गणतन्त्र और उसकी आभासी दुनिया


इस बार  सारे मुल्क को पता लगा कि हमारे यहाँ गणतन्त्र है  l एक अदद गणतन्त्र दिवस है  l सिर्फ वह है ही नहीं एकदम टेलरमेड स्वरुप में  है  lअपनी पूरी धमक के साथ है  l मिसाईल , टैंक , लोक की स्वरलहरी और जाबांजों करतबों की  सघन उपस्थिति  के बीच है  lवीवीआईपी ,वीआईपी और साधारणजन के मध्य सुरक्षित अंतराल में है  lलोकतंत्र की अनेक परतें हैं  l सबका अपना -अपना जनतंत्र है  l
राजपथ पर उल्लास दिखा  l सलीके से पूरी धज के साथ कदमताल दिखी  l बादलों से आच्छादित आसमान से पानी की बूंदों की शैतानी दिखी   l ठंड ने जनता ठिठुराया    l छातों ने अपनी  युगीन उपयोगिता का कौशल दिखाया  lबयान बहादुरों ने सोशल मीडिया पर  अपनी ‘विट’ को भरपूर प्रदर्शन किया  lराष्ट्रवाद जगह -जगह विभिन्न रूपों में ओवरफ्लो करता दृष्टिगोचर हुआ  l
रुक रुक कर बारिश हुई  lछाते बार –बार खुले और बार –बार बंद हुए  lकुछ लोग इसी काम मशगूल रहे  l जिनके पास सुविधा और विशेषाधिकार था ,उनके छाते कारिंदे संभालते  रहे  l जिनके पास यह  प्रिवलेज नहीं था वे उन दिनों को याद करके पछताते  रहे जब छाते उनके सिर पर खुद -ब -खुद खुल जाया करते थे  lतब उनके हाथ उन्मुक्त होकर ताली बजाते थे  lलोगों को डांट  डपट लिया करते थे l  वक्त जरूरत तर्जनी  का  शौर्य दिखा लेते  थे  l हस्त मुद्राओं के जरिये राजनीतिक वर्चस्व की हनक अभिव्यक्त हो जाती थी  l
गणतंत्र मेहमान द्वय के सान्निध्य में रहा   lमेजबानों ने  अपने आतिथ्य  में कोई कोर कसर उठा नहीं रखी   l वे मखमली रेडकारपेट की तरह जहाँ तहां बिछे रहे    lजो बिछ पाने में असमर्थ रहे वे मनमसोस कर इधर उधर लिपटे हुए धरे रहे  कि दैवयोग से इशारा मिले   और वे इतिहास के पन्नों में अपनी सुनहरी मौजूदगी की लेकर पसर जाएँ   l तब शायद मीडिया का  कोई कैमरा ज़ूम होकर उनकी कर्तव्यनिष्ठ इमेज को विश्व्यापी बना जाये   l
गणतन्त्र होने को तो हमारे यहाँ पिछले पैंसठ बरस से है  lस्कूल  कालेजों के प्रांगण , सरकारी अस्पतालों और कार्यालयों की छत पर ,रैनबसेरों की टिन की टप्पर पर और जिस तिस की दुकानों व दुछत्ती पर साल में एक दिन फहरते झंडे से पता लगता रहा है कि वह है  lहर शहर कस्बे में मुहँ अँधेरे निकलने वाली प्रभात फेरी और उसके बाद बंटने वाले लड्डुओं से उसके होने की पुष्टि  होती रही है  lइस दिन मुल्क के भर के माननीय देश भक्ति का अपनी समझ के हिसाब से पुनर्पाठ करते रहे हैं   lबच्चे आसमान मे तिरंगी पतंग को उड़ा कर अपने बचकाने  उल्लास के साथ उड़ाते हुए बिना जवान हुए सीधे बुढ़ापे की दहलीज तक पहुँचते रहे हैं  l
इस बार गणतन्त्र दिवस आया तो लगा कि वाकई वह आया है  lआ धमकने और आ पहुँचने  में किस कदर फर्क होता है  ? लोग आते हैं , बतकही की च्युंगम चबाते हैं और आ कर चले जाते हैं  l आने -जाने के साथ ही ठहरने की  एक अदा  होती  है  lआवागमन का अपना अभिजात्य होता है  lउसे स्मृति में संजोने लायक बनाने की एक टेक्नीक होती है  l गणतंत्र का होना  नहीं , इसका ठीक से पता लगना जरूरी है  lवह प्यार की तरह महज अहसास नहीं है जिसके होना न होना सदैव संशय में रहता रहे   l उसकी दैहिक उपस्थिति का आभास होना नितांत आवश्यक है  l
आभासी तंत्र का असल गणतन्त्र तो यही है  l



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