम ने जब यह बात कही होगी तब तक विज्ञान और तर्क शास्त्र इतना विकसित नहीं था। उन्होंने जो कहा लोगों ने सहज भाव से उसे मान लिया।तार्किकता के अभाव में लोगों के गर्दनें बड़ी जल्द सहमति मोड में आ जाती हैं। लेकिन अब हालात बदल लिए हैं। भुजंग  चन्दन से लिपटना तो दूर उसके आसपास फटकते भी नहीं। होशियार लोग और सांप इतनी एहतियात तो बरतते ही हैं। उनके बारे में कन्फर्म जानकारी यह है कि उन्हें चंदन की गंध हो या लड़कियों …

नैतिकता का आधार

चित्र
मानसूनके साथ मक्खी मच्छर और उमस का आगमन ठीक उसी तरह से हुआ  है जैसे बारात के जनवासे में पहुँचते ही ढोल तासे वाले बिन बुलाए तड तड करते हुए प्रकट हो जाते हैं । जब धुआं उठता  है तो आग़ के इर्दगिर्द होने अंदाज़ा स्वत: लग जाता है । राजनीतिक पटल पर जब किसी पदासीन से इस्तीफा मांगने की रुत आती है तो नैतिकता अपने आधार के साथ इस तरह खुद-ब-खुद नमूदार हो जाती है जैसे योगाभ्यासी लोग सुबह होते ही सार्वजनिक पार्क में चटाई बगल में दबा कर आ जाते हैं । जिस तरह बिना चटाई के योग नहीं हो सकता उसी प्रकार नैतिकता की ओढ़नी के बिना किसी से इस्तीफे की मांग करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । वैसे तो बरसात का मौसम पेड़ से टपके हुए आम चूसने और लज्जतदार पकौड़े खाने के लिए उपयुक्त मना गया  है लेकिन जिसके  पास राजनीतिक समझ है उसके लिए  यह वक्त सरकार से लेकर इलाके के सफाईकर्मी तक को कोसने के लिए मुफीद होता है । ऐसे में यदि एकाध इस्तीफ़ा -विस्तीफा मांगने का मौका मिल जाये तो समझो गर्मागर्म समोसों के साथ मेथी की जायकेदार चटनी मुफ्त में मिल गई । जैसे उबली हुई लौकी की बेस्वाद सब्जी में प्याज ,लहसुन ,हींग ,जीरे का देसी घी में तड़…

मानसून सत्र , रेनीडे और राजनीतिक मंतव्य

चित्र
मानसून सत्र शुरू हुआ। इसे इसी तरह आरम्भ होना था जैसे यह हुआ। खूब गुलगपाडा हुआ और फिर थोड़ी हीलाहवाली के बाद पूरे दिन की छुट्टी।मीडिया सवाल दर सवाल पूछता रह गया और वे हंसते हुए निकल लिए। ठीक उसी तरह जैसे कभी फ़िल्मी नायक हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता हुआ चला जाता था। जैसे स्कूली बच्चे रेनीडे अवकाश की मुहंमागी मुराद पूरी हो जाने पर बस्तों और तख्ती को विजयध्वज को लहराते हुए घर की ओर चले जाते थे। इसे देख याद आया कि पुराने दिनों में पाठशालाओं में भी तो ऐसा ही होता था। बच्चे बारिश के दिनों में घर से स्कूल आते थे। उनके साथ साथ चहलकदमी करते हुए जलभरे नटखट  बादल भी आ धमकते थे। बच्चे बादलों को देख हरेभरे मैदानों में खेलने के लिए मचल उठते थे।छुट्टी करने की पुरजोर मांग करते थे और मास्टरजी अंतत: पसीज जाते थे। रेनी डे हो जाता था। हालाँकि यह बात बहुत बाद में पता लगी कि उसे रेनीडे कहा जाता है। यह उस समय की बात है जब बादल बिना अधिक नखरे दिखाए चट से बरस कर पट से सबको भिगो देते थे। यह कैसा मानसून सत्र है,जो शुरू तो हो लिया पूरे विधिविधान के साथ लेकिन न सदन में छाते लहराए ,न काली मिर्च की धूनी उड़ी ,न किसी का क…
सरकार के पास-फेल का हिसाब बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट आने शुरू हो गए हैं। अब इन परीक्षाओं में इतने अंक लुटते हैं कि कोई फेल नहीं होता। सारे पप्पू-टप्पू टाइप के लोग पास हो जाते हैं। परीक्षक इस उदारता से अंक बांटते हैं कि यदि गणितीय बाध्यता न हो, तो वे छात्रों को सौ में से एक सौ दस नंबर दे डालें। सौ नंबर उत्तर पुस्तिका में लिखाई के और दस अंक अतिरिक्त उस सफाई के, जो हाथ की सफाई भी हो सकती है। बच्चे ज्यादा अंक पाकर कम इतराते हैं, पर अभिभावकों का सीना गर्व से अधिक फूलता है। वे नौनिहालों के नंबरों की लहलहाती फसल में आनुवांशिक कमाल देखते हैं। सरकार कोसत्ता संभाले एक साल पूरा होने वाला है। मुल्क के समस्त चिंतक सरकार के कार्यकलापों की कॉपी जांचने में लगे हंै। यहां पूर्णांक सिर्फ दस हैं। कुछ तो सरकार बनने के पहले दिन से उसका रिजल्ट बताने में लगे हैं। वे सरकार को लगातार फेल घोषित कर रहे हैं। हवा तेज चली एक नंबर घटा। हवा मंद रही, तो दो नंबर, बारिश हुई, तो तीन अंक घटे और भूंकप आया, तो दस पूर्णांक में से माइनस नौ। ऋणात्मक दस इसलिए नहीं दिए, क्योंकि भूकंप का एपिसेंटर भारत में न होकर नेपाल में था। यदि भ…
चित्र
अगले जन्म मोहे इंजीनियर ही कीजो ..... ................................................... उनके यहाँ से दो ढाई किलो हीरे मिले ।लोगों के घरों में तो दो ढाई किलो प्याज या आलू तक बमुश्किल तमाम मिलते हैं।इंजीनियरजी  हमारे समय के नायाब कीमियागर हैं ।उनके पास हुनर है कि जिस काली चीज को ढंग से छू भर लें तो वह हीरे में तब्दील हो जाती है।काला धन हो या श्यामल मन ,सब चमकता हुआ हीरा बन जाते हैं।और चमक भी कितनी बहुरंगी कि उसकी चकाचौंध के आगे समस्त राजनीतिक मतवाद एकाकार हो जाते हैं ।सारा प्रशासनिक तंत्र कोर्निस करने लगता है ।सारे नियम- कायदों की किताब में से रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है। इंजीनियरजी हमारे समय के सबसे चमकदार आइकन हैं।उन्होंने धन अर्जित करने के  अपने अभूतपूर्व कौशल और मेधा से इतिहास रच दिया है।भावी टेक्नोक्रेट्स के लिए वह प्रात: स्मरणीय बन गए  हैं ,प्रेरणा का अजस्र स्रोत ।वक्त की शिला पर लिखी गई अमिट सक्सेस की गजब दास्तान।लोगों की कामनाओं में वह रच बस गए हैं।लोक में -अगले जनम मुझे इंजीनयर ही कीजो.....की स्वर लहरी गूँज रही है । इंजीनियरजी के पास क्या नहीं है और क्या क्या नहीं मिला इनके पास।…

थैंक्यू इंद्र देवता,तुसी ग्रेट हो जी !

चित्र
बारिश आ गईl बिन गरजे बादल बरस गए l धरती तरबतर हुई l इससे फिर यह साबित हुआ कि बरसने के लिए गरजने की जरूरत नहीं पड़तीलेकिन बरसने के साथ गरजते भी रहें तो मामला एकदम चकाचक हो जाता हैlजिस तरह जिया के झूमने भर से सावन आ जाता है उसी तरह कभी कभी कागजी नाविकों की फरमाइश पर गली मोहल्ले की नालियां पानी से भर जाती हैं l यह पानीदार वक्त है l जिनके घरों की  छतें वाटरप्रूफ हैं ,उनके लिए छज्जे पर खड़े होकर बरखा की फुहारों का मज़ा लेने का मौसम हैl बारिश में बतरस और ताकाझांकी के लिए उत्तम मौका होता है l बालकनी में बैठ कर,इधर उधर नजर फिराते हुए अतीत के सुनहरे पलों का पुनर्पाठ हो सकता है l यदि हरी मिर्च की चरपरी पकौड़ी गर्म चाय के साथ उपलब्ध हो तो देश दुनिया के मुद्दों पर विमर्श किया जा सकता है l यदि प्याज़ के पकौड़े मिल जाएँ तो व्यापम घोटाले पर चर्चा और उनके साथ हरी चटनी मिले तो ग्रीस के मुद्रा संकट पर बहस  की जा सकती है l  बरसाती स्नैक्स  के मैन्यू के हिसाब से चिंतन  का आकार प्रकार बदलता रहता है l पकौड़ियों की मिकदार और क्वालिटी के हिसाब से विमर्श का एजेंडा तय होता हैl बरसात आई है तो खूँटी पर टंगे छाते की याद …

पगडियों के जरिये तय होता मुकद्दर

चित्र
यह खुद पगड़ीपहनने से अधिक दूसरों की पगडियां उछालने का मौसम अधिक है।बारिश की ऋतु तो ‘ऑन पेपर’ है।इसके होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।वैसे तो पगड़ी के सिर पर होने या न होने से भी कुछ नहीं बनता - बिगड़ता ।इसके बावजूद अदृश्य पगडियां चाहे- अनचाहे सभी प्रमुख  सिरों पर मौजूद रहती है। सरकार की पगड़ी उछालने का खेल कुछ लोग बड़े मनोयोग से खेल रहे हैं।उनका यकीन है कि सरकार की पगड़ी की कोटर में वह मिथकीय तोता रहता है , जिसमें सियासी राक्षस के प्राण बसते हैं। वे सरकार की पगड़ी को गिरा कर उसमें छिपे तोते की गर्दन मरोड़ना चाहते हैं। तमाम पुरातनपंथी लोगों की धारणा हैं कि  बुद्धिमत्ता सिर के ऊपरी माले में बसती है जबकि सरकार सबको बताने में लगी है कि मेधा  डिजिटल होती है और इसे  माईक्रो चिप के जरिये कहीं भी संभाल कर रखा और इस्तेमाल किया जा सकता है। आधुनिक संदर्भ में पगड़ी बतौर पहनावा भले ही सिर्फ धार्मिक रह गई हो लेकिन इसके जरिये होने वाली  राजनीति पूरे उफ़ान पर है। सोशल मीडिया  के रणबांकुरे पगड़ी को लेकर बेहद सम्वेदनशील  हैं।वे समय -असमय किसी न किसी की पगड़ी उछाल देते हैं। अतिउत्साही निंदकों का मानना है कि सत्त…

मानसून ,इस्तीफ़ा ,मेथी की चटनी और रेनडांस

मानसून के आ पहुँचने की अपुष्ट खबर है l वह कभी ‘मे आई कम इन’ सर कह कर नहीं आता  l वह ओबिडियंट स्टूडेंट जैसा  नहीं होता l वह क्लासरूम के पिछले दरवाजे से किसी शैतान बच्चे की तरह दबे पाँव आता है l राजनीति में भी सब कुछ खुलेआम नहीं होता l अधिकतर काम चुपचाप हो जाते हैं l तमाम वजहों के चलते  न होने लायक काम भी हो जाते हैं l मसलन हवा का दवाब घटता है तो बादल बरस जाते हैं l विक्षोभ बढ़ता है तो जलभरे काले बादल तमाम गर्जन के बावजूद नहीं बरसते l राजनीति में भी अमूमन यही सब होता है l ऐसा ही सदा -सदा से होता आया है l मौसम विभाग और राजनीतिक पंडितों की भविष्यवाणी अकसर धूल चाट जाती है l मौसम और राजनीति में  अप्रत्याशित घटित होता है l होता हो या न होता हो ,पर होता हुआ –सा लगता जरूर है l कई दिनो से  सुन रहे हैं कि मानसून मुंबई तक आ पहुंचा है l मुम्बई तरबतर हो ली है l दिल्ली सहित अन्य जगहों के सूखे खेत, खलिहान, गाँव, कस्बे उसके  आने की बाट जोह रहे हैं l  लेकिन वह आने की तमाम अफवाहों के बावजूद ठीक से आ नहीं रहा l यही हाल राजनीतिक हलकों में इस्तीफों का है l  वे आने की पुष्ट खबरों के बावजूद  आ नहीं रहे l कभी उ…