जुबान की फिसलन का मैकेनिज्म और क्षमा याचना का अनुष्ठान


मुहँ में जब आइडियोलोजी  के मलाईदार लड्डू भरे हों और अपने मन की  बात कह कर लाइमलाइट में आने की जल्दबाजी  हो तब अमूमन आदमी वो सब कह जाता है जिसे जुबान का फिसलना कहा जाता है lसड़क पर पड़े केले के छिलके पर पैर फिसल जाये तो उसके सिवा जो धराशाही हुआ होता है सब हँसते हैं lयह हंसी हालाँकि लापरवाही पर सटीक व्यंग्य होती है लेकिन इसका शुमार विशुद्ध व्यंग्य में होता हैl यही वह संधिस्थल है जब केले का छिलका ,मलाईदार लड्डू ,हास्य और व्यंग्य सब एकजुट होते दिख जाते हैं l
राजनीति में किसी न किसी की जुबान के बेकाबू होने का सिलसिला चलता ही रहता है lइसी फिसलन के जरिये टीआरपी पर निगाह गड़ाये रखने वाले मीडिया को मनोवांछित बाईट मिलती है l  वह इसे  प्रोफेशनल आलोचकों के साथ  मिल बाँट कर चटखारे लेकर कुतरता है  lइससे ही जीवन में विकासोन्मुखी  परोपदेशी  नारों  से उपजने  वाली एकरसता टूटती है l लोगों को लगता है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि कामधाम भले ही ठीक से न कर पा रहे हों लेकिन अपने गालों के  ढपोरशंख को  बजा बखूबी रहे हैं l
जुबान के फिसलने का अपना आनंद होता है lइससे बिना पचे लड्डूओं की मिठास सतह पर आ जाती हैlउदर में सिर्फ उतना ही मीठापन अवस्थित हो पाता है जितना उर्जावान बने रहने के लिए जरूरी होता है lशेष बाहर आ गिरता है lराजनीतिक पटल पर खुद को केन्द्र में रखने का यह वो मैकेनिज्म है जिससे शुगर के अधिक्य से शरीर का बचाव  होता है और स्वास्थ्य के लिए कोई गम्भीर खतरा पैदा नहीं होता lतिस पर वक्त -जरूरत क्षमायाचना टाइप अनुष्ठान  भी कर लिया  जाये तो उससे उदारमना होने की खबर  सार्वजनिक हो जाती है lयानि सांप भी मर जाता है और  मारने वाले की सहिष्णु और अहिंसक छवि भी बरक़रार रहती  है l
वैसे रोजमर्रा की जिंदगी में भी यह फिसलन बड़े काम की होती है l जब जी चाहा थोड़ा इधर- उधर बहुत भटक लिए और फिर तफरीह करके लौट आये अपने  पूर्व स्थान पर l 
जुबान को फिसलाने का यह  काम थोड़ा जोखिम भरा तो जरूर है लेकिन है बड़े काम का l 
निर्मल गुप्त 

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