हिंदी दिवस और सत्ता के चमचमाते जूते



हिंदी दिवस पर उस वक्त मेरा मन एकदम ‘हिंदी हिंदी’ हो गया जब एक वयोवृद्ध लेखक पुरस्कार प्राप्त करते समय झुकते-झुकते इनाम प्रदाता के सामने लगभग लम्बवत हो गये।यदि कोई और दिन रहा होता तो इस परिदृश्य को निहार कर मेरा अंतस ‘गार्डन गार्डन’ हो गया होता। वर्ष के शेष तीन सौ चौंसठ दिन मेरा दिल अभिव्यक्ति के नाम पर भाषाई भेद को नहीं मानता। हिंदी ,अंग्रेजी, उर्दू ,संस्कृत या पंजाबी में जैसे चाहे अपनी खुशी प्रकट कर लेता है। वह प्रसन्नता भी क्या प्रसन्नता जिसे सामने लाने के लिए गणित के जटिल सूत्र को हल करने जैसी माथापच्ची करनी पड़े। इन शेष दिनों में मेरा लेखक बेहद उदारमना रहता है। हिंदी को भी अंग्रेजी की तरह शब्दों को घुमा घुमा कर बोलता है। मुझे पता है कि हिंदी अंग्रेजी लिबास में अधिक जंचती है।
सत्ता का सान्निध्य पा हिंदी की रचनाधर्मिता अकसर भावुक हो उठती है। हमारे गहरे तक जड़ें जमाए संस्कार ठीक उसी तरह खिल उठते हैं जैसे ओस का स्पर्श पाते ही शंखपुष्पी। हम हाथ मिलाते मिलाते सत्ता के चमचमाते जूते के स्पर्श के लिए आतुर हो झुक जाते हैं।झुकी हुई भाषा तनी हुई भाषा के मुकाबले अधिक संभावनाओं से भरी और गरिमामय लगती है।भाषा के ग्लोबलाइजेशन के लिए सिर्फ नम्रता का होना नहीं उसका मंचीय होकर सबको दिखना भी जरूरी होता है। इससे ही भाषा और आदमी का गौरव बढ़ता है।
हिंदी के पास अब मौके ही मौके हैं।उसे आगे बढ़ना और सबको पछाडना है तो लचीलापन अपनाना होगा। सरकार से नजदीकी का जब मौका मिले उसका भरपूर इस्तेमाल करना होगा। सबको पता है कि भाषाई कौशल राजकीय संरक्षण में पनपता और पल्लवित है। साहित्य सत्ता के बगलगीर होकर नयनाभिराम लगता है ,जैसे मूंग की दाल प्याज लहसुन का छोंक लगने से स्वादिष्ट बन जाती है। रचनाकार सरकार से इनाम इकराम और पुरस्कार पा कर चिरयुवा होने का ख्वाब देखता है। उसे इच्छा मृत्यु जैसा वरदान टाइप कुछ मिल जाने की प्रतीति होता है। वह उम्र के आठवें दशक में एक अदद प्रेयसी के लिए आकुल हो उठता है।
हिंदी अब धीरे- धीरे दुनियादार होती जा रही है। वह खुद को बाजार की मांग के अनुरूप बनाने में लगी है। उसके लेखक खुद को मार्केट फ्रेंडली बना रहे हैं। वे कुशल सेल्समैन बनने की फ़िराक में हैं।उन्हें पता चल गया है कि हर अवसर का भरपूर लाभ लेना चाहिए। उम्मीद यदि चरणरज में दिखे तो उसे भी माथे पर सजाने में हर्ज ही क्या है। वैसे भी राजसी चरणों की कोई धर्म जाति मजहब या आयु नहीं होती। वे सनातन होते हैं। सार्वभौम होते हैं। ईश्वरीय उपस्थिति की तरह सर्वव्यापी होते हैं।इन चरणों की जब भी मौका मिले उतनी बार वंदना कर लेनी चाहिए।पता नहीं किसने कह दिया था कि झुके हुए सिर मुकुटधारिता के अनुकूल नहीं होते जबकि सच यह है कि मान सम्मान उन्हीं को प्राप्त होता है जिन्हें सिर नवाने की कला और उपयुक्त चरणों की सम्यक वंदना का सलीका आता है।

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