बाजार का गिरना


बाज़ार के धडाम से गिर जाने की खबर है।  यह बात अर्धसत्य है। वह किसी मासूम आदमी की तरह काई पर फिसल कर नहीं गिरा।  वह बड़ी तामझम के साथ सलीके से गिरा है।  उसके  गिरने में नियति का कोई लेना देना नहीं ।  वह पूर्वनियोजित तरीके से धराशायी हुआ है।  वह मुहँ के बल नही गिरा।  उसने अपने चेहरे का क्षत-विक्षत होने से बचा लिया है।  या कह सकते हैं कि उसको  इसी तरह से गिरने के लिए प्रोग्राम किया गया था।  यह एकदम प्रायोजकीय आयोजन है।  प्रयोजकीय बोले तो स्पांसर्ड।  उसी तरह से विज्ञापनीय जैसे कोल्डड्रिंक से गला तर होते ही भय के आगे जीत का प्रकट हो जाना।
बाजार को पता था कि एक दिन उसे गिरना है।  उसे अपनी भूमिका का अच्छे से पता है।  एक एक डायलाग कंठस्थ है।  जो गिरता है ,उठता भी वही है टाइप का।  जब घटाटोप अँधेरा होता है तब उजाले की उम्मीद सबसे प्रबल होती है।  जो कभी चारों खाने चित नहीं हुआ उसे क्या पता कि हारने का दर्द क्या होता है।  बिना पराजय के विजय का कोई मतलब नहीं होता।  बाजार का अजब  दर्शन शास्त्र है और गजब जिंदा बने रहने  का अर्थशास्त्र।  इसका अपना प्रभामंडल होता है और धूलधसरित होकर उबरने की रणनीति।
बाजार कहता है कि आओ और मुझमें समाहित हो जाओ।  भरी जेब लेकर आओ और उसे मुझ पर न्योछावर कर रीती  जेब चले जाओ।  खूब शॉपिंग करो और यहाँ शोकेस में सजी हर अंडबंड चीज को खरीद कर ले जाओ।  खाओ पियो और जश्न मनाओ।  उत्सवप्रिय बनो और मौज मस्ती में डूबो उतराओ।  जेब यदि रिक्त हो  जाए तो फ़िक्र न करो ,खूब कर्ज लो मगन होकर जीवन का जश्न मनाओ।  तमाम महाकवियों और शायरों ने कर्ज की उपदेयता के बारे कसीदे यूहीं नहीं काढ रखे हैं  हैं।  कर्ज लेने से कर्ज देने वाले का भला होता है।  जो इसे दिलवाता है, वह भी अपनी क्षमता भर इसमें अपनी चोंच डुबो लेता है।  कर्ज के घी से बने व्यजंनों से सेहत सुधरती है और इससे क्रय की मय से सुरूर और कालजयी शायरी प्रकट होती है।  कर्ज की नकदी से बाज़ार पनपता है।  इसके प्रताप से दलाल पनपते हैं।  यह अलग बात है कि कर्ज की वजह से बाजार झटका खा जाता है।  गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में ---वाली स्प्रिट हो तो कहना पड़ता है कि यह गिरना भी कोई गिरना है लल्लू।  
बाज़ार अल्लूओं -लल्लुओं के चिंतानिमग्न होने से नहीं चलता।  वह अपनी गति से चलता है।  बिलकुल घड़ी की सुईं की तरह, गोलाकार।  निरंतर उठता  और उतराता  हुआ।  पेंडुलम की तरह इधर से उधर डोलता हुआ। यहाँ वही चलता है जो बिकता है।  यहाँ पालतू रचनात्मकता चलती है फालतू लोगों को यह बुहार कर यह तुरंत हाशिए पर धरे डस्टबिन में डाल देता है।  अपने गिर पड़ने की स्थिति में यह किसी को स्यापा करने की इजाज़त नहीं देता।  रुदालियों के लिए इसके यहाँ कोई स्पेस नहीं है।  बाज़ार हर हाल में बिंदास रहता है।
बाज़ार में अप्रत्याशित ढंग से कुछ घटित नहीं होता।  दलाल स्ट्रीट पूर्वानुमान के तहत चलती है।  निवेशक की पूँजी डूबती है तो ब्रोकरों की झोली तब भी भरती है।  बाज़ार की एक जेब के नीचे अनेक जेबें होती हैं।  एक जेब में सुराख़ होता है तो पैसा टनटनाता हुआ दूसरी जेब में जा गिरता है।  किसी का कुछ खोता है तभी दूसरा कुछ हांसिल करता है।  सही मायनों में यह गिरना और उठना एकदम नाटकीय होता है।
देखते रहें ,गिरा हुआ बाज़ार कर्ज में मिली उम्मीद के जरिये देखते ही देखते फिर उठ कर खड़ा हो जायेगा।  


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