दो साल का हाल


दो साल बीत गये।सरकार इतने बड़े –बड़े विज्ञापन न छपवाती तो शायद यह बात पता भी  नहीं चलती।आमतौर से सरकारें उसी तरह  दबे पाँव ही चलती हैं जैसे चतुर बिल्ली जो  रसोई में रखी सारी दूध मलाई चट  कर जाए और किसी को भनक तक न लगे।धडाधड़ विकास पर विकास होता चला जाए और उसका अंदाजा  तक किसी को न होने पाए।जैसे बरसात में घास की फसल ऐसी उपजे कि सब तरफ हरा ही हरा दिखने लगे।खर पतवार की ऐसी बढ़वार हो कि पौधों पर लगे फूलों  के समस्त रंग उसकी हरीतिमा में गुम हो जाए।
तो वाकई दो साल पूरे हुए।इतना समय यूँही गुजर गया।सच तो यह है कि वक्त हमेशा इसी तरह गुजरता है।जन्मजात प्रेमी प्रेयसी के आगमन के इंतजार में छज्जे की रेलिंग पर टंगे के टंगे रह जाते हैं और सपनों की अदृश्य पालकी पलक झपकते आँखों  के आगे से बिना कोई सुराग छोड़े गुजर जाती है।लेकिन सरकार नहीं चाहती कि वह चुपचाप समय को बीत जाने दे।उसके पास हर पल को सेलिब्रेट करने का मौका है और दस्तूर भी।अपनी कारगुजारियों के आदमकद विज्ञापनों के परचम लहराने की अपूर्व सुविधा है।सबको पता है कि सरकारी कृत्यों का वैभव उसके सम्यक प्रदर्शन से ही प्रकट होता है।
दो साल बीतने का अहसास हो या न हो लेकिन विपक्षियों को इसका अच्छे से पता था।वैसे भी राजनीति में सत्ता से पृथक हो कर टाईम बड़ी मुश्किल से उसी तरह कटता है जैसे लोडशेडिंग की रात में पसीने में तरबतर आदमी के लिए कंटीली रात  बीतती है।ऐसे विकट समय में सरकार को जन सरोकारों की आड़ में गरियाने से बेहतर वक्तकटी कुछ हो ही नहीं सकती।आप मानें या न मानें, गाली गलौच हमारे मुल्क का सबसे अधिक लोकप्रिय इनडोर और आउटडोर गेम है।आजकल विपक्षी खेमा सरकार को पूरी शिद्दत से लानत भेजने में लगा है।इस समय सरकार को वे लोग पूरे मनोयोग से गाली दे रहे हैं ,जिनको यकीन है कि एक न एक दिन जनता द्वारा चुनी गयी सरकार उनकी चुनिंदा गालियों से  आज़िज़ आकर खुद इस्तीफ़ा दे देगी।
यह वक्त ही कुछ ऐसा है ,जब छाज तो बोले ही बोले वे छलनियाँ भी वाचाल बन जाएँ , जिनमें बहत्तर  छेद।गालियों के साथ बदलाव का राग वे गा रहे हैं, जिनसे कभी अपने घर की दीवार पर लगा फ्यूज़ बल्ब तक नहीं बदला गया। देश दुनिया के मुद्दे उठाने की बात वे कर  रहे हैं,जिनके पाँव दुछत्ती पर रखी कूटनी  को नीचे उतारने की कल्पना मात्र से थरथराने लगते हैं।ऐसे साहसी  रणबांकुरों को अब यकीन हो चला है कि सरकार का तख्ता पलटने में और सांप सीढ़ी के खेल में कोई खास फर्क नहीं होता।जिसे लूडो खेलना आता है वह सांप सीढ़ी भी खेल सकता है और जिसे इस खेल में निन्यानवे के अंक से नीचे लुढ़क कर शून्य पर आने का सदमा सहना आ जाता है ,वह अंतत: राजनीति का निष्णात खिलाड़ी बन जाता है।
तो बात हो रही है,सरकार के लिए लगभग 731 दिन बीत जाने की। इनमें से आधे दिन तो बीत गये सोते -सुलाते,कुछ दिन व्यतीत हुए इधर उधर की ताकझांक में ,काफी समय बरबाद हुआ यत्रतत्र होने वाले शोरगुल से पैदा क्राइसिस के मेनेजमेंट में।मुल्क में जब जब संकट आया तो उसके समाधान  के लिए होने वाली हाईपावर मीटिंग का एजेंडा तय करने में और पडौसियों की हिंसक धूर्तता का शब्दवाणों के जरिये  मुंह तोड़ जवाब देने में।
इस बीच  कुछ थोडा बहुत जो भी काम हुआ,उसे ही पर्याप्त मानने की यदि सरकार जिद कर ही रही है तो उसे  मान लेने में आखिर हर्ज़ ही  क्या है?
 निर्मल गुप्त,208,छीपी टैंक ,मेरठ-250001 मोब। 08171522922



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