झपकी क्यों खटकी ?


एक आधुनिक तानाशाह राजा ने अपने दरबारी मंत्री को इसलिए तोप से उड़वा दिया क्योंकि वह दिन के समय अपने कार्यालय में बैठा हुआ खुल्लमखुल्ला झपकी ले रहा था । पता लगा है कि वह सिर्फ इतना ही नहीं कर रहा था वरन सपने देखने की कोशिश भी कर रहा था । नींद को तो फिर भी बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन सपने देखना तो कतई कदाचार है । कदाचार से भी बढ़ कर शतप्रतिशत राजद्रोह । ऐसे में उसे वही दण्ड मिला जिसका वह पात्र था । राजे महाराजे इनाम इकराम पद ओहदे और सजा देने में कभी कृपणता नहीं बरतते । इतिहास इस प्रकार की ‘दरियादिली’ को सदियों तक याद रखता है । वह शाबाशी आदि को तो दर्ज करने में भले ही चूक जाये पर सख्त किस्म की न्यायप्रियता को स्वर्णिम अक्षरों में संजो कर रखता है ।
यह बात सबको ठीक से पता रहनी चाहिए कि गहरी नींद में बांसुरी बजाने और सपने देखने का काम राजसी होता है और इसका विशेषाधिकार सिर्फ राजा टाइप लोगों के पास सुरक्षित रहता है । प्रत्येक राजा के भीतर कमोबेश नीरो नाम का निष्णात बांसुरीवादक रहता है । जनता का सम्यक कर्तव्य है कि वे अपने राजा के स्वप्न साकार करने के लिए चौबीस पहर जागती रहे । अपने उद्यम में व्यस्त रहें । निरंतर ‘जागते रहो जागते रहो’ का उद्घोष सजगता से करे कि राजा की नींद में खलल न पड़े ।
राजहित में राजा को भरपूर नींद का मिलना जरूरी है । जनहित में जनता का हरदम जागते रहना अपरिहार्य है । सपने देखने और दिखाने का काम राजा का है । जनता का काम है इन बड़े बड़े सपनों की गाथा सुनकर पुरजोर तालियाँ पीटते हुए जय हो जय जय हो का नारा लगाना । जिसका जो काम है वह करे । अपना काम पूरे मनोयोग से करे । दिलोजान से करे । निजी सपने देखने का दुस्साहस न करे । तमाम तानाशाहों को पता है कि अतीत में अनेक झंझटो का एपिसेंटर सपनों में रहा है । इन सपनों की चिंगारी से ही सीले हुए पलीतों से विद्रोह की दावानल भड़की है । मासूम से लगने वाले सपने सही वक्त आने पर घातक विस्फोटक बन जाते हैं ।
सपने धीरे धीरे बेहद खतरनाक रूप अख्तियार करते जा रहे हैं । अब ये आँख और नींद की परिधि से बाहर आते जा रहे हैं । अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि सपने वही साकार होते हैं जो किसी नींद के मोहताज नहीं होते । यानि अब सपने बिना सोये भी देखे जाने लगे हैं । इसे केवल प्रेमिका प्रेमी जैसे लिजलिजे इश्क के होलटाइमर ही नहीं देखते वरन अन्य जुझारू कडियल युवा भी बाकायदा देखने लगे हैं । सपने देखना अब केवल कारोबार नहीं रहा ,राजनीतिक और सामाजिक सरोकार भी बन गया है । सपने असाध्य संक्रामक रोग बनते जा रहे हैं । किसी सुपरबग के जरिये फैलने वाली वैश्विक बीमारी ।
आजकल तमाम तामझाम और सात पहरों के बीच सोते हुए राजा कच्ची नींद के बीच इस आशंका से हडबड़ा कर जाग जाते हैं कि प्रजा ने बिना पलक झपकाए सपने देखने की तकनीक विकसित कर ली है ।
राजा ने झपकी लेने वाले अपने दरबारी को तोप के गोले से मार तो गिराया लेकिन इतना सब होने पर भी उसके भीतर के सपनों का समूल नाश हुआ ,इसकी कोई कन्फर्म खबर उसके पास नहीं है ।
सपने इतनी आसानी से कहाँ मरा करते हैं । तोप तलवार बंदूक बारूद के वार दर वार होने के बावजूद ये किसी न किसी प्रकार जिन्दा बने रहते हैं ।

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