डिजिटल पड़ोसियों का आना

यह आकाशवाणी नहीं है।यह खबर ऊपर से आई है इसलिए सच ही होगी।वैसे हमें ये जमीनी सच नहीं पता कि सोलहवीं मंजिल पर एकाकी रहने वाली बूढ़ी महिला के घुटनों का दर्द आजकल कैसा है। बगल के फ़्लैट में रहने वाली आंटी अपने इकलौते बेटे के सीरिया में मार डाले जाने के बाद किस हाल में हैं।उन्होंने अब अपने जिन्दा बने रहने की कौन सी तरकीब इज़ाद की है। सोलहवीं मंजिल वाली बिल्डिंग की  लिफ्ट ख़राब हो जाने पर ग्राउंड फ्लोर पर फिजियो के पास सिकाई के लिए कैसे आती जाती होंगी।हम अपने पड़ोसियों की जिंदगी में  उसूलन नहीं झाँका करते। अच्छे भले पड़ोसी इसी प्रकार के होते हैं।
समय तेजी से बदल रहा  है।अच्छे दिनों की आहट महसूस की जा रही है। अफवाह और हकीकत का फ़र्क मिट गया है। इस अंतर पर लोग चिंतित भी नहीं हैं। देशभक्ति अमरीका आदि मुल्कों में रह रहे प्रवासी भारतियों के बीच ओवरफ्लो कर रही है।  कन्फर्म सूचना यह है कि फेसबुक, टि्वटर, गूगल, इंस्टाग्राम नाम के हमारे नए पड़ोसी  आये हैं। ये ब्रह्मांड के किस माले पर  रहते हैं ,यह तो नहीं पता पर हमारी कामनाओं के कबाडखाने में इनका आवास  है। इनके घर की ओर जाने वाले रास्ते हरदम चौपट खुले रहते हैं। ये किसी से पड़ोसी धर्म निभाने की कोई उम्मीद नहीं रखते। इनके पास आने जाने के लिए किसी औचारिकता की कोई जरूरत नहीं। दरवाजे पर खड़ा कोई गार्ड आगंतुक से उसकी  हैसियत की पूछताछ और जामा तालाशी नहीं लेता। और तो और जूतों में आतंकवादी की आईडी भी नहीं ढूंढता।
फेसबुक है तो समझो सब कुछ है।सब चाकचौबंद है।बगल वाले फ़्लैट में रहने वाले मंगतू का पूरा नाम भले ही ठीक से पता न हो पर बनाना रिपब्लिक की किसी गली कूंचे में रहने वाली मार्गरीटा के पालतू कुत्ते की दुम की तफ़सील का हमें ठीक से पता है। वह दिन में कितनी बार किसके सामने झबरीले बालों वाली पूँछ हिलाता है ,यह भी जानकारी है। अलबत्ता उसकी दुम सीधी करने वाला कोई उपकरण ऑनलाइन नहीं मिल पाया है। गाँव में रह रही मां के दमे का इलाज भले ही न करा पाते हों पर झुमरीतलैया के ओल्डएज होम में रहने वाला कब खांसता है, उसका हमें भली प्रकार मालूम रहता है।उसकी इस बीमारी को लेकर फीलिंग सेड हैश टैग डाल कर हम अपनी चिंता को जाहिर करने से कभी नहीं चूकते। सेल्फी ने तो इन नये डिजिटल पड़ोसियों के सहकार से जिंदगी को कितना नयनाभिराम बना दिया है।कोई भी मौका हो उसमें से सेल्फी के लिए जगह निकल ही आती है जैसे खचाखच भरी बस में बावर्दी सिपाही के लिए पसरने का माकूल स्थान।
ट्विटर ने तो कमाल ही कर दिया है। सुनसान बेनूर जीवन को नीले रंग वाली आयतित चिड़िया की चहचाहट से भर दिया। रोज की घरेलू चिक चिक को ट्वीट में तब्दील कर दिया ।पत्नियों के लिए पति से बात बात पर रूठ कर अबोला शुरू कर देने वाले  समयसिद्ध हथियार की धार कुंद हो चली है। पत्नी ट्वीट करती है – ऐसा कब तक चलेगा ? पति का ट्वीट आता है – जब तक ट्विटर एकाउंट हैक नहीं होता। पत्नी गूगल पर हैकिंग के गुर तलाशती हुई रूठना भूल जाती है।ट्विटर ने सारे पेचीदा मसले एक सौ चालीस कैरेक्टर में समेट दिए है।
व्हाट्स एप पर कॉपी पेस्ट वाली शेरो शायरी के जरिये बड़े से बड़ा झूठ बेहद मासूमियत के साथ बोल, सुन और देख लिया जाता है।गूगल की ओट में तमाम मूर्खतायें बड़े मज़े से सिर छुपा लेती हैं। इंस्टाग्राम भी कुछ न कुछ करता ही रहता है।
ये नये पड़ोसी क्या आये जिंदगी किस कदर आसान और ग्लोबल हो गयी है।

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