वर्डकप फ़ुटबाल में जर्मनी का जीतना

उस रात वर्डकप फ़ुटबाल का फाइनल मैच चल रहा था । दोनों टीम एक दूसरे पर गोल करने को जूझ रही थी ।  मुल्क के समस्त खेलबहादुर अपनी अपनी नींद से लड़ते हुए आँखें टीवी पर टिकाये जाग रहे थे । वे अर्जन्टीना की जीत का सामूहिक सपना देख रहे थे ।  उन्हें लग रहा था कि  अर्जन्टीना जीता तो मानो टीम इंडिया जीत जायेगी । मैसी के हाथ विजय की ट्राफी आई तो समझो उनके मोहल्ले से लेकर एन राजधानी  तक उनकी उम्मीदों की बुलेट ट्रेन पहुँच जायेगी । गाज़ा में इजराइली बमबारी रुक जायेगी । गरीब और गरीब बनने से बच जायेंगे । नुक्कड़ वाला पनवाड़ी पान में चूने की उपयुक्त मात्रा लगाना शुरू कर देगा । दूध वाला दूध में से पानी की मिकदार घटा देगा । रिश्वती बाबू एक काम रिश्वत लेकर करने के साथ दूसरा काम घटी दरों पर कर देगा ।

उन्हें लग रहा था कि जर्मनी की जीत हुई तो अनर्थ हो जायेगा । बेचारे मेजबान ब्राजील के जले पर नमक छिड़क जायेगा । नेमार को रीढ़ की हड्डी में लगी चोट के इलाज के लिए केरल आने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ेगा । सांभा डांस पर विश्व्यापी प्रतिबंध लग जायेगा । दिल्ली में धरने वाली सरकार काबिज हो जायेगी । घरेलू गैस के दाम दस रुपये प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ने लगेंगे । डीयू में एडमिशन की कटआफ सौ के आंकड़े को पार कर जायेगी । सरकार इनकमटैक्स में रियायत का फैंसला वापस ले लेगी । आम के खाने खिलाने पर देशव्यापी पाबंदी  लग जायेगी  । घर में एकसाथ अनेक मेहमानों का आगमन हो जायेगा । घर में काम करने वाली बाई बिना पूर्व सूचना के लम्बे अवकाश पर चली जायेगी ।  
मैच चल रहा था । गोलरहित मैच के चलते पूरे मुल्क के करोड़ों लोगों  की सांस बार - बार रुकी जा रही थी । कभी - कभी तो ऐसा भी हुआ कि जर्मन खिलाड़ी  गोल करने के  -लिए गोलपोस्ट के इतने करीब आ गए कि दिलों ने धड़कना स्थगित कर दिया । इटली के रेफरी ने सही समय पर सीटी बजाकर  लोगों को राहत की साँस दिलाई । इटली मूल के लोग होते ही गरीबनवाज़ हैं । इस बात को हमारे मुल्क से बेहतर भला कौन जानता है ।
मैच का निर्धारित समय गोलरहित पूरा हुआ । एक्स्ट्रा टाइम का खेल शुरू हुआ । तभी आशंका हुई कि अब अनहोनी घटित होगी । पुराने समय में जो बच्चे स्कूल समय में ठीक से नहीं पढ़ते थे वही एक्स्ट्रा टाइम में मनोयोग से  पढ़ते दिखते थे । उन दिनों इसी एक्स्ट्रा टाइम को दफ्तरी भाषा में बाबू ओवरटाइम कहते थे । इस ओवरटाइम की अवधि में कुंभकर्ण के मानसपुत्र कर्मठता का कीर्तिमान स्थापित करते थे । आखिरकार वही हुआ जिसका डर था । एक्स्ट्रा टाइम में ओवरटाइम करते जर्मन खिलाडियों ने वह कर दिखाया जिसका डर था । एक अल्पज्ञात जर्मन ने अर्जंटीना पर गोल दाग कर न जाने कितने दिलों को तोड़ दिया ।  मेजबान ब्राजील के हाथ से अपनी कटी हुई नाक और उसे  चिपकाने का मौका फिसल गया ।
जर्मनी जीत गया । उसके खिलाड़ी अपने हाथ में ट्राफी थाम कर जश्न मनाने लगे । हमारे मुल्क के लोगों को लगा फासीवादी का डरावना समय वापस आ गया है ।  उनके मुहँ सूख कर लटक गए । यह तो अच्छा है कि हमारे प्रगतिशील गहरी नींद में थे (वैसे भी ये लोग महत्वपूर्ण मौकों पर सोते हुए ही पाए जाते हैं ),वरना वे इतनी चीत्कार करते कि फीफा वालों को अपनी साख बचाने के लिए जर्मनी की विश्वविजय में से कोई बीच का सुनहरा गलियारा ( गोल्डन मीन पाथ ) निकालना पड़ता ।  
जर्मनी जीत चुका है और यह बात एकदम आफिशियल है । सबसे बड़े ताज्जुब की बात यह है कि सूरज आज भी पूर्व से ही निकला है ।

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