उलटा-पुलटा और बल्लीमारान वाली बात

मैं वार्निंग वॉक के चक्कर में लगभग घिसट रहा था।वैसे तो मैं दुलकी चाल चल रहा था। देखने वालों को भी शायद ऐसा ही लग रहा हो।पर मुझे असलियत का पता था।मैं भी उन हज़ारों बुद्धिजीवियों जैसा हूँ ,जिन्हें यथार्थ का बोध तो होता है लेकिन वो उसे अभिव्यक्त नहीं करते।वो तब कोई बात खुल कर कहते हैं जब आसन्न खतरा टल चुका होता है।वे किशोर वय में हुए प्यार का इज़हार तब करते हैं जब उनके सीनियर सिटीजन बनने की बाकयदा मुनादी हो चुकी होती है।हम आदतन चिड़ियों द्वारा खेत चुग जाने के बाद पूर्ण मनोयोग से ‘हुर्र हुर्र’ करते हैं।
मैं वाकई थक चुका था इसलिए तेज़ कदमों से चल रहा था।तेज़ पदचालन की कोई धार्मिक या मेडिकल वज़ह नहीं थी।मैं तो सिर्फ थकन से उपजी ऊब से जल्द से जल्द निज़ात पाने की कोशिश कर रहा था। मार्निंग वॉक का यह अनुष्ठान खत्म हो और मैं काउच पर पसर कर देश दुनिया के मसलों पर ढंग से चिंतन कर सकूँ।मैं अपने कम्फर्ट ज़ोन में ही कुछ सोच पाता हूँ।
मेरे लिए मार्निंग वॉक ठीक उसी तरह से और उतनी ही मिकदार में बाध्यकारी है, जिस तरह से बीट कांस्टेबल का आती-जाती रिक्शाओं के हुड पर अपना डंडा फटकार कर चौथ वसूलना।।जैसे परचुनिए द्वारा नौकर से सुबह दुकान खोलते ही मिर्च की खाली बोरियों को फटकार कर तह लगावाना।जैसे दफ़्तर के बाबू के लिए क्लोज़सर्किट कैमरे की निगरानी में मनमसोस कर काम करना। इसके बावजूद कुछ न कुछ ऐसा जरूर है कि सुबह-सवेरे वॉक पर जाना धीरे-धीरे पान मसाले जैसी लत बनता जा रहा है।
पर मुल्क का हर मार्निंग वॉकर मेरे जैसा नहीं है।मसलन मैं वॉक करते हुए चुपचाप रहता हूँ जबकि अधिकांश लोग इस समय का सदुपयोग खुलेआम प्रभु के सुमरन में करते हैं। इतने पुरजोर तरीके से राम का नाम लेते हैं कि पेड़ों पर बैठे अलसाये पक्षी बिना पंख तौले खुले आसमान की ओर रुख कर लेते हैं।सड़क के किनारे अंगड़ाई लेते कुत्ते चौकन्ने होकर भौकने लगते हैं।भले ही इन लोगों के बगल में अदृश्य छुरी रहती हो पर मुँह पर रब का जिक्र ही रहता है।हो सकता है मैं भी अपनी चुप्पी के बीच कोई बगावती ख्याल पकाता हूँ।
मैं मॉर्निंग वॉक उसी तरह से करता हूँ ,जिस तरह से लोग अमूमन सदियों से करते रहे हैं। हर बढ़ते कदम को उँगलियों पर गिनता और उनका योग जीने लायक उम्र में करता हुआ।गुज़रे हुए वक्त को रिकॉल करने का यह सनातन तरीका है।लेकिन सब ऐसे नहीं हैं। नये समय में नई तकनीक आ रही है। एक दिन एक सज्जन मुझे उलटे चलते हुए मिले। सहज कौतुहलवश मैंने पूछ लिया –महोदय यह क्या?
-यह वक्त के खिलाफ़ चाल है।महोदय ने कहा।
-कौन से समय के विरुद्ध ? मैंने पूछा।
-इस क्रूर समय के खिलाफ जिससे हम गुज़र रहे है।बात में कविताई थी सो बात ठीक से पल्ले नहीं पड़ी।पर मैं इतना समझ गया कि बंदा पहुंचा हुआ है।
वह निरंतर उलटा चलता रहा।मैं सवाल दर सवाल पूछता सीधे-सादे तरीके से उसके पीछे- पीछे।कुछ ही देर में मीडिया वाले कैमरा और माइक लेकर आ गये। उन लोगों ने मुझे धकिया कर पीछे किया।मैंने उसके पास जाने की कोशिश की।उन्होंने मुझे रोक दिया,कहने लगे-आपका काम वॉक करना है।उसे चुपचाप करते रहें। ज्यादा बड़बड़ न करें।
-हम भी मुंह में जुबान रखते हैं ….मैंने मिर्ज़ा मरहूम के मार्फ़त अपनी बात कहने की कोशिश की।
-ऐसी बल्लीमारान वाली सीधी-सादी बात अब कौन सुनता है मियां।मुद्दा उठाने-धरने का शौक फरमाते हैं तो कुछ ऑफबीट करो। जरा कुछ उलटा-पुलटा करो ना।
मुझे पता नहीं यह बात मीडिया वालों के हज़ूम ने कही या मेरे मन ने। पर मैंने साफ़-साफ़ यह बात तब सुनी जरूर।
@निर्मल गुप्त

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