पश्चताप , नैतिकता ,रत्नजड़ित सिंहासन और काठ की खड़ाऊँ ,,,,,


नौ महीने कम नहीं होते ।  इतनी अवधि में क्या से क्या हो जाता है ।  नव संतति का जन्म हो जाता है । घर का सूना आंगन  किलकारी से भर उठता है । राजनीति में इतने समय में पश्चताप पूरा हो जाता है । प्रयाश्चित  पछतावे में बदल जाता है ।  जनसेवा के लिए मन मचलने लगता है । पहले से सेवाकार्य में तल्लीन लोग  इस मौके को हाथ से निकलता देख बेचैन हो उठते हैं  । उनके हाथों से उम्मीद  के तोते उड़ जाते हैं । विकासोन्मुखी ठेकेदारों का सुशासन  पाला बदल लेता हैं । हाहाकार मच जाता है |
नैतिकता के आधार पर स्वेच्छा से पद का त्याग बड़ा आसान होता है ।  छोड़े गए पद को  दुबारा पाना   जटिल होता है ।  इसके लिए  पापड़ बेलने पड़ते हैं । नाक बचाने की खातिर उससे लोहे के चने चबाने पड़ते हैं । नाक के चोटिल हो जाने के भय से नए सिरे से जनता के सामने क्षमा याचना के रूप में उसे रगड़ना पड़ता  है । जनता को यकीन दिलाना पड़ता है कि वह आगे से कभी  इस्तीफे नामक नामाकूल लफ्ज़ का इस्तेमाल तक नहीं करेंगे। कुर्सी से अपने को ऐसी  गोंद से चिपकायेंगे जिसका लगाया जोड़ किसी भी झंझावात में खुलता नहीं ।
नैतिकता एक जादुई शब्द है । यह सत्ता की राजनीति का वह कालू जादू है जिसमें जरा सी चूक होने पर प्राण का संकट उत्पन्न हो जाता है । यह सिर्फ कहने - सुनने के लिए सुदर्शन ध्वनि है । यह हाथी का दांत है जिससे कुछ भी खाया या पाया नहीं जा सकता । यह नंगे राजा का वह परिधान  है , जो किसी मासूम बच्चे की साफगोई से तार -तार हो जाती हो जाता है ।
राजनीति की म्यूजिकल चेयर के खेल में कुर्सियां कभी खाली नहीं रहतीं । उनपर लगातार कोई न कोई पसरता    रहता है । चेयर पर आसीन होने की जुगत में  अच्छा भला आदमी चेयर कुमार बन जाता है। चेयर का अपना प्रभामंडल होता है ।  यह सनातन खेल निरंतर चलता है ।  दिग्गज  से दिग्गज खिलाड़ी भी  कुर्सी पर बैठने के चक्कर में धकिया दिए  जाते हैं ।  
कुर्सी जब रत्नजड़ित  सिंहासन में तब्दील होती है तो उसका अपना तिलिस्म स्वत: ही निर्मित  हो जाता  है । इस पर आसीन होते ही आदमी तो आदमी काठ की खड़ाऊँ तक बड़ी वाचाल हो जाती हैं । इसमें जड़ित पुतलियाँ इतिहास का पुनर्पाठ करती  हैं । इस बात को जो समझने में भूल करता है उसे भूल सुधार करने में कड़ी मशक्कत करनी  पड़ती है ।

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