शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

गधे दरअसल गधे ही होते हैं


गधे पर राष्ट्रव्यापी विमर्श जारी है।बेचारे को इस बात का पता भी नहीं।वह मैदान में इधर उधर विचरता हरी घास चर रहा है।बीच बीच में वह दुलत्ती झाड़ने की प्रेक्टिस करता है तो वातावरण में धूल उठती है।देखने वाले समझते हैं कि वह विमर्श के लिए कोई जरूरी सवाल उठा रहा है या उठाने की कोशिश कर रहा है।सवाल जब उठाये जाते हैं तो गर्द तो उड़ती ही है।
आजकल गधों पर राजनीति हो रही है जबकि गधे की कोई अपनी पौलिटिक्स नहीं होती सिर्फ राग होता है।ढेंचू ढेंचू की बड़ी मासूम –सी डिप्लोमेसी होती है।वह खुश होते हैं तब गर्दन उठा कर रेंकते हैं ,जब नाराज़ होते हैं तो पिछले पैर फटकारते हैं।कभी कभी कुछ गधे रेंकते भी हैं और दुलत्ती भी चलाते हैं।ऐसे गधे दरअसल पहुंचे हुए विमर्शवादी होते हैं।इनके पास एक पूँछ के अलावा कुत्ते जैसी अदृश्य दुम भी होती है ,जिसे वे अपने आकाओं के आगे गुपचुप तरीके से हिलाते हैं।बड़े हौले से ‘खी-खी’ भी करते हैं।निरीह दिखते हैं पर बेहद शातिर होते हैं।सांस भी पूर्वनिर्धारित योजना के तहत लेते हैं।नींद में बडबडाते हैं तो भी सरोकारों के आलोक में।उनके पास मुखौटों का भंडार है।एक से बढकर मुखौटे।चेहरे पर चढाने वाले।विवेक को ढांपने वाले।वक्त जरूरत रंग बदलने वाले।वक्त –बेवक्त काम आने वाले।स्वांग रचने वाले।नाटकीयता प्रकट करने वाले।
कोई यकीन करे या न करे,लेकिन उपलब्ध सच यही है कि गधे धीरे धीरे आदमी जैसे बनते जा रहे हैं।और अर्द्धसत्य यह कि आदमी बड़ी तेजी से निरे गधे में तब्दील हो रहा है।घोड़े और गधे का ही नहीं वरन गधे और आदमी के बीच की विभाजन रेखा धीरे धीरे मद्धम पड़ती जा रही है।गधों के निजी बाप होने लगे हैं और इसी वजह से अवसर आने पर किसी गधे को अब बाप मान लेने की बाध्यता समाप्त हो गयी है।आदमी ने गधेपन के साथ नजदीकी रिश्ता बना लिया है।गधे सिर्फ वही नहीं होते जो उस जैसे दिखते हैं।दीखने से क्या होता है ,जो गधा होता है,वह होता है।होता ही है।
गधे सर्वत्र होते हैं।वे हर जगह मिल जाते हैं।अकादमियों के चारागाह में  चरते हुए।घास की तरह अपने मंतव्यों को चुभलाते हुए।निहितार्थ साधने के लिए आकाओं के चरणों में लोटपोट होते हुए।मंच पर खड़े होकर दुनिया के हर जरूरी गैर-जरूरी मुद्दे पर बीज वक्तव्य देते हुए।कमर पर सम्मान के दुशाले ओढ़े हुए।खीसे निपोरते हुए।माननीयजनों के साथ गर्दन टेढ़ी कर सेल्फी खीचते हुए।बात –बात पर बयान देने के लिए गला खंखारते हुए।बेबात हंसने के लिए होठों को ऊपर नीचे सरकाते हुए।
गधे और गधे में दरअसल कोई फर्क नहीं होता।वे दुलकी चाल से चलने में कितना भी खुद को निपुण बना ले लेकिन वह वही रहता है जो वह मूलत: होता है।तानसेन का ‘गंडाबंद’ शागिर्द बन जाने के बावजूद भी कोई गधा शायद ही मोहल्ला स्तर का गवैया बना हो।
चुनावी राजनीति में गधों के लिए घास और स्पेस का कोई टोटा नहीं है।यह किसी गधे की आत्मकथा नहीं है।गधे खुद कभी कुछ नहीं लिखते।अन्य लोग उनकी जीवनी लिखते हैं।अपने कॉलम में उसका गाहे –बगाहे जिक्र करते हैं।सबसे दिलचस्प बात यह कि अधिकतर गधे ही गधों के केंद्र में रख कर कथानक रचते हैं।
अब यह बात साफ़ हो चुकी है कि गधे उल्लू या उल्लू टाइप के नहीं होते।ये जन्मना सीधे सादे होते हैं।कोई उनको न टेढ़ा बना पाता है न उनके जरिये अपना उल्लू सीधा कर पाता है।यही वजह है कि श्रमवीर होने के बावजूद गधा ही सबसे अधिक मार खाता है।
गधे हो तो सदा गधे ही रहोगे।उससे इससे अधिक की कोई उम्मीद न रखे।उनके  के लिए घास और स्पेस का फ़िलहाल कोई टोटा नहीं है।




शराफ़त नहीं है फिर भी....


शराफ़त के टोकरे को ताख पर रखे पर्याप्त समय बीत गया है।इस बीच मेरे घर के पिछवाड़े  बहने वाला नाले में इतना गंदा पानी बह चुका है कि अब इसके भीतर की तरलता समाप्त हो चुकी हैं।यही हाल शराफ़त का भी है,यह लोकाचार में विचरते विचरते इतना ठोस हो गयी है कि एकदम ठस्स हो चली है।इसी किसी वजह के चलते रुपहले पर्दे की बेमिसाल नृत्यांगना ने कहा था –शराफ़त छोड़ दी हमने। यह क्रांतिकारी बयान उन्होंने  ठुमकते हुए दिया ,तब दर्शकों ने सिनेमाघरों में इतने सिक्के इस कदर उछाले कि उसका यह वक्तव्य, जो दरअसल एक प्रस्ताव भी था,सिक्काबंद खनक के साथ ध्वनिमत से पारित हो गया।तब से आज तक जो शराफ़त यहाँ वहां कभी कभार दिख भी जाती है,वह वास्तव में शराफ़त नहीं,उसकी डुप्लीकेट है।अनुकृति नहीं डुप्लीकेट ,जैसे महात्मा बुद्ध की चीन में बनी प्रतिमा ,जिसे हम बेहद आदरभाव से लाफिंग बुद्धा कहते हैं।
चुनावी समय में चारों ओर शराफ़त ही शराफ़त दिख रही है जैसे कभी हर शहर गाँव कस्बे की दीवारों पर बन्दर छाप लाल दंत मंजन के इश्तेहार ही इश्तहार दिखते थे।जैसे मुगली घुट्टी 555 के बगलगीर शराफ़त से भरी किलकारी मारता नवजात शिशु रहता था ।जैसे कल्लन पतंगसाज की डोर इतनी शरीफ़ होती थी कि कोई पतंग आसपास दिखते ही खटाक से टूट जाती थी ताकि पेंचबाजी से बची रही।मारधाड़ से खुद को बचा ले जाना भी शराफ़त का प्रदर्शन ही है।अब तमाम तरह की शराफ़त और शरीफ़ पडोसी मुल्क में रहते हैं।बहुतायत में पाए जाते हैं।टेरेरिस्ट से लेकर रहनुमा तक सभी शरीफ़ हैं।
नायिका ने शराफ़त छोड़ने की संगीतमय उद्घोषणा की तो पूरे मुल्क ने भारी मन से ही सही पर उसका अनुसरण किया।एक बार जब शराफ़त तिरोहित की तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा।बाद में कभी दिल में भावुकता उठी तो एकाध खुराफ़ात कर ली और कह दिया कि कृपया इसे ही बाय डिफॉल्ट शराफ़त मान लिया जाए।वैसे भी शराफ़त वही जो खुराफात में भी मौजूद रहे।माँ बहन की गालियाँ भी दी जाएँ तो भी उसके साथ आदरणीय प्रिय सौभाग्यवती आदि विशेषण उसके साथ चस्पा रहे।सम्बोधनों में शराफ़त बनी रहे ,यही काफी है।इससे अधिक शराफ़त को कोई करेगा भी क्या।
जब शराफ़त थी तब भी दुनिया थी।दुनियादारी थी।दयानतदारी थी।साजिश थीं।बडबोलापन था।शायद भोलापन भी।शराफ़त का शफ्फाक कारोबार भी।व्यवहार भी।आचार था तो दुराचार भी रहा होगा।असल जिंदगी में न शब्द की और न ध्वनि की ,किसी की भी कोई मिरर इमेज नहीं होती।एक तरह की शराफ़त दूसरे तरीके की शराफ़त से बेहद भिन्न होती है।मन्दिर वाली शराफ़त धंधे वाली शराफ़त से फर्क होती है।टायलेट वाला पवित्रता का भान कसाईबाड़े वाली साफ़ –सफाई जैसी नहीं होता।
शराफ़त एक चिकना चुपड़ा शब्द है।यह सार्वजनिक त्वचा को चमकीला और दर्शनीय बनाता है।यह हेयर डाई है, जो आदमी की उम्र को बैकवर्ड मोड में ले जाती है।
शराफ़त न होने के बावजूद भी इसके अपने आभासी प्रारूप है।बेईमान ठेकेदार और कमीशनखोर अफ़सर के बीच शराफ़त का झीना सा पर्दा रहता है।चालाक डाक्टर और दवा कम्पनी के काईया सेल्समैन के मध्य रिश्वत रिश्ता  होता है  फिर भी शराफ़त भरपूर रहती  है।अपने अपने हिस्से की मिल बाँट में कोई कोताही नहीं बरतता।लेकिन जो कुछ स्याह सफेद होता है ,पूरी शराफ़त के साथ होता है.
पिछली शताब्दी में शराफ़त छोड़ देने की घोषणा के बावजूद ,किसी न किसी फॉरमेट में शराफ़त मौजूद रही है।ठीक उसी तरह उपस्थित रही  जैसे बाघ के किसी जंगल से होकर गुजर जाए तो उसकी धमक और तीखी गंध अरसे तक अरण्य में बनी रहे।

शराफ़त भले ही हो या न हो लेकिन उसके होने की भनक अब भी जब तब मिलती ही रहती  है।

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

तुला में फुदकता मतवाद


अमुक जी आजकल कहाँ हैं?यह एक ऐसा सवाल है जो समय समय पर किसी न किसी बहाने उठता या उठाया जाता रहा है।
वास्तव में यह अमुक जी और कुछ नहीं रिक्त स्थान पर लगे डाॅट है। रिक्त स्थान पूर्ति के लिए छोड़ दी गयी खाली जगह।एसएमएस की शैली में कहा और समझा जाए तो स्पेस।जब हम खुद को समझने में निर्णायक रूप से पराजित हो जाते हैं तब दूसरों की जिन्दगी का अतापता पूछना शुरू करते हैं।यह पूछताछ ऐसी ही है जैसे कोई नकटा दूसरों की नाक की कुशलक्षेम जानने के बहाने कुतरी हुई नाक के विषय में जानकर तसल्ली पाए।
 अमुक जी के बारे में जानना इतना सरल भी नहीं होता पर खोज पड़ताल की जाए तो उनका पता लगा लेना इतना कठिन भी नहीं ।मैंने फोटो फ्रेम करने वाले मुसद्दी लाल जी से दरयाफ्त की तो उन्होंने बताया कि वह अभी दो चार दिन पहले लोहिया जी की तस्वीर मढ़वाते हुए दुकान पर बरामद हुए थे।इससे पहले बाबा जी का लेमिनेट किया चित्र ले गये थे।इसके बाद उस भगवाधारी बाबाजी को कोट पेंट वाले बाबा साहब से बदल कर ले गये थे।एक दिन अन्ना का आदमकद चित्र ढूंढते हुए आये थे जब वह उन्हें नहीं मिला तो बन्दर नचाते मदारी का फोटो यह कह कर ले गये कि यह भी ठीक है।इससे भी काम चल जायेगा।बोसीदा दीवार को ढांपना  ही तो है।
मैंने आपसे पहले ही कहा कि अमुक जी किसी का वास्तविक नाम नहीं है।वह तो नामचार के लिए बचा कर रखी गयी जगह है केवल।यह  जगह तभी भरती है जब सुपात्र  मिल जाता है। इसे भरने के लिए नाम उठाने,उछालने और धरने होते हैं।उपयुक्त नामधारी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।कठिनाई से इसलिए मिलते हैं क्योंकि वे उसी तरह हिलते डुलते रहते हैं जैसे मेंढक लाख कोशिश के बाद भी कहाँ तुलते हैं।जब तक तुला की डंडी थामो एक पलड़े से दूसरे में फुदक जाते हैं।बनते –बनते संतुलन में दोलन कर जाते हैं।न..न....दलबदल नहीं करते।सिर्फ अपनी धारणाओं में विकास करते हैं।कारोबारी शब्दावली में कहें तो अपने मतवाद में वैल्यू एडिशन करते जाते हैं।दरअसल यह मूल्य सम्वर्धन बड़े कमाल की चीज है।
अमुक जी बड़े दिलवाले होते हैं।इनका दिल हमिंग बर्ड की तरह लगातार उड़ता रहता है।किसी एक डाल पर देर तक नहीं टिकता।एक फूल पर रसपान के लिए चिपकता नहीं ,निरंतर फुर्र फुर्र उड़ान भरता है।ये लगभग भारहीन होते हैं।किसी भी तरह का आकर्षण इनके लिए अपकर्षण होता है।गुरुत्वाकर्षण को धता बताना इन्हें आता है।
चुनाव का मौसम इनके लिए मुरादों से भरे दिनों का समुच्चय होता है।इनके घर दफ्तर की खाली दीवारें इनके भरेपन का कूट संकेत है।इनकी राजनीतिक समझ की निशानदेही भी।जब ये कहीं नहीं दिखते तो वे हर जगह होते हैं।ये न कभी दल बदलते हैं और न ऐसी किसी बात को दिल पर लेने की नादानी करते हैं।दिल को धड़कने के लिए सदा खुला रखते हैं।गाहे बगाहे दल जरूर बदल लेते हैं लेकिन दिल को इस मामले को अपने आसपास भी नहीं फटकने देते।

अमुक जी रिक्त स्थान तो हैं लेकिन ऐसी उन्मुक्त लावारिस स्पेस  भी नहीं कि उस पर जाकर जो चाहे अपना मालिकाना हक या मंतव्य यूँही खाली –पीली टांग आये।

जलीकट्टू और सिर पर उगे नुकीले सींग


अढाई हज़ार साल से हम जलीकट्टू खेलते हुए मरखने बैलों को साध रहे हैं।सैकड़ों बरसों से हम एक दूसरे के कंधे पर पाँव रख कर दही की हांडी चकनाचूर कर रहे हैं।गत अनेक दशकों से हम अपने बच्चों को भविष्य के लिए प्रशिक्षित करने के नाम पर तोते जैसी रटंत विद्या में प्रवीण बना रहे हैं।वर्तमान में हम अतीत के चोटिल परन्तु महिमामंडित संस्कृति में संतति के लिए गोलमटोल ‘पे पैकेज’ टटोल रहे हैं।बदलते वक्त के साथ हम खुद को लेशमात्र बदलने को तैयार नहीं।गंदगी से बजबजाती नालियों को हम इसलिए साफ़ करने को तैयार नहीं क्योंकि स्वच्छता से हमारी युगीन असहमति रही है।जीवन मूल्य तेजी से उल्ट पलट हो रहे हैं लेकिन हम अपनी परम्पराओं के वैभव के समर्थन में डटे हैं।हमारे सिरों पर नुकीले सींग उग आये हैं।
बैल के सींग पर लटके सोने चांदी के सिक्के पाने या लूटने पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। लूटपाट ही हमारी महत्वकांक्षा है।आकाश में लटकी हांडियों को फोड़ कर उसमें रखे द्रव्य को पाने की वीरता सर्वकालिक है। लेकिन इसमें जोखिम है।सबको पता है कि नो रिस्क ,नो गेम।जिस काम में रिस्क फैक्टर न हो वह तो घर की चौखट पर बैठकर लडकियों द्वारा खेले जाने वाले गिट्टू का खेल है।बेहद निरापद।अतिशय मासूम।एकदम घरेलू।निहायत स्त्रैण।
एक समय था जब लड़के गली मोहल्ले में गुल्ली डंडा खेलते थे ।लडकियाँ घर आंगन में इक्क्ल दुक्कल खेलती थीं।लड़के उद्दंड होते हैं।तब भी होते होंगे।खेल ही खेल में झगड़ पड़ते।परस्पर मारपीट कर बैठते।लडकियाँ सहेलियों से किसी बात पर नाराज होती हैं,तो रूठ जाती।मुंह फुला लेती।अबोला कर लेती।ऐसा करते करते कब ये खेल समय बाहर हुए,पता ही नहीं लगा।न कोई सवाल उठा।न किसी ने इन खेलों के खत्म होने को लेकर गुस्सा जताया।
जलीकट्टू पर लगे बैन को लेकर सांस्कृतिक विरासत के हलवाहे ऐसे बैचैन थे जैसे उनके खूंटे से बंधी भैंस कोई जबरन हांक ले गया हो.यह न रहा तो उनके ऐतिहासिक साहस का क्या बनेगा।
कोई भी न्याय पद्धति बैल या दही हांडी से बड़ी कैसे हो सकती है?