एक्टर को मिली सजा के आजू –बाजू

जेल जाना किसी के बड़ा कलाकार होने की सही शिनाख्त होती है ।जेल जाता हुआ एक्टर उदारमना हो जाता है । उसकी पलकें बार बार भीग जाती हैं ।फैसला आते ही उसकी दबंगई काफूर हो जाती है ।वह बडबडाता है कि इस मुकदमे से हमारे भीतर इतने छेद हो गए  कि समझ में नहीं  आ रहा कि हम किस छेद से जेल को निहारें और किससे वकील और जज  की ओर जमानत के लिए उम्मीद से देखें  ।इस कन्फ्यूजन के समय में वह महामानव और आम आदमी के बीच लगातार आवाजाही करता हुआ बड़ा दयनीय लगता  है । उसकी सिक्स पैक वाली देह यकायक ढीली पड़ जाती है ।
नामवर एक्टर सिर्फ आदमी भर नहीं होता वह अरबों रुपये का चलता फिरता व्यवसाय होता है ।रुपहले परदे पर उसकी हर अदा और डायलॉग डिलीवरी पर जनता झूम -झूम जाती है ।वह नाचता है तो करोड़ों लोगों के पाँव थिरकने लगते हैं ।।वह विलेन को पीटता है तो जनता को लगता है कि देश -दुनिया की समस्त बुराईयों की ढंग से धुलाई हो रही है ।वह कोल्डड्रिंक की बोतल का ढक्कन भर खोलता है तो अपनी -अपनी ऊब में सिमटे हुए लोगों को जिंदगी में नयनाभिराम तूफ़ान के आने की प्रतीति होती है ।
फैसला आ गया है ।मसखरे नेपथ्य में सदियों पुराना  बाल -गीत पूरे सुर ताल और लय के साथ गा रहे हैं –पोशम्पा भाई पोशम्पा ,सौ रूपये की घड़ी चुराई ,अब तो जेल में जाना पड़ेगा ।वे झूठ -झूठ गा रहे हैं ।झूठमूठ गाते हुए सुनाई दे रहे हैं । मसखरी कर रहे हैं । एक्टर जी ने  किसी की घड़ी -वडी नहीं चुराई ,बस जल्दबाजी के चलते कुछ लोगों की जिंदगी की घड़ी बंद कर दी थी ।वह भी ऐसे लोगों कि जिनके जीने और मरने में कोई खास फर्क नहीं होता ।वास्तव में उन्होंने किसी को नहीं मारा लोग खुद –ब –खुद उनकी मोटरकार के पहियों के नीचे कुचलने के लिए आ गए थे ताकि उनका परलोक सुधर जाये। गरीब और बेसहारा लोग इस तरह से भी अपनी बैकुंठ यात्रा का रास्ता पा लेते हैं।  
आदलती फैसले ने उनके मन को  खौफ  से  भर दिया है । वह सोच रहे हैं कि  यह कैसा डर है ,जिसके आगे -पीछे ,ऊपर -नीचे केवल अकेलापन  और निराशा ही दिख रही है ।तभी उनके एक शुभचिंतक ने याद दिलाया –भाई टेंशन नहीं लेने का ।जेल के आगे बेल तो होती ही है ,उसके सिवा सजा के आजूबाजू पैरोल भी होती है ,फरलो होती है ,फ्रेंच लीव होती है ।
एक दबंग एक्टर को सजा का ऐलान होने का फ्यूचर टेंस हमेशा जेल जाना  नहीं होता ! उसे आननफानन में अंतरिम जमानत भी मिल जाती है , जितनी देर में आम आदमी कोर्ट परिसर में फोटोस्टेट की दुकान नहीं ढूँढ पाता  । मल्टीप्लेक्स में सिनेमा टिकट पाने के लिए सही खिड़की नहीं मिल पाती ।  क्रासिंग की ट्रेफिक  लाईट हरी और लाल होते रहने के बावजूद वाहन एक ही जगह जमे रहते हैं । जब तक गोलगप्पे वाला हज़ार के नोट के छुट्टे ठीक से लौटा नहीं पाता ।
कानून के हाथ लम्बे होते हैं लेकिन इतने निर्दयी नहीं होते कि एक्टर की रियल स्टोरी में रील स्टोरी वाले ट्विस्ट की आवाजाही को रोक ले। इनकी निजी जिंदगी के अंत अनिवार्य रूप से सुखांत होते हैं।   

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