बहस : सेक्युलर मुल्क का राजधर्म


समय तेजी से बदल रहा है। परस्पर संवाद का अंदाज़ और टोन बदल रही है। राजनीति के सर्वोच्च पटल पर इतना शोरोगुल रहा कि जनता को पूछना पड़ा रहा कि हंगामा है क्यूँ बरपा ? ये लोग ‘जनहित’ में एक दूसरे से इतना उलझ क्यों रहे हैं ? लोग यही समझे पा रहे हैं कि वे निजी कारणों से संघर्षरत हैं। वैसे भी राजनीति और इसके तहत होने वाली डिबेट में निजता जैसा कुछ बचा नहीं है। सब गडमड हो गया है। सरकार बहादुर इतनी तेजी में हैं कि जो सवाल यहाँ मुल्क के भीतर उठते हैं ,वह उसका जवाब यूएई में देते हैं। वह बहस में नहीं उलझते सिर्फ अपनी बात कहते हैं। उनके एकालाप पर तालियाँ पिटती हैं। प्रलाप से लोकप्रियता बढ़ती है।
डिबेट में कटुता होती है। विद्वता के अतिरेक का दर्शन होता है। सामने वाले को नीचा दिखाने का उपक्रम होता है। जिसके भीतर जो होता है , वही परोसता है। तर्क- दर -तर्क रखते हुए मुहँ लाल सुर्ख हो जाते हैं। गला सूखने लगता है। फिर भी शास्त्रर्थी पानी  की घूँट तक नहीं पीते हैं। उन्हें आशंका रहती है  कि उनके ऐसा करने से बहस की नैतिकता का भंग होना न मान लिया जाये। लोग कहेंगे कि वह तर्क वितर्क की बजाय पानी पी- पी कर कोस रहा है। आजकल की बिल्लियाँ  शिकार पकड़ पाने में असफल होने पर खिसिया कर खम्बा नहीं नोचती। वे मुहँ नोचने के लिए सही मौके तलाशती हैं।
यह खिसियाने का समय नहीं है। यह एकालापी  प्रपंच काल है। आरोप का जवाब प्रत्यारोप है। कद्दावर दिखने के लिए बौनों की सोहबत अपरिहार्य है। इतिहास के काले पन्नों का विज्ञापन वक्त की जरूरत  है। मांग के हिसाब से इतिहास में मनभावन रंग भरे जाते हैं। सास बहु वाली पारंपरिक भाषा का जमकर राजनीतिक इस्तेमाल होता है। साप्ताहिक पैंठ वाली किचकिच शैली सर्वमान्य है। मोलभाव का अर्थशास्त्र है। रैपर की महत्ता है। दिखावे से बाजार भाव तय होते हैं।
मानसून सत्र का सत्रावसान हुआ। उसे तो होना ही था। बिना कोई सार्थक कार्यकलाप  हुए मुल्क की हर समस्या धुल गई। बरसों से ऐसा ही होता आया है। एक बूँद धरती पर गिरे बिना सदन का गरिमामय तन तरबतर हो  गया। बहस में सबने एक दूसरे  की कमियों खामियों का खूब बखान किया। ऐसा करते हुए पुरखों को भी सलीके से याद कर लिया गया।
कोई कह रहा है कि यह चुल्लूभर पानी में डूब मरने जैसा प्रसंग है। उन्हें नहीं पता कि राजनीति में इस तरह जीना मरना नहीं होता। हर काम के लिए बहस का प्रावधान है। बहस  से पहले हल्लाबोल होना जरूरी है। बहस के बीच टोकाटाकी करने की इजाज़त है। चुल्लू भर पानी से कुछ नहीं होता ,डूबने उतराने के लिए गहरे पानी की दरकार होती है।
हमेशा से लोकतंत्र इसी तरह से पुष्पित और पल्लवित होता रहा  है। पर्याप्त खाद पानी मिले बिना यह पनपता रहता है। वह अमरबेल है। देश का क्या ,वह तो सदा रामभरोसे चलता आया  है।
एक सेक्युलर मुल्क का यही राजधर्म है ,जिस पर कोई बहस नहीं।











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