बयानों के कुल्ले और उसका पेटेंट



खबर है कि एक विदेशी टूथपेस्ट कम्पनी कुल्ले करने की भारतीय परम्परा का पेटेंट अपने नाम कराने की कोशिश कर रही है।  इस खबर को सुनते ही मुल्क भर के कुल्ला प्रेमी नींद से जाग उठे हैं और अपनी अपनी समझ के अनुसार कुल्ले पर कुल्ले कर रहे हैं।  लोगों को लग रहा है कि कुल्लों के जरिये सिर्फ मौखिक स्वास्थ्य की ही नहीं  सामाजिक सरकारों की नए सिरे से व्याख्या हो सकती है।
कुल्ला करना मुल्क भर की हर समस्या पर बयान देने जैसा हमारा जन्मना अधिकार है।  अभी  हम बयान देने के लिए किसी उपकरण या परमीशन  के मोहताज नहीं।  जिसको जब जहाँ मौका मिलता है वह वहां बयान उलट देता है।  इस काम के लिए चैनल उपयुक्त जगह है।  लेकिन वहां यदि स्थान न मिले तो फेसबुक ट्विटर आदि पर अपनी उलटबांसी को मजे से उसी तरह टिकाया जा सकता है जैसे ऑफीशियल पार्किंग में जगह न मिलने पर गाड़ी को किसी के मंदिर ,मज़ार या मस्जिद के आसपास चुपके से पार्क किया जाता है।यह काम करते हुए धार्मिकता ठीक उसी तरह कभी आड़े नहीं आती जैसे इन स्थानों की जमीन हथियाने में धर्म कभी रोड़े नहीं अटकाता। यह काम लोग बेहद श्रृद्धाभाव से करते हैं।     
कुल्ले करते रहने से मसूड़े सुदृढ बनते हैं।  दांतों के आभामंडल में इजाफ़ा होता है।  बयान देते रहने से मुल्क का सेक्युलर बाना रफू होता रहता है। हस्ताक्षरित स्टेटमेंट जारी करने से आदमी की छवि उज्ज्वल बनती है। ऐसे बयानों का विरोध करने से देशभक्ति की व्याख्या होती है।  बम विस्फोट में मारे गए लोगों की आत्माएं शर्मिन्दा होती हैं।  उन्हें लगता है कि वे इस तरह से क्यों मरे ? यदि मरना अपरिहार्य था तो किसी सेलेब्रिटी की भारीभरकम गाड़ी से कुचल कर पूरी आनबान शान से मरते। इससे बेहतर तो यह रहता कि कुछ इस तरह मरते कि किसी को इसकी कानोंकान खबर नहीं होती ।कीड़े मकोडों की तरह मर जाते ,चुपचाप। हालाँकि कीट पतंगे भी मरने से पहले खूब संघर्ष करते हैं।  फिर भी आदमी को न ढंग जीना आ पाया है और न मरना।  
लोगों को लगता है कि कुल्ले करना और बयान देना भी भला कोई काम जैसा है। कुल्ला वो जिसका द्रव किसी के कीमती कपड़े खराब कर दे और बयान ऐसा जो मुल्क का अमन चैन खत्म कर दे। मुहँ में थोड़ा पानी और कुछ तेजाबी शब्द भर कर उसे  बाहर बिखेर भर देने से बात नहीं बनती। उपयुक्त समय और स्थान पर जो काम किया जाता है उसके नतीजे विस्फोटक होते हैं।  पर इसे करने का सलीका न पता हो तो झंझट खड़ा हो जाता है। बयान तो फिर भी वापस लिया जा सकता है लेकिन मुहँ से बाहर आया कुल्ले का द्रव वापस नहीं होता। कुल्ले अधिक सनसनीखेज होते हैं।  
कुल्ले का साथ बयान देने का पेटेंट होना वाकई जरूरी है।  कोई फ्री में बयानों के कुल्ले क्यों करता फिरे , यदि ये काम इतना जरूरी ही है तो ऑन पेमेंट करो न !



इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जलीकट्टू और सिर पर उगे नुकीले सींग

भगत जी ,जगत जी और मस्तराम की पकौड़ी

शराफ़त नहीं है फिर भी....