जासूस नहीं रिसर्च स्कॉलर


उनके घर के आसपास जो टहलते मंडराते मिले थे ,उनके बारे में पक्की खबर यह है कि वे कोई जासूस -वासूस नहीं खांटी  एकेडेमिक रिसर्च स्कॉलर थे l वे यह पता करने आये थे कि राजनेता का निठल्लापन आम आदमी की  अकर्मण्यता से कैसे भिन्न होता  है l वे यह भी जानने  में लगे थे कि राजसी तफरीह के लिए कौन से नम्बर का जूता और कैसी पतलून या हॉफ पैंट मुफ़ीद रहती  है l उनकी उत्सुकता इस बात को लेकर  भी थी कि वे उस नीरो के मानस पुत्र बनने में किस हद तक  कामयाब रहे  हैं ,जो जलते हुए रोम को देख कर चैन ब्रांड की बांसुरी बजाया करता था l वे यह रिसर्च भी करने में लगे थे कि रोम वाले नीरो के मुकाबले इनका बांसुरीवादन कितना अधिक कर्णप्रिय साबित हो रहा है l
जासूस और रिसर्च स्कॉलर में बड़ा फर्क होता है l  सीक्रेट एजेंट  उन बातों को जानने में जान खपाते हैं जो ओपन  टाइप के सीक्रेट  होते हैं  l  अंडरकवर  जासूस  रहस्य पर पड़ा ‘कवर’  उठाते कम  हैं उसे जमींदोज करने  की कोशिश  अधिक करते   हैं  l  शोधक  पहले से सर्विदित  बातों को कुछ इस तरह से क्रमवार परोसते हैं , जिससे उनकी निजी विद्वता में चार चाँद लग जाते हैं  l वह पकाने से अधिक पके पकाए को सजाने में अपनी मेधा का अधिक उपयोग करते हैं l  दोनों में एक मौलिक समानता यह रहती  है कि वे काम कम करते हैं लेकिन उसे  करते हुए प्रतीत  अधिक होते  हैं l उनकी इस प्रतीति पर ही  राष्ट्रव्यापी विमर्श की शुरुआत  होती है l लम्बी बहसें होती हैं l  दोनों ही तरह के लोग अवांतर प्रसंगों की वजह से खुद को प्रासंगिक बनाते हैं l जासूस अपने कारनामों  की वजह से कुख्यात बनते हैं और शोधक लगभग उन्हीं कारणों के चलते  शैक्षिक प्रणाली के सुनामधन्य कर्णधार बन बैठते हैं l
अब तो यह भी रिसर्च के लिए उपयुक्त टॉपिक बन गया  है कि वे जहाँ शोध करते बरामद हुए थे ,वहां केवल शून्य पसरा था तो वे  आखिर उसमें क्या तलाशने की कोशिश कर रहे थे l  जानकार लोगों का तो यही कहना रहा है कि शून्य में तो केवल कविता बसती है l वे कवियों के एकाधिकार वाले क्षेत्र में अतिक्रमण करने गए ही क्यों थे ? उन्होंने यह दुस्साहस किया है तो बतौर  सजा सार्वजनिक निंदा ,छीछालेदर और प्रताड़ना के तो  भुगतनी ही होगी l  काव्यात्मक उलहाने और संत्रास का फल चखना ही होगा l क्या उन्हें यह  नहीं पता कि शोध प्रबंध लिखने के लिए इससे -उससे पूछताछ , इधर -उधर ताकाझांकी और  यहाँ -वहां टहलना नहीं मात्र गूगल सर्च , कट पेस्ट और रिसर्च गाइड की सेवा -टहल में  माहिर होना ही पर्याप्त होता है l केवल चापलूसी के जरिये भी अक्सर महान रिसर्च सम्पन्न हो जाती हैं l
कुछ नादान  शोधकों ने शर्लाक होम्स का  दत्तक पुत्र बन कर नाम और दाम कमाने के चक्कर में ‘बेचारी’ सरकार की जान नाहक ही झंझट में फंसा दी है  l इनकी नादानी पर एक अदद शोध का किया जाना तो बनता ही है l




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