गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

आप और दूर की कौड़ी


दिल्ली में आप ने झाड़ू पछाड के जरिये सबको चारों खाने चित्त कर दिया । अब वह इस स्थिति में है कि चित्त भी उसकी और पट भी उसकी ।  चारों ओर जयजयकार हो रही है । जीतने वाले तो जीतने वाले  ,पटखनी खाने वाले भी इस जैकारे में शामिल हैं । परस्पर विरोधी लोग एक दूसरे से गलबहियां करते कह रहे हैं –मुबारक हो जी । जी सर जी ,दिली मुबारकबाद । मफलर ने कीमती सूट को हरा दिया । सादगी गरिमामय हुई । आम आदमी की जीत गई ।  राजनीतिक दांवपेच हार गए । कोई दीवाना पुरजोर आवाज़ में गा  रहा है कि बड़बोलापन हार गया । जानकार लोग  उलझन में  हैं । वे समझ नहीं पा रहे कि इस जंग में वाम विचार की फतह हुई या दक्षिण पंथ की या फिर मध्य मार्ग की फतह हुई । उनकी बौद्धिकता की साख दांव पर लगी है ।
एक बात तय है कि जीत तो हुई है और वह भी एकतरफा हुई है । इस कदर हुई है कि हारने वाले ढूंढे नहीं मिल रहे । हराने वाले अंगूठों को टिली लिली झर्र करने के लिए उपयुक्त लक्ष्य नहीं मिल रहे । तरकश में रखे व्यंग्य बाण निठल्ले बैठे  कसमसा रहे हैं । आत्मचिंतन वाले दिनन के फेर को निहारते हुए मुहँ सिले उदास बैठे हैं । उनके लिए दिल्ली एक बार फिर दूर रह गई है । वह हरियाणा के बार्डर पर सस्ती दारू के सरकारी ठेके पर सुकून और उम्मीद ढूंढ रहे हैं । भक्तगगणों की फैक्ट्री में बने चुटकलों के लिए बाजार से ग्राहक नदारद हो गए हैं । उन्होंने ये चुटकुले फिलवक्त गोदाम में रख दिए हैं ताकि वक्त जरूरत काम आयें और  सनद रहे ।  वैसे भी राजनीतिक चुटकुले कभी आब्सलीट (निष्प्रयोज्य ) नहीं होते । कोई नहीं जानता कि इनकी जरूरत कब आन पड़े । उम्मीद एक जिन्दा शब्द है ,यह कभी बासी नहीं पड़ता  ।
राजनीति अपने लिए निरंतर नए प्रहसन गढ़ती है । इसमें  मसखरों के अलावा सारे किरदार बदलते रहते हैं । नायक खलनायक हो जाते हैं और विलेन मसीहा बन जाते हैं । लेकिन विदूषक कभी नहीं बदलते वे नवीनतम भावभंगिमा के साथ सदा उपस्थित रहते हैं । दर्शकों को ये इसीलिए भाते हैं क्योंकि  यह हमेशा जिंदगी में हँसने हंसाने के लिए गुंजाइश बनाये रखते हैं । वे कभी थक कर नहीं बैठते । कभी नहीं ऊँघते । पछताने के चक्कर वक्त खराब नहीं करते । उनके लिए रंगमंच पर स्पेस की कमी कभी नहीं पड़ती ।
दिल्ली वाले कह रहे हैं कि आप जीत गए । बधाई हो जी बधाई हो ,आपके यहाँ आप आये हैं  ।  दिल्ली से बाहर रहने वाले इस पहेली को ठीक से समझ नहीं पा रहे । वे सोच रहे हैं कि इतनी बड़ी तादाद में वहां आप आये हैं तो क्या उनमें से एकाध दिल्ली से बाहर निकल कर रोडवेज की बस ,ट्रेन , टैम्पू या डग्गामार जुगाड़ में बैठ कर उनके यहाँ भी एक न एक दिन जरूर आयेंगे ?  वे आयें तो लाइफ बन जाये । वे अपने साथ मुफ्त की वाईफाई लायें या न लाएं लेकिन एक अदद आस तो लेकर आयेंगे ही । आस बड़ी चीज होती है।  आस की हरी मखमली घास पर टहलता हुआ लोकतंत्र सदा जिन्दा और स्वस्थ  रहता है ।
दिल्ली वाले इस बार आपके लिए दूर की कौड़ी चमकीली धूप और हरी दूब लाए हैं  







बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

झाड़ू फिर गई


बापू ने कहा था कि अपनी गलती को तहेदिल से स्वीकार कर लेना झाड़ू लगाने के सामान है, जिससे सतह साफ़ और चमकदार हो जाती है ।हालाँकि आजकल बापू की सुनता कौन है लेकिन उनकी कही बातें न चाहते हुए भी अकसर याद हो आती हैं ।दिल्ली में बहुत से लोगों की उम्मीद पर इस अंदाज़ में झाड़ू फिरी कि राजधानी एकदम क्लीन हो गई और तमाम छंटे हुए रणनीतिकार इस तरह ‘क्लीनबोल्ड’ हुए मानो वर्ड कप  के प्रेक्टिस मैच में बनाना रिपब्लिक ने  फाइव स्टार खिलाडियों से युक्त टीम इण्डिया को हरा दिया हो ।
बापू का कहा माना होता तो ये दिन न देखना पड़ता। अपनी मूर्खताओं का पता करके समय रहते उन्हें बुहार दिया होता तो इस तरह दूसरों से झाड़ू लगवाने की नौबत ही क्यों आती। जो अपना घर खुद स्वच्छ रखते हैं उनके घरों में परायी झाड़ू से सफाई करने की कोई जुर्रत नहीं करता।
अब झाड़ू जादुई कालीन बन चुकी है । इस पर पसर कर लोग सत्ता के सातवें आसमान तक पहुंचा गए हैं । वह अलादीन का वह करामाती चिराग बन गई है ,जिसे जमीन पर घिस कर फर्माबरदार जिन्न को बुलाया जा सकता है ,कभी भी कहीं भी ।झाड़ू अब खुल जा सिम -सिम वाला कोडवर्ड बन गई है ,जिससे खजाने से भरी गुफा का दरवाजा तो खुल जाता है लेकिन जान के लिए जोखिम भी बढ़ जाता है ।
बापू बेचारे जाने क्या - क्या कहते चले गए । उन्होंने कहा सरल बनो सहज बनो और लोग सजते संवरते और जटिल से जटिलतम होते चले गए ।उन्होंने कहा कि ईमानदारी से अच्छी कोई  नीति नहीं  ,लोग अनीति के जरिये सबसे अधिक उजले चेहरे वाला मुखौटा लगा कर हाज़िर होते गए। बापू ने कहा सदाचार ,लोगों ने सुना कदाचार ।उन्होंने जो कहा उसे सिर्फ कहा नहीं वरन अपने जीवन में उतारा ।लोगों ने जो कभी किया नहीं उसे अपनी सेल्फी में उतार कर निश्चिंत हो चले। अत्याधुनिक तकनीक के सहारे असत्य को सत्य में कन्वर्ट कर दिया ।अपने ऊपर इतने आवरण चढा लिए कि उनकी कुरूपता जगजाहिर  हो  गई ।
दिल्ली में झाड़ू आ गई ।उसका जादू वोट बन कर बोला ।बड़े-बड़े धुरंधर धराशाही हो गए ।छोटे छोटे प्यादे जीत गए ।यह सबको पता है कि प्यादे भले ही मंथर गति से चलते हों लेकिन वे टेढ़ी चाल चलने वाले घोड़ों को हरा देते हैं । एकजुट प्यादों ने चुनावी बिसात में दिग्गजों को मुहँ की खिला दी ।बिना शह दिए ही मात दे दी  ।
झाड़ू ने चुनावी गणितज्ञों की पोल खोल कर रख दी ।दस हज़ार वॉट का शाॅक ट्रीटमेंट  दे दिया ।सावधान होने का मौका दिए बिना विश्राम की मुद्रा में ला दिया ।आत्ममंथन के लिए सिर खुजाने के लिए फुर्सत तो दी लेकिन नाखून कतर दिए ताकि वे अपनी खोपड़ी चोटिल न कर लें । झाड़ू ने साधारण अंकगणित को बुहार कर हाशिए पर पटक दिया और उसकी जगह बीजगणित के नए सूत्र गढ़ दिए ।अपने लिए इतिहास रच  दिया ।इतिहास के पुनर्पाठ के लिए पराजित योद्धाओं के रूप में पाठक उपलब्ध करा दिए।
दिल्ली में झाड़ू ने हाहाकार मचा दिया है ।उसने तमाम पूर्व अनुमानों को बुहार कर वक्त के डस्टबिन में डाल दिया है ।उसने बता दिया है कि साल में केवल लू लपट वाला मई का महीना ही नहीं आता इसमें सर्दगर्म फरवरी भी आती है और फरवरी किसी का लिहाज़ नहीं करती। मनमानी करती है ।इसके आगे किसी की  नहीं चलती ।
@नई दुनिया ११ फरवरी १५ को प्रकाशित 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

जीरो ऑवर में अटकी दिल्ली


दिल्ली में आजकल जीरो ऑवर चल रहा है। वोटिंग हो चुकी है। नतीजे लगभग आ गए हैं लेकिन ऑफिशियली प्रकट नहीं हुए हैं। सरकारी काम तुरत -फुरत होते भी नहीं। वे जब होते हैं पूरे विधि विधान के साथ होते हैं। बड़ी नज़ाकत के साथ हौले हौले। जैसे दुल्हन विवाह मंडप की ओर दुल्हे के गले में वरमाला डालने चले ,बिल्ली की तरह दबे पाँव। नेपथ्य में गीत बजे –बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है।
वेलेंटाइन –डे सिर पर आ खड़ा है। मुल्क भर के महबूबा और महबूब टाइप लोग ओवरबिजी होने की फ़िराक में हैं। लेकिन जीरो ऑवर है कि बीत ही नहीं रहा ।वह खिंचता चला जा रहा है ।इंतज़ार खत्म नहीं हो रहा। दुल्हन है। वरमाला है। दुल्हे की संकोचवश सिकुड़ी हुई गर्दन है। उम्मीद है। आशंका है। हवन कुंड है। लकड़ी है। पान का पत्ता है। दूब घास है। सुपारी है। कपूर है ।हवन सामग्री है ।अग्नि के चारों ओर परंपरागत चक्कर लगवाने का फूलप्रूफ इंतजाम है। पंडित जी हैं। मुहुर्त निकल जाने की बैचैनी है। मीडिया है पल पल की कवरेज के लिए चाक चौबंद। उनके स्टेंड पर टंगे कैमरे हैं। बाइट्स के लिए उत्सुक परेशान आत्माएं हैं। ब्रेकिंग न्यूज़ हवा में है। उसे लपकने वाली हथेलियों में लगातार होती खुजली है।
इस जीरो ऑवर में सात तालों के बीच रखी इवीएम एकदम निश्चिंत हैं। वह तटस्थ मुद्रा में हैं। उनकी न काहू से दोस्ती है ,न काहू से बैर ।उनके मन में कोई जल्दबाजी नहीं है। इवीएम को पता है कि उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता क्योंकि वह कांग्रेस पार्टी की तरह खुद किसी रेस में नहीं हैं। वे चीनी दार्शनिक लओत्सू की मानस पुत्री हैं। वे किसी गरीब की जोरू नहीं इसलिए भौजाई भी किसी की नहीं।
जीरो ऑवर में लोगों ने अपशकुन के भय से छींकना स्थगित किया हुआ है ।उनकी नाक बेहद दवाब में है। नाक की साख दांव पर लगी है। वह छींकने के लिए उपयुक्त मौके और मुहँ पर रखने के लिए सही आकार के रुमाल की तलाश में हैं। उन्हें तो बस इवीएम के जिन्न के अधिकारिक तौर पर बाहर आने की प्रतीक्षा है। जिन्न दिखे तो वे उससे बेगार करवाने की शुरआत करें। मुफ्त का बिजली ,पानी ,झुग्गी ,कपड़े, लत्ते , कानून -व्यवस्था ,सुशासन आदि लाकर देने का आडर थमाएं ।
जीरो ऑवर में अटकी दिल्ली एक अदद चुनी हुई सरकार के लिए दम साधे शीर्षासन कर रही है।
@हिंदुस्तान के नश्तर स्तंभ में १० फरवरी १५ को प्रकाशित 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

हैंगर पर टंगा एंगर


असहमति दर्शाने के लिए आग़बबूला होने का चलन बढ़ता जा रहा हैl जिसे देखो वही किसी न किसी बात पर मुहँ फुलाए घूम रहा हैl अनेक  मुहँ गैस के गुब्बारे बनकर आसमान छूने को आतुर हैं l कुछ लोग तो मुहँ अँधेरे ही किसी न किसी बात पर सरकार पर गुस्साते  हुए उसकी घेराबंदी करते हुए मिल जाते हैंl यदि ठंड अधिक हुई  तो मार्निंग वॉकर क्रोधित हो जाते हैं l ब्रेड फफूंद लगी मिल गई तो ब्रेकफास्ट करने पर उतारू लोग कुपितl बच्चे की स्कूल बस देर से आई तो पेरेंट आपे से बाहरl नहाते समय गीजर से गर्म पानी आना बंद हो गया तो स्नानधर्मी नाराज़l किसी वजह से मुर्गा सुबह तय समय पर बांग देना और मुर्गी अंडा देने से चूक गई तो देर तक सोते रह जाने वाले  और आमलेटप्रेमी दोनों दुखीl और तो और आलू की कीमत घट गई तो लाल टमाटर ,अदरक और हरा धनिया  भाव खाने लगता है lमटर महंगी हुई तो मटर पनीर की रेसिपी को मूर्तरूप देने वाला खानसामा रूठ जाता है l
अब देखिए न ,उन्होंने  जरा कीमती परिधान क्या  धारण किए सादगी पसन्द लोगों की पूरी जमात अपनी- अपनी कमीजों में गांठ बांध कर एग्री यंगमैन में कन्वर्ट हो गईl विदेशी मेहमान ने उत्साह में भर कर जय हिंद की जगह जय हैंड कह दिया तो लोग नाराज होकर उसकी नीयत को आड़े हाथ लेने में जुट गएl मुल्क की नाक पर गुस्सा छींक बन कर अटका  हुआ  है lलेशमात्र के सर्द -गर्म से वह नज़ले के रूप में टपकने लगता  हैl
आजकल कुढ़न के सार्वजनिक प्रदर्शन  का देशव्यापी मौसम चल रहा है lमन की बात को मन में न रख कर उसके  कनकौए उड़ाने की  रुत है lदिल के डस्टबिन को समय - असमय  सतह पर जल्द से जल्द बिखेरते जाने  की  होड़ मची  हैl यह साफ़ सफाई का समय नहीं है वरन गंदगी को नयनाभिराम बनाने का वक्त हैl  सोशल मीडिया पर संतों ,असंतों और भक्तों के बीच गाली -गलौच का फ्रेंडली मैच चुटकुलों के जरिये पूरी हुड़दंग भावना से खेला जा रहा हैl आरोप प्रत्यारोप की  तर्जनियों  के जरिये विक्ट्री साइन   बनाये जा रहे हैंl दिल्ली में मतदान के परिणाम से पूर्व ही लोग हाशिए से उठकर मुख्य पटल पर आ रहे हैं और कुछ जो किसी दल की मुखमंडल की आभा बने हुए थे गुमनामी के  अँधेरे कोनों की ओर धकियाये जा रहे हैंl  लोग हारते -हारते एक ही पल में विजयी योद्धा की तरह अपने सिर पर मुकुट रख कर इतराने लगते हैं और अगले क्षण अपने लटके हुए मुहँ को हथेली पर टिका देते हैंl
ऐसी मारक स्थिति में आम आदमी के पास कमोबेश एक अदद हैंगर हैl उस हैंगर पर जिस पर कभी विवाह आदि समारोह में पहनने लायक पोषाक टंगी  रहती थी उस पर अब उसका ड्राइक्लीन किया हुआ एंगर  टांगा हुआ  हैl ये  मौके की तलाश में लगे  हैं और समुचित मौका मिलते ही जुबान पर गुस्सा और हाथ में हैंगर को तलवार की तरह लहराते हुए प्रकट हो जाते हैंl
दिल्ली के चुनावों में कोई जीते या हारे लेकिन यह तय है कि हैंगर पर लटका गुस्सा इसमें जरूर अपनी विजय गाथा लिखेगा l हैंगर पर राजनीतिक दलों  के मुकद्दर का छीका लटका हैl यह दिल्ली के अहोभाग्य से टूटेगा या बिल्ली की चालाकी के चलते ,यह किसी को नहीं पताl


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