भुजंग डियो नहीं लगाते !


सुशासन जी यह खूबी है कि वह कभी गोलमोल बातें नहीं करते। जब कभी मौका मिलता है तो एकदम खरी खरी कह देते हैं। यह अलग बात कि उनके निंदकों को उनकी बातें खिसियानी हंसी में लिपटी उलटबांसी जैसी लगती हैं। निंदकों की समझ की  सीमा और राजनीति जरा हट कर होती है। बातों ही बातों में उन्होंने खुद को चन्दन कहा तो त्वरित प्रतिक्रिया हुई , अपने मुहँ मिया मिटठू। साथी जी को भुजंग कहा तो जवाब मिला कि हो सकता है कि वह हों। इस बहुरुपिया समय में कुछ भी सम्भव है। लेकिन चन्दन से लिपटे रहने की जब बात आई तो आवाज़ आई कि यह बात कुछ पची नहीं। मान्यवर , रहीम के ‘चन्दन विष व्याप्त नहीं’ वाले दोहे पर नए सिरे से विचार करें।रहीम ने जब यह बात कही होगी तब तक विज्ञान और तर्क शास्त्र इतना विकसित नहीं था। उन्होंने जो कहा लोगों ने सहज भाव से उसे मान लिया।तार्किकता के अभाव में लोगों के गर्दनें बड़ी जल्द सहमति मोड में आ जाती हैं। लेकिन अब हालात बदल लिए हैं। भुजंग  चन्दन से लिपटना तो दूर उसके आसपास फटकते भी नहीं। होशियार लोग और सांप इतनी एहतियात तो बरतते ही हैं। उनके बारे में कन्फर्म जानकारी यह है कि उन्हें चंदन की गंध हो या लड़कियों को रिझाने वाले  डियो, कतई नहीं भाते । वे तो अपनी फुफकार से ही प्रेम के इजहार , नफरत के प्रदर्शन और खौफ के संचार का काम चला लेते हैं। अलग- अलग समय पर अलग -अलग गंधों की जरूरत तो बस नेताओं को पड़ती है। जैसा अवसर हुआ वैसी सुगंध अपने तन से लपेट ली। चुनाव नजदीक दिखे तो सेक्युलर ब्रांड का इत्र छिडक लिया वरना  कोई खांटी कम्युनल सुगंध देह पर लगा कर धर्म लाभ लेते रहे। एक ही तरीके की गंध के साथ राजनीतिक मनोकामनाएं पूरी नहीं हुआ करतीं।
चंदन तस्कर वीरप्पन के इस फ़ानी दुनिया से कूच कर जाने के बाद से चंदन का ग्लैमर अब पहले जैसा रहा भी नहीं। इसलिए कोई सांप उससे चिपट कर क्यों रहेगा भला ? हालाँकि जानकार सूत्र बताते हैं कि वीरप्पन के जीते जी ही चंदन की सुवास का तिलस्म टूटने लगा था। इसलिए बाद के सालों में उसने अपना ध्यान हाथियों के उन दांतों की ओर लगा दिया था जो सिर्फ देखने दिखाने के लिए होते है। वह भविष्य दृष्टा था उसे पता था कि बाज़ार में गंध के मुकाबले दिखावटी चीजों से अधिक मुनाफा प्राप्त होता है। हमारे राजनीतिक सरोकार भी अब हाथीदांत सरीखे जैसे ही हो चले हैं। उसका चाल चेहरा और चरित्र भी हाथी की तरह वजनदार हो गया है।
 यह अधिक सत्य बोलने और व्यवहार में लाने का उपयुक्त समय नहीं है। स्पष्टवादिता आपकी जान झंझट में फंसा सकती है। सुशासन जी भी इस बात को अच्छे से समझते हैं। वह इस  अर्धसत्य से ही काम चलाने के पक्ष में खड़े दिखे  कि भुजंग के कुसंग से सज्जनों का कुछ नहीं बिगड़ता। तब तक तो कतई नहीं जब तक कि संग साथ के लिए तमाम तरह के विकल्प मौजूद हों।
अर्द्धसत्यों के जरिये, न चाहते हुए भी ,बड़े रहस्य और राजनीतिक प्रहसन प्रकट  होते रहे हैं।

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