भगत जी ,जगत जी और मस्तराम की पकौड़ी


एक जगतजी हैं ,उनकी अरसे से समोसे की दुकान है lवह पूरे मनोयोग से परंपरागत समोसे तलते हैं lउनके लगे बंधे ग्राहक हैं lउनका काम ठीकठाक चल रहा है lउनके बनाये समोसे न कभी हॉटहिट साबित  हुए और न ही कभी सुपर फ्लॉप l
जगतजी जरा रूखी सूखी खाये कर ठंडा पानी पीव ' टाइप के हैं lवह पहले से  ऐसे ही हैं lउनके पिता भी लगभग ऐसे ही थे lलोगों का अनुमान है कि उनके पिता भी अमूमन इसी प्रकार के रहे होंगे lलब्बेलुआब यह कि वह जेनेटिकली ऐसे  हैं l
एक भगत जी हैं lउन्होंने उनकी दुकान के बगल मे दुकान खोल रखी है lवह भी समोसे बनाते हैं lउनके समोसे आकार में तो समोसे जैसे होते हैं लेकिन खाने में लगभग केक जैसे लगते हैं l वह कढ़ाई के खौलते घी में समोसे तलते नहीं बंद भट्टी में पकाते हैं lउनमें से केक जैसी गंध आती है lइसलिए वह  हॉट केक्स की तरह बिकते हैं lहालाँकि यह कहने वाले भी हैं कि यह समोसे नहीं उसके नाम कलंक है l इसलिए वो धड़ाधड़ बिकते हैं lइससे जगतजी को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उनकी संतति  को मार्केट में अपने पड़ोसी से यूं पिछड़ना मंजूर नहीं lवह रूखी सूखी खाने वाली  नहीं है l
वे  अपने पिता  से पूछ रही है  आप केक जैसे समोसे क्यों नहीं बनाते ?
-क्यों बनाऊ ? वह  कहते हैं  l
-क्योंकि उसका  माल  बिकता  है  l संतति का तर्क है  l
-उसके समोसे नहीं केक बिकते  है lसमोसे तो केवल मैं ही बनाता और  बेचता हूँ l उनका कहना है  l
संतति  जिद पर अडिग रही  उसने भगत जी वाले सोकाल्डसमोसे की रेसिपी कॉपी कर उस जैसे समोसे बनवाने की कोशिश की  l लेकिन हुआ यह कि लगे बंधे ग्राहकों ने भी उनकी दुकान से किनारा गए  l
तभी एक तीसरी दुकान उनके बगल में खुली – मस्तराम के मदमस्त समोसे l उसके समोसे सिर्फ अपने बाह्य रूप में समोसे हैं लेकिन  वह स्वाद में एकदम भांग की पकौड़ी जैसे  l ग्राहक उन्हें खाते ,चटखारे लेते  और मगन हो जाते हैं  l जगतजी भगत जी कह रहे हैं  यह समोसे नहीं उसके नाम पर निपट धोखा है l पर इससे क्या ? मस्तराम की समोसेनुमा पकौड़ी की मार्केट में खूब डिमांड  है  l
अब बाज़ार में सिर्फ मस्ती बिकती   है l  उसकी ‘शेप’ को कौन पूछता है ?





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