पॉर्न में हटा बैन अब चैन ही चैन



यह उस समय की बात है जब पॉर्न के अधिकांश कोनों पर सरकारी ताला लटक चुका था और मैं हस्बेमामूल उसकी मास्टर की को ढूँढता हुआ हरिभजन सुन रहा था। उदास आदमी बाय डिफॉल्ट भक्तिभाव से भर जाता है।  तभी कमरे के दरवाजे पर हलचल हुई।  मैंने आननफानन में गूगल सर्च से पॉर्न के  कीवर्ड को दिव्यात्मा से रिप्लेस किया।  यह करने के बाद मैं संभल पाता कि हाथों में किसी चैनल का माइक संभाले अपने कुछ गुर्गों के साथ एक सुदर्शना धम्म से कमरे में नमूदार हुई।  उसने अपने हाथ में माइक इस अंदाज़ में थामा था जैसे पुराने ज़माने की खामोश कॉमेडी फिल्मों का ओवरसाईज जूता पहनने वाला विदूषक डॉक्टर का रोल करता हुआ बड़े आकार की सिरिंज लेकर आता और मरीज़ संभल पाए इससे पूर्व ही उसके नितम्ब को भेद देता था।  तब मरीज़ कराहता था और थियेटर में बैठे दर्शक हो हो करके हँसते थे।  उन दिनों पराई तकलीफें प्रहसन बनती थीं।  आज तक परपीड़ा में आनंद का भाव कालजयी है।
सुदर्शना एकदम मेरे इतने समीप आ गई कि उसकी साँसों की गमक से पता लगने लगा कि बंदी ने ब्रेकफास्ट में किसी लहसुनिया व्यंजन का सेवन किया है और काम पर पहुँचने की जल्दबाजी में टूथपेस्ट का इस्तेमाल करना भूल गई है।  मैं उसे मुख और दांतों के हाइजीन पर ताकीद करता कि उसने अपने माइक को मेरे मुख से अड़ाते हुए पूछा : आपके कम्प्यूटर में पॉर्न है ?
-नहीं ,इसमें वायरस है।  मैंने कहा।
-कौन सा वाला ? उसने अगला सवाल दागा।
-वही, जिसके जरिये बिना कुछ करे धरे हमारी निजता वायरल हो जाती है।
-मतलब?
-मतलब यह कि वायरस सरकार से अधिक पावरफुल है। सरकार अडल्ट कंटेंट पर पाबंदी लगाती है ,वह उसे इस तरह हमारे नाम से फैला देता है कि उसे हमारे सिवा हर कोई देख पाता है।
-सीधा जवाब दो।  तुम्हारी मेमोरी में पॉर्न है ? उसकी आवाज़ सख्त थी।
-जी नहीं ।  उसमें पॉर्न तो क्या पॉपकॉर्न भी नहीं है।  शयद कुछ कुकीज हों।  मैं डाइबेटिक हूँ इसलिए कुकीज से दूर रहता हूँ।  मैंने बात स्पष्ट की।
-तब तुम रात दिन ऑनलाइन रह कर करते क्या हो? मुझे उसके इस प्रश्न में छुपा जासूस दिखा। मैं समझ गया कि इसके हाथ में जो उपकरण है वह माइक या सिरिंज नहीं ,डॉक्टरी स्टेथोस्कोप है,बीमारी परखने के लिए?
-वही करता हूँ जो काम पूरे मुल्क के चमगादड़ और बौद्धिक करते हैं। मैंने लम्बी सांस फेफड़ों में भर कर अपनी बौद्धिकता की भनक दी।
-चमगादड़ तो उलटे लटकते हैं। आप क्या करते हैं? उसने जिरह की।
-हम भी अन्य बुद्धिजीवियों की तरह कम्प्यूटर से उलटे लटक कर चिंतन करते हैं। उलटे लटकने से सोच प्रगाढ़ होती है। मैंने जानकारी दी।
इतना सुनते ही वह समझ गई कि वह गलत जगह पर आ गई है। उसने पुरजोर आवाज में कहा- लैट्स गो ।  उसने यह निर्देश कुछ इस तरह से दिया जैसे कमांडर अपनी पैदल सेना कदमताल का निर्देश देता है। वे अपने उपकरण सँभालते हुए चल दिए।  
-कहाँ ? मैंने सहमते हुए पूछा।
-कहीं नहीं।  तुम यहीं बैठो। जब पॉर्न मिल जाये तो बताना। उसने कड़क कर कहा।
- जी ….. मैंने कहा।  उसकी बात मैं समझ नहीं पाया । हालाँकि तब मैं कहना तो ‘हम्म’ चाह रहा था लेकिन हडबडाहट में मुहँ से सिर्फ ‘जी’ निकल पाया।  नाज़ुक मौकों पर अकसर मैं ऐसे ही चूक कर बैठता हूँ।
वह धडधडाती हुई चली गई।  मेरा घर किसी पुल के आसपास बना होता तो मैं कहता –वह किसी रेल सी गुजरती है /मैं किसी पुल स थरथराता हूँ।
वह चली गई।  तभी व्हाट्स एप पर खबर आई।  पोर्नोग्राफी से बैन हटा।  
अब चैन ही चैन है।  अब मैं बेख़ौफ़ कह सकता हूँ कि मेरे कम्प्यूटर में तो जाने क्या क्या अगडम सगड़म रहता है,उसे तो जब चाहो ब्लॉक कर दो ,लेकिन हमारी स्मृति में तो  यकीनन अतृप्त लालसाओं और कुंठाओं का स्थाई वास है।उस पर कोई प्रतिबंध लगे तो बात बने !

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