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July, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इतिहास का तंदूर

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काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है। शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है। धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पु…

इतिहास का तंदूर

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काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की बित्ते भर की दूरी पर खड़ी  राजनीति निर्लिप्त भाव से मुस्करा रही है।लोग सीमापार वाले आसमान की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये हैं।निरुपाय वक्त धीरे धीरे अपने घावों को चाटता निढाल पड़ा है। शोकाकुल राजनय शांति की अपील के लिए सफेद कबूतरों के जोड़े ढूंढ रहा है।अपील के लिए उपयुक्त शब्दावली खोजते राजनेता आग के खुद-ब-खुद बुझ जाने की बाट जोह रहे हैं।मीडिया बहादुर हिंसा की लाइव कवरेज के लिए अपने रणबांकुरों को हाई अलर्ट पर रखे हुए है।ऐसे मौके कभी –कभी ही आते हैं।मृतकों की सही –सही गणना के लिए मरने वालों के शिनाख्ती कार्डों में उनकी जात खंगाली  जा रही  है।पूरा  मुल्क दम साधे अपनी समझ के अनुरूप भारी भरकम जूतों में बंटती सद्भाव की दाल का तमाशा देख रहा है। धधकती हुई आग लगातर धधक रही है।उसे धधकाने के लिए अपनी अपनी फूंकनी से हवा फूंकते ही जा रहे है।शांति की पु…

सोशल मीडिया और अंगूठा छाप लाइक्स का वैभव

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यह सोशल मीडिया का  जमाना हैlबधाई से लेकर गालियाँ तक बड़ी आसानी से यहाँ से वहां चली आती हैं,इतनी मात्रा में आती हैं कि लगता है कि इस दुनिया में बधाई  और अपशब्द के सिवा कुछ बचा ही नहीं हैl सोशल मीडिया पर किसी के निधन की सूचना आती है तो देखते ही देखते हजारों ‘अंगूठा छाप लाइक्स’ आ जाते हैंlझुमरीतलैयासे खबर मिलती है कि वहां कोई मैना सरेआम गलियां बकती  है तो पूरा मुल्क  उसकी इस हरकत पर दो खेमोंमें बंट कर गहन विमर्श में तल्लीन हो जाता हैl मैना के इस साहस , दुस्साहस और नादानी पर लोग अपने -अपने तरीके से गम ,गुस्से और तारीफ का इज़हार करते हैं,लेकिन उनमें भी बधाई और गाली किसी न किसी रूप में रहती जरूर हैंlअभिव्यक्ति की इस आनलाइन आज़ादी ने सबको निहायत वाचाल  बना दिया हैlइस डिजिटल स्वछंदता ने तो  बाहुबलियों तक के  नाक में दम कर रखा हैl सिर्फ इतना ही नहीं,सोशल मीडिया पर नेशनल लेवल के दबंगों तक की मोहल्ला स्तर  के फूंकची पहलवान तक बड़े मजे से टिल्ली -लिल्ली कर लेते हैंl
आभासी आज़ादी  ने अपने शैशव काल  में गुल खिलाने शुरू कर दिए हैंl अधिकांश चिंतक इसके गले में बिल्ली के गले वाली मिथकीय घंटी लटकाने की फ़िराक …

ऑनलाइन गंगाजल और डिजिटल आस्था

छन छन कर खबरें आ रही थीं कि अब गंगाजल ऑनलाइन बिकेगा।अब खबर कन्फर्म हुई कि हाँ जी ,बाकायदा ऑनलाइन बुक भी होगा और कैश ऑन डिलीवरी पर मिलेगा भी।अभी यह नहीं पता कि नापसंद होने पर वापस भी होगा या नहीं।लोगों का अनुमान है कि गंगाजल में हमारी युगीन आस्था जुड़ी है इसलिए इसकी कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं होगी।आस्थाएं लहंगे ,चुनरी और नाईट वियर की तरह उसी प्रकार वापस नहीं की जा सकेगी  जैसे खा लेने के बाद रबड़ी और पी लेने के बाद छाछ।रबड़ी खा लेने के बाद मिठास दीघ्रजीवी होती है और छाछ पीने के बाद पेट की ठंडक कालजयी।इसी तरह गंगाजल की पवित्रता सदा बरक़रार रहती है।
अब गंगाजल घर घर आएगा ठीक उसी तरह आएगा जैसे आरती भजन पूजा सामग्री आदि कूरियर से मंगाई जाती हैं।अभी यह नहीं पता कि जल किस ब्राण्ड का होगा।भागीरथ ब्राण्ड का या किसी राजनेता के खानदानी नाम का।तमाम तरह के खनिजों,विटामिनों और आशीर्वाद से भरापूरा।या वह वाला गंगाजल बिकेगा,जिसके बारे में राम तेरी गंगा मैली फिल्म ने भ्रामक अफवाहें फैला रखी है।सम्भव है कि समस्त प्रकार के पापों को धो देने की गारंटी वाले डिटर्जेंटयुक्त जल की आपूर्ति की जाए।हो सकता है कि ऐसा चुल्ल…

ठुल्ले और अलौकिक निर्वात में उनका वजूद

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अदालत ठुल्ले का मतलब पूछ रही है।समानांतर कोष वाले अरविंद कुमार  जी शब्द को चिमटी से पकड़ कर बड़ी ईमानदारी से उसकी रिहाइश के लिए डिक्शनरी  में उपयुक्त जगह ढूंढ रहे हैं।फ़िलहाल शब्दकोशों में यह शब्द ढूंढें नहीं मिल रहा।इस सबके बावजूद ठुल्ले हर जगह हैं और हरदम हैं।बड़े काम के हैं।निष्काम हैं।उन दुर्लभ स्थानों पर भी है जहाँ न ईश्वर रहता है और न शैतान।इस तरह के अलौकिक निर्वात में भी ठुल्लों का वजूद रहता  है।इसलिए रहता है क्योंकि ठुल्लापन हर हालात में रह लेता है।अपनी निरर्थकता के मध्य बड़े मजे से बना रहता है।वैसे ठुल्ले ही हैं जिनकी वजह से समाज में थोड़ा-बहुत खौफ और ला एंड ऑडर है।हर आपदा के समय इन्हें ही सर्वत्र उपलब्ध ईश्वर की बजाय याद किया जाता है।वे थोड़ा विलम्ब से ही डायल -100 पर बतियाने के लिए मिल भी जाते हैं।आसमानी ताकतों का तो न ही  कोई सर्वज्ञात हेल्पलाइन नम्बर है और न ही उसकी कोई ईमेल आईडी।वेब पोर्टल भी नहीं है।इसका जो पता धर्मग्रन्थों में मिलता  है उस एड्रेस पर तो उसकी जगह तमाम तरह के  बहुरूपिये रहते हैं। ठुल्ले  है।बाकायदा है।उनका अस्तित्व वास्तविक है।वे  कोई आभासी रूपक नहीं हैं। किसी प्…

खुली चिट्ठी का लिखना और बोतल बंद का रोमांच

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आजकल चिट्ठी कौन लिखता है? हालांकि चिट्ठियां अभी भी लिखी और भेजी तो जाती ही हैं।जब तक यह कायनात है,तब तक लिखा-पढ़ी तो जारी रहनी ही है।यह अलग बात है कि अब इन चिट्ठियों को ‘मेल’ और लिखी इबारत को ‘टेक्स्ट’ कहा जाता हैं।ये बिना पर के उड़ लेती हैं और पलक झपकते ही लैंड भी कर जाती हैं।पर इस तरह की मेल को हाथ में थाम कर कोई नहीं गाता –चिट्ठी आई है,आई है,बड़े दिनों के बाद।
फिर भी कुछ लोग हैं जो चिट्ठी लिखने की जिद पर आमादा हैं।वे बात-बात पर और कभी-कभी बेबात चिट्ठी लिख मारते हैं।और चिट्ठी भी ऐसी वैसी नहीं खुली चिट्ठी।एक जमाना था जब चिट्ठियों की बात ही कुछ और थी।तब खुली चिट्ठियों वाले पोस्टकार्ड से सुखद और दुखद सूचनाओं ,बधाइओं और श्रृद्धांजलियों का आदानप्रदान समभाव से हो जाया करता था।लेकिन असल रोमांच तो बंद लिफाफों  में ही विरजता था।उन दिनों किसी चिट्ठी में यदि यह लिखा आ जाए कि इसे तार समझो और तुरंत आओ तो लोग पहली उपलब्ध बस या रेल से गाँव घर की ओर कूच कर जाते थे।कोई मूढ़मति भी उस तार को तार समझ उस पर गीले कपड़े सुखाने की हिमाकत नहीं करता था। अब खुली चिट्ठियां हवा में लहरा कर अपने सरोकारों  पर इतराने का …

पे कमीशन का सातवाँ घोड़ा और तलहटी में खड़ा ऊंट

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अंतत: पे कमीशन के अस्तबल का सातवाँ घोड़ा छूट निकला।कल तक जो लोग इसे लेकर बड़ी –बड़ी खुशफहमी पाले बैठे थे,वे गमज़दा हैं।उन्हें अब पता लगा  कि खुशफहमी ही दरअसल गलतफहमी होती है। जैसे किसी से प्यार का अहसास-ए-गुल तभी तक मन को भरमाता है जब तक वह मिसेज गुलबदन बनकर बाकायदा रोज लौकी की सब्जी में हींग जीरे का छौंक  नहीं लगाने लगती।दूरस्थ पहाड़ तभी तक नयनाभिराम लगते हैं जब तक उसके नजदीक पहुँच कर आदमी ऊंट में रूपांतरित नहीं हो जाता।तब उसे पता लगता है कि अरे वह तो ऊंचे  पहाड़ की तलहटी में जा पहुंचा एक अदद उदास मसखरा है। पे कमीशन की रिपार्ट क्या आई ,गंदे नाले के मुहाने पर बने दड़बानुमा मकानों को स्वीमिंगपूल या पार्क फेसिंग विला कहकर बेचने वाले प्रोपर्टी डीलर से लेकर मौत के बाद जीवन को स्वार्गिक आनंद से भर देने का दावा करने वाला बीमा कम्पनी के  एजेंट तक सभी उसी तरह  सक्रिय हो गये हैं जैसे मानसून की पहली बौछार के बाद धरती के भीतर के तमाम जीवजन्तु धरती की सतह पर सक्रिय हो उठते हैं।यकीनन यह पाताललोकवासियों  के लिए मुरादों भरा आभासी मौसम है।बाज़ार के पास करेंसी नोटों से  भरी हुई ‘ओवरसाइज’ जेबों को बेचने के लिए …