इंस्टेंट कामयाबी का शार्टकट


बरेली के बाज़ार में सिंघम और दबंग की  वेशभूषा में दो पुलिसकर्मी वाचिक शैली में हुदहुद करते  झुमका तलाश रहे थे कि तभी उच्च अधिकारियों की उन पर निगाह पड़ी और आननफानन में वे  निलम्बित कर दिए गए | उनके ऊपर आरोप है कि वह अपनी ड्यूटी के सम्यक निर्वहन की जगह अपनी -अपनी प्रेयसी को रिझाने के लिए  हीरोपंती में मशगूल थे | जबकि सच यह है कि वे किसी वीरोदत्त नायक की तरह  ऐसे निष्काम कर्म में लगे थे ,जिसके बाय प्रोडक्ट के रूप में उन्हें प्यार व्यार जैसी कोई चीज  मिलने की उम्मीद भर   थी |
हमारे मुल्क में अक्सर आम आदमी  शंकाओं के बीच जन्म लेता है  और पालने में ही  दबंग या सिंघम टाइप के किसी  महामानव में परिवर्तित होने का सपना देखता है | आम धारणा है कि फ़िल्मी पात्रों के अनुरूप  एकाध काला चश्मा ,थोड़े बहुत स्टंट और शारीरिक सौष्ठव को पा लेने  भर से बात बन जाती है  |एक बार ये नायकोचित खूबियां येनकेनप्रकारेण पा लीं जाएँ  तो  जिंदगी खुद-ब-खुद  मानीखेज़ बन जाती है  | इस मुल्क में नामवर लोगों के साथ  उनकी अनुकृतियों  की हमेशा  खूब डिमांड  रहती है  |
एक समय था जब रुपहले परदे पर औसत कद के और थुलथुल काया वाले एक सुपर स्टार प्रकट हुए थे |तब देश की नब्बे  प्रतिशत से अधिक युवक बालों के बीच की मांग संवार कर उनके रेप्लिका और लगभग साठ प्रतिशत युवतियां रातोंरात इन नक्कालों की  दीवानी बन गई थीं | ऐसा  इसलिए हुआ  कि सुपर स्टार जी  देहाकार ऐसा था कि उसकी  मिलती जुलती आकृति बनना बेहद सरल  था | सीधे सरल रास्तों पर हर कोई  पर्वतारोही  बनने का भरम पाल  ही लेता है | भगत सिंह ,चंद्रशेखर आज़ाद या बिस्मिल बनने में  बड़ा जोखिम है इसलिए उन जैसा बनने का कोई अनावश्यक ‘रिस्क’ नहीं उठाता  |
समय बदल गया है |इस समय सुनामधन्य हो या बाकायदा बदनाम हुए लोग , जनमानस को सामान रूप से प्रभावित करते  हैं | आजकल  ओरिजनल की डिमांड के साथ ही साथ रेप्लिका का भी भरापूरा मार्केट  है |ऐसी चीजों को बाज़ार हाथों हाथ लेता है | इनके समक्ष सामाजिक स्वीकार्य का कोई संकट कभी नहीं रहता |सदियों से आस्थावान महिलाएं मोहल्ले के आवारा टाइप लडकों  को रामलीला में  सीता मैया के अवतार में देख तब जार जार रोती आई हैं जब रावण का रूप धरे कोई दुर्जन  उनका अपहरण करने को उद्धत होता है |
वक्त तेजी से आगे बढ़  रहा है किन्तु  हमारे पास  प्रेरणादायक आइकन प्राय:  नाटकीय तत्वों   के जरिये ही प्रकट होते आये हैं | दबंग और सिंघम बनने के चक्कर में दो पुलिस वालों की नौकरी ही भले ही उलझ गई हो लेकिन उन जैसा बनने का क्रेज बरक़रार है  | ऐसी भी जानकारी मिली है कि कमीज के कॉलर में पीछे की ओर चश्मा अटकाने की स्टाइल का कॉपी पेस्ट करते करते अनेक  पुलिसश्री  अब तक ढेरों  चश्मों से हाथ धो चुके हैं | बहुत से  जांबाज़  अपनी बाइक और स्कूटर   आकाश मार्ग से उड़ाने की जुगत में अपने  हाथ  पैर की तुड़वा चुके हैं |
अब तक यह बात साफ़ हो चुकी है कि किसी का डुप्लिकेट बनने के रास्ते में बाधाएं बहुत हैं |यह काम जितना आसान दिखता है उतना है भी नहीं | इसके बावजूद किसी न किसी को कॉपी पेस्ट करने का उत्साह लोगों में बदस्तूर  कायम  है |
सबको यकीन हो चला है कि इंस्टेंट कामयाबी का शार्टकट अभी भी नक्कालों की पतली गली से ही होकर गुजरता है 

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