भूकम्प आया तो क्यों आया


दिल्ली हिली।भूकम्प आया।यह पता नहीं कि कौन सी बात पहले हुई।अफगानिस्तान के हिन्दुकुश इलाके में हिंदुत्व के होने का पता पहले लगा या लुटियन ज़ोन में रखी अटकलों की  लुटिया पहले छलकी।लेकिन कुछ न कुछ हुआ ज़रूर जो लोग बिना हिलेडुले एक दूसरे से पूछने लगे- व्हाट हैप्पिंड।फ़ोन घनघना उठे।व्हाट्स एप पर चिंताओं की चीलें चिंचियाने लगीं।आशंकाओं की फिरकनी घूमने लगी।फेसबुक अचानक गुलज़ार हो गया।गुलज़ार जी का  गीत याद आने लगा- इब्नबतूता पहन कर जूता।दिक्कत तब आ खड़ी हुई कि उनकी उलटबांसियों जैसी कविताओं को लेकर लोगों के भीतर फिट मैमोरी कार्डों ने बगावत कर दी।तब मुनव्वर राणा बहुत याद आये।पर समस्या यह पैदा हुई कि उनके अशआरों में से कौन से वाले याद किये जाएँ और किन्हें दरकिनार किया जाए।इस बंदे के बारे में यही पता नहीं कि वह आखिर कौन से पाले में खड़ा है।भूकम्प के खिलाफ या उसके समर्थन में।
दिल्ली में  भूकम्प आया तो भरी दोपहरी में आया।लंच टाइम के बाद तब आया जब शहर की औरतें डबल बैड पर लेट कर टीवी के रिमोट से घरेलू राजनीति के दांवपेंच सीखती हैं।आदमी अपने-अपने दफ्तरों में खाना खाकर ऊँघने के लिए मौका तलाशते हैं।दिहाड़ी मज़दूर हमेशा की तरह काम में जुटे होते हैं।छोले भटूरे वाला काम निबटा कर कढ़ाई मांजने की जुगत में होता है। चाय वाला व्यस्त रहता है।चायवाले अमूमन सबसे अधिक बिजी रहते हैं। उनके सपनों और बातों का भगौना हरदम खदबदाता रहता है।
भूकम्प आया तो सही। पर बेवक्त आया।इसे आना ही था तो कायदे से आता।पहले से बता कर आता।दरवाजा नॉक करके या गला खंखार कर आता।भलेमानस की तरह आता।
सोशल मीडिया वालों को तैयारी का मौका देता।उन्हें पहले से पता होता तो चाणक्य की तस्वीर के साथ अपने कथोकथन इधर-उधर चिपकाते।तुहर की दाल से भूकम्प का नाता जोड़ते।उत्तर भारत वाले बताते कि जब तक अरहर तुहर की दाल नहीं बनी थी तब तक भूकम्प आता भी था तो कितने सलीके से आता था।
खैर भूकम्प को आना था, सो आ गया।रिक्टर स्केल पर चाहे जिस तरह से आया ,धरती की सतह पर आकर ठिठक गया। कुछ दीवारें ,चंद पंखे और ड्राइंगरूम में रखे एकाध एक्वेरियम का पानी हिला कर चला गया।कुछ और चीजें भी हिली होंगी पर पूर्वसूचना न होने से सेल्फीवीर उनकी तस्वीर लेने से चूक गये।
अब सबको पता लग गया है कि अच्छा समय और भूकम्प कभी भी आ सकता है।इसलिए मोबाइल की बैटरी हर समय फुल रहनी चाहिए ताकि फेसबुक पर स्टेट्स फटाफट अपडेट किया जा सके।ऐसे मौकों के लिए अनमोल वचनों का रेडी स्टॉक डेस्कटॉप पर हिफ़ाज़त के साथ रखा होना जरूरी है।यही वह मौका होता है जब किसी को भी सराहा या गरियाया जा सकता है।भूकम्प से हानि हुई तो यह सरकार निकम्मी है। बच गये तो यह सरकार के सद्कर्म है।बाल ही बाल बचे तो इसका श्रेय खानपान की आदत,पूजा पद्धति या ऊपरवाले को दिया जा सकता है।
भूकम्प आने की भनक मिलते ही कुछ लोगों का तुरंत पता लग गया कि इसमें अतिवादी संगठनों  द्वारा फैलाई गयी धार्मिक असहिष्णुता का हाथ है।भूकम्प से दिल्ली हिली है तो पूरे मुल्क के भीतर भी कुछ न कुछ विचलन हुआ ही होगा।
बिहार के अलावा अन्य राज्यों में इसका  क्या असर हुआ ,यह बात ज़रा देर से पता लगेगी। अलबत्ता बिहार अपना हाल मतगणना वाले दिन बता देगा।

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