शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

वह इस तरह क्यों मरा ? ,,,,


आप वाले परेशान हैं l राजस्थान का किसान दिल्ली के पेड़ से सरेआम लटक कर मर गया l लोग मरने के लिए कैसी कैसी जगह और वजह ढूंढ लेते हैं l नेताओं को शक है कि यह मरने वाला और चाहे जो हो किसान तो नहीं रहा होगा l और यदि किसान होगा भी तो गरीब गुरबा नहीं होगा l एक पीड़ित शोषित आदमी के पास इस तरह मरने की फुरसत कहाँ ? वह तो अपने घर द्वारे बैठ कर मुआवजे की बाट जोहता है l मदद के लिए पटवारी से लेकर अफसर तक और ग्राम प्रधान से लेकर जिला स्तरीय नेता तक सभी के पीछे पीछे चिरौरी करता घूमता है l वह तिल -तिल कर मरता है लेकिन इस तरह अपने प्राण नहीं त्यागता l वह मरते दम तक अपनी औकात याद रखता है और जब मरना अपरिहार्य हो जाता है तो चुपचाप मर जाता है l
आप वालों को उसके इस तरह मरने में बड़ी साजिश की बू आ रही है l अन्य दलों के नेताओं को इसमें अपने लिए मौके ही मौके दिखाई दे रहे हैं l किसान की जब फसल बरबाद होती है तब राजनीतिक जमीन पर उम्मीदों की फसल लहलहाती है l सपने जब धाराशाही होते हैं तब गिद्धों के लिए महाभोज का इंतजाम होता है l वह अन्नदाता है इसलिए उसे अपने लिए कुछ मांगने का अधिकार नहीं है l यह मुल्क कृषिप्रधान देश है इसलिए यहाँ के किसानों को मरने के मामले में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए l उसे अपने रुतबे को समझ लम्बे अरसे तक भूखे रहने का सलीका सीखना चाहिए l
वह तमाम तमाशबीनों की उपस्थिति में अपनी पगड़ी का फंदा बना फांसी पर लटक गया l लोग देखते रहे और वह मर गया l नेता तक़रीर करते रहे और उसकी जिंदगी रीत गई l खबरनवीस एड़ियों पर उचक कर उसकी मौत के लाइव मंजर को फिल्माते रहे और उसके पास जिन्दा रहने की वजह खत्म हो गयीं l वक्त रहते उसे किसी ने नहीं बचाया l वह किसी का कुछ नहीं लगता था तो उसे कोई क्यों बचाता l वह किसी वीआईपी का निकट संबंधी भी तो नहीं था l और तो और वह दिल्ली का रहने वाला भी नहीं था तब उसकी चिंता दिल्ली वाले क्यों करे l
एक भोलाभाला आदमी पेड़ से लटक कर मर गया l वह किसान था ,व्यापारी था या कुछ और इस पर शोध चल रहा है l फ़िलहाल राजनीति के हाट पर घड़ियाली आसुओं की डिमांड यकायक बहुत बढ़ गई है l 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

रैली ,बैंकाक ,सेबिटिकल और लंतरानी


रैली हो गई । रैली होनी ही थी । रैलियां होती रहती हैं । रैली में भीड़ थी । गहमागहमी थी । किसानों की जमीन से अधिक अपनी राजनीतिक जमीन को फिर पा लेने का उतावलापन था । गुलाबी पगड़ी थीं । सोमरस की महक  के साथ पसीने की गमक थी । मंचासीन लोगों को अपना चेहरा दिखाने की सनातन उत्सुकता थी । मौसम गर्म था । ठंडाये नेताओं में जोश था । उनके भीतर का अवसाद पिघलता हुआ लग रहा था । उनकी बॉडी लेंग्वेज में उचाट मन के रूपांतरण की गाथा लिखी दिख रही थी । मीडिया के रणबांकुरे ओवरबिजी दिख रहे थे । वे रैली स्थल के जर्रे जर्रे से लगातार पूछ रहे थे कि अब वे कैसा महसूस कर रहे हैं ।
रैली के लिए मंच सजा था । उसे खूब ऊँचा बनाया गया था । यह बात कन्फर्म नहीं है लेकिन भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि मंच के नीचे फोम के मोटे गद्दे बिछाए गए थे ताकि भावातिरेक में  कोई नेता कुरते की बांह  चढ़ाता वहां से छलांग लगा भी दे  तो चोटिल न हो ।  पार्टी और नेता की रिलाउन्चिंग के समय ऐसी -वैसी हर बात का ख्याल रखना ही पड़ता है । तिस पर इस बार तो विपश्यना से प्राप्त होश और थाईलैंड प्रवास से प्रवास से प्राप्त अतिरिक्त  जोश की साख  इसी मंच पर दांव पर लगी थी ।
रैली खूब कामयाब रही । वहाँ व्यवस्था एकदम चाकचौबंद रही । मंच वालों को ठंडा मिनरल वाटर और नीचे भीड़ लगाये लोगों को सादा पानी पिलवाने की माकूल व्यवस्था की गई  ताकि वे  रैली स्थल पर सरकार को पानी पी -पी कर कायदे  से कोस सकें । पार्टी ने भीड़ की  हर जरूरत का ख्याल रखा । नेताओं ने मंच से खूब भाषण के फुग्गे उडाये । बैंकाक के अरण्यों में की गई घनघोर तपश्चर्या का फलित उनकी ओजस्वी वाणी से प्रकट होता हुआ लगा । यह प्रतीति जनता को जरा कम और नेताओं को कुछ अधिक हुई । जाकी  रही भावना जैसी टाइप की  रही।
रैली के दौरान सेबिटिकल की भी खूब चर्चा रही । कुछ लोग दबी जुबान में एक दूसरे से कहते सुने गए कुछ भी कहो भइया ,यह सेबिटिकलवाभी है ,चीज भोत ही गज़ब की । अधिकांश लोगों को लगा कि पार्टी कोई  सेबेटिकल ब्रांड का उन्नत बीज काश्तकारों को दिलवाने की मांग उठाने वाली है ,जिससे उगी फसल ओले और  बेमौसम बारिश में बची रहेगी ।
लब्बेलुआब यह कि रैली की तमाम लंतरानियों  में सबको कुछ न कुछ मिला या मिलता हुआ -सा लगा । 


गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

वह आ गए हैं


वह आ गए हैं यदि पुराना समय होता तो राजमहल के दमकते फर्श पर सच्चे शफ्फाक  मोती फुदक रहे होते मध्यकाल में जब हिज हाईनेस अकबर को दासी ने राजकुंवर के आगमन की  खबर दी थी तो उन्होंने खुश होकर अपने गले में पहनी मोतियों की बेशकीमती माला तोड़ कर उसकी झोली में डाल दी थी तब कुछ मोती फर्श पर जा गिरे थे और देर तक क्रेजी बाॅल की तरह उछलते हुए ऐतिहासिक गल्प का हिस्सा बन गए थे  राजसी फिजूलखर्ची का यह किस्सा आज तक खूब मजे लेकर सुना और सुनाया जाता है वह आये हैं तो आसमान में बेमौसम बादल आ गए हैं ढोल नगाड़े वालों ने आने में देर की तो बादल खुदबखुद गड़ागड़ा उठे बधाइयाँ गाने की तैयारी चल रही है बधाई गान की स्क्रिप्ट आलाकमान के अप्रूवल के लिए भेजी गई है इस बार हर काम बड़े करीने से किया जाना तय हुआ है वह सत्य से साक्षात्कार करके आये हैं अब पार्टी के भीतर -बाहर जो  घटित होगा सच के आलोक में देख -परख के होगा इस बार कोई चूक न हो ,इसका पूरा ख्याल रखा जायेगा पार्टी के कारिंदों से कह दिया गया है कि वे इतनी तालियाँ बजाएं कि उनके हथेली लाल सुर्ख हो जाये ताकि जनता को पता लगे कि हाथ वाले अपना काम किस कदर मुस्तैदी से कर रहे हैं
वह आये हैं तो आवाम को यह पता लगना चाहिए कि उनके आने में कुछ खास है उनकी वापसी एक असाधारण परिघटना है उनकी घर  वापसी को ढंग से सेलिब्रेट किया जाना चाहिए वह पूर्णत; रूपांतरित होकर लौटे हैं l   वह ठीक उसी तरह बदल गए हैं जैसे कभी कलिंग के युद्ध  के बाद सम्राट अशोक  परिवर्तित होकर महान अशोक बने  थे
उनके आने की कन्फर्म खबर मिलने के बाद पूरे मुल्क  को ऐसा लग रहा है कि पुराने ज़माने में मेलों में लगने वाले मूविंग थियेटर में जनता की भारी मांग पर सैमसन और डिलालाइला या हरक्यूलिस या उसी टाइप की  किसी पिक्क्चर का प्रदर्शन शुरू हो गया  हो जैसे कोलम्बस इण्डिया की  खोज कर अपने मुल्क लौट आया हो जैसे अलादीन का खोया हुआ चिराग एंटीक सामान बेचने वाली किसी दुकान की दुछत्ती पर रखा मिल गया हो

वह जहाज के किसी बोदे पक्षी की तरह वापस नहीं आये हैं वह सच्चे मोती की आब लेकर पूरे रौबदाब के साथ आये हैं l  

मुआवजे का सीजन


मौसम की उलटबांसी ने किसानों के लिए बुरे दिन ला दिए असमय बारिश और ओलों ने खड़ी फसल बरबाद कर दी राजनीतिक लोगों के लिए मुरादों भरे दिन आ गए  गांव गांव मुआवजा बाँटने और बंटवाने का खेल शुरू हो गया तमाम जाँच पड़ताल के बाद जब मुआवजे की रकम चैक की शक्ल में आई तो लुटे पिटे किसानों की समझ में यह नहीं आ रहा  कि इतनी कम धनराशि से वे मरने के लिए कौन सा सामान खरीदें  इतनी कम  धनराशि से  आत्महत्या  के लिए उपयुक्त रस्सी या समुचित मात्रा में जहरभरी  पुड़िया तो मिलने से रही !
मुआवजा बंटने की भनक मिलते ही ब्लॉक से लेकर तहसील कार्यालय तक  बहार छा गई  तजुर्बेकार सरकारी कारिंदों और नेताओं ने आसमान से ओले की पहली खेप के धरती पर बरसते ही समझ लिया था कि अब उनका   ‘सीजन’ आने वाला है दार्शनिक सच भी यही है कि जब किसी को कुछ गुम होता  है तभी किसी दूसरे को कुछ मिलता है ठसाठस भरी बस में से जब एक सवारी उतरती है तो डंडा थामे जैसे तैसे एक पाँव पर खड़ा पैसिंजर बैठने का मौका पाता है मुआवजा ,पेंशन ,अनुग्रह राशि  जब वितरित होने लगती  है तब सुविधा शुल्क के रूप में रिश्वत से लोगों की मुट्ठियाँ गर्माने  लगती हैं
मौसम जब बेईमान होता है तब कुछ लोगों के लिए सुहावना सीजन ठीक उसी तरह  आता है जैसे जब डेंगू इबोला मलेरिया इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है तब चिकित्सा के धंधे से जुड़े लोगों के लिए  मौज आती है इस बार मौसम की वजह से  सीजन आया  है और जब इस तरह का सीजन आता है तब गिद्धों को महाभोज की भनक मिलती है  राजनीति  के भीतर का गिद्ध अपनी तंद्रा से बाहर आता है
आजकल खेतों में किसानों की उम्मीदें बिखरी पड़ी हैं उसके पास जिन्दा रहने से अधिक मरने की वजह है  उनकी इस दुर्दशा में नेताओं को अपने ख्वाब पूरे होते दिख रहे हैं उनके लिए यह शासन  और प्रशासन को गरियाने का बेहतरीन अवसर है  यह समय अपने रीते वोट बैंक को दुबारा भरने लेने  का है यह गाल बजाने और मगरमच्छी   आंसू बहाने का सही वक्त है  कहीं खुशी कहीं गम जैसा अदभुत परिदृश्य उपस्थित है
मुआवजे के सीजन में भुक्तभोगी किसान के अलावा सबकी पौबारह है मुआवजा बाँटने वाले लोग रात दिन अपने काम में लगे हैं मायूस किसान उनकी चिरौरी करता हुआ आगे पीछे घूम रहे हैं चैक पर चैक बन रहे हैं बना बना कर रखे जा रहे हैं बन चुके चैक किसानों को दिखाए जा रहे हैं लेकिन दिए नहीं जा रहे अधिकारी जी इन पर साइन करने से पहले इन्हें अपनी हथेली पर रख कर तौल  रहे हैं कारिंदे अधिकारी के सामने खड़े खीसें निपोर रहे हैं साहब का चपरासी अब तक कई बार चक्कर लगा कर कह गया है कि हमारा भी ख्याल रखना सब एक दूसरे को  ख्याल रखने का आश्वासन दिए हैं किसान के अतिरिक्त सबका सीजन मनमाफिक चलता हुआ लग रहा है
मौसम जब बेढब चाल चलता है तो सीजन आता है सीजन की कोई तय मियाद  नहीं होती  वह अचानक आता है और आननफानन में चला भी जाता है चतुर सुजान ऐसे ही सीजन में अपने सपने साकार कर लेते हैं मुआवजा पाकर किसान अपने को पहले से अधिक टूटा हुआ पाता है


सोमवार, 13 अप्रैल 2015

वह आ रहे है


he is coming
मीडिया के स्वयंभू गुप्तचर जिसे न जाने कहां-कहां ढूंढते फिर रहे थे, वह आखिरकार मिले भी तो कहां मिले! एक कम चर्चित देश के जंगल में सच की तलाश में साधनारत। जब उनका अता-पता मिला था, तब भी टीवी वाले सक्रिय थे, और अब जब उनके आने की खबर है, तब भी वे सक्रिय हैं। टीवी पर किसी भी क्षण मोटे अक्षरों में लिखा दिख सकता है-वह आ रहे हैं।

कुछ दिनों पहले उनकी उपस्थिति की थाह पाने के लिए लोगों ने आकाश-पाताल एक कर दिया था। अति उत्साही गोपीचंदों ने उनके घर से लेकर पार्टी दफ्तर के कोने-कोने की खाक छानी, पोगो के कैरेक्टर, भूमि अधिग्रहण संबंधी दस्तावेजों से लेकर उनके बेड के गद्दे के नीचे मिली चॉकलेट की पन्नियों तक में बारीकी से तलाशा था उन्हें।

वह सत्य की तलाश में थे, और यह बात सबको पता है कि सच गहमा गहमी से भरी रोजमर्रा की चीजों के बीच कहां मिलता है। सच तो सदियों से ही सघन अरण्यों में, कंदराओं के भीतर, वटवृक्ष की छाया में आराम फरमाता मिला है। आज तक किसी को यह मेट्रो ट्रेन की सीट पर लावारिस रखा हुआ या किसी धन्ना सेठ की जैकेट के जेब के बाहर अटका हुआ या मल्टीप्लेक्स की रेलिंग पर लटका हुआ नहीं मिला।

वह सच की तलाश में उसी तरह निकले थे, जैसे कभी सिद्धार्थ महल से दबे पांव निकले थे। इनकी शादी नहीं हुई है, इसलिए किसी को बताने या बिना बताकर जाने जैसा धर्म संकट भी नहीं था। वह जाते-जाते आलाकमान को बता गए थे कि वह एजुकेशन लीव पर जा रहे हैं। चूंकि वह खुद ही अपने आलाकमान हैं, इसलिए इस विषय में विस्तार से उन्होंने जो कुछ बताया होगा, अपने कान में बता दिया होगा। इसी से उनकी गुमशुदगी का रहस्य गहराया था।

बहरहाल, अब वह सत्य को पा चुके हैं। संभव है वह नवीनतम सच के पैकेज के साथ अपनी पार्टी और खुद को रिलॉन्च करें।

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

स्टिंग और हिडन कैमरा


‘सुनो जी हमारे मोबाइल में भी स्टिंग एक्टिवेट करवा दीजिए’ मैडम जी की चाशनी में डूबी आवाज़ मेरे  एक कान में आई तो मेरे  दोनों कान ताज्जुब से फडफडा उठे l  अचरज में  भर कर मैंने केलेण्डर की ओर देखा l आज न मैरिज एनिवर्सरी थी  और न वैलेंटाइन डे जैसा कुछ होने का कोई सबूत l हमने उनके इस अनुरोध के जवाब में कहा –हम्म l  इस ढाई आखर के ‘हम्म’ से आई बला टल जाती है l  
-हम्म नहीं ,हाँ जी कहो l मुझे हर हाल में स्टिंग करने वाला एप चाहिए l उनकी आवाज़ में मौजूद  तल्खी से मुझे तुरंत पता चल गया कि बला अभी टली नहीं है l
-तुम्हें किसका  स्टिंग करने की जरूरत आ पड़ी सुबह -सुबह ? मैंने यूँही पूछ लिया l
-इससे तुम्हें क्या ? मैं जी चाहे जिसका स्टिंग करूँ ,मेरी मर्जी ? मैडम जी के भीतर से माय चायस वाली तारिका बोलती हुई सुनाई दी l
-जी ,मैंने कहा l
-सिर्फ जी से काम नहीं चलने वाला l इसे तुरंत खुद एक्टिवेट करो या किसी से करवाओ l उन्होंने एकदम स्पष्ट हुक्म प्रसारित किया l
हुक्म मैडम जी का था सो तामील तो होनी ही थी l हमने भीतर के साहस बटोर कर पूछ ही लिया –मैडम जी यह तो बता दो स्टिंग के जरिये करोगी क्या ?
-वही करुँगी जो सब कर रहे हैं l जैसे आप वाले करते हैं l
- आप वाले  स्टिंग नहीं करते वे तो एक दूसरे की छिछालेदार करते हैं l इस  काम के लिए  एप नहीं ,  मुहँ में डेढ़ तोले की धारदार जुबान होना  काफी है l
-सही बताओ l  क्या स्टिंग का कोई मोबाइल एप नहीं होता ?
- मोबाइल से सिर्फ सेलफी उतारी जा सकती है l  स्टेट्स अपडेट किया जा सकता है l लाइक किया जाता है किसी को फ्रेंड तो किसी को अन्फ्रेन्ड किया जा सकता  है l पर स्टिंग नहीं किया जा सकता l
-तब ? उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हो पा रहा था l
- स्टिंग के लिए स्पाई कैम चाहिए होता है l हमने बताया l
-यानि वो गोवा वाला मुआ हिडन कैमरा ? मैडम जी ने पूछा l
-हाँ वही l हमने तुरंत उनके शक की पुष्टि कर दी l
-तब हमें नहीं करना यह स्टिंग विस्टिंग l इससे तो वहाट्स एप भला हमारा काम तो इससे ही ठीक चल रहा है l उनके उत्साह के गुब्बारे में भरी हवा निकल गई l
कानाफूसी और परनिंदा काम वैसे ही ठीक - ठाक चल रहा है  l  कौन फंसे इन  झमेलों में ? मैडम जी ने शायद यही कहना चाहा होगा लेकिन कहा नहीं l स्टिंग करना नेताओं और खोजी पत्रकारों का काम है l जनता का काम है इस सारे कौतुक को अपलक निहारना l
मैडम जी  समझ गयीं  कि जिसका काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे l उन्होंने व्हाट्स एप के जरिये अपना यह ज्ञान तत्काल वायरल कर दिया l




अब तक पैंतालीस ......


उनके बाईस साल की राजकीय सेवा के दौरान पैंतालीस बार तबादले हो चुके हैं l यहाँ से वहांविभाग दर विभाग और पद दर पद  इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है सेवार्थ नौकरशाह  इधर से उधर आते  जाते रहते  हैं  उनके इस आवागमन से ही सरकार की पैनी नाक की साख बनती है l एक जगह ठहरा हुआ पानी गंधाने लगता है l जो  चलायमान रहता है उसकी  निर्मलता बरक़रार रहती है जनहित में किये गए तबादलों से ही  सरकार की  नेक मंशा और कार्यकुशलता का पता मिलता है इससे एक लाभ यह भी होता रहा है कि राजकीय व्यय पर नौकरशाहों को हवा और पानी बदलते रहने का लगातार अवसर मिलता  है  यह सर्वविदित है कि हवा पानी में बदलाव से सेहत सुधरती है  कुशल प्रशासन के लिए प्रशासकों का चुस्त- दुरुस्त रहना कितना जरूरी  है ,यह बात किसी से छुपी नहीं है l

सरकारी तंत्र में तबादले वीरता प्रदर्शन के लिए किसी रणबहादुर को मिले तमगों  की तरह होते हैं ये तमगे किसी शिकारी के घर के ड्राइंगरूम की दीवार पर टंगी उसके द्वारा मारे गए जानवरों की खाल की तरह होते हैं  ,जिससे उसके अदम्य साहस और आखेट  कौशल का पता मिलता है जिस नौकरशाह के  पास जितने अधिक ट्रांसफर आॅडर वह उतना अधिक चर्चित व्यक्तित्व  और ईर्ष्या का पात्र बनता है लोग कहते फिरते हैं कि हाय इसके जितने तबादले हमारे क्यों न हुए l सबसे अधिक आदरणीय वे अधिकारी होते हैं जिनके जितनी द्रुतगति से  तबादले होते हैं उससे भी अधिक स्पीड से उनका निरस्तीकरण हो जाता है l कभी कभी तो ऐसा भी हुआ है कि ट्रांसफर ऑडर से पहले उसका कैंसिलेशन प्रकट हो जाता है l कुछ तबादले तो सरकार करती ही इसलिए है ताकि उन्हें निरस्त करके अपनी  बिगडती हुई छवि में गुणात्मक सुधर ला सके l तबादले करना सरकार का मौलिक दायित्व  है और उसे रुकवाना या उसका रुख मनचाही जगह की ओर मोड देना नौकरशाही  का   चातुर्य  l

अब सुनने में आया  है कि  ईमानदारी  के दुर्गम रज्जु मार्ग पर चलते -चलते वह अंतोतगत्वा  पुरातत्व महकमे की दहलीज तक  पहुँच गए हैं कर्तव्यपरायण और सत्यनिष्ठ आदमी के लिए इससे उपयुक्त स्थान और हो भी क्या सकता है ? जिस चीज की व्यवहारिक दुनिया में उपादेयता खत्म हो जाती है ,वह या तो कबाड़खाने में जाकर जमती  है या अजायबघर में फबती है भाषाई लिहाज से इतिहास कबाडखाना और अजायबघर पर्यायवाची भले  न हों पर समानार्थी शब्द तो हैं  ही l पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं के मूल्य और महत्व को कबाड़ी और इतिहासकार से  बेहतर  कौन परख  सकता है ?
बाईस साल में पैंतालीस तबादले प्रथमदृष्टया तो एकदम नियमानुसार लगते हैं ,बस इसमें पेंच सिर्फ इतना है कि एक वर्ष में दो तबादले की दर से चवालीस ट्रांसफर  बनते है ,तब पैंतालीसवा तबादला क्यों कर हुआ ? यह किसी लिपकीय भूल  के चलते हुआ या अन्यत्र कारण से ? इसकी गहन जाँच और गवेषणा आवश्यक है भूल और लिपिक को सुधारा जा सकता है लेकिन अन्य वजहों की शिनाख्त के लिए उसकी तलहटी में उतर कर राजनीतिक निहितार्थ को ठीक से समझना  पड़ता है l
चवालीस तक तो ठीक पर यह पैंतालीसवा जरा संदेह  पैदा कर रहा है यह तबादला निरंतर विकास और रूटीन ट्रांसफर में यकीन रखने वाली  सरकार की आँख में अचानक गिर गए कंकड़ की तरह खटक रहा है l

रविवार, 5 अप्रैल 2015

क्रिकेटर की शादी और स्टाइल



क्रिकेटर जी की शादी हो रही है l एक और क्रिकेटर जी भी शादी करने की फ़िराक में इश्क के स्लॉग ओवर्स खेल रहे हैं l  चहुँ ओर  मंगल गीत बज रहे हैं l ढोलकें थपक  रही हैं l टप्पे गाये जा रहे हैं l मझीरे छनक रहे हैं l मेहँदी की रस्म हो रही है l सेलिब्रिटी दुल्हे दुल्हन  के विवाह स्थल के  इर्दगिर्द काली पोषाक पहने बाउंसर समूह  मंडरा रहा है  l  मीडिया के रणबांकुरों के हाथ कैमरे के जरिये कुछ  अभूतपूर्व कर गुजरने के लिए कुलबुला रहे हैं l बाउंसरों की मासपेशियां उन्हें रोकने के लिए फड़क रही हैं l स्टूडियो में बैठा एंकर न्यूज़ ब्रेक करने में हो रही देरी के चलते अंगुलियों के नाखून कुतर रहा है l यदि फुटेज  पहुँचने में कुछ और देर हुई तो संभव है कि वह पैर के नाखूनों तक को कतरने के लिए नेलकटर का काम मुहँ के दांतों से ही करने लगे  l
यह बात सही है कि किसी  के लिए भी विवाह करना बड़ी बात होती है l इससे भी बड़ी यह बात होती है जब वह क्रिकेट के जरिये नाम और दाम कमाता हुआ प्रसद्धि के नभ में नामजद होता है l और इससे भी अधिक बहुत बड़ी बात तब घटित होती है जब वह विवाह करता हुआ खुल्लमखुल्ला छुपम -छुपाई का खेल खेलता है l मीडिया से आँख मिचौनी करता है l खुद को दुल्हन सहित कैमरे की निगाह से बचाकर सीसी टीवी कैमरे में दर्ज करवाता है l खेल के मैदान में एक रन बनाने के बाद बैट के सहारे फ़्लाइंग किस दर्शक दीर्घा की ओर उड़ाता है l मजे मजे में टीम को हरवाने के बाद भी अजेय दिग्गज बन जाता है l
क्रिकेट भी अजब खेल है l इसमें भीषण पराजय के बावजूद खिलाड़ी के चेहरे पर ग्लानि की शिकन नहीं आती l रस्सी जलने पर भी ऐंठ बनी रहती है l गर्दन की अकड़ जस की तस रहती है l शर्मनाक पराजय को वे कीमती कपड़े पर गिर गई धूल की तरह झाड कर चेहरे को खुशबूदार टिशु पेपर से साफ़ कर लेते हैं l वे खेल को सिर्फ खेल मानते हैं और उसके नतीजों को दिल में नहीं रखते l
क्रिकेटर हर काम सलीके  से करते हैं l मैदान में वे  कैच पकड़े या छोड़े ,पर  जो करते है ,करते हैं पूरी अदा के साथ l  प्यार का इज़हार और शादी की रस्मअदायगी भी  स्टाइल से करते हैं l  एक की तो शादी पूरे धूमधड़ाके से हो गई l दूसरे को पूरी कवरेज देने के लिए मीडिया कमर कसे तैयार बैठा है l