सब कुछ मिलता है !


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सब कुछ कितना आसान हो चला है । सुबह ठीक से हो भी नहीं पाती कि वाया मोबाइल गुडमार्निंग चली आती है । पेड़ों पर बैठे परिंदे दिन की पहली उड़ान के लिए पंख तौल रहे होते हैं कि बाजों के आसमान में आखेट के लिए मंडराने  की खबर सार्वजनिक हो जाती है । लोग मुहँ धोने की सेल्फी सोशल मीडिया पर चिपका कर वैचारिक क्रांति का बिगुल बजाने लगते हैं । क्षणांश में बगावती तेवर वाइरल हो जाते हैं । सब एक दूसरे को निहारते अपने –अपने काम में तल्लीन हो जाते हैं ।
ब्रेकफास्ट पर  लोग मक्खन को ब्रेड पर लपेटते हुए उसकी क्वालिटी और भूमि अधिकरण बिल पर चिंतातुर हो उठते हैं । लंच टाइम में रेहड़ी वाले द्वारा छोले बटूरे की फुल प्लेट के साथ दी जाने वाली मुफ्त प्याज की घटती मात्रा को देख कर रेलबजट पर  गहन विमर्श शुरू हो जाता है । शाम को दिन भर के सामाजिक सरोकार ट्रेफिक की रेड लाईट में अटक कर दम तोड़ने लगते  हैं ।  रात में  लाल डोरे वाली उन बत्तखों को याद किया जाता है जो दिन छिपे आँखों के सागर में तैरने को आतुर रहती  हैं ।
दिन सरलता से बीत जाता है । रात होते ही शुभरात्रि  नामक रात्रिचर अपनी कोटरों से निकल कर आभासी दुनिया की अँधेरी वादियों में पंख फडफडाने लगते हैं । लोग अनिद्रा (इनसोमनिया ) की समस्या पर स्टेट्स अपडेट और  चैट  करते -करते कब सो जाते हैं कि उन्हें खुद ही इसका पता नहीं लगता । अब सब कुछ इतना आसान हो गया है जैसे चार माह ही  पूर्व ट्रेन में  रिजर्वेशन करा लेना  । जैसे कोई अपने प्रोफाइल फोटो में रॉक स्टार का फोटो कॉपी पेस्ट करके  रातोंरात चाहतों की कारोबारी दुनिया का जगमगाता सितारा बन जाना ।
बाजार की अपनी गति  है ।  राजनीति की अपनी  स्टाइल  है । रेलगाड़ी की  चाल दुलकी  है । रेल बजट वर्गपहेली और सुडूकू के रीमिक्स की शैली में बनता  है । इसके पेश होने के बाद भी किसी को समझ में नहीं आता कि हुआ क्या । किस किसने इससे क्या पाया और क्या खोया ?  तभी तो विपक्षी नेत्री को कहना पड़ता है कि यह बजट तो हमारे वाले बजट की नकल जैसा है । एकदम निराशाजनक । सारी  कहन -सुनन चुटकुला –सा बन कर वातावरण में मुस्कुराहट घोल जाती है ।
दिन में रेल  बजट आता है और शाम तक वह बीत भी  जाता है । दूसरे बजट का इंतजार होने लगता है । एक से ब्रेकअप होता है तो दूसरे की तलाश आरम्भ हो जाती है । एक तोता पिंजरे से निकल कर चुपचाप रफूचक्कर हो जाता है तो उसकी खोज में घनचक्कर बनने की बजाय लोग दूसरा तोता बहेलिये से खरीद लाते हैं  । यह यूज एंड थ्रो का जमाना है । यहाँ  पैचअप नहीं , रिप्लेसमेंट होता  है ।  पुराने को डस्टबिन में फेंक कर नए को गले लगाना  कितना सुविधाजनक होता है ।  
रेल बजट आया तो  याद आया कि मेन बाज़ार के बरअक्स रेलगाड़ी का अपना हाट होता है । मुख्य बाज़ार के समानांतर एक और  बाजार चलता है । इस यायावर बाज़ार में सब कुछ मिलता हुआ सा लगता है और  बिकता है । यहाँ बिना रिजर्वेशन के सीट पर कब्जा बकायदा बेचा और खरीदा जा सकता  है ।  इसमें ताजा लगे पान से लेकर सैंडविच तक और चोखा बाटी से लेकर बर्गर तक सब मिल जाता है ।  
खचाखच भरी ट्रेन में वर्दीधारी सिपाही ,टीटी अथवा कुली को ले -दे कर सुविधा से लेकर धिक्कार तक सब कुछ बड़ी आसानी से मिल जाता है ।

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