अगले जन्म मोहे इंजीनियर ही कीजो .....
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उनके यहाँ से दो ढाई किलो हीरे मिले ।लोगों के घरों में तो दो ढाई किलो प्याज या आलू तक बमुश्किल तमाम मिलते हैं।इंजीनियरजी  हमारे समय के नायाब कीमियागर हैं ।उनके पास हुनर है कि जिस काली चीज को ढंग से छू भर लें तो वह हीरे में तब्दील हो जाती है।काला धन हो या श्यामल मन ,सब चमकता हुआ हीरा बन जाते हैं।और चमक भी कितनी बहुरंगी कि उसकी चकाचौंध के आगे समस्त राजनीतिक मतवाद एकाकार हो जाते हैं ।सारा प्रशासनिक तंत्र कोर्निस करने लगता है ।सारे नियम- कायदों की किताब में से रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है।
इंजीनियरजी हमारे समय के सबसे चमकदार आइकन हैं।उन्होंने धन अर्जित करने के  अपने अभूतपूर्व कौशल और मेधा से इतिहास रच दिया है।भावी टेक्नोक्रेट्स के लिए वह प्रात: स्मरणीय बन गए  हैं ,प्रेरणा का अजस्र स्रोत ।वक्त की शिला पर लिखी गई अमिट सक्सेस की गजब दास्तान।लोगों की कामनाओं में वह रच बस गए हैं।लोक में -अगले जनम मुझे इंजीनयर ही कीजो.....की स्वर लहरी गूँज रही है ।
इंजीनियरजी के पास क्या नहीं है और क्या क्या नहीं मिला इनके पास।जो मिला उससे अधिक इधर उधर रखा रह गया।बस ढाई किलो हीरे ,डेढ़ क्विंटल सोना ,दस बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ ,सौ हेक्टेयर आवासीय भूखंड ,एक सौ पिचासी फ़्लैट आदि का ही पता लगा।वह तो अपने आप में किसी बैंक के चलते फिरते स्ट्रांगरूम में रखे सामान जैसे हैं।हमारी पारदर्शी सर्वजनिक कार्य प्रणाली का आइना हैं।उनके जैसा बन पाना अनेक लोगों का ख्वाब है।वह हमारी कामनाओं  के ब्रांड एम्बेसडर है।
यह अलग बात है कि इंजिनीयर जी का सरमाया सार्वजनिक हो जाने से मुल्क भर के अवर अभियंताओं की जान सांसत में फंस गई है।सिर्फ जूनियर टाइप लोगों की ही जान झंझट में नहीं उलझी वरन अन्य चीफ के पद तक पर शोभायमानों  के हाल खराब हैं।उनकी पत्नियाँ उन्हें रात दिन यह कह कर उलाहना देती नहीं थकती कि तुम्हारे बस की न है कुछ करना धरना।उन्हें देखो न, उनकी घरवाली को अपने जेवरों को उठाने के लिए कुली बुलाने पड़ते हैं।और एक तुम हो ,बीस तीस ग्राम का जड़ाऊ हार  खरीदते हुए हांफ जाते हो।उनकी पर्सनेलिटी देखी है कभी ? तुम भी जिम जाया करो जिम।कुछ करा करो ,करने से ही  होता है।
इंजिनीयर बनना आसान हो सकता है लेकिन पद पाकर  इंजीनियरजी बनने के  बाद धन सम्पदा एकत्र करने की इंजीनियरिंग कर पाना कठिन होता है । सरकार के लिए सड़क ,फुटपाथ ,पुलिया ,मकान आदि बनवाते हुए यह भी जानना पड़ता है कि ठेकेदार से मिलीभगत से कितनी पूँजी निजी जेब तक किस तकनीक से बने  रज्जू मार्ग से कैसे पहुँचेगी।मिल- बाँट कर खाने खिलाने का पूरा ब्लू प्रिंट बनाना पड़ता है।राजनेताओं के घर गांव तक उनकी चाहतों के पुल विकसित करने होते हैं।काले धन को कार्बन का शुद्धतम रूप मानकर उन्हें हीरे में तब्दील करना पड़ता है।धन क्षणभंगुर होता है।हीरा सदा के लिए होता है।उसकी चमक कभी धूमिल नहीं होती।वह हर हाल में चमकता है।समय गुजरता जाता है लेकिन हीरे पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।हीरा आत्मा जैसा होता है –अम्रर ,अविनाशी और अदभुत।
इंजीनियरजी जीते जी इतिहास पुरुष बन गए हैं ।उनका कृतित्व और व्यक्तित्व अनुपम हीरे की तरह सदियों तक यूँही जगमगाता रहेगा।

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