कोई पूछे तो मुद्दा क्या है !


मुद्दे बहुत हैं l आम आदमी की जिंदगी में कोई न कोई मुद्दा  रहता ही है l उसकी जेब भली रीती रहे लेकिन मुद्दों से भरपूर  रहती  है l उसकी ख्वाइश रहती  है कि कोई उससे जुड़े मुद्दों को  उठाये l लेकिन वे हमेशा धरे के धरे रह जाते हैं l जब मुल्क का समूचा विपक्ष भूमि अधिग्रहण कानून का मुद्दा कांधे पर उठाये राजमार्ग पर मार्च करता है तब आम आदमी किराये की खोली के लिए अपने सपनों में कदमताल करता है उसकी चिंता पैर के नीचे की जमीन खिसक जाने की नहीं ,अपने लिए सिर्फ पैर टिकाने लायक स्थान पाने की है l उसकी जद्दोजेहद बाद मरने के दो गज़ जमीन पाने की नहीं जिन्दा बने रहते हुए कमर टिकाने का ठिकाना पाने के लिए हैl  
राजनेताओं को सदा मुद्दों की तलाश रहती है l वे सदन के पटल पर मुद्दे किसी गुलदस्ते की तरह सजाते हैं l मौका मिलने पर उन्हें हवा में लहराते हैं l बड़े बड़े बयान देते हैं l  मेज पर रखे मुद्दों को अलटते -पलटते हैं l वे इन्हें किसी कुशल खानसामे की भांति रोटी की तरह सेंकते हैं l  मुद्दा हाथ आ जाये तो उसे सीने से लगा कर रखते हैं l उनका पुनर्पाठ करते हैं l सरकारें  मुद्दों को  हमेशा विज्ञापनी पंच लाइन बना देती हैं  l इस तरह मुद्दे मुद्दे न रह कर ‘अपने मुहँ मियां मिटठू’ टाइप स्तुतिगान बन जाते हैं l
मुद्दा कोई भी हो लम्बे समय तक मुद्दा नहीं रह पाता l उसका स्वरुप बदल जाता है l मुद्दे द्रव सरीखे होते हैं जिस आकार के पात्र में रखे जाते हैं वैसे ही बन जाते हैं l रोटी ,कपड़ा और मकान से जुड़े शाश्वत प्रश्न चुटकुले या मारक वनलाइनर बन जाते हैं l सोशल मीडिया पर इन विषयों पर अनवरत विमर्श चलता है और लाइक्स से शुरू होकर  कमेंट्स के क्लाइमैक्स पर  निबट  जाता है l  मुद्दे फिर भी कभी खत्म नहीं होते l वे बने रहते हैं l
सदन में लोग मुद्दे उठाते और उठवाते रहते हैं l विपक्ष हर मुद्दे को भुनाता है l सरकार हर मुद्दे पर भुनभुनाती है l अपनी फ़ाइल में से नए -नकोर मुद्दे उठा लाती है l जोरदार बहस करवाती है l हाल ही में पता चला कि सदन के भीतर शाम के समय सक्रिय हो जाने वाले मच्छर भी एक मुद्दा हैं l वे राजनेताओं के कान पर बैठकर घुन्न -घुन्न करते हैं l मच्छर चाहते हैं कि वे भी राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनें l  सदन वाले मच्छर  किसी भी रासयन से डर कर भागते नहीं l हर हाल में मौजूद रहते हैं l इन्हें आप चाह कर भी नजरंदाज़ नहीं कर सकते l कहा तो यह जाता है कि मुद्दे हैं तो सदन है l सदन है तो लोकतंत्र है l लोकतंत्र है तो मच्छरों का वजूद है l मच्छर हैं तो उनके दंश की आशंकाएं हैं l
गरीबों  के लिए असल मुद्दा उनकी भूख है लेकिन उनके इस मुद्दे को उठाने वालों के लिए यह वक्तकटी और  वोट बैंक की चाभी है  l यही वह चाभी है ,जिससे गरीब का पेट तो नहीं भरता पर नेताओं के मुकद्दर पर लगे  ताले खुल जाते हैं l
फिर भी आजतक किसी को  समझ में नहीं आया कि असल मुद्दा क्या है l





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