यह भक्ति है, सब जानते हैं


देश एक है, मगर भक्त अनेक हैं। देश के होने की वजह विशुद्ध राजनीतिक है। भक्तों के होने का कारण भावनात्मक कम, धार्मिक अधिक है। कुछ भक्त सत्ता पाने के लिए देशभक्त टाइप के बने रहते हैं। ये लोग वक्त के हिसाब से अपने मुखौटे चुनते हैं। उनका देशप्रेम बेलौस होता है। बदलते समय के साथ उनका चाल, चरित्र और चेहरा बदलता रहता है। वे जब खुद को मुसीबतों में घिरा पाते हैं, तो भक्तिभाव से सुर, ताल और लय की परवाह किए बिना मजीरे बजाते हैं। वे अपनी देशभक्ति के आगे किसी अन्य की भावना को टिकने नहीं देते।
देश भौगोलिक रूप से भले ही स्थिर हो, लेकिन भक्तों की उसके प्रति निष्ठा पोर्टेबिल रहती है। वह उस मोबाइल नंबर की तरह होती है, जो खुद तो स्थिर रहता है, लेकिन कंपनी बदल जाती है। राजनीति में सिद्धांतों की पोर्टेबिलिटी का अजब सुख होता है। इसकी महिमा से स्वर्णिम मध्यमार्ग सहज उपलब्ध हो जाता है, और टकराव से बचाव हो जाता है।
देश कमोबेश वहां रहने वालों के दिल में बसता है। बसता है या नहीं बसता, यह बात तो कंफर्म नहीं है, लेकिन भावुक होने पर कहा यही जाता है। हालांकि यदि देश वाकई दिल में बसा होता, तो वह हमेशा संकट में रहता। इसलिए यह दिल में नहीं, हमारे स्वार्थी मुंह में स्वर्णिम नकली दांत की तरह आरोपित है। खीसे निपोरते हुए इसे दिखाया जाता है। इसी के जरिये राष्ट्रभक्ति के प्रमाणपत्र पर सत्यता की मुहर लगती है।
भक्ति रंग में सराबोर इस देश में तीन प्रकार के लोग रहते हैं। एक वे हैं, जो वाकई देशभक्त हैं, लेकिन लगते नहीं, क्योंकि उनके पास इसका कोई सुबूत नहीं। दूसरे वे भक्त हैं, जो जरा कारोबारी किस्म के हैं; ′जहां देखा तवा परांत, वहां बिता दी सारी रात′ टाइप के। तीसरे प्रकार के भक्त सिर्फ गाल बजाते हैं, और इस तरह बजाते हैं कि उनका दिलफरेब झूठ भी बिल्कुल सच जैसा लगता है।
इस भक्तिमय समय में देशभक्ति दिल की किसी धमनी में कटी पतंग की तरह फिजूल का शब्द बनकर अटक गई है।
निर्मल गुप्त

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