बुधवार, 27 जुलाई 2016

इतिहास का तंदूर


काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है।
शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है।
धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पुरजोर अपील लिए लोग उस खजांची को तलाश रहे हैं,जिनके पास वे अपनी संवेदनशीलता को अपने नाम के इन्द्राज  के साथ उसी तरह जमा कर सकें जिस तरह मांगलिक समारोहों में शगुन  की धनराशि को सदियों से जमा कराये जाने की परिपाटी रही है।
हालात बिगडैल हाथी की तरह बिगड़ते जा रहे है।बिगड़े ही जा रहे हैं।तदबीरों के विविध व्यंजनों से भरी हुई प्लेट घाटी की ओर इस तरह रवाना की जा रही हैं जैसे किसी  समारोह में फूफा या बुआ के रूठ जाने पर उनके पास कुल्फी फलूदा,रबड़ी मलाई या खस का चिल्ड शर्बत भेज दिया जाता है।तजुर्बा बताता है कि जब कोई तरकीब काम नहीं करती तब इसी तरह के घरेलू  नुस्खे या सिर्फ दुआएं ही काम कर जाती हैं।
एक न एक दिन अमन चैन तो बहाल होना ही है।आइये, यदि फिलवक्त करने लायक और कोई काम न हो तो यत्र तत्र सर्वत्र हो रही प्रार्थनाओं में अपनी भागीदारी ही दर्ज करा लें।




इतिहास का तंदूर


काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है।
शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है।
धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पुरजोर अपील लिए लोग उस खजांची को तलाश रहे हैं,जिनके पास वे अपनी संवेदनशीलता को अपने नाम के इन्द्राज  के साथ उसी तरह जमा कर सकें जिस तरह मांगलिक समारोहों में शगुन  की धनराशि को सदियों से जमा कराये जाने की परिपाटी रही है।
हालात बिगडैल हाथी की तरह बिगड़ते जा रहे है।बिगड़े ही जा रहे हैं।तदबीरों के विविध व्यंजनों से भरी हुई प्लेट घाटी की ओर इस तरह रवाना की जा रही हैं जैसे किसी  समारोह में फूफा या बुआ के रूठ जाने पर उनके पास कुल्फी फलूदा,रबड़ी मलाई या खस का चिल्ड शर्बत भेज दिया जाता है।तजुर्बा बताता है कि जब कोई तरकीब काम नहीं करती तब इसी तरह के घरेलू  नुस्खे या सिर्फ दुआएं ही काम कर जाती हैं।
एक न एक दिन अमन चैन तो बहाल होना ही है।आइये, यदि फिलवक्त करने लायक और कोई काम न हो तो यत्र तत्र सर्वत्र हो रही प्रार्थनाओं में अपनी भागीदारी ही दर्ज करा लें।




सोशल मीडिया और अंगूठा छाप लाइक्स का वैभव


यह सोशल मीडिया का  जमाना हैlबधाई से लेकर गालियाँ तक बड़ी आसानी से यहाँ से वहां चली आती हैं,इतनी मात्रा में आती हैं कि लगता है कि इस दुनिया में बधाई  और अपशब्द के सिवा कुछ बचा ही नहीं हैसोशल मीडिया पर किसी के निधन की सूचना आती है तो देखते ही देखते हजारों अंगूठा छाप लाइक्सआ जाते हैंl झुमरीतलैया से खबर मिलती है कि वहां  कोई मैना सरेआम गलियां बकती  है तो पूरा मुल्क  उसकी इस हरकत पर दो खेमों  में बंट कर गहन विमर्श में तल्लीन हो जाता है मैना के इस साहस , दुस्साहस और नादानी पर लोग अपने -अपने तरीके से गम ,गुस्से और तारीफ का इज़हार करते हैं,लेकिन उनमें भी बधाई और गाली किसी न किसी रूप में रहती जरूर हैंlअभिव्यक्ति की इस आनलाइन आज़ादी ने सबको निहायत वाचाल  बना दिया हैlइस डिजिटल स्वछंदता ने तो  बाहुबलियों तक के  नाक में दम कर रखा हैसिर्फ इतना ही नहीं,सोशल मीडिया पर नेशनल लेवल के दबंगों तक की मोहल्ला स्तर  के फूंकची पहलवान तक बड़े मजे से टिल्ली -लिल्ली कर लेते हैंl

आभासी आज़ादी  ने अपने शैशव काल  में गुल खिलाने शुरू कर दिए हैं अधिकांश चिंतक इसके गले में बिल्ली के गले वाली मिथकीय घंटी लटकाने की फ़िराक में हैं हमारे विचारकों को तय मिकदार से अधिक आजादी हज़म ही कहाँ  होती है!
अब यदि इस ऑनलाइन हिमाकत से निबटना है तो खुद को ऑनलाइन करने का हुनर सीखना होगाइस मामले में  डंडे और हथकंडे जैसे किसी दिखावटी खौफ काम नही चलने वाला ऑनलाइन रणबांकुरों का सामना करने  के लिए उनसे ऑनलाइन ही भिड़ना होगा lयदि किसी से मिलना ,बतियाना,प्रणय निवेदन करना या झगड़ना है  तो कृपया व्हाह्ट्स एप ,फेसबुक,मैसेंजर  या ट्विटर पर तशरीफ़ लायें किसी से पुरानी अदावत का हिसाब किताब चुकता  करना हो तो पहले फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज कर दोस्त बनें  और फिर कमेन्ट में तेजाबी बयान लिख कर ‘अनफ्रेंड’ होंअमित्र बनने के लिए पहले मित्रता की पेशकश करनी  ही होगीसोशल मीडिया पर लड़ने -झगड़ने का  अलग विधान  होता है l
अलबत्ता सोशल मीडिया के  ग्लोब में मुहं छुपाने लायक स्पेस नहीं ढूंढें नहीं मिलती,यहाँ सब कुछ सेल्फी वाली आत्ममुग्धता के साथ प्रकट  होता है l

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

ऑनलाइन गंगाजल और डिजिटल आस्था


छन छन कर खबरें आ रही थीं कि अब गंगाजल ऑनलाइन बिकेगा।अब खबर कन्फर्म हुई कि हाँ जी ,बाकायदा ऑनलाइन बुक भी होगा और कैश ऑन डिलीवरी पर मिलेगा भी।अभी यह नहीं पता कि नापसंद होने पर वापस भी होगा या नहीं।लोगों का अनुमान है कि गंगाजल में हमारी युगीन आस्था जुड़ी है इसलिए इसकी कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं होगी।आस्थाएं लहंगे ,चुनरी और नाईट वियर की तरह उसी प्रकार वापस नहीं की जा सकेगी  जैसे खा लेने के बाद रबड़ी और पी लेने के बाद छाछ।रबड़ी खा लेने के बाद मिठास दीघ्रजीवी होती है और छाछ पीने के बाद पेट की ठंडक कालजयी।इसी तरह गंगाजल की पवित्रता सदा बरक़रार रहती है।
अब गंगाजल घर घर आएगा ठीक उसी तरह आएगा जैसे आरती भजन पूजा सामग्री आदि कूरियर से मंगाई जाती हैं।अभी यह नहीं पता कि जल किस ब्राण्ड का होगा।भागीरथ ब्राण्ड का या किसी राजनेता के खानदानी नाम का।तमाम तरह के खनिजों,विटामिनों और आशीर्वाद से भरापूरा।या वह वाला गंगाजल बिकेगा,जिसके बारे में राम तेरी गंगा मैली फिल्म ने भ्रामक अफवाहें फैला रखी है।सम्भव है कि समस्त प्रकार के पापों को धो देने की गारंटी वाले डिटर्जेंटयुक्त जल की आपूर्ति की जाए।हो सकता है कि ऐसा चुल्लू भर डिब्बाबंद पानी  भेजा जाए, जिसमें डूब मरने की मुहावरे वाली सुविधा सहज ही उपलब्ध हो।कौन जाने?
गंगाजल सरलता से  उपलब्ध होगा तो जिन्दगी कितनी निष्कलुष हो जायेगी।चाहे- अनचाहे ,समय-असमय कभी भी अनाचार टाइप कुछ किया और फट से गंगाजल अपने  ऊपर छिडक लिया।किसी पतित (या पतिता) का सान्निध्य हुआ तो  एंटी सेप्टिक गंगाजल से  रगड़ रगड़ कर हाथ पाँव धो लिए और हो गये निष्पाप। एंटी सेप्टिक लिक्विड से केवल शरीर धुलता है और इससे तन के साथ मन का अपराध बोध भी धुल जायेगा।।जाहिर है कि वो लोग जो तपाक से हाथ मिलाने के लिए एहतियातन जेब में सेनेटाईज़र स्प्रे लिए फिरते ते हैं वे तब गंगाजल से अपना काम चला सकेंगे।
यह तो तय है कि गंगाजल जब बिकेगा तो खूब बिकेगा।जाहिर है कि जब बिकेगा तो एक न एक दिन इसकी किल्लत भी होगी।इसलिए अभी से  ही यह पता करना पड़ेगा कि गंगाजल किस –किस मुल्क से इम्पोर्ट किया जा सकता है।इसके कारखाने स्थापित करने के लिए किन किन मुल्कों से एफडीआई  मिल सकती है।जब अरहर की दाल मोजाम्बीक में मिल सकती है तो यकीनन गंगाजल भी तंजानिया या ऐसे ही किसी दीगर मुल्क में सस्ते दामों पर मिल ही जाएगा।जब तक आयात की नौबत आये तब तक निर्यात तो इसका हो ही सकता है।वह दिन दूर नहीं चीन में बना गंगाजल सब जगह बिकने ही लगेगा।
वैसे गंगाजल यदि  डिजिटल फॉर्मेट भी ऑनलाइन मिलने लगे तो क्या कहने।विकल्प तो आस्थाओं के भी होते ही होंगे।दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि कोई भी विचार या वस्तु तभी ग्लोबल होती है जब उसका डिजिटल स्वरुप उपलब्ध हो जाता है।


सोमवार, 18 जुलाई 2016

ठुल्ले और अलौकिक निर्वात में उनका वजूद


अदालत ठुल्ले का मतलब पूछ रही है।समानांतर कोष वाले अरविंद कुमार  जी शब्द को चिमटी से पकड़ कर बड़ी ईमानदारी से उसकी रिहाइश के लिए डिक्शनरी  में उपयुक्त जगह ढूंढ रहे हैं।फ़िलहाल शब्दकोशों में यह शब्द ढूंढें नहीं मिल रहा।इस सबके बावजूद ठुल्ले हर जगह हैं और हरदम हैं।बड़े काम के हैं।निष्काम हैं।उन दुर्लभ स्थानों पर भी है जहाँ न ईश्वर रहता है और न शैतान।इस तरह के अलौकिक निर्वात में भी ठुल्लों का वजूद रहता  है।इसलिए रहता है क्योंकि ठुल्लापन हर हालात में रह लेता है।अपनी निरर्थकता के मध्य बड़े मजे से बना रहता है।वैसे ठुल्ले ही हैं जिनकी वजह से समाज में थोड़ा-बहुत खौफ और ला एंड ऑडर है।हर आपदा के समय इन्हें ही सर्वत्र उपलब्ध ईश्वर की बजाय याद किया जाता है।वे थोड़ा विलम्ब से ही डायल -100 पर बतियाने के लिए मिल भी जाते हैं।आसमानी ताकतों का तो न ही  कोई सर्वज्ञात हेल्पलाइन नम्बर है और न ही उसकी कोई ईमेल आईडी।वेब पोर्टल भी नहीं है।इसका जो पता धर्मग्रन्थों में मिलता  है उस एड्रेस पर तो उसकी जगह तमाम तरह के  बहुरूपिये रहते हैं।
ठुल्ले  है।बाकायदा है।उनका अस्तित्व वास्तविक है।वे  कोई आभासी रूपक नहीं हैं। किसी प्रकार  काव्यात्मक बिम्ब भी नहीं है।उनका कोई अर्थ हो या न हो लेकिन उनका होना निर्विवाद है।उचक्का किसी का सामान छीन कर भागता है तो उस समय दो बाते होती हैं। भागता हुआ उचक्का सोचता है कि कहीं कोई ठुल्ला उसकी दौड़ में टांग न अड़ा दे और लुटा हुआ आदमी सपना देखता है कि अपवाद स्वरुप ही सही उचक्का ठुल्ले की पकड़ में आ जाए।मजे की बात यह है कि कभी-कभी इसी ठुल्ले के कारण लुटेरे का दुस्वप्न और लुटने वाले का  सुंदर सपना  साकार हो जाता हैं। किसी का कच्ची नींद में सपना टूटता है तभी  तो कोई  चाहत पूरी होने का जश्न मनाता है।हमारे अधिकांश उत्सव इसी तरह के चोर-सिपाही के शाश्वत खेल के बाय प्रोडक्ट हैं।
ठुल्ले दरअसल ठुल्ले कहा ही इसलिए जाते हैं क्योंकि वे  हर जगह अकसर ठहलते हुए मिल जाते हैं।पनवाड़ी से मुफ्त में सौंफ लेकर उसे चुभलाते हुए।45 डिग्री सेल्सियस के तापक्रम में गर्म भाप वाली चाय का लुत्फ़ लेते हुए।मूसलाधार बारिश में अपनी टोपी को पौलीथीन की पन्नी से ढंके हुए।सर्द रातों में जमीन पर डंडा फटकार कर झुझलाहट दूर करते हुए।मन ही मन दूरस्थ गाँव में रह रहे बीवी बच्चों और बुजुर्ग माता पिता के कुशलक्षेम के लिए अस्फुट प्रार्थनायें बुदबुदाते हुए।घटाटोप अँधेरे में मोहल्ले के चौकीदार की चारपाई के पैताने बैठ उससे खैनी और चूना मांगते हुए।पार्किंग में खड़ी हुई आपकी चमचमाती हुई गाड़ी को अपने  मैले हाथों से छू कर उसे दागदार सुरक्षा देते हुए।खुलेआम हुई वारदात के बाद प्रत्यक्षदर्शियों की अनभिज्ञता पर चौंकते हुए।इलाके के बाहुबली से रहमदिली की उम्मीद करते हुए।वीआइपी और वीवीआइपी की सुरक्षा के लिए भीड़ को परे धकेलते हुए।अधिकारियों और नेताओं की डांट तथा जनता की दुत्कार को साक्षीभाव से श्रवण करते  हुए।

यह ठुल्ले ही हैं जिनकी वजह से राजनेताओं का खोटा रुआब खरे सिक्के सा खनकता है।यह सच है कि वाकई ठुल्ले का कोई मतलब नहीं है लेकिन इन्हें इस बात की परवाह ही कब है।  

रविवार, 10 जुलाई 2016

खुली चिट्ठी का लिखना और बोतल बंद का रोमांच

आजकल चिट्ठी कौन लिखता है?
हालांकि चिट्ठियां अभी भी लिखी और भेजी तो जाती ही हैं।जब तक यह कायनात है,तब तक लिखा-पढ़ी  तो जारी रहनी ही है।यह अलग बात है कि अब इन चिट्ठियों को ‘मेल’ और लिखी  इबारत को ‘टेक्स्ट’ कहा जाता हैं।ये बिना पर के उड़ लेती हैं और पलक झपकते ही  लैंड भी कर जाती हैं।पर इस तरह की मेल को हाथ में थाम कर कोई नहीं गाता –चिट्ठी आई है,आई है,बड़े दिनों के बाद।
फिर भी कुछ लोग हैं जो चिट्ठी लिखने की जिद पर आमादा हैं।वे बात-बात पर और कभी-कभी बेबात चिट्ठी लिख मारते हैं।और चिट्ठी भी ऐसी वैसी नहीं खुली चिट्ठी।एक जमाना था जब चिट्ठियों की बात ही कुछ और थी।तब खुली चिट्ठियों वाले पोस्टकार्ड से सुखद और दुखद सूचनाओं ,बधाइओं और श्रृद्धांजलियों का आदानप्रदान समभाव से हो जाया करता था।लेकिन असल रोमांच तो बंद लिफाफों  में ही विरजता था।उन दिनों किसी चिट्ठी में यदि यह लिखा आ जाए कि इसे तार समझो और तुरंत आओ तो लोग पहली उपलब्ध बस या रेल से गाँव घर की ओर कूच कर जाते थे।कोई मूढ़मति भी उस तार को तार समझ उस पर गीले कपड़े सुखाने की हिमाकत नहीं करता था।
अब खुली चिट्ठियां हवा में लहरा कर अपने सरोकारों  पर इतराने का वक्त है।पहले वह समय भी गुजरा जब खुली चिट्ठी बंद बोतल में रख कर सागर की धार के साथ यह सोच कर तैरा  दी जाती थी कि वे देर- सवेर जिनके लिए हैं,उन्हें मिल ही जाएँगी।वैसे अमूमन चिट्ठियां बंद लिफाफे में ही अपनी यात्रा तय करती थीं।लेकिन अब जिस मात्रा में खुली चिट्ठी लिखी जा रही हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हम लिफाफा विरोधी युग में प्रवेश कर चुके हैं। अब बाज़ार में शगुन देने वाले सिक्का लगे लिफाफे ही चलन में अधिक है।कुछ दिनों बाद जब निमन्त्रण पत्र पर  बैंक एकाउंट नम्बर और आईएफएससी कोड छापा जाने लगेगा तब इनका भी  निष्प्रयोज्य हो जाना लगभग तय है।
ओपन लैटर और प्यार का खुल्लमखुल्ला इज़हार एक ही सिक्के दो सपाट पहलू हैं।ये चिट्ठियां दरअसल वे  कनकौए हैं, जो तेज हवा में  ऊंचे आसमान  में  खुलकर उड़ते कम और फरफराते अधिक है।


मंगलवार, 5 जुलाई 2016

पे कमीशन का सातवाँ घोड़ा और तलहटी में खड़ा ऊंट


अंतत: पे कमीशन के अस्तबल का सातवाँ घोड़ा छूट निकला।कल तक जो लोग इसे लेकर बड़ी –बड़ी खुशफहमी पाले बैठे थे,वे गमज़दा हैं।उन्हें अब पता लगा  कि खुशफहमी ही दरअसल गलतफहमी होती है। जैसे किसी से प्यार का अहसास-ए-गुल तभी तक मन को भरमाता है जब तक वह मिसेज गुलबदन बनकर बाकायदा रोज लौकी की सब्जी में हींग जीरे का छौंक  नहीं लगाने लगती।दूरस्थ पहाड़ तभी तक नयनाभिराम लगते हैं जब तक उसके नजदीक पहुँच कर आदमी ऊंट में रूपांतरित नहीं हो जाता।तब उसे पता लगता है कि अरे वह तो ऊंचे  पहाड़ की तलहटी में जा पहुंचा एक अदद उदास मसखरा है।
पे कमीशन की रिपार्ट क्या आई ,गंदे नाले के मुहाने पर बने दड़बानुमा मकानों को स्वीमिंगपूल या पार्क फेसिंग विला कहकर बेचने वाले प्रोपर्टी डीलर से लेकर मौत के बाद जीवन को स्वार्गिक आनंद से भर देने का दावा करने वाला बीमा कम्पनी के  एजेंट तक सभी उसी तरह  सक्रिय हो गये हैं जैसे मानसून की पहली बौछार के बाद धरती के भीतर के तमाम जीवजन्तु धरती की सतह पर सक्रिय हो उठते हैं।यकीनन यह पाताललोकवासियों  के लिए मुरादों भरा आभासी मौसम है।बाज़ार के पास करेंसी नोटों से  भरी हुई ‘ओवरसाइज’ जेबों को बेचने के लिए कुछ न कुछ हमेशा मौजूद रहता है।
पे कमीशन  की रिपोर्ट ने बीते ज़माने में  टाइमपास के लिए सुलझाई जाने वाली वर्ग पहेली फिर उपलब्ध करा दी है।सुडुकू के जरिये दिमाग का ताजादम रखने वाले नवपेंशनधारियों के लिए यह रिपोर्ट  महज एक रिपोर्ट ही नहीं वरन सम्पूर्ण मानसिक व्यायामशाला भी है,जिसके जरिये वे अपने-अपने केलकुलेटर पर दिमागी घोड़ों को सरपट दौड़ा और जम्प करा रहे  हैं।बार–बार अलग-अलग फार्मूलों के तहत पेंशन को घटा- बढ़ा कर कभी उदास तो कभी मुदित हो लेते  हैं।
बाकी सब तो ठीक ,लेकिन इस अफवाह ने बड़ी सनसनी फैला दी है कि सरकार यह मार्मिक अपील करके कर्मचारियों को धर्म संकट में डालने वाली है कि वे रेल किराये में सीनियर सिटीजन को मिलने वाली रियायत और गैस सब्सीडी की तरह वेतन वृद्धि लेने से स्वेच्छा से इंकार करके देश के विकास में अपना महती योगदान दे।
कुछ सच भी बिलकुल अफवाहों जैसे लगते जरूर हैं,लेकिन वे निरी अफवाह नहीं होते