पॉर्न की विदाई और नए कोडवर्ड की तलाश


पॉर्नग्राफी साइट्स को सरकार ने ब्लॉक करना शुरू कर दिया है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। पर अभिव्यक्ति के आज़ादी के रणबांकुरे इस पर चुप हैं। वह इस पर फासीवादी ताकतों का काला कारनामा टाइप जैसी कोई बात जोरशोर से कहना तो चाह रहे हैं लेकिन कहते हुए लजा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि यदि वे इस पर अधिक मुखर होंगे  तो बात जरा ज्यादा दूर तलक जायेगी। लोगों को  तो हर बात पर अटकल लगाने की लत हैं। ऐसे कयासों से बनी बनाई उज्ज्वल छवि धूल धसरित हो जाती है।
इंटरनेट जनित दुनिया में ‘माउस’ की सत्ता होती है।  इसके किलकने भर से न सिर्फ मित्र अमित्र बन जाते हैं वरन सारा परिदृश्य ही रूपांतरित हो जाता है। जब तक पॉर्न सहज उपलब्ध था तब तक ये दुनिया किस कदर सनसनीखेज़ और उदार लग रही थी। यहाँ सब कुछ उपलब्ध दिखता था। लगता था कि दिव्य अशरीरी प्यार के बरअक्स दैहिक प्रेम के प्रदर्शन और इज़हार का चौबीसों घंटे और प्रतिदिन खुलने वाला सुपरमार्केट खुला है। तमाम वर्जनाओं की मौजूदगी के बीच ऐसे गोपनीय गलियारे हैं जिनमें आदमी अपनी इमेज को धूमिल होने के अपराधबोध के  बिना निर्भीक होकर आ जा सकता है।
पॉर्न की नेट से सम्पूर्ण विदाई की आशंका ने बता दिया है कि टेक्नोलॉजी से बड़ा कोई विचार नहीं। तकनीक वह लाठी है जिसके हाथ में होती है उसकी सिर्फ भैंस ही नहीं तमाम अवधारणायें बाय डिफॉल्ट उसकी हो जाती हैं। भैंस तो जिस खूंटे से जा बंधेगी वहां दुही जायेगी। जिसका भैंस पर एकाधिकार होगा वह उसके दूध की कीमत तय करेगा।
पॉर्न जा रहा है। इसकी कुछ नायिकाओं ने समय रहते अपने लिए नए ठिकाने ढूंढ लिए हैं। बदलती तकनीक के साथ नैतिकता जैसे शब्द चपटे हो गए हैं और जीवन मूल्य वही सार्थक बचे हैं जो चटपटे हैं। वह वक्त गया जब ऊँची दुकानों के फीके पकवान बिक जाते थे। अब वही बिकाऊ है जो अपने बाह्य स्वरुप में दिखाऊ है। हलवाई की दुकान के वही पकवान बिकते हैं जिसके पास ग्राहक के रूप में स्थाई खाऊ हैं। पोर्नोग्राफी के हाट पर उत्तेजक व्यंजन दिखते रहे हैं।  ये नज़ारे जब न होंगे तब इसके लिए कुछ चोर दरवाजे तलाशे जायेंगे।अलीबाबा के ज़माने से गोपन दरवाजों के खुलने के लिए कूट शब्द इज़ाद होते रहे हैं।
एक कोडवर्ड निरर्थक हुआ तो क्या नया कोडवर्ड उसकी जगह रीसैट हो जायेगा
@निर्मल गुप्त  


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